संसार में बहुत लम्बे समय से धर्म पर चर्चाएँ होती रही हैं l कौन सा धर्म सर्वश्रेष्ठ है , किसका वर्चस्व रहेगा यह सब विवाद बहुत सामान्य हो गया है लेकिन सर्वश्रेष्ठता का पैमाना क्या होगा ? संख्यात्मक वृद्धि या गुणात्मक वृद्धि ? किसे आधार माना जाए l पं . श्रीराम शर्मा जी ने अपने प्रवचनों में बहुत सरल ढंग से समझाया है l आचार्य श्री कहते हैं ---"भगवान को समीप बुलाने का एक ही मार्ग है कि हम ' धर्म पथ ' पर अग्रसर रहें और पात्रता विकसित करें l सत्पात्र की दो ही निशानियाँ हैं ---1 .उसका चरित्र पवित्र और पारदर्शी हो l 2 . उसके ह्रदय में करुणा हो , संवेदना हो l जिस व्यक्ति का व्यक्तित्व ऐसा शानदार और मजबूत होगा भगवान उसके पास खिंचे चले आते हैं l " उनके इन वचनों से यही स्पष्ट होता है कि सद्गुणों से युक्त व्यक्ति जिस भी धर्म में अधिक होंगे वही धर्म सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा और वही चिरकाल तक कायम रहेगा l अब समस्या यही है कि कलियुग में पाप , अनीति , अपराध , अत्याचार आदि दुर्गुणों की बाढ़ आ गई है , तो सद्गुण कैसे स्थापित हों ? समाज को दिशा देने वाले ही दिशाभ्रमित हैं , उनके कोरे उपदेशों का कोई असर नहीं होता l आचरण से ही शिक्षा दी जा सकती है लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं जिनके आचरण और व्यवहार में एकरूपता हो l आज की युवा पीढ़ी तो इतनी बुद्धिमान है कि समाज के बड़े -बड़े और जिम्मेदार लोगों का भूत , वर्तमान सब खोज लेती है l बुराई का मार्ग बहुत सरल होता है , पानी नीचे की ओर बड़ी तेजी से गिरता है इसलिए युवा पीढ़ी का भटकना स्वाभाविक है l आज संसार पतन और पराभव की ओर जा रहा है , इस स्थिति को पलटने का और अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाने का एक ही मार्ग आचार्य श्री ने संसार को बताया और वह है ---- ' गायत्री मंत्र ' l यदि संसार में सभी लोग इस मन्त्र को अपनी पूजा का अभिन्न अंग बना लें तो नकारात्मकता दूर होगी l व्यक्ति के जीवन में , वातावरण में सकारात्मकता आएगी l आचार्य श्री कहते हैं --- हम मंत्र का अर्थ जाने या न जाने , यदि हम श्रद्धा और विश्वास से मंत्र जप करते हैं तो मंत्र के देवता अवश्य आते हैं और आशीर्वाद देते हैं l '