6 April 2013

SELF TRANSFORMATION

परिशोधन का अर्थ है -मन की पवित्रता तथा अंत:करण को दुर्भावनाओं से रहित करना | भीतरी पवित्रता का उद्देश्य यदि पूरा नहीं हुआ तो बाह्य कर्मकांडो का कुछ विशेष लाभ नहीं मिल पाता |
एक संत अपने शिष्यों के साथ गंगा किनारे बैठे हुए थे | उनसे थोड़ी दूर एक व्यक्ति गंगा स्नान कर रहा था | उसने बहुत देर गंगा स्नान किया फिर भजन किया और उसके बाद किनारे बैठकर भोजन करने लगा | उसी समय एक अपंग व्यक्ति उसके पास आकर भोजन की याचना करने लगा | उसे कुछ देने के बजाय वो व्यक्ति उस अपंग को गालियाँ देने लगा और अपने पास से हटाने के लिये धक्का भी देने लगा | यह देखकर संत अपने शिष्यों से बोले -"गंगास्नान का पुण्य तो बहुत देखा था .पर आज पाप भी देख लिया ।"संत ने शिष्यों से कहा -"केवल बाहर से शरीर साफ कर लेने से मन पर चढ़ा मैल दूर नहीं होता | जिसके ह्रदय में दीन -दुखियों के लिये करुणा नहीं ,संवेदना नहीं ,वो लाख प्रयत्न कर ले ,पर उसे पुण्य नहीं ,केवल पाप का भागी बनना पड़ेगा | अध्यात्म का सार बाह्य क्रिया -कलापों में नहीं ,वरन आंतरिक परिष्कार में है | 

5 April 2013

POSITIVE THINKING

एक बार बादशाह अकबर ने कवियों का सम्मेलन बुलाया और विषय रखा ,--'अकबर '| इस पर अनेक कवियों ने अकबर की प्रशंसा में कविताएँ बनाई और पुरस्कार पाया | महाकवि गंग भी उस उस सम्मलेन में गये ,पर झूठी प्रशंसा करने को तैयार न हुए | बादशाह ने कवि गंग से कहा -"आपको भी कुछ न कुछ अवश्य सुनाना पड़ेगा | "कवि ने कहा -"मुझसे मिथ्या प्रशंसा की आशा न करें ,जो यथार्थ है वही कहूँगा | भले ही आप नाराज हो जायें | "कवि गंग ने कविता बनाई और सुनाई | उसमे अकबर तथा उसके पूर्वजों द्वारा किये गये अत्याचारों का वर्णन था | भरे दरबार में अपनी निन्दा इस प्रकारअकबर आग बबूला हो गया | अकबर ने कवि गंग को हाथी के पैर के नीचे कुचलवा देने का प्राण दंड दिया  |
कवि गंग को ऐसी ही संभावना का भान भी था | इस मृत्यु दंड को कार्यान्वित होते हुए देखने के लिये अनेक लोग एकत्रित हुए | बादशाह स्वयं भी यह देखने आये कि कवि बड़ा निर्भीक बनता था ,देखें मृत्यु के समय वह निर्भीकता रहती है या नहीं |
कवि गंग ने मृत्यु के पूर्व एक कविता बनाई और सभी उपस्थित जनों को सुनाई | प्रशिक्षित हाथी उन्हें कुचलने को तैयार खड़ा था |
इस कविता में बड़ी सुंदर कल्पना थी --कहा गया कि स्वर्ग लोक में देवताओं ने कवि सम्मेलन बुलाया ,सब उपस्थित होकर अपनी बनाई कविता सुनाते गये ,पर कवि गंग उनके दरबार में बिना बुलाये नहीं गये ,उन्हें अपने स्वाभिमान का बोध था |
तब देवताओं ने सोचा स्वाभिमानी गंग को अपनी पीठ पर बिठाकर स्वर्ग ले आने के लिये किसी बुद्धिमान देवता को भेजना चाहिये | इसके लिये उपयुक्त गणेशजी ही हो सकते हैं | कवि को अपनी पीठ पर बिठाकर लाने के लिये हाथी रूपी गणेशजी को भेजा है ,वे ही मेरे सामने स्वर्ग ले जाने के लिये खड़े हैं | कविता की अंतिम पंक्ति थी --"कवि गंग को लेन गणेश पठायो | "
कवि को हाथी ने पैर से कुचल दिया ,पर वे मरते समय तक अपनी कल्पना में मस्त थे | मृत्यु को उन्होंने स्वर्ग का निमंत्रण और उनके स्वाभिमान की रक्षा करने वाला बुलावा ही माना | बादशाह सहित सभी दर्शक आश्चर्यचकित रह गये कि मृत्यु जैसे कष्ट को को भी उन्होंने सुख स्वप्न में परिणत कर लिया | 

4 April 2013

self -control

'मन के हारे हार है ,मन के जीते जीत '
रोग की जड़ें शरीर में नहीं ,मन में होती हैं | अधिकतर समस्याएं ,विकृति,एवं विकार ,आध्यात्मिक जीवन -द्रष्टि के अभाव में पनपते हैं | यदि पीड़ित व्यक्ति की जीवन द्रष्टि सुधार दी जाये तो समस्या का समाधान हो जाता है | विचार एवं चिंतन प्रणाली को स्वस्थ ,श्रेष्ठ ,पवित्र एवं सकारात्मक रखकर ही शरीर एवं मन -मस्तिष्क को स्वस्थ एवं प्रसन्न रखा जा सकता है | मानसिक संकल्प की द्रढ़ता के आगे असाध्य रोग भी ठीक होते देखे गये हैं | 

THE PRESERVATION OF HEALTH IS DUTY

समर्थ वैद्द जीवक अपने एक रोगी को लेकर चिंतित थे | वह पूर्ण रूप से स्वस्थ था ,बस उसकी एक आँख नहीं खुलती थी | जीवक अपने स्तर पर सारी जाँच कर चुके थे | शरीर के सभी अंगों के साथ आँख के भी सभी अवयव सामान्य थे | थककर उन्होंने महास्थविर रैवत ,जो तथागत के शिष्य थे ,अपनी कथा सुनाई |
रैवत मानवीय चेतना के ज्ञाता थे | सब जानने के बाद वे बोले -"जीवक !तुम्हारे रोगी की समस्या शारीरिक नहीं ,मानसिक है | उसने अपने जीवन में नैतिकता की अवहेलना की है | इसी वजह से यह ग्रंथि बनी है | प्रभु के प्रेम की ऊष्मा उसे अपनी मनोग्रंथि से मुक्त कर देगी | जाओ !इसे भगवान बुद्ध के पास ले जाओ | "
उस रोगी ने अपने सभी गलत कार्य ,मन की व्यथा प्रभु को सुना दिये | भगवान ने उसके मस्तक पर हाथ फेरा | उसकी आँख खुल गई ,रोग से मुक्ति मिली | उसके द्वारा पूर्व में किये गये गलत कार्यों के प्रायश्चित हेतु उसे जनसेवा का व्रत दिलाया गया ।
अनैतिकता समाज से मिटे तो बहुत से असाध्य रोग सहज ही नष्ट हो जायेंगे | 

3 April 2013

GRIEF

जिसने दुःख नहीं सहा वह सुख की मिठास क्या जाने | जो रोया नहीं उससे हँसना भी न आयेगा | जिसने हार -जीत नहीं देखी उसे पुरुषार्थ का महत्व कैसे मालुम होगा | | जिसे संदेह करना नहीं आता वह सही चिंतन भी न कर सकेगा |
तपस्वियों ने दुःख को देवों के हाथ का हथौड़ा कहा है ,जो चेतना के उन्नयन के नये सोपान स्रष्ट करता है ,विकास व परिष्कार के नये द्वार खोलता है |
सिनाका प्रसिद्ध संत थे | उनका एक शिष्य अपने नवजात शिशु को उनसे आशीर्वाद दिलाने पहुंचा | सिनाका बोले -"इसे क्या आशीर्वाद दूं ?"शिष्य ने अनुरोध किया -"बस इतना कह दें कि इसका व्यक्तित्व परिपक्व और तेजस्वी निकले | "सिनाका बोले -"भगवान करे इसके जीवन में संघर्षों की कमी न रहे | "शिष्य घबराया तो सिनाका ने उसे समझाते हुए कहा -"पुत्र !बिना तराशे हीरे की कीमत पत्थर से ज्यादा नहीं होती | संघर्ष और कठिनाइयां मनुष्य के व्यक्तित्व को मजबूत और सुगढ़ बनाते हैं ,जैसे श्रम के अभाव में शरीर नकारा हो जाता है वैसे ही विपरीत परिस्थितियों से टकराए बिना मनुष्य का व्यक्तित्व निष्प्राण बना रहता है | ये विषम घड़ियाँ ही उसके व्यक्तित्व को मजबूत और तेजस्वी बनायेंगी | "

2 April 2013

सत्कर्म ही वे पंख हैं ,जिनके सहारे मनुष्य स्वर्ग तक की ऊँची उड़ान उड़ सकता है |
भगवान का भजन करना श्रेष्ठ है ,किन्तु भजन का बहाना बनाकर सामाजिक और सांसारिक कर्तव्यों से विमुख होने की जो बात सोचते हैं ,उन्हें समाज में निठल्ले ,आलसी ,ढोंगी जैसे मर्माहत शब्द सुनने पड़ते हैं | 

PRESENT IS PRECIOUS

जो गुजर गया वह वापस नहीं आने वाला है |एक ही नदी के पानी में दो बार खड़ा हुआ नहीं जा सकता | नदी का पानी निरंतर प्रवाहित होता रहता है | दूसरी बार खड़े होने पर वह पानी आगे बढ़ चुका होता है | ठीक ऐसे ही वर्तमान पल एवं क्षण परिवर्तित होकर अतीत बन जाते हैं | जो व्यक्ति अपने अतीत में खोये रहते हैं वे मनोरोगी हो जाते हैं | जो अपने भविष्य की कल्पनाओं में डूबे रहते हैं वे शेखचिल्ली और पलायनवादी हो जाते हैं | निष्क्रिय ,निस्तेज और आलसी होकर सपने देखने से ऊर्जा के अभाव में सपने कभी पूरे नहीं होते |
हमारे हाथ में न तो अतीत है और न ही भविष्य ,हमारे नजदीक एवं निकट तो वर्तमान का क्षण है | यही वर्तमान का क्षण सच एवं यथार्थ है | इसी का सदुपयोग करना और इसी में जीने का अभ्यास करना चाहिये |
जो वर्तमान को साध लेता है ,वह अगला -पिछला सभी को साध लेता है | वर्तमान में विभूतियों ,उपलब्धियों का अंबार भरा पड़ा है | यही परमात्मा है ,यही जीवन है ,यही साधना है और इसी को साधना है | जो वर्तमान में जितना ज्यादा टिकेगा ,वह संसार और अध्यात्म दोनों ही क्षेत्रों में उतना ही सफल होगा |