यदि जीवन में कुछ भी खोने का भय न हो और मृत्यु का भी भय न हो तो व्यक्ति निर्भय हो जाता है l वर्तमान युग का जो युवा वर्ग है , वह ऐसा ही निर्भय है l सामान्य वर्ग में हम देखें तो पुत्र के युवा होने पर , उसकी शिक्षा पर पर्याप्त धन खर्च करने के बाद माता -पिता उसकी ओर बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से देखने लगते हैं कि बेटा ! अब कुछ कमाने लगो , अपनी जिम्मेदारी समझो l इस उम्मीद में कई वर्ष बीत जाते हैं फिर भी नौकरी नहीं , कोई निश्चित आय का साधन नहीं तब उस युवक की स्थिति बहुत दयनीय हो जाती है , अड़ोसी -पडोसी , रिश्तेदार और माता -पिता भी ताने देने लगते हैं कि कुछ कमाता नहीं है , बैठा रहता है l अब वह युवक क्या करे ? बहुत मेहनत कर रहा है लेकिन सब व्यर्थ है l बिना कमाई के विवाह भी संभव नहीं है और यदि विवाह हो गया है तो बिना कमाई के परिवार में कोई इज्जत नहीं है l परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत साधारण है तब रोजगार के बिना युवा का जीवन बहुत कठिन है l ऐसे में कुछ निराश होकर आत्महत्या कर लेते हैं , कुछ पलायन कर साधु बन जाते हैं l कोई बहकाने वाला मिल जाये तो उनके कदम अपराध की ओर बढ़ जाते हैं लेकिन जो जागरूक हैं और आशावादी हैं , उन्हें यदि तिनके का भी सहारा मिल जाए तो वे अपने नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूक होकर ' करो या मरो ' पर उतारू हो हो जाते हैं l उनके जोश को देखकर जो युवा निराश हो चुके हैं , उनमे भी ऊर्जा का संचार हो जाता है l संसार के कई देशों में युवाओं के जोश को देखकर ऐसा लगता है जैसे कार्ल मार्क्स की आत्मा ऊर्जा बनकर इन सबके भीतर समां गई है , उन्होंने कहा था --- संसार के मजदूरों एक हो जाओ , तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है ------------' आज का युवा बहुत बुद्धिमान है और संचार के आधुनिक साधनों ने उनकी ऊर्जा को और अधिक शक्तिशाली बना दिया है l अब यह ऊर्जा क्या गजब करेगी यह तो आने वाला समय बताएगा l