30 July 2026

WISDOM -----

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी   ' महापुरुषों  के  अविस्मरणीय जीवन  प्रसंग '  में  लिखते  हैं  ----- " वास्तव  में  अधिकार  पद  बड़ा  विडम्बनापूर्ण  होता  है  l  जब  तक  वह  सक्षम  और  समर्थ  है  ,  लोग  उसकी  झूठी  चाटुकारी  किया  करते  हैं   और  जब  वह  असहाय  और  विवश  होता  है  तो  तुरंत  आँखे  ही  नहीं  फेर   लेते  बल्कि  न  उठने  देने  के  लिए   दो  धक्के   और  दे  देते  हैं   l  "      --- विश्व  विजय की  कामना  लिए  हुए  जब  सिकंदर  फारस  देश  पर  आक्रमण  करने  जा  रहा  था  l  सहसा   एक  स्थान  पर  उसकी  तबियत  ख़राब  होने  लगी  , तुरंत  तम्बू  लगा  दिया  गया  l  सिकंदर  पेट  और  ह्रदय-स्थल  की  पीड़ा  से   छटपटाने  लगा  l  सिकंदर  के  साथ  यूनान  के  कई  सुयोग्य  हकीम  आए  हुए  थे  ,  उन्होंने  सिकंदर  के  शरीर   और  नाड़ी  की  परीक्षा  की   और  वे  हताश  हो  गए   l  उन्हें  विश्वास  हो  गया  कि  सिकंदर   चन्द  मिनटों  का  मेहमान  है  l  सिकंदर  असहाय  सा   हकीमों  और  सरदारों  की  ओर  सहायता  के  लिए  देख  रहा  था  l  इधर  सरदार  सहायता  से  यह  सोचकर  मुँह  छिपा  रहे  थे  कि  शायद  इसकी  मृत्यु  के  बाद  यह  अधिकार  हमें  मिल  जाए   और  हकीम  सोच  रहे  थे  कि  यदि  मेरी  दवा  लेने  के  बाद  मर  गया  तो  लोग  यह  संदेह  करेंगे  कि  इसे  मैंने  जानबूझ  कर  मार  डाला  ,  तब  बेकार  में  जान  आफत  में  फंसेगी  l  उन  सब  का  स्वामी  सिकंदर  मर  रहा  था   और  उसकी  मृत्यु  की  घड़ी  देखकर  सब  अपने -अपने  हित  की  सोच  रहे  थे  l  l  आचार्य  श्री आगे  लिखते  हैं  ---- "  जब  तक  शक्तिमंतों  की  भुजा  में  बल  ,  वाणी  में  प्रभाव  और  विस्तार  पर  नियंत्रण  रहता  है  ,  सभी  उसे  नमन  करते  हैं  ,  उसके  अत्याचार  को  वीरता  ,  अनीति  को  चातुर्य  और   शोषण  को  आवश्यकता  मानते  हैं    किन्तु  ज्यों  ही  उसकी  ये  विशेषताएं  समय  पाकर  क्षीण  हो  जाती  हैं  त्यों  ही  लोगों  के  मन  और  द्रष्टिकोण  बदल  जाते  हैं  l  लोग  निर्णायक  की  तरह  उसके  जीवन  तथा  कृत्यों  का  लेखा -जोखा  करने  लगते  हैं  ,  उसके  गुण  नीचे  पड़  जाते  हैं  और  सारे  दोष  उभर  आते  हैं  l  "  आचार्य श्री  लिखते  हैं  ---"सिकंदर  का  जीवन  इस  सत्य  को  सिद्ध  करता  है  ,  सिखाता  है  कि  बड़े  आदमी  बनने  की  अपेक्षा  महान  कार्य  करने  की  कामना  हजार  गुनी  श्रेष्ठ  है  l  "  

29 July 2026

WISDOM -----

   कहते  हैं  जो  भी  महाभारत  में  है  , वही  इस धरती  पर  है  l   सब  कुछ  वैसा  ही  है  ,  यह  हमारा  विवेक  है  कि  हम  क्या  सीखते  हैं  l  कौरवों  के  कुलगुरु  थे  --- कृपाचार्य  l  दुर्योधन  ने  जीवन  भर  जितने  षडयंत्र  किए  , छल -कपट  किया  ,  कुलगुरु  होने  के  नाते  वे  दुर्योधन  को  ऐसा  करने  से  रोक  सकते  थे  ,  धृतराष्ट्र  को  भी  समझा  सकते  थे  कि  ऐसा  अन्याय  न  करें  , इसका  परिणाम  अच्छा  नहीं  होगा    लेकिन  उन्होंने  ऐसा  नहीं  किया   क्योंकि  उन्हें  राजसी  सुख  भोग  की  आदत  हो  गई  थी    और  दुर्योधन  के  विरोध  का  मतलब  था   उन  राजसी  सुखों  से  वंचित  हो  जाना  l  ऐसे  ही  संत  -महात्मा  आज  के  समय  में  भी  हैं  ,  उन्हें  अपनी  दुकान  की  चिंता  है  ,  वे  सब  शक्ति   और  धन -वैभव  संपन्न  लोगों  को  खुश  करने  में  लगे  रहते  हैं  l  इस  युग  में   जिनके  पास  पद -प्रतिष्ठा  है  , धन  संपन्न  हैं   वे  भी  सोचते  हैं  की  जितनी  चाहे  मनमानी   कर    लो  , पापकर्म  कर  लो   फिर  बड़े -बड़े  संत -साधकों  से  पूजा  - पाठ  करा  लेंगे  जिससे  सारे  पाप  धुल  जाएंगे  l  मन्त्र  की  और  विधि -विधान  से  पूजा -पाठ  की  ऐसी  शक्ति  भी  है   कि  ऐसा  होता  भी  है   और  ऐसे  लोगों  के  सुख - वैभव  में  कहीं  कोई  कमी  नहीं  आती  l  लेकिन  जो  साधक - संत  उनके  लिए  इतनी  तपस्या  करते  हैं  , इसके  लिए  उन्हें  पर्याप्त  धन -राशि , मान -सम्मान  तो  मिल  जाता  है  लेकिन  कहते  हैं  इसमें  उनके  पुण्यों  का  एक  बड़ा  हिस्सा  भी  चला  जाता  है  l  अब  वे  विभिन्न  नेक  कर्मों  से  इसकी  क्षतिपूर्ति  कर  लें  तो  ठीक  है  अन्यथा  उन  संत -साधकों  का  पतन   शुरू  हो  जाता  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ---- अत्याचारी , अन्यायी   और  मर्यादाहीन  आचरण  करने  वालों  का  कभी  भी  साथ  न  दें  ,  ऐसे  लोग  स्वयं  तो  डूबेंगे   और  जो  भी  उनके  साथ  है  , उन  सब  को  ले  डूबेंगे  l  महात्मा  विदुर  ने  दुर्योधन   के  गलत  कार्यों  का  कभी  समर्थन  नहीं  किया   राजमहल  के  सुख  छोड़कर   बहुत  साधारण  जीवन  जिया   l  विदुर  जी  की    सत्य -निष्ठा  और  सादगी  की  ऐसी  ताकत  थी   कि  स्वयं  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  दुर्योधन  के   स्वादिष्ट  पकवान  त्याग  दिए  और     विदुर  जी   के   घर  जाकर   साग -रोटी    खा  कर  ही  तृप्त  हो  गए   l  

27 July 2026

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   यदि  जीवन  में  कुछ  भी  खोने  का  भय  न   हो  और  मृत्यु  का  भी  भय  न  हो    तो  व्यक्ति  निर्भय  हो  जाता  है  l   वर्तमान  युग  का  जो  युवा वर्ग  है  ,  वह  ऐसा  ही  निर्भय  है  l    सामान्य  वर्ग   में  हम  देखें  तो  पुत्र  के  युवा  होने  पर  ,  उसकी  शिक्षा  पर  पर्याप्त  धन  खर्च  करने  के  बाद  माता -पिता  उसकी  ओर  बड़ी  उम्मीद  भरी  नज़रों  से  देखने  लगते  हैं  कि   बेटा  !  अब  कुछ  कमाने  लगो ,   अपनी  जिम्मेदारी  समझो  l  इस  उम्मीद  में  कई  वर्ष  बीत  जाते  हैं   फिर  भी  नौकरी  नहीं , कोई  निश्चित  आय  का  साधन  नहीं    तब   उस युवक  की  स्थिति  बहुत  दयनीय  हो  जाती  है  , अड़ोसी -पडोसी , रिश्तेदार   और  माता -पिता  भी  ताने  देने  लगते  हैं  कि  कुछ  कमाता  नहीं  है , बैठा  रहता  है  l  अब  वह  युवक  क्या  करे  ?  बहुत  मेहनत  कर  रहा  है  लेकिन  सब  व्यर्थ  है  l  बिना  कमाई  के  विवाह  भी  संभव  नहीं  है   और  यदि  विवाह  हो  गया  है  तो   बिना  कमाई  के   परिवार  में  कोई  इज्जत  नहीं  है  l  परिवार  की  आर्थिक  स्थिति   बहुत  साधारण  है   तब     रोजगार  के  बिना   युवा   का  जीवन  बहुत  कठिन  है  l  ऐसे  में  कुछ  निराश  होकर  आत्महत्या  कर  लेते  हैं , कुछ  पलायन  कर  साधु  बन  जाते  हैं l  कोई  बहकाने  वाला  मिल  जाये    तो  उनके  कदम  अपराध  की  ओर  बढ़  जाते  हैं  लेकिन  जो  जागरूक  हैं  और  आशावादी  हैं  , उन्हें  यदि  तिनके  का  भी  सहारा  मिल  जाए  तो  वे  अपने  नागरिक  अधिकारों  के  प्रति  जागरूक  होकर  ' करो  या  मरो '  पर  उतारू  हो  हो  जाते  हैं  l  उनके जोश  को  देखकर     जो  युवा  निराश  हो  चुके  हैं  , उनमे  भी  ऊर्जा  का  संचार  हो  जाता  है  l  संसार  के  कई  देशों  में  युवाओं  के  जोश  को  देखकर  ऐसा  लगता  है   जैसे  कार्ल  मार्क्स  की  आत्मा  ऊर्जा  बनकर  इन  सबके  भीतर समां  गई  है  , उन्होंने  कहा  था  --- संसार  के  मजदूरों  एक  हो  जाओ  , तुम्हारे  पास  खोने  को  कुछ  नहीं  है  ------------'   आज  का  युवा  बहुत  बुद्धिमान  है   और  संचार  के  आधुनिक  साधनों  ने  उनकी  ऊर्जा  को  और  अधिक  शक्तिशाली  बना  दिया  है  l  अब  यह  ऊर्जा  क्या  गजब  करेगी  यह  तो  आने  वाला  समय  बताएगा  l  

26 July 2026

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 महाभारत  के  विभिन्न  प्रसंग   हमें  शिक्षा  देते  हैं  , सिखाते  हैं  कि  कैसे  हमें   होश  में  रहकर  जीवन  जीना चाहिए  l  छोटी  सी  चूक  से  बहुत  बड़ा  नुकसान  हो  जाता  है  l  --महाभारत  का  युद्ध  समाप्त  हो  गया  था  l  दुर्योधन     ने    18  दिन  चले  इस  युद्ध  में  अश्वत्थामा  को  सेनापति  नहीं  बनाया  था  ,  संभवतः  यह  ईश्वर  का  ही  कोई  विधान  होगा   l  अब  दुर्योधन  युद्ध  भूमि  में    घायल  पड़ा  था   l     दुर्योधन  के  मरणासन्न  होते  ही    युद्ध  तो  समाप्त  हो  गया  था  लेकिन  उसकी  सेना  के  अश्वत्थामा  और  कृपाचार्य  तो  जीवित  थे  l  इधर  पांडव  विजय का  जश्न  मनाकर   शिविर  में  निश्चिन्त  होकर  सो  रहे  थे   l  वे  भगवान  श्रीकृष्ण  की  शरण  में  थे  इसलिए  निश्चिन्त  थे  l   उस  समय  श्रीकृष्ण  ने  शिविर  में  प्रवेश  किया  और  पांचों  पांडवों  को  अपने  साथ   शिविर  से  बाहर  नदी  किनारे  चलने  को  कहा  l  पांडव  आज्ञाकारी  थे  इसलिए  बिना  किसी तर्क  के  वे  श्रीकृष्ण  के  साथ  बाहर  निकल  गए  l  पांडवों  के  पाँचों  पुत्र  वहीँ  सो  रहे  थे  ,  उन्होंने  चलने  से   मना    कर  दिया  l    युद्ध  भूमि  में  दुर्योधन  की पराजय  देखकर  अश्वत्थामा  क्रोध    के  कारण  अपना  विवेक  खो  बैठा  और  अर्धरात्रि  में   उसने  पांडवों  के  शिविर  में  प्रवेश  कर   बहुत  उत्पात  मचाया  , कुछ  का  क़त्ल  किया   और  पांडवों  के   पांच    पुत्र  सो  रहे  थे  , उन्हें  अँधेरे  में  पांच  पांडव  समझ  कर  उसने  उनके  सिर  काट  दिए  l  अपना  विवेक  खो  देने  के  कारण  उसके  भीतर  की  आसुरी  प्रवृत्ति  जाग  गई  थी  , उसने  पांडवों   के    वंश  का  अंत  करने  के  लिए   उसने  अभिमन्यु  की  पत्नी  उत्तर  के  गर्भ  को  लक्ष्य  कर  ब्रह्मास्त्र  चला  दिया  था  ताकि  गर्भ  में  स्थित  पुत्र  का  अंत  हो  जाये  l  अश्वत्थामा  के  इन  सब  कृत्यों  का  क्या  परिणाम  हुआ  ,  इसकी  एक  पूरी  कथा  है   लेकिन  यह  प्रसंग  हमें  शिक्षा  देता  है  कि  ---  शत्रु    को  कभी  भी कमजोर  मत  समझो  ,  घायल  शत्रु  और  भी  खतरनाक  होता  है   और  वह  कैसी भी  रणनीति  बनाकर  फिर  से  आक्रमण  कर  सकता  है  l    युद्ध  में  कौरव  वंश  , उनकी विशाल  सेना    सभी  का  अंत  हो  गया  था   लेकिन  पांडव  यह  भूल  गए  कि  अभी  अश्वत्थामा  और  कृपाचार्य  जीवित  हैं  l  पांडवों  की  इस  भूल  ने  उन्हें  ऐसा  दुःख  दिया  जिसकी  भरपाई   अब  संभव  नहीं  थी  l  इसलिए  शत्रु  से  हमेशा  सतर्क  और  सावधान  रहना  चाहिए  l  

24 July 2026

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  इस  धरती  पर  जब  भी  अत्याचार , अन्याय  की  अति  हुई  है ,   ईश्वर  ने   किसी  न  किसी  रूप  में  यहाँ  अवतार  लिया  है  l  संसार  के  सभी  धर्मों  में   अनेक  महान  आत्माओं  ने  जन्म  लिया   और  पूरा  प्रयास  किया  कि  असुरता  का  अंत  हो  और   धरती  पर  सुख-शांति  हो  ,   मनुष्य      देवत्व  की  ओर   आगे   बढ़ने  का  प्रयास  करे  ,  मनुष्यता  से  नीचे  न  गिरे  l  इन  विभिन्न  प्रयासों  के  बावजूद  असुरता   का  अंत  नहीं  हुआ  l  अब  कहते  हैं  भगवान  कलिक  का  अवतार  होगा  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  कहा  है  --- अब  भगवान  का  अंशावतार  होगा  ,  ईश्वर  लोगों  की  चेतना  में  प्रवेश  करेंगे   l  उनका  कहना  है  कि  असुरों  को  मारने  से  असुरता  समाप्त  नहीं  होगी  ,  उनके  विचारों  में  परिवर्तन  जरुरी  है  l  '      असुर  कहीं  आकाश  से  यहाँ  नहीं  आए  ,  वे  सब  परिवार  से  ही  हैं  , धन -सम्पन्नता  , शक्ति  प्राप्त  कर  वे  अहंकारी  हो  गए  , अत्याचारी  हो  गए  और  अपनों  को  ही  सताने  लगे  l  अब  साम्राज्यवाद  नहीं  है  ,  कोई  बाहर  से   आकर  हम  पर  अत्याचार  नहीं  कर  रहा  l  आज  अपने  ही  अपनों  को  सता  रहे  हैं  l  यह  अलग  बात  है   कि  मनुष्य  अपने  स्वार्थ  के  कारण    चाहे  परिवार  हो  या  राष्ट्र  हो  ,  अपनों  को  सताने  के  लिए    गैरों  से  भी  सांठ -गाँठ  कर  लेता  है  , मनुष्यता  के  स्तर  से  नीचे  गिर  जाता  है  l    ईश्वर  विभिन्न  घटनाओं  के  माध्यम   से    मनुष्य  के  अहंकार  को  मिटाने  का  और  उसकी  सोई  हुई  चेतना  को  जगाने  का  प्रयास  करते  हैं  l  

21 July 2026

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   देवता  और  असुर  तो  प्रत्येक  युग  में  रहे  हैं   लेकिन  कलियुग  में  एक  विशेष  बात  यह  है  कि  असुर  समाज  में  घुल-मिलकर  रहते  हैं  , उन्हें  अलग  से  पहचानना  कठिन  है  l  व्यक्ति  के  काम  करने  के  तरीके , बोलचाल  और  उसके  स्वभाव  से  ही   समझा  जा  सकता  है  कि  वे  किस  श्रेणी  के  असुर  हैं  l   ऐसे  व्यक्तियों  में  करुणा , संवेदना , दया , प्रेम  जैसी  कोई  भावना  नहीं  होती  , ये  बहुत  निर्दयी   होते  हैं   l  उनका  यह  निर्दयता  का  व्यवहार   उन  सभी  के  साथ  होता  है   जिसने  उनके  अहंकार  को  चोट  पहुंचाई  है  , उनकी  निरंकुशता  में  रहने  से  इनकार  कर  दिया  l रिश्ते -नातों  से  भी  वे  ऐसा  कठोरता  का  व्यवहार  करने  से  नहीं   चूकते  l  हिरण्यकश्यप   ने  अपने  पुत्र  प्रह्लाद  को सताने  में  कोई  कोर -कसर    नहीं  छोड़ी    असुरों  के  पास  धन -वैभव   और  इसके  बल  पर  प्राप्त  शक्ति  की  कोई  कमी  नहीं  होती  है  l    कलियुग  में  यह  असुरता  इतनी  दुखदायी  इसलिए  हो  जाती  है   क्योंकि   सामान्य जन  अपने  हितों  को  पूरा  करने  के  लिए   इस  असुरो  के  अहंकार  को  पोषित  करते  हैं  ,  उनकी  चापलूसी  कर  अपना  स्वार्थ  सिद्ध  करते  हैं   और  उनकी  कमजोरियों  का  पता  लगाकर  उन की  कमजोर  नस  भी  दबाकर  रखते  हैं  इसलिए  असुरता  एक  श्रंखलाबद्ध  तरीके  से  बढ़ती  जाती  है  l  इसका  अंत  कौन  करे  ?  यह  बहुत  बड़ी  समस्या  है  l 

17 July 2026

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   कभी  -कभी  ऐसा  वक्त  आता  है  कि  दो  पक्षों  में  युद्ध  जैसी  स्थिति  होती  है   l  एक  पक्ष  आक्रमण  पर  आक्रमण  करता  जाता  है   लेकिन  दूसरा  पक्ष     वार  नहीं  करता  , केवल   अपनी  सुरक्षा  का  ही  प्रयास  करता  है  l  जैसे  मथुरा  का  राजा  कंस  कितना  शक्तिशाली  था  ,  उसके  पास  सब  कुछ  था  लेकिन  वह   भयभीत  था   और  भयभीत  भी   था  तो   छोटे  से   दूध  पीते  बच्चे  कृष्ण  से  l  मृत्यु  का  भय , सत्ता  को  खोने  का  भय  ऐसा  ही  होता  है  l  कंस  आयु  में   कृष्ण  से  कितना  बड़ा  था , उसके  पास  विशाल  सेना  थी , अनेक  मायावी  राक्षस  थे  , अनेक  शक्तिशाली  राजा  उसके  मित्र , संबंधी  थे  l  क्या  आश्चर्य  है  कि  फिर  भी  वह  डरता  था  l   उसने  पूतना  को   और  अनेक  राक्षसों  को  भेजा  कि  वे  किसी  तरह  कृष्ण  का  अंत  कर  दें  l  श्रीकृष्ण  तो  स्वयं  ईश्वर  थे  , वे  बाल रूप  में  थे  तो  क्या  , उन्हें  पता  था  कि  ये  सब  राक्षस  कंस  के  भेजे  हुए  हैं  ,  उन्होंने  केवल  अपनी  सुरक्षा  के  लिए  उन  राक्षसों  को  मारा  ,  उन्होंने  कंस  को  मारने  का  कोई  प्रयास  नहीं  किया  l  कंस  के  सिर  पर  जब  मृत्यु  का  साया   मंडराने  लगा    तब  उसने  स्वयं  ही  कृष्ण  और  बलराम  को  मथुरा  बुला  लिया  ,  अपनी   मृत्यु    की  व्यवस्था  स्वयं  ही  कर  ली  l   इस  प्रसंग  का  अर्थ  यही  है  कि   इस  संसार  में  सभी  के  जन्म , मृत्यु  , सत्ता , प्रतिष्ठा ,  धन-वैभव , सुख  ---     आदि  प्रत्येक  घटना  का  समय  निश्चित  है  ,  इन  सब  को  खोने  के  भय  से  किसी  को  सताना , उसको  मारने  का  प्रयास  करना   व्यर्थ  है  l    लोग  इसी  भय  से  न  तो  स्वयं  चैन  से  रहते  हैं  और  न  ही  दूसरे  को  चैन  से  रहने देते हैं  l  कंस  ने  काल  को  समझा  नहीं  , स्वयं  को  ही  भगवान   समझा   , समय रहते  चेता  नहीं  इसलिए  काल  ने  उसे  पटक -पटक  कर  मारा  l  

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   श्रीमद भगवद्गीता  संन्यास  की  पाठ्य -पुस्तक  नहीं  , यह  हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाती  है  l  जीवन  समर  में  सभी  प्रकार  की  उथल -पुथल   का  सामना  करते  हुए  जीना  ,  सक्रिय    हो  उद्यमी   बने  रहना  ही   मनुष्य  को  शोभा  देता  है  l  कर्म  करो ,  सक्रिय  होकर  जियो   एवं  निर्भय  होकर  रहो  , परिश्रम  से  मत  डरो  l  निराशाओं  का  सामना  करने  से  हिचकिचाओ  मत  l  जब  तक  जीवित  हो  , वास्तव  में  जीवन  का  एक -एक  पल  जिओ  l  कर्मों  द्वारा  ऊँचे  उठो  , कर्मों  द्वारा  ही  उन्नति  करो  ,  कर्मों  से  ही  अपना  विस्तार  करो  l  जीवन  को  कलाकार  की  तरह  जीने  का  ,  हँसती -हँसाती ,  खिलती -खिलखिलाती  ,  मस्ती  भरी  जिन्दगी   जीने  का  संदेश   गीता  हमें  देती  है  l    गीता  का  संदेश  बड़ा  स्पष्ट  है  ---- कभी  भी  कर्म  किए  बिना  न  रहो   l  जीते  हुए  धरना देना  ,  धीमे  काम  करना  , हड़ताल  करना  , भाग  खड़े  होना  ,  कर्तव्य  त्याग  देना  , अनुपस्थित  रहना  ,  यह  सब  उपाय   जीवन  को  धीमी  मृत्यु  की  ओर  ले  जाते  हैं  ,  सौन्दर्य  छीन  लेते  हैं   और  जीवन  का  क्षरण  कर  डालते  हैं  l  जो  कर्म  किए  बिना  जीता  है  ,  वह  अपने  अस्तित्व  को  खो  बैठता  है  l  

15 July 2026

WISDOM ------

   वर्तमान  समय  में  विभिन्न  क्षेत्रों  में  जितना  भी  ज्ञान  है  ,  उसके  बीज   हमें  पूर्व  के  युगों  में  भी  मिलते  हैं  l  उनमें  अंतर  केवल  अभिव्यक्ति  का  है  l  इसे  सरल  रूप  में  समझें  तो   दो  कहावतें  हैं  ---- ' अंधे  के  आगे  रोवे , अपना  दीदा  खोवे  l '  और  दूसरी  कहावत  है  --- ' भैंस  के  आगे  बीन  बजाए  , भैंस   खड़ी  डकराये  l '           त्रेतायुग  में  जब  भगवान  श्री  राम  को  समुद्र  पार  कर  लंका  जाना  था  तब  उन्होंने  तीन  दिन  तक  समुद्र  से  प्रार्थना  की  कि  वह  उन्हें   लंका  जाने  का  रास्ता  दे  , लेकिन  समुद्र  ने  एक  न  सुनी  l  लक्ष्मण जी  को  बहुत  क्रोध  आया  , उनका  कहना  था  -- दैव -दैव  आलसी  पुकारा  l '  आखिर  श्री  राम  ने  समुद्र  को  सुखाने  के  लिए  जैसे  ही  धनुष  बाण  उठाया  ,  समुद्र  देव  प्रकट  हो  गए   और  नल -नील  के  माध्यम  से  समुद्र  पर  सेतु  बनाने  का   सुझाव  दिया  l  द्वापर  युग  में  पांडवों  पर  दुर्योधन , शकुनि  आदि  ने  इतना  अत्याचार  किया  , हर  तरह  से  उन्हें  उत्पीड़ित  किया  लेकिन  पांडवों  ने  कभी  भी   दुर्योधन  से  , भीष्म  पितामह  से  , धृतराष्ट्र  से  कभी  भी  दया  की  भीख  नहीं  मांगी   क्योंकि  उन्हें  यह  ज्ञान  था  कि   जिनकी आसुरी  प्रवृति  होती  है  उनमें  करुणा , संवेदना  नहीं  होती  , उनसे  दया  की  उम्मीद  करना  , अपनी  ऊर्जा  को  बरबाद  करना  है  l  इसलिए  पांडवों  ने   अपने  शरीर  को  मजबूत  बनाया  , तप  से  और  ज्ञान  से  शारीरिक   और  मानसिक  बल  अर्जित  किया  , दिव्य  अस्त्र -शस्त्र  प्राप्त  किए    l  उनके  ऐसा  करने  पर  पूरी  कायनात  ने  उनकी  मदद  की  , स्वयं  भगवान  श्रीकृष्ण  उनके  सारथि  बने   और  वीरता  से  उन्होंने  अपना  हक  प्राप्त  किया  l  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  अर्जुन  को   गीता  का  उपदेश  दिया  कि  कर्म  करो  , परिस्थिति  चाहे  कैसी  भी  हो  कर्म  करना  नहीं   छोड़ो  ,  कर्म  से  भागो  मत  l  गीता  का  ज्ञान  हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाता  है  l   चारों  तरफ  कांटे  हैं  , घोर  अंधकार  है  , ऐसी  कठिन  परिस्थिति  से  हम  कैसे  सकुशल  बाहर  निकल सकते  हैं  ,  यह  ज्ञान  हमें  गीता  से  मिलता  है  l  इस  ज्ञान  को  सही  ढंग  से  न  समझ  पाने  के  कारण    अनेक  लोग   बड़ी  मुश्किल  से  मिले  इस  मानव  तन  की उपेक्षा  कर  देते  हैं  l   संसार  के  सारे  काम  इस    देह  से  ही  होते  हैं  ,  जब  यह  शरीर  ही  कमजोर   हो  गया    तो  क्या   करोगे  ?  आज  संसार  को  गीता  के  ज्ञान  की  जरुरत  है  l  

13 July 2026

WISDOM

  युग  परिवर्तन  के  साथ  लोगों  के  विचार  और  सोचने -समझने  का  तरीका  भी  बदल  जाता  है  l  यहाँ  तक  कि  समाज  में  जो  संघर्ष  होते  हैं  , उनके  कारण  भी  बदल  जाते  हैं  l  त्रेतायुग  में  धर्म  और  अधर्म  के  बीच  युद्ध  था  l  रावण  के  आतंक  और  अत्याचार  का  अंत  करने  के  लिए  यह  युद्ध  हुआ  था  l  इसी  तरह  द्वापरयुग  में  पांडव  सत्य  और  धर्म  के  मार्ग  पर  थे   लेकिन  दुर्योधन  आदि  कौरवों  ने  षड्यंत्र  और  अन्याय  की  अति  कर  दी  थी   , इसलिए  महाभारत  हुआ  l  लेकिन  कलियुग  में   लोग  सत्य , धर्म , नैतिकता  , न्याय   को  भूल  गए  हैं  l  लोगों  पर  कामना , अहंकार  और  महत्वाकांक्षा  हावी  है  l  सभी  अनीति  की  राह  पर  हैं  तो  कौन  किस  को  मिटाए ,  किसे  सजा  दें  l  सभी  को  अपनी -अपनी  कमियां  उजागर  होने  का  भय  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी लिखते  हैं  ----' समाज  में  फैले  संघर्षों  का  मूल  मुख्यतः  ईर्ष्या  होती  है  l  आज  की  परिस्थिति  पर  द्रष्टिपात  करें   तो  चारों  ओर  ईर्ष्या  का  ही  साम्राज्य  फैला  दिखाई  देगा  l  भाई -भाई  से  ईर्ष्या  करता  है ,  पड़ोसी -पड़ोसी  से  l  जातियों , संगठनों , दलों , सम्प्रदाय  और  राष्ट्रों  के  बीच  ईर्ष्या  की  आग  फैली  हुई  है   l '  आचार्य श्री  कहते  हैं  --- ' उच्च  स्थिति  में  पहुँचने  के  बाद  भी   यदि  किसी  में   ईर्ष्यालु  वृत्ति  आ  गई  है  ,  तो  वह  उसके  पतन  का  कारण   ही  बनेगी  l  l  इसलिए  ईर्ष्या  की  अग्नि  को  शांत  करना  ही  सच्ची  बुद्धिमत्ता  है  l "   

10 July 2026

WISDOM ------

  असुरता  का  साम्राज्य  प्रत्येक  युग  में  रहा  है   और  यह  असुर  ईश्वर  से  वरदान  प्राप्त  कर   इतने  शक्तिशाली  हो  जाते  हैं  कि  फिर  अपने  साम्राज्य  में  ईश्वर  को  ही  टिकने  नहीं  देते  l इसका  एक  अर्थ  यह  भी  है  कि  जिस  भी  क्षेत्र  में  असुरता  का  साम्राज्य  होता  है  वहां   के  धार्मिक  स्थलों  में  दैवीय  ऊर्जा नहीं  होती  , वे  केवल  नाममात्र  के  होते  हैं  ,  ईश्वर  उस  स्थान  को  छोड़कर  चले  जाते  हैं  l  असुर  इतने  अहंकारी  होते हैं  कि  वे  इसे  भी    स्वयं  की  ताकत  ही  कहते  हैं  कि  उन्होंने  भगवान  को  वह  स्थान  छोड़ने  पर  मजबूर  कर  दिया   और  अब  वे    वे  स्वयं   को    भगवान  कहते  हैं  ,   प्रजा  को  मजबूर  करते  हैं  कि  वे  भी  उन्हें  भगवान  समझकर  पूजें  , उनका  गुणगान  करे  l  शिवजी  से  वरदान  प्राप्त  कर  रावण   इतना  शक्तिशाली  हो  गया  था  कि  सम्पूर्ण  धरती  पर  उसका   आतंक  था  l  अपनी  मृत्यु  के  समय  भी  वह  श्रीराम  से  कहता  है  --- मेरे  जीते  जी  आप  लंका  में  प्रवेश  न  कर  सके   लेकिन  मैं  तुम  से  पहले  तुम्हारे  धाम  जा  रहा  हूँ  l  इसी  तरह  मथुरा  के  लिए  कहा  जाता  है  कि  वहां   भगवान  कृष्ण  को  भी  कारावास  में   डाल  देने  वाले  लोग  राज  करते  रहे  l  कंस  का  तो  आतंक  इतना  था  कि  भगवान  श्रीकृष्ण  को  जन्म  लेते  ही   अँधेरी  रात्रि  में ,  इतनी   वर्षा    और  आंधी -तूफान   में   मथुरा   छोड़कर  गोकुल  जाना  पड़ा  l  कलियुग  का  समय  तो  बहुत  विकट  है   l   भगवान  श्रीराम  को  अयोध्या  से  वनवास  मिला  ,  रावण  के  रहते  वे  लंका  में  भी  नहीं  जा  सके  ,  तब  उन्हें  कम  से  कम  वन  में  रहने  का  तो  ठिकाना  मिला    l  इसी  तरह  भगवान  श्रीकृष्ण  को  मथुरा   छोडनी  पड़ी  तो  उन्हें  कम  से  कम  गोकुल  में  तो  रहने  की  जगह  मिली   लेकिन  इस  कलियुग  में  असुरता  इतनी  प्रबल  है  कि   सम्पूर्ण  धरती ,  आकाश , पाताल , वन   सब  जगह  असुरता  का  साम्राज्य  है  , भगवान  को  कहीं  भी  टिकने  की जगह  नहीं  है   जहाँ  से  वे  स्वयं  की  सेना  बनाकर  असुरता  पर  आक्रमण  कर  उसे  पराजित  कर  सकें  l  इसलिए  अब  भगवान  ने  मनुष्यों  की  चेतना  में  प्रवेश  करने  का  निश्चय  किया  है   ताकि  प्रत्येक  मनुष्य  व्यक्तिगत  रूप  से  जाग्रत  हो  ,  उसे  सही -गलत  की  समझ  हो  ,  भेड़ -चाल  न  चले  l  निजी  स्वार्थ  के  लिए  असुरता  का  पोषण  न  करें  l  इस  युग  में  असुरता  को  युद्ध  कर  के  नहीं , अपनी  बुद्धि  और  विवेक  से   और  अपने  ह्रदय  में  विराजमान  ईश्वर  के  विश्वास  से  ही  हराया   जा  सकता  है  l  

5 July 2026

WISDOM -----

  महाभारत  युद्ध   समाप्त  हुआ  और  अनेक  वर्ष   शासन  करने  के बाद  पांडवों  ने  महाराज  परीक्षित  को  राजगद्दी  सौंप  दी  और   वे  वन  में  चले  गए  l  महाराज  परीक्षित  के  शासनकाल  में  ही  कलियुग  का  धरती  पर  आगमन  हुआ  l  कलियुग  को  सम्पूर्ण  धरती  पर  उत्पात  मचाते  देख  महाराज  परीक्षित  ने  उसे  आदेश  दिया  कि  वह  केवल  पांच  स्थानों  पर  ही  रह  सकता  है   , इनमे  सबसे  प्रमुख  है  --- स्वर्ण  अर्थात  धन -संपदा  l  धन -संपदा  की  अति  होने  पर   वहां  कलियुग  रहता  है  जो  मनुष्यों  की  बुद्धि  भ्रष्ट  कर  देता  है  जिससे  अन्य  सभी  बुराइयाँ  वहां  खिंची  चली  आती  हैं   और   फिर  वह  व्यक्ति  हो  ,   परिवार  हो , संस्था  हो  , सरकार  हो  --उसे  पतन  के  गर्त  में  धकेल  देती  हैं  l  कलियुग  में  मनुष्यों  के  विकार  , मानसिक  विकृतियाँ  अपने  चरम  पर  होती  हैं    इसलिए  प्रकृति  की  एक  व्यवस्था  समझ  में  आती  है    कि  दाल  में  नमक  के  बराबर  आप  बेईमानी   कर    लो  , अपनी  इच्छाओं  को  पूरा  कर  लो   और  धन  का  एक  भाग  लोक कल्याण  में  लगाओ   तो  पाप -पुण्य  का  संतुलन  बना  रहेगा  l  आपका  भी  यश  बढ़ता  रहेगा  और  लोगों  का  भी  हित  होगा  l  लेकिन  यदि   दाल  के  नाम  पर  केवल  नमक  है  , उसमे  दाल   नहीं  है   तब  उसे  प्रकृति  बर्दाश्त  नहीं  करती  l  जैसे  कोई  एक  बड़ी  संस्था  है  उसको    अपने  उद्देश्य    के  लिए  अपार  धन  दिया  जाता  है   l अब  उसके  कार्यकर्त्ता  उस  धन  में  से  किसी  भी तरीके  से  अपनी  भी  इच्छाएं  पूरी  कर  लेते  हैं   और  अपने  उद्देश्य  के  अनुसार  शेष  धन  से  प्रजा  के  कल्याण  के  लिए  स्कूल , अस्पताल , धर्मशाला  आदि  का  निर्माण  करते  हैं  ,  निर्धनों  और  निम्न  वर्ग  के  लोगों  को  सिर  उठाकर  जीने  का  मौका  भी  देते  हैं  , पर्यावरण   प्रदूषण  को  दूर  करने  के  लिए   पेड़ -पौधे  लगाना  , सामाजिक  कुरीतियों  को  दूर  करना  आदि  कार्य  भी  करते  हैं    तो  यह  मानव  धर्म  कहलाया  ,  इससे  उनका  विस्तार  होगा  और  यश  भी  बढ़ेगा  l  अब  कलियुग  तो  है  ही    , हमें  अपने  जीवन  में  संतुलन  बनाकर  चलना   होगा  l  

3 July 2026

WISDOM -------

   विधाता  ने   स्रष्टि  की  रचना  की  l  अनेक  प्राणी  पशु -पक्षी - वनस्पति  आदि  सभी  कुछ  बना  दिया  और  अंत  में  अपनी  सर्वश्रेष्ठ   कृति   ' मनुष्य ' की  रचना  की  l  यहाँ   व्यवस्था   इस  तरह  की  कि  जब  तक  मनुष्य  शिशु  है   वह  निर्मल है   और  ईश्वर  का  ही  रूप  है  लेकिन  जैसे  जैसे  वह  अपनी  आयु  के  अगले  चरणों  की  ओर  बढ़ता  जायेगा   काम , क्रोध ,लोभ , मोह , अहंकार , कामना , वासना , तृष्णा   आदि  विकार  उसे  घेर  लेंगे   और  वह  स्वयं  को   सर्वश्रेष्ठ  , ईश्वर  का  राजकुमार  तभी  सिद्ध     कर  सकेगा    जब  वह  इन  विकारों  पर  विजय  प्राप्त  कर  लेगा  l  जो  इन  विकारों  से  ग्रस्त  है  वह  असुर  कहलायेगा  l   इन  विकारों  पर  विजय  प्राप्त  करना  , अपने  मन   के  घोड़े  की  लगाम  अपने  हाथ  में  रखना   बड़ा  कठिन  है   l  मनुष्य  को  असुर  बनना  अधिक  सरल  लगा  l  इसलिए  प्रत्येक  युग  में   असुरों  के  उत्पात  से  धरती    त्रस्त    रही  l  अत्याचार , अन्याय , प्रजा  का  शोषण , उत्पीड़न  असुरों  का  प्रमुख  कार्य  है   और  इसी  तरीके  से   रावण  ने  सोने  की  लंका  , अपार  धन -वैभव  प्राप्त  किया  l  यह  स्थिति  आज  भी  है ,  असुरों    के  पास  अपार  धन -संपदा  होती  है  , इस  धन  के  बल  पर   वे  असीमित  शक्ति  अर्जित  कर  लेते  हैं   और  युग  चाहे  कोई  सा  भी  हो  वे  स्वयं  को  भगवान  समझाते  हैं  l  रावण  ने  स्वयं  को  ही  ईश्वर  समझा  , यदि  वह  श्रीराम  को  भगवान  मानता  तो  सीताजी  का  हरण  क्यों  करता  l  कहते  हैं  त्रेतायुग  में   संभवतः  केवल  दो  ही  ऐसे  व्यक्ति  थे  जिन्होंने  ईश्वर  को  पहचाना  l  इसी  तरह  द्वापर  युग  में   केवल  भीष्म पितामह ,  विदुर  ने  भगवान  श्रीकृष्ण  के  ईश्वर  तत्व  को  समझा  , फिर  भी   दुर्योधन  का  साथ  दिया  l  विशाल  हिंदुस्तान  के   लगभग  सभी  राजा  दुर्योधन  के  ही  पक्ष  में  थे   l  पांडवों  के  साथ   भगवान  श्रीकृष्ण  थे   लेकिन  किसी  राजा  ने  उनका  साथ  नहीं  दिया  l  यही  हाल  कलियुग  में  है   l  भगवान  श्रीराम  और  श्री  कृष्ण  को  कोई  सच्चे  ह्रदय  से  भगवान  नहीं  मानता  ,  उनके  नाम  पर  लूटते  हैं  l  धर्म  चाहे  कोई  भी  हो   , सभी  में  ईश्वर  केवल  दिखावे  के  लिए  हैं  , कुछ  क्षण  उनकी  पूजा  कर  ली  फिर  पाप , अत्याचार  में  मगन  हो  गए  l   ईश्वर  को  ईश्वर  मानने  वाले  , सन्मार्ग  पर  चलने  वाले  बहुत  कम  हैं  , लेकिन  उन्ही  के   पुण्यों  के  बल  पर  यह  धरती  टिकी  हुई  है   l  कलियुग  की  समस्या  बड़ी  विकट  है  ,  ईश्वर  भी  सोचते  हैं  कि  असुरता  का  अंत  करने  के  लिए  धरती  पर  अवतार  लें  भी  तो   एक  तो  ये  अहंकारी  मनुष्य  उन्हें  भगवान  नहीं  मानता  और  असुर  इतने  ज्यादा  हैं  कि  उन  सभी  को  समाप्त  कर  दें  तो  यह  धरती  वीरान  हो  जाएगी , संसार  कैसे  चलेगा   l   इसलिए  अब  ईश्वर  का  निर्णय  एक  अलग  रूप  में  दिखाई  देता  है  ---- अब  असुर  आपस  में  ही  लड़ -भिड़कर  मरेंगे  , प्राकृतिक  प्रकोपों  से  नष्ट  होंगे  , लाइलाज  बीमारियाँ  होंगी  , प्रकृति  ही  असुरता   को  कमजोर  कर  देगी   l  जो  असुर   प्रकृति  के  इन  प्रकोपों  से  बच   जाएंगे   ,  तो  प्रकृति  के  नियमानुसार  बूढ़े  हो  जाएंगे , गर्दन  हिलने  लगेगी , हाथ -पैर    ये  शरीर  कमजोर  हो  जायेगा  लेकिन  उनका  मन  बूढ़ा  नहीं  होगा  , वह  तो  कुलांचे  भरता  ही  रहेगा   l  यह  स्थिति  बड़ी  विकट  होगी  , सुख -वैभव  सब  है  लेकिन   उसका  उपभोग  करने  की  सामर्थ्य  नहीं  है  l  इस  सम्पूर्ण  प्रक्रिया  में  जो  भी  मनुष्य  सन्मार्ग  पर  है  ,  किसी  का  अहित  नहीं  करता   उसकी  ईश्वर  हर  पल  रक्षा  करते  हैं   ताकि  उनके  प्रकाश  से  इस  संसार  का  अँधेरा  धीरे -धीरे  ही  सही  दूर  तो  होगा  , एक  नई  सुबह  होगी  l