10 July 2026

WISDOM ------

  असुरता  का  साम्राज्य  प्रत्येक  युग  में  रहा  है   और  यह  असुर  ईश्वर  से  वरदान  प्राप्त  कर   इतने  शक्तिशाली  हो  जाते  हैं  कि  फिर  अपने  साम्राज्य  में  ईश्वर  को  ही  टिकने  नहीं  देते  l इसका  एक  अर्थ  यह  भी  है  कि  जिस  भी  क्षेत्र  में  असुरता  का  साम्राज्य  होता  है  वहां   के  धार्मिक  स्थलों  में  दैवीय  ऊर्जा नहीं  होती  , वे  केवल  नाममात्र  के  होते  हैं  ,  ईश्वर  उस  स्थान  को  छोड़कर  चले  जाते  हैं  l  असुर  इतने  अहंकारी  होते हैं  कि  वे  इसे  भी    स्वयं  की  ताकत  ही  कहते  हैं  कि  उन्होंने  भगवान  को  वह  स्थान  छोड़ने  पर  मजबूर  कर  दिया   और  अब  वे    वे  स्वयं   को    भगवान  कहते  हैं  ,   प्रजा  को  मजबूर  करते  हैं  कि  वे  भी  उन्हें  भगवान  समझकर  पूजें  , उनका  गुणगान  करे  l  शिवजी  से  वरदान  प्राप्त  कर  रावण   इतना  शक्तिशाली  हो  गया  था  कि  सम्पूर्ण  धरती  पर  उसका   आतंक  था  l  अपनी  मृत्यु  के  समय  भी  वह  श्रीराम  से  कहता  है  --- मेरे  जीते  जी  आप  लंका  में  प्रवेश  न  कर  सके   लेकिन  मैं  तुम  से  पहले  तुम्हारे  धाम  जा  रहा  हूँ  l  इसी  तरह  मथुरा  के  लिए  कहा  जाता  है  कि  वहां   भगवान  कृष्ण  को  भी  कारावास  में   डाल  देने  वाले  लोग  राज  करते  रहे  l  कंस  का  तो  आतंक  इतना  था  कि  भगवान  श्रीकृष्ण  को  जन्म  लेते  ही   अँधेरी  रात्रि  में ,  इतनी   वर्षा    और  आंधी -तूफान   में   मथुरा   छोड़कर  गोकुल  जाना  पड़ा  l  कलियुग  का  समय  तो  बहुत  विकट  है   l   भगवान  श्रीराम  को  अयोध्या  से  वनवास  मिला  ,  रावण  के  रहते  वे  लंका  में  भी  नहीं  जा  सके  ,  तब  उन्हें  कम  से  कम  वन  में  रहने  का  तो  ठिकाना  मिला    l  इसी  तरह  भगवान  श्रीकृष्ण  को  मथुरा   छोडनी  पड़ी  तो  उन्हें  कम  से  कम  गोकुल  में  तो  रहने  की  जगह  मिली   लेकिन  इस  कलियुग  में  असुरता  इतनी  प्रबल  है  कि   सम्पूर्ण  धरती ,  आकाश , पाताल , वन   सब  जगह  असुरता  का  साम्राज्य  है  , भगवान  को  कहीं  भी  टिकने  की जगह  नहीं  है   जहाँ  से  वे  स्वयं  की  सेना  बनाकर  असुरता  पर  आक्रमण  कर  उसे  पराजित  कर  सकें  l  इसलिए  अब  भगवान  ने  मनुष्यों  की  चेतना  में  प्रवेश  करने  का  निश्चय  किया  है   ताकि  प्रत्येक  मनुष्य  व्यक्तिगत  रूप  से  जाग्रत  हो  ,  उसे  सही -गलत  की  समझ  हो  ,  भेड़ -चाल  न  चले  l  निजी  स्वार्थ  के  लिए  असुरता  का  पोषण  न  करें  l  इस  युग  में  असुरता  को  युद्ध  कर  के  नहीं , अपनी  बुद्धि  और  विवेक  से   और  अपने  ह्रदय  में  विराजमान  ईश्वर  के  विश्वास  से  ही  हराया   जा  सकता  है  l  

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