महाभारत युद्ध समाप्त हुआ और अनेक वर्ष शासन करने के बाद पांडवों ने महाराज परीक्षित को राजगद्दी सौंप दी और वे वन में चले गए l महाराज परीक्षित के शासनकाल में ही कलियुग का धरती पर आगमन हुआ l कलियुग को सम्पूर्ण धरती पर उत्पात मचाते देख महाराज परीक्षित ने उसे आदेश दिया कि वह केवल पांच स्थानों पर ही रह सकता है , इनमे सबसे प्रमुख है --- स्वर्ण अर्थात धन -संपदा l धन -संपदा की अति होने पर वहां कलियुग रहता है जो मनुष्यों की बुद्धि भ्रष्ट कर देता है जिससे अन्य सभी बुराइयाँ वहां खिंची चली आती हैं और फिर वह व्यक्ति हो , परिवार हो , संस्था हो , सरकार हो --उसे पतन के गर्त में धकेल देती हैं l कलियुग में मनुष्यों के विकार , मानसिक विकृतियाँ अपने चरम पर होती हैं इसलिए प्रकृति की एक व्यवस्था समझ में आती है कि दाल में नमक के बराबर आप बेईमानी कर लो , अपनी इच्छाओं को पूरा कर लो और धन का एक भाग लोक कल्याण में लगाओ तो पाप -पुण्य का संतुलन बना रहेगा l आपका भी यश बढ़ता रहेगा और लोगों का भी हित होगा l लेकिन यदि दाल के नाम पर केवल नमक है , उसमे दाल नहीं है तब उसे प्रकृति बर्दाश्त नहीं करती l जैसे कोई एक बड़ी संस्था है उसको अपने उद्देश्य के लिए अपार धन दिया जाता है l अब उसके कार्यकर्त्ता उस धन में से किसी भी तरीके से अपनी भी इच्छाएं पूरी कर लेते हैं और अपने उद्देश्य के अनुसार शेष धन से प्रजा के कल्याण के लिए स्कूल , अस्पताल , धर्मशाला आदि का निर्माण करते हैं , निर्धनों और निम्न वर्ग के लोगों को सिर उठाकर जीने का मौका भी देते हैं , पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिए पेड़ -पौधे लगाना , सामाजिक कुरीतियों को दूर करना आदि कार्य भी करते हैं तो यह मानव धर्म कहलाया , इससे उनका विस्तार होगा और यश भी बढ़ेगा l अब कलियुग तो है ही , हमें अपने जीवन में संतुलन बनाकर चलना होगा l