आज संसार में इतनी अशांति , इतनी उथल -पुथल क्यों हैं ? इसका एक ही कारण समझ में आता है कि अब लोग नास्तिक हो गए हैं l l अब मनुष्य ईश्वर से दूर हो गया है , जिसके पास थोड़ी भी शक्ति है , वह स्वयं को ही ईश्वर समझने लगा है l यदि व्यक्ति को ईश्वर की सत्ता में विश्वास हो तो वह ईश्वर से डरे , प्रत्येक कदम फूंक -फूंक कर रखे , कहीं कोई गलती न हो जाए ईश्वर हमें सहस्त्र आँखों से देख रहे हैं , वे हमारे प्रत्येक कर्म को , उसके पीछे छुपे भाव को , हमारे मन की गहराई में जो सच छुपा है उसे भी देख रहे हैं l लेकिन जब स्वयं को ही भगवान समझना है तो फिर डर किस बात का l जब पाप का घड़ा फूटता है , जीवन में कोई भयंकर परेशानी आती है तब भी व्यक्ति सुधरता नहीं है l वह धन खर्च कर के उस फूटे घड़े को जोड़ने का प्रयास करता है और अपने विभिन्न तरीकों से इस बात की जी -तोड़ कोशिश करता है कि घड़े के फूटने से जो पाप बिखर कर दुनिया के सामने आ गए , उन्हें किसी तरह दूसरे पर उड़ेल दे और फिर से भोग -विलास में मगन हो जाये l इसी का नाम संसार है l दुर्योधन के सामने तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे , उसने उन्हें माना नहीं , उन्हें ग्वाला और मायावी कहता था , वह तो उन्हें ही जंजीरों से बाँधने चला l शिशुपाल ने तो भरी सभा में श्रीकृष्ण को सौ गालियाँ दीं l जब भगवान का सुदर्शन चक्र उसका गला काटने आ गया , तब भागा , बचाओ -बचाओ l तब कोई नहीं बचाता l चाहें कितनी ही बड़ी रियासत के मालिक हो , अपार धन -संपदा हो , अपने कष्ट तो स्वयं ही भोगने पड़ते हैं , उसमें कोई भी साझेदार नहीं होता l जब मनुष्य अनैतिक और मर्यादाहीन आचरण करता है , ईश्वर की सत्ता को चुनौती देता है तब प्रकृति स्वयं न्याय करती है ताकि संसार में संतुलन बना रहे l संसार तो इसी तरह चलता रहता है , मनुष्य व्यक्तिगत स्तर पर ईश्वर की सत्ता की स्वीकार कर अपने जीवन को सार्थक करना चाहे तो उसके लिए ईश्वर हैं और वो हर पल उसके साथ हैं l