विधाता ने स्रष्टि की रचना की l अनेक प्राणी पशु -पक्षी - वनस्पति आदि सभी कुछ बना दिया और अंत में अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति ' मनुष्य ' की रचना की l यहाँ व्यवस्था इस तरह की कि जब तक मनुष्य शिशु है वह निर्मल है और ईश्वर का ही रूप है लेकिन जैसे जैसे वह अपनी आयु के अगले चरणों की ओर बढ़ता जायेगा काम , क्रोध ,लोभ , मोह , अहंकार , कामना , वासना , तृष्णा आदि विकार उसे घेर लेंगे और वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ , ईश्वर का राजकुमार तभी सिद्ध कर सकेगा जब वह इन विकारों पर विजय प्राप्त कर लेगा l जो इन विकारों से ग्रस्त है वह असुर कहलायेगा l इन विकारों पर विजय प्राप्त करना , अपने मन के घोड़े की लगाम अपने हाथ में रखना बड़ा कठिन है l मनुष्य को असुर बनना अधिक सरल लगा l इसलिए प्रत्येक युग में असुरों के उत्पात से धरती त्रस्त रही l अत्याचार , अन्याय , प्रजा का शोषण , उत्पीड़न असुरों का प्रमुख कार्य है और इसी तरीके से रावण ने सोने की लंका , अपार धन -वैभव प्राप्त किया l यह स्थिति आज भी है , असुरों के पास अपार धन -संपदा होती है , इस धन के बल पर वे असीमित शक्ति अर्जित कर लेते हैं और युग चाहे कोई सा भी हो वे स्वयं को भगवान समझाते हैं l रावण ने स्वयं को ही ईश्वर समझा , यदि वह श्रीराम को भगवान मानता तो सीताजी का हरण क्यों करता l कहते हैं त्रेतायुग में संभवतः केवल दो ही ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ईश्वर को पहचाना l इसी तरह द्वापर युग में केवल भीष्म पितामह , विदुर ने भगवान श्रीकृष्ण के ईश्वर तत्व को समझा , फिर भी दुर्योधन का साथ दिया l विशाल हिंदुस्तान के लगभग सभी राजा दुर्योधन के ही पक्ष में थे l पांडवों के साथ भगवान श्रीकृष्ण थे लेकिन किसी राजा ने उनका साथ नहीं दिया l यही हाल कलियुग में है l भगवान श्रीराम और श्री कृष्ण को कोई सच्चे ह्रदय से भगवान नहीं मानता , उनके नाम पर लूटते हैं l धर्म चाहे कोई भी हो , सभी में ईश्वर केवल दिखावे के लिए हैं , कुछ क्षण उनकी पूजा कर ली फिर पाप , अत्याचार में मगन हो गए l ईश्वर को ईश्वर मानने वाले , सन्मार्ग पर चलने वाले बहुत कम हैं , लेकिन उन्ही के पुण्यों के बल पर यह धरती टिकी हुई है l कलियुग की समस्या बड़ी विकट है , ईश्वर भी सोचते हैं कि असुरता का अंत करने के लिए धरती पर अवतार लें भी तो एक तो ये अहंकारी मनुष्य उन्हें भगवान नहीं मानता और असुर इतने ज्यादा हैं कि उन सभी को समाप्त कर दें तो यह धरती वीरान हो जाएगी , संसार कैसे चलेगा l इसलिए अब ईश्वर का निर्णय एक अलग रूप में दिखाई देता है ---- अब असुर आपस में ही लड़ -भिड़कर मरेंगे , प्राकृतिक प्रकोपों से नष्ट होंगे , लाइलाज बीमारियाँ होंगी , प्रकृति ही असुरता को कमजोर कर देगी l जो असुर प्रकृति के इन प्रकोपों से बच जाएंगे , तो प्रकृति के नियमानुसार बूढ़े हो जाएंगे , गर्दन हिलने लगेगी , हाथ -पैर ये शरीर कमजोर हो जायेगा लेकिन उनका मन बूढ़ा नहीं होगा , वह तो कुलांचे भरता ही रहेगा l यह स्थिति बड़ी विकट होगी , सुख -वैभव सब है लेकिन उसका उपभोग करने की सामर्थ्य नहीं है l इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में जो भी मनुष्य सन्मार्ग पर है , किसी का अहित नहीं करता उसकी ईश्वर हर पल रक्षा करते हैं ताकि उनके प्रकाश से इस संसार का अँधेरा धीरे -धीरे ही सही दूर तो होगा , एक नई सुबह होगी l
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