13 July 2026

WISDOM

  युग  परिवर्तन  के  साथ  लोगों  के  विचार  और  सोचने -समझने  का  तरीका  भी  बदल  जाता  है  l  यहाँ  तक  कि  समाज  में  जो  संघर्ष  होते  हैं  , उनके  कारण  भी  बदल  जाते  हैं  l  त्रेतायुग  में  धर्म  और  अधर्म  के  बीच  युद्ध  था  l  रावण  के  आतंक  और  अत्याचार  का  अंत  करने  के  लिए  यह  युद्ध  हुआ  था  l  इसी  तरह  द्वापरयुग  में  पांडव  सत्य  और  धर्म  के  मार्ग  पर  थे   लेकिन  दुर्योधन  आदि  कौरवों  ने  षड्यंत्र  और  अन्याय  की  अति  कर  दी  थी   , इसलिए  महाभारत  हुआ  l  लेकिन  कलियुग  में   लोग  सत्य , धर्म , नैतिकता  , न्याय   को  भूल  गए  हैं  l  लोगों  पर  कामना , अहंकार  और  महत्वाकांक्षा  हावी  है  l  सभी  अनीति  की  राह  पर  हैं  तो  कौन  किस  को  मिटाए ,  किसे  सजा  दें  l  सभी  को  अपनी -अपनी  कमियां  उजागर  होने  का  भय  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी लिखते  हैं  ----' समाज  में  फैले  संघर्षों  का  मूल  मुख्यतः  ईर्ष्या  होती  है  l  आज  की  परिस्थिति  पर  द्रष्टिपात  करें   तो  चारों  ओर  ईर्ष्या  का  ही  साम्राज्य  फैला  दिखाई  देगा  l  भाई -भाई  से  ईर्ष्या  करता  है ,  पड़ोसी -पड़ोसी  से  l  जातियों , संगठनों , दलों , सम्प्रदाय  और  राष्ट्रों  के  बीच  ईर्ष्या  की  आग  फैली  हुई  है   l '  आचार्य श्री  कहते  हैं  --- ' उच्च  स्थिति  में  पहुँचने  के  बाद  भी   यदि  किसी  में   ईर्ष्यालु  वृत्ति  आ  गई  है  ,  तो  वह  उसके  पतन  का  कारण   ही  बनेगी  l  l  इसलिए  ईर्ष्या  की  अग्नि  को  शांत  करना  ही  सच्ची  बुद्धिमत्ता  है  l "   

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