युग परिवर्तन के साथ लोगों के विचार और सोचने -समझने का तरीका भी बदल जाता है l यहाँ तक कि समाज में जो संघर्ष होते हैं , उनके कारण भी बदल जाते हैं l त्रेतायुग में धर्म और अधर्म के बीच युद्ध था l रावण के आतंक और अत्याचार का अंत करने के लिए यह युद्ध हुआ था l इसी तरह द्वापरयुग में पांडव सत्य और धर्म के मार्ग पर थे लेकिन दुर्योधन आदि कौरवों ने षड्यंत्र और अन्याय की अति कर दी थी , इसलिए महाभारत हुआ l लेकिन कलियुग में लोग सत्य , धर्म , नैतिकता , न्याय को भूल गए हैं l लोगों पर कामना , अहंकार और महत्वाकांक्षा हावी है l सभी अनीति की राह पर हैं तो कौन किस को मिटाए , किसे सजा दें l सभी को अपनी -अपनी कमियां उजागर होने का भय है l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----' समाज में फैले संघर्षों का मूल मुख्यतः ईर्ष्या होती है l आज की परिस्थिति पर द्रष्टिपात करें तो चारों ओर ईर्ष्या का ही साम्राज्य फैला दिखाई देगा l भाई -भाई से ईर्ष्या करता है , पड़ोसी -पड़ोसी से l जातियों , संगठनों , दलों , सम्प्रदाय और राष्ट्रों के बीच ईर्ष्या की आग फैली हुई है l ' आचार्य श्री कहते हैं --- ' उच्च स्थिति में पहुँचने के बाद भी यदि किसी में ईर्ष्यालु वृत्ति आ गई है , तो वह उसके पतन का कारण ही बनेगी l l इसलिए ईर्ष्या की अग्नि को शांत करना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है l "
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