व्यक्ति धर्म के क्षेत्र में हिन्दू , मुसलमान, सिख . पारसी , बौद्ध , जैन हो सकता है पर अध्यात्म के क्षेत्र में तो बस एक आत्मा है l जायसी हिन्दी के प्रमुख संत - कवियों में से जाने जाते हैं l ' पद्मावत ' उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ है l वे सभी धर्मों की अच्छाइयों को स्वीकार कर लेने वाले थे l बचपन में उन्हें चेचक निकली थी , जिससे चेहरा कुरूप हो गया था और वे अपनी एक आँख भी खो बैठे थे l जायसी अपनी कुरूपता और निर्धनता को लेकर कभी दुःखी नहीं हुए , उन्होंने ईश्वर की उस इच्छा को समझा कि क्यों उन्हें कुरूपता और निर्धनता से विभूषित किया गया l यह कुरूपता और निर्धनता उनके लिए वरदान बन गई l उन्होंने उस सौन्दर्य को पा लिया जो सत्य था l
16 June 2017
15 June 2017
एक संत जिसने गोवा को स्वतंत्र कराया ------ डा. माश्कार हंस
' जब किसी प्रतिभाशाली लेखक के सामने कोई समस्या खड़ी होती है तो उसकी कलम चलने लगती है और समस्या की परिसमाप्ति लेख में ही हो जाती है l "
डा. माश्कार पुर्तगाल गए थे बैरिस्टर बनने l प्राध्यापक के रूप में जिन अर्थवेत्ता का उनसे परिचय हुआ , वे थे डा. सालाजार l डा. माश्कार होनहार और कुशाग्र बुद्धि थे तथा सालाजार के प्रिय शिष्य थे l
डा. माश्कार के मन में इस बात की बहुत पीड़ा थी कि गोवा वासी अपने को भारतीय कम और पुर्तगाली अधिक मानते हैं l अपनी मातृभूमि के लिए इनमें स्वाभिमान क्यों नहीं | उन्होंने लिखना शुरू किया , रवीन्द्रनाथ ठाकुर के दो उपन्यास ' नौका डूबी , और ' घरे - बाहिरे ' का और गांधीजी की आत्मकथा का पुर्तगाली में रूपान्तर किया l उनके ह्रदय में अद्भुत आस्था थी , वे अनुकूल समय का इंतजार कर रहे थे l जब उन्होंने सुना कि डा. लोहिया गोवा - मुक्ति के लिए आन्दोलन कर रहे हैं तो वे पुर्तगाल से गोवा आ गए l उन्होंने पुर्तगाली साम्राज्यवाद के विरुद्ध लेख लिखे | अनेक रातों तक अथक परिश्रम कर के उन्होंने एक पुस्तक लिखी ' गोवा माई विलवैड लैंड ' l इसकी छपाई का प्रबंध कैसे हो ? उसका कथानक सुनकर सब प्रकाशक छापने से इनकार कर देते l
उन्होंने अपनी चार एकड़ जमीन और कुछ सोने के गहने , यही उनकी दौलत थी , उसे बेचकर पुस्तक छपवाई , तो उसने क्रान्ति मचा दी l जन - जन में वह लोक प्रिय हुई , उसमे लगा धन भी वापस आ गया l उसमे प्रतिपादित विषय इतने सशक्त और सार गर्भित थे कि मुर्दों में प्राण आ जाये l समस्त गोवा चैतन्य हो गया और पुर्तगाल सरकार के विरुद्ध मुहिम छेड़ दी l सालाजार के आदेश पर डा. माश्कार को 24 वर्ष का कठोर कारावास देकर पुर्तगाल की जेल में बंद कर दिया l जनता जागरूक हो चुकी थी , 1962 में पुर्तगाली सरकार को गोवा छोड़ना पड़ा l लेकिन माश्कार पुर्तगाल की जेल में ही थे l अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय के निर्णय पर उनकी आजादी संभव हो सकी l गोवा वासी उन्हें ' गोवानी संत ' के नाम से पुकारते हैं
डा. माश्कार पुर्तगाल गए थे बैरिस्टर बनने l प्राध्यापक के रूप में जिन अर्थवेत्ता का उनसे परिचय हुआ , वे थे डा. सालाजार l डा. माश्कार होनहार और कुशाग्र बुद्धि थे तथा सालाजार के प्रिय शिष्य थे l
डा. माश्कार के मन में इस बात की बहुत पीड़ा थी कि गोवा वासी अपने को भारतीय कम और पुर्तगाली अधिक मानते हैं l अपनी मातृभूमि के लिए इनमें स्वाभिमान क्यों नहीं | उन्होंने लिखना शुरू किया , रवीन्द्रनाथ ठाकुर के दो उपन्यास ' नौका डूबी , और ' घरे - बाहिरे ' का और गांधीजी की आत्मकथा का पुर्तगाली में रूपान्तर किया l उनके ह्रदय में अद्भुत आस्था थी , वे अनुकूल समय का इंतजार कर रहे थे l जब उन्होंने सुना कि डा. लोहिया गोवा - मुक्ति के लिए आन्दोलन कर रहे हैं तो वे पुर्तगाल से गोवा आ गए l उन्होंने पुर्तगाली साम्राज्यवाद के विरुद्ध लेख लिखे | अनेक रातों तक अथक परिश्रम कर के उन्होंने एक पुस्तक लिखी ' गोवा माई विलवैड लैंड ' l इसकी छपाई का प्रबंध कैसे हो ? उसका कथानक सुनकर सब प्रकाशक छापने से इनकार कर देते l
उन्होंने अपनी चार एकड़ जमीन और कुछ सोने के गहने , यही उनकी दौलत थी , उसे बेचकर पुस्तक छपवाई , तो उसने क्रान्ति मचा दी l जन - जन में वह लोक प्रिय हुई , उसमे लगा धन भी वापस आ गया l उसमे प्रतिपादित विषय इतने सशक्त और सार गर्भित थे कि मुर्दों में प्राण आ जाये l समस्त गोवा चैतन्य हो गया और पुर्तगाल सरकार के विरुद्ध मुहिम छेड़ दी l सालाजार के आदेश पर डा. माश्कार को 24 वर्ष का कठोर कारावास देकर पुर्तगाल की जेल में बंद कर दिया l जनता जागरूक हो चुकी थी , 1962 में पुर्तगाली सरकार को गोवा छोड़ना पड़ा l लेकिन माश्कार पुर्तगाल की जेल में ही थे l अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय के निर्णय पर उनकी आजादी संभव हो सकी l गोवा वासी उन्हें ' गोवानी संत ' के नाम से पुकारते हैं
14 June 2017
सच्ची देशभक्ति
विश्व विजय के स्वप्न द्रष्टा हिटलर को हालैंड आँखों में तिनके की भांति खटक रहा था l आगे बढ़ने के लिए हालैंड पर विजय प्राप्त करना आवश्यक था l आदेश मिलते ही जर्मनी की विशाल सेना हालैंड पर चढ़ दौड़ी l उन दिनों यह देश गरीबी के भयंकर दौर से गुजर रहा था l हालैंड की जमीन की सतह समुद्र से भी नीची है इसलिए यहाँ के नागरिकों को बड़ी दीवार बनाकर अपनी सुरक्षा करनी पड़ती है | देश की आधी शक्ति इसी में खप जाती है l उनके पास न सेना थी न ही लड़ने के लिए शस्त्र l
जर्मन सैनिकों ने सोचा कि हालैंड को तो मिनटों में जीता जा सकता है l जर्मन सेना का हमला हुआ तो हालैंड के विचारशीलों ने मीटिंग बुलाई और सर्वसम्मति से यह तय हुआ कि गुलाम हो कर जीने की अपेक्षा शान से मरना अधिक श्रेयस्कर है l हम किसी भी कीमत पर गुलामी की जंजीरें नहीं पहनेंगे l गाँव - गाँव में नगाड़े आदि के माध्यम से मुनादी पिटवा दी गई कि जब तक हालैंड का एक भी बच्चा जीवित है , हम गुलामी स्वीकार नहीं करेंगे l
हालैंड के पास न शस्त्र न सेना , फिर मुकाबला कैसे हो ? यह निश्चय किया गया कि जिस भी गाँव पर जर्मन सेना हमला करे , उस गाँव की दीवाल तोड़ दी जाये l इस प्रकार समुद्र के पानी से गाँव तो डूबेगा ही , जर्मन सेना भी डूबेगी l
जिस गाँव पर जर्मन सेना ने हमला किया , उसे हालैंड के युवकों ने दीवाल तोड़कर डुबो दिया और गाँव के बच्चे - बच्चे ने जल - समाधि ले ली और साथ ही जर्मन फौज की टुकड़ी भी समुद्र में डूब गई l दूसरे और तीसरे नगर पर हमला हुआ , वहां भी हालैंड के नागरिकों ने ऐसी ही नीति अपनाई तीन गाँव अथाह जलराशि में समा गए , साथ में जर्मनी की फौजें भी डूब गईं l
हिटलर को ऐसी आशा भी न थी कि ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा l जर्मन सेना का मनोबल टूट गया l देशभक्ति उनमे भी थी पर हालैंड वासियों की कुर्बानी के समक्ष फीकी पड़ गई l हिटलर ने सेना को वापस लौट जाने का आदेश दिया और कहा कि हालैंड पर विजय प्राप्त करना सम्भव नहीं है l उसने अपनी डायरी में लिखा ---- " आज मुझे पहली बार पता चला कि संगीनों , बंदूकों और बमों से अधिक ताकतवर होती है ---- मन एवं आत्मा की शक्ति l जिस देश के नागरिक आत्म - स्वाभिमान की रक्षा के लिए मरने को तैयार हैं, उन्हें कोई गुलाम नहीं बना सकता l " बची हुई जर्मन सेना पराजय स्वीकार कर के वापस लौट गई l
जर्मन सैनिकों ने सोचा कि हालैंड को तो मिनटों में जीता जा सकता है l जर्मन सेना का हमला हुआ तो हालैंड के विचारशीलों ने मीटिंग बुलाई और सर्वसम्मति से यह तय हुआ कि गुलाम हो कर जीने की अपेक्षा शान से मरना अधिक श्रेयस्कर है l हम किसी भी कीमत पर गुलामी की जंजीरें नहीं पहनेंगे l गाँव - गाँव में नगाड़े आदि के माध्यम से मुनादी पिटवा दी गई कि जब तक हालैंड का एक भी बच्चा जीवित है , हम गुलामी स्वीकार नहीं करेंगे l
हालैंड के पास न शस्त्र न सेना , फिर मुकाबला कैसे हो ? यह निश्चय किया गया कि जिस भी गाँव पर जर्मन सेना हमला करे , उस गाँव की दीवाल तोड़ दी जाये l इस प्रकार समुद्र के पानी से गाँव तो डूबेगा ही , जर्मन सेना भी डूबेगी l
जिस गाँव पर जर्मन सेना ने हमला किया , उसे हालैंड के युवकों ने दीवाल तोड़कर डुबो दिया और गाँव के बच्चे - बच्चे ने जल - समाधि ले ली और साथ ही जर्मन फौज की टुकड़ी भी समुद्र में डूब गई l दूसरे और तीसरे नगर पर हमला हुआ , वहां भी हालैंड के नागरिकों ने ऐसी ही नीति अपनाई तीन गाँव अथाह जलराशि में समा गए , साथ में जर्मनी की फौजें भी डूब गईं l
हिटलर को ऐसी आशा भी न थी कि ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा l जर्मन सेना का मनोबल टूट गया l देशभक्ति उनमे भी थी पर हालैंड वासियों की कुर्बानी के समक्ष फीकी पड़ गई l हिटलर ने सेना को वापस लौट जाने का आदेश दिया और कहा कि हालैंड पर विजय प्राप्त करना सम्भव नहीं है l उसने अपनी डायरी में लिखा ---- " आज मुझे पहली बार पता चला कि संगीनों , बंदूकों और बमों से अधिक ताकतवर होती है ---- मन एवं आत्मा की शक्ति l जिस देश के नागरिक आत्म - स्वाभिमान की रक्षा के लिए मरने को तैयार हैं, उन्हें कोई गुलाम नहीं बना सकता l " बची हुई जर्मन सेना पराजय स्वीकार कर के वापस लौट गई l
13 June 2017
सेवा व्रत का आदर्श ------ अवन्तिकाबाई गोखले
श्रीमती अवन्तिकाबाई में प्राचीन और नवीन भावनाओं का इस प्रकार मिश्रण हुआ था जिससे उनका व्यक्तित्व बहुत अधिक आकर्षक और कल्याणकारी बन गया था l उन्होंने सब प्रकार के सांसारिक प्रलोभनों और तृष्णाओं को त्याग कर अपना तन - मन - धन समाज सेवा में लगा दिया था l उनका जीवन प्रत्येक भारतीय स्त्री - पुरुष के लिए मार्ग दर्शक है l उन्होंने अपने गृहस्थ जीवन की उपेक्षा न करते हुए समाज सेवा का कार्य किया और महात्मा गाँधी के आदेश पर चम्पारण में सेवा कार्य किया और राष्ट्रीय आन्दोलन में बढ़ - चढ़ कर हिस्सा लिया l बम्बई के मुख्यमंत्री बाला साहब खेर ने कहा था --" कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि उनकी आकृति से ही देखने वाले पर अनुकूल छाप पड़ती है l अवन्तिकाबाई उन्ही में से एक थीं l उन्हें देखते ही ' यह कौन हैं ? ' जानने की सहज इच्छा होती थी l
अवन्तिकाबाई सुशिक्षित महिला थीं , अपने पति बबनराव के साथ बम्बई में सुख - सुविधा में रहती थीं , लेकिन उन्होंने सेवा का रास्ता चुना l अपने पति के दुर्घटना ग्रस्त होकर अपाहिज हो जाने पर वे उनसे और अधिक प्रेम और सेवा करती गईं l
उनका सबसे बड़ा कार्य था --' हिन्द महिला समाज ' की स्थापना l चम्पारण से वापस आने पर उन्होंने इस संस्था की स्थापना की , इसका उद्देश्य था मध्यम श्रेणी की महिलाओं को कार्य क्षेत्र में लाना l श्रीमती सोफिया वाडिया, यमुना बाई आप्टे और स्वयं उनके पति बबनराव गोखले ने हजारों रूपये दान स्वरुप देकर ' हिन्द महिला समाज ' की स्थिति को सुद्रढ़ बनाया l , इसका उद्देश्य स्त्रियों में शिक्षा प्रसार करना था , इसमें अंग्रेजी , मराठी और हिन्दी पढ़ाने की अच्छी व्यवस्था थी l स्त्रियों को सिलाई , चित्रकला , काढ़ना का कार्य भी सिखाया जाता था , जिससे अनेक महिलाएं स्वावलम्बी हो गईं l उन्होंने इसमें पुस्तकालय , वाचनालय खोला , उन दिनों महिलाये अखबार या पुस्तकें पढ़ने नहीं आती थीं , तब अवन्तिका बाई अखबार लेकर दस - बीस स्त्रियों को एकत्रित कर उन्हें अख़बार व पुस्तक पढ़कर सुनाती थीं l गरीबों को कपड़े, प्रसूता स्त्रियों को पौष्टिक खुराक , दूध , बच्चों के कपड़े देना आदि सभी सेवा कार्य किये जाते थे l ऐसी परोपकारी संस्था जब तक कायम रहेगी वह उनके लिए उत्तम स्मारक का काम काम करती रहेगी l
अवन्तिकाबाई सुशिक्षित महिला थीं , अपने पति बबनराव के साथ बम्बई में सुख - सुविधा में रहती थीं , लेकिन उन्होंने सेवा का रास्ता चुना l अपने पति के दुर्घटना ग्रस्त होकर अपाहिज हो जाने पर वे उनसे और अधिक प्रेम और सेवा करती गईं l
उनका सबसे बड़ा कार्य था --' हिन्द महिला समाज ' की स्थापना l चम्पारण से वापस आने पर उन्होंने इस संस्था की स्थापना की , इसका उद्देश्य था मध्यम श्रेणी की महिलाओं को कार्य क्षेत्र में लाना l श्रीमती सोफिया वाडिया, यमुना बाई आप्टे और स्वयं उनके पति बबनराव गोखले ने हजारों रूपये दान स्वरुप देकर ' हिन्द महिला समाज ' की स्थिति को सुद्रढ़ बनाया l , इसका उद्देश्य स्त्रियों में शिक्षा प्रसार करना था , इसमें अंग्रेजी , मराठी और हिन्दी पढ़ाने की अच्छी व्यवस्था थी l स्त्रियों को सिलाई , चित्रकला , काढ़ना का कार्य भी सिखाया जाता था , जिससे अनेक महिलाएं स्वावलम्बी हो गईं l उन्होंने इसमें पुस्तकालय , वाचनालय खोला , उन दिनों महिलाये अखबार या पुस्तकें पढ़ने नहीं आती थीं , तब अवन्तिका बाई अखबार लेकर दस - बीस स्त्रियों को एकत्रित कर उन्हें अख़बार व पुस्तक पढ़कर सुनाती थीं l गरीबों को कपड़े, प्रसूता स्त्रियों को पौष्टिक खुराक , दूध , बच्चों के कपड़े देना आदि सभी सेवा कार्य किये जाते थे l ऐसी परोपकारी संस्था जब तक कायम रहेगी वह उनके लिए उत्तम स्मारक का काम काम करती रहेगी l
12 June 2017
संघर्षरत साहित्यकार ------ एन्टन चेखव
सारी क्षमताएं , सारी शक्तियां और सारी संभावनाएं भगवान ने इस मानव शरीर में भर दी हैं l उनके उपयोग की स्थिति में हम हैं नहीं इसलिए लगता है कि हम असहाय और दीन - दुःखी हैं l उन सामर्थ्यों की एक झलक कभी हर एक के जीवन में देखने को मिलती है l जब जीवन खतरे में लगता है तब मनुष्य न जाने क्या से क्या कर गुजरता है l '
एन्टन चेखव के साथ भी यही हुआ ---- बचपन में वे मंद - बुद्धि और अविकसित दिमाग के थे , पढ़ने - लिखने में उनका मन नहीं लगता था l स्कूल प्रबंधकों ने उन्हें अपने स्कूल में पढ़ाने से मना कर दिया l तब उन्हें दरजी की दुकान पर रखा गया , वहां भी चेखव महीनों तक प्रयत्न करते रहे लेकिन एक पायजामा तक नहीं सी सके l नौ - दस वर्ष की आयु तक उनकी यही स्थिति रही l जीवन के यथार्थ धरातल पर जब उन्हें उतरना पड़ा तो परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए उनकी बौद्धिक क्षमता न जाने कहाँ से जाग गई l
24 वर्ष की अवस्था में उनका पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ l इस स्थिति तक पहुँचते - पहुँचते उन्होंने ग्रीक , लैटिन , जर्मन और फ्रेंच भाषाएँ सीख लीं , साथ ही डाक्टरी का भी अध्ययन किया l जब उनसे किसी ने पूछा कि इतने कम समय में आप अपना इतना विकास कैसे कर सके तो उनका एक ही उत्तर होता ---- लगन और निष्ठा के बल पर कुछ भी अप्राप्य नहीं है l
काम के प्रति उनके मन में ऐसी लगन जागी कि वे जब लिखने बैठते तो तब तक लिखते जब तक कि उँगलियाँ दर्द के कारण लिखने से इनकार न कर दें l उस स्थिति में भी वे थक कर सोते नहीं पढ़ने लगते थे l धैर्य इतना था कि जब प्रकाशक रचनाएँ वापस कर देते तो बिना खिन्न हुए वे उसे सुधार कर फिर से लिखने लगते l
एन्टन चेखव के साथ भी यही हुआ ---- बचपन में वे मंद - बुद्धि और अविकसित दिमाग के थे , पढ़ने - लिखने में उनका मन नहीं लगता था l स्कूल प्रबंधकों ने उन्हें अपने स्कूल में पढ़ाने से मना कर दिया l तब उन्हें दरजी की दुकान पर रखा गया , वहां भी चेखव महीनों तक प्रयत्न करते रहे लेकिन एक पायजामा तक नहीं सी सके l नौ - दस वर्ष की आयु तक उनकी यही स्थिति रही l जीवन के यथार्थ धरातल पर जब उन्हें उतरना पड़ा तो परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए उनकी बौद्धिक क्षमता न जाने कहाँ से जाग गई l
24 वर्ष की अवस्था में उनका पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ l इस स्थिति तक पहुँचते - पहुँचते उन्होंने ग्रीक , लैटिन , जर्मन और फ्रेंच भाषाएँ सीख लीं , साथ ही डाक्टरी का भी अध्ययन किया l जब उनसे किसी ने पूछा कि इतने कम समय में आप अपना इतना विकास कैसे कर सके तो उनका एक ही उत्तर होता ---- लगन और निष्ठा के बल पर कुछ भी अप्राप्य नहीं है l
काम के प्रति उनके मन में ऐसी लगन जागी कि वे जब लिखने बैठते तो तब तक लिखते जब तक कि उँगलियाँ दर्द के कारण लिखने से इनकार न कर दें l उस स्थिति में भी वे थक कर सोते नहीं पढ़ने लगते थे l धैर्य इतना था कि जब प्रकाशक रचनाएँ वापस कर देते तो बिना खिन्न हुए वे उसे सुधार कर फिर से लिखने लगते l
11 June 2017
दृढ़ संकल्प से अपने सपनों को पूरा किया ----- श्री एच , जी. वेल्स
' आगे बढ़ने की अदम्य - आकांक्षा , आंतरिक उत्साह , ध्येय के प्रति अविचल निष्ठा मनुष्य को क्या से क्या बना डालते हैं , इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं ---- एच. जी. वेल्स
छोटी उम्र में बच्चों के साथ खेल - कूद में उनकी एक टांग टूट गई जो ठीक न हो सकी l छोटी उम्र में ही एक कपड़े की दुकान पर काम करने लगे , गरीबी थी l काम करते वक्त वे सोचते थे -- ' मुझे ऊँचा उठाना है , आगे बढ़ना है , सारी जिन्दगी यों ही दासता नहीं करनी l कठिन से कठिन श्रम करूँगा , जो कठिनाइयाँ सामने आएँगी उन्हें पराजित करूँगा , दुनिया को दिखा दूंगा कि भाग्य नहीं , मनुष्य की कर्म निष्ठा बड़ी है l '
उनके ह्रदय में एक ऐसा व्यक्ति बनने की महत्वाकांक्षा थी जो संसार प्रसिद्ध हो --- जिसे सब आदर और श्रद्धा साथ स्मरण करें और जो काल के भाल पर अपने अमिट पद चिन्ह छोड़ जाये l इस सबके लिए उन्हें सबसे अधिक भाया एक लेखक का व्यक्तित्व l उन्होंने अपने सारे प्रयत्न इसी दिशा में मोड़ दिए l दिन भर दुकान में काम करते और देर रात तक पढ़ते l दिन में काम के बीच जो समय मिलता उसमे अध्ययन करते l धीरे - धीरे लिखना शुरू किया --- कहानी , लेख , उपन्यास ---- और इस तरह अपने अदम्य साहस , लगन , कठिन श्रम और आत्मविश्वास के बल पर महान लेखक बने , विश्व के साहित्यिक व्यक्तियों में एक ऐतिहासिक व्यक्ति l
छोटी उम्र में बच्चों के साथ खेल - कूद में उनकी एक टांग टूट गई जो ठीक न हो सकी l छोटी उम्र में ही एक कपड़े की दुकान पर काम करने लगे , गरीबी थी l काम करते वक्त वे सोचते थे -- ' मुझे ऊँचा उठाना है , आगे बढ़ना है , सारी जिन्दगी यों ही दासता नहीं करनी l कठिन से कठिन श्रम करूँगा , जो कठिनाइयाँ सामने आएँगी उन्हें पराजित करूँगा , दुनिया को दिखा दूंगा कि भाग्य नहीं , मनुष्य की कर्म निष्ठा बड़ी है l '
उनके ह्रदय में एक ऐसा व्यक्ति बनने की महत्वाकांक्षा थी जो संसार प्रसिद्ध हो --- जिसे सब आदर और श्रद्धा साथ स्मरण करें और जो काल के भाल पर अपने अमिट पद चिन्ह छोड़ जाये l इस सबके लिए उन्हें सबसे अधिक भाया एक लेखक का व्यक्तित्व l उन्होंने अपने सारे प्रयत्न इसी दिशा में मोड़ दिए l दिन भर दुकान में काम करते और देर रात तक पढ़ते l दिन में काम के बीच जो समय मिलता उसमे अध्ययन करते l धीरे - धीरे लिखना शुरू किया --- कहानी , लेख , उपन्यास ---- और इस तरह अपने अदम्य साहस , लगन , कठिन श्रम और आत्मविश्वास के बल पर महान लेखक बने , विश्व के साहित्यिक व्यक्तियों में एक ऐतिहासिक व्यक्ति l
10 June 2017
समग्र मानवता की पीड़ा को हरना जिनका उद्देश्य था ------- बंट्रेन्ड रसेल
ब्रिटेन की धरती पर जन्म लेकर भी वह किसी एक देश के होकर न रहे l लार्ड रसेल विश्व को एक कुटुम्ब के रूप में देखना चाहते थे l मानव - मानव के बीच धर्म , जाति, सम्प्रदाय और राष्ट्र की जो ऊँची - ऊँची दीवारें खड़ी हैं उन्हें वे तोड़ने के लिए प्रयत्नशील थे l ' रिमेम्बर योर ह्यूमनिटी एंड फोरगेट दी पास्ट ' नामक वक्तव्य को प्रसारित करते हुए उन्होंने कहा था ---" आप पृथ्वी के धरातल के किसी भी भाग में जन्म लें , इससे कुछ भी बनता - बिगड़ता नहीं , यदि कोई महत्वपूर्ण बात याद रखने की है तो वह यह कि आप इनसान हैं l
जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो वे सोचने लगे कि कितने ही नवयुवक जो देश की रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रूप से सहयोग दे सकते हैं , युद्ध की अग्नि उन्हें अपने में समेट लेगी l 1915 में उनकी पुस्तक ' व्हाई मैन फाइट ' प्रकाशित हुई l यह पुस्तक प्रत्येक युवक के हाथ में दिखाई देने लगी l अनिवार्य भरती का जो कानून बनाया था , उसके विरोध में स्वर फूटने लगे l शान्ति में जिनकी आस्था थी उन्होंने सेना में भरती होने से इनकार कर दिया l
रसेल अंत तक मानव को प्रेम से हाथ में हाथ मिलाकर चलने का सन्देश देते रहे l
जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो वे सोचने लगे कि कितने ही नवयुवक जो देश की रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रूप से सहयोग दे सकते हैं , युद्ध की अग्नि उन्हें अपने में समेट लेगी l 1915 में उनकी पुस्तक ' व्हाई मैन फाइट ' प्रकाशित हुई l यह पुस्तक प्रत्येक युवक के हाथ में दिखाई देने लगी l अनिवार्य भरती का जो कानून बनाया था , उसके विरोध में स्वर फूटने लगे l शान्ति में जिनकी आस्था थी उन्होंने सेना में भरती होने से इनकार कर दिया l
रसेल अंत तक मानव को प्रेम से हाथ में हाथ मिलाकर चलने का सन्देश देते रहे l
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