एक अंधियारी रात में एक प्रौढ़ व्यक्ति नदी के तट से कूदकर आत्महत्या करने पर विचार कर रहा था l वह उस क्षेत्र का सबसे धनी व्यक्ति था , लेकिन अचानक घाटे में उसकी सारी संपदा चली गई , इसी वजह से वह आत्महत्या का निश्चय कर के वहां आया था , परन्तु वह नदी में कूदने के लिए जैसे ही चट्टान के किनारे पहुँचने को हुआ कि उसे किन्ही दो मजबूत हाथों ने थाम लिया l उसने देखा कि आचार्य रामानुज उसे पकड़े हुए थे l उन्होंने उससे इस अवसाद का कारण पूछा तो वह बोला ----- " पहले मैं बहुत सुखी था l मेरे सौभाग्य का सूर्य पूरे प्रकाश से चमक रहा था लेकिन अब सिवाय अंधियारे के मेरे जीवन में और कुछ भी बाकी नहीं है l " यह सुनकर आचार्य रामानुज बोले ----- " दिन के बाद रात्रि और रात्रि के बाद दिन l जब दिन नहीं टिका तो रात्रि कैसे टिकेगी l परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है l जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे l जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है , उसका जीवन उस अडिग चट्टान की भांति हो जाता है , जो वर्षा व धूप में समान ही बनी रहती है l "
29 June 2024
23 June 2024
WISDOM -----
उत्तराखंड के एक प्राचीन नगर में सुबोध नामक राजा राज्य करते थे l महाराज का नियम था कि राजकीय कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व वे आए हुए याचकों को दान दिया करते थे l इस नियम में उन्होंने कभी भूल नहीं की l एक दिन जब सब लोग दान पा चुके तो तो एक विचित्र स्थिति आ गई l एक व्यक्ति ऐसा आया जो दान के लिए हाथ तो फैलाए था , पर मुँह से कुछ न कहता था l सब हैरान हुए कि इसे क्या दिया जाए ? बुद्धिमान व्यक्तियों की एक समिति बैठाई गई l किसी ने कहा वस्त्र देना चाहिए , किसी ने कहा अन्न देना चाहिए l कोई स्वर्ण देने को कहता था l समस्या का यथार्थ हल नहीं निकला l राजा की कन्या भी वहां उपस्थित थी , उसने कहा ---- " राजन ! जो व्यक्ति न बोल सकता है , न व्यक्त कर सकता है l उसके लिए आभूषण आदि व्यर्थ हैं l ऐसे लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ दान ' ज्ञान दान है l ज्ञान से मनुष्य अपनी सब इच्छाएं , आकांक्षाएं स्वयं ही पूर्ण कर सकता है और दूसरों को भी सहारा दे सकता है l इसलिए इसे ज्ञान दान दीजिए l ' राजकन्या की बात सभी को पसंद आई l उस व्यक्ति के लिए शिक्षा की व्यवस्था की गई l यही व्यक्ति आगे चलकर उस राज्य का विद्वान मंत्री नियुक्त हुआ l ऋषि कहते हैं ---- अज्ञान का निवारण ही सच्चा पुण्य -परमार्थ है l यह स्वाध्याय से और ज्ञानार्जन से ही संभव है l
22 June 2024
WISDOM -----
स्वामी विवेकानंद अपने शिष्यों के साथ पैदल भ्रमण को निकले l निर्माणाधीन मंदिर के पास उनकी द्रष्टि तीन मजदूरों पर पड़ी l उन्होंने उत्सुकतापूर्वक पहले मजदूर से पूछा ---- " क्यों भाई , क्या कर रहे हो ? " उसने उत्तर दिया ---- " गधे की तरह जुटे हुए हैं , देख नहीं रहे हो l दिन भर काम करने पर थोड़ा -बहुत मिल जाता है , पर इतने के लिए ठेकेदार मानो जान निकाल लेता है l " यही प्रश्न दूसरे से करने पर वह बोला ---- " मंदिर बन रहा है , हमारी तो किस्मत में यही था कि मजदूरी करें , सो कर रहे हैं l " तीसरे ने भाव भरे ह्रदय से उत्तर दिया ----- " भगवान का घर बन रहा है l मुझे तो प्रसन्नता है कि मेरी पसीने की कुछ बूंदे भी इसमें लग रही हैं l जो भी मुझे मिलता है , उसी में मुझे ख़ुशी है l गुजारा भी चल जाता है और प्रभु का काम भी हुआ जा रहा है l " स्वामी जी ने शिष्यों से कहा --- " " यह अंतर है तीनों के काम करने के ढंग में l मंदिर तीनों बना बना रहे हैं लेकिन एक गधे की तरह मज़बूरी में , दूसरा यंत्रवत भाग्य के नाम पर दुहाई देता हुआ और तीसरा समर्पण भाव से काम में जुटा हुआ है l यही अंतर इनके काम की गुणवत्ता में भी देखा जा सकता है l क्या कार्य किया जा रहा है , यह महत्वपूर्ण नहीं है , उसे किस उदेश्य से , किस भावना से किया जा रहा है , यह मायने रखता है l "
WISDOM -------
गोपियों ने एक बार बाँसुरी से पूछा ---- " तुम्हे कृष्ण स्वयं हर समय होठों से लगाए रहते हैं और हम सब उनकी कृपा पाने के लिए बहुत प्रयत्न करते हैं , परन्तु सफल नहीं होते , जबकि तुम बिना प्रयत्न किए ही उनके अधरों पर रहती हो l " बाँसुरी बोली ---- " बिना प्रयत्न किए नहीं गोपियों l मैंने भी प्रयत्न किया है l जानती हो मुझे मुरली बनने के लिए अपना मूल अस्तित्व ही खो देना पड़ा है l " गोपियों को तब समझ में आया l बाँसुरी अपने आप में खाली थी l उसमे स्वयं का कोई स्वर नहीं गूँजता था , बजाने वाले के ही स्वर बोलते थे l बाँसुरी को देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि वह कभी बाँस रह चुकी है क्योंकि न तो उसके कोई गाँठ थी और न कोई अवरोध l गोपियों को भगवान का प्यार पाने का अनूठा सूत्र मिल गया l
18 June 2024
WISDOM ----
एक बार महाराजा पुरंजय ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया l इसमें उन्होंने दूर -दूर से ऋषि -मुनियों को आमंत्रित किया l प्रजा के सुख के उदेश्य से आयोजित यज्ञ में विधि -विधान से आहुतियाँ दी जाने लगीं l यज्ञ की पूर्णाहुति का दिन आया l महाराज , महारानी , राजकुमार सभी यज्ञ मंडप में विराजमान थे l वेड मन्त्रों की ध्वनि से वातावरण गुंजित हो रहा था l अचानक एक किसान के रोने की आवाज सुनाई दी l वह रोते हुए कह रहा था ---- " डाकुओं ने मेरी संपत्ति लूट ली l मेरी गाय छीनकर ले गए l डाकू अभी थोड़ी ही दूर गए होंगे l राजा तुरंत उनको पकड़कर मेरी संपत्ति दिलाएं l " पंडितों ने कहा ---- " इस व्यक्ति को दूर ले जाओ l यदि राजा इस पर दया करके पूर्णाहुति किए बिना उठ गए तो देवता कुपित हो जाएंगे l " लेकिन किसान का रुदन सुनकर राजा के ह्रदय में करुणा जाग उठी , वे बोले ---- " मेरा पहला कर्तव्य प्रजा का संकट दूर करना है l मैंने अनेक यज्ञ पूर्ण किए हैं l आज मैं पहली बार यज्ञ पूर्ण किए बिना अपने राज्य के किसान का संकट दूर करने जा रहा हूँ l " राजा के यह कहने पर साक्षात् यज्ञ भगवान प्रकट हुए और बोले ---- " राजन ! तुम्हे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है l यह तुम्हारी परीक्षा थी कि तुम अपनी प्रजा के प्रति कर्तव्यपालन करते हो या नहीं l अब आपको सौ राजसूय यज्ञ का फल मिलेगा l "
15 June 2024
WISDOM --------
आज की सबसे बड़ी समस्या है कि लोगों के मन में शांति नहीं है l अशांत मन का व्यक्ति अपने आसपास अशांति फैलाता है और इस तरह अशांत मन के लोगों की श्रंखला बढ़ती जाती है और धीरे -धीरे विकृत रूप ले लेती है l इस अशांति की शुरुआत परिवारों से ही होती है l यह आदिकाल से चला आ रहा है l भगवान श्रीराम को वनवास माता कैकेयी की जिद्द और पिता दशरथ के आदेश से हुआ l कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं था l इसी तरह महाभारत में पांडवों के विरुद्ध जितने भी षड्यंत्र रचे गए , उन्हें वर्षों तक जितना भी उत्पीड़ित किया गया वह उन्ही के चचेरे भाइयों --दुर्योधन आदि कौरवों द्वारा किया गया l हमारे धर्मग्रन्थ रामायण और महाभारत हमें जागरूक करने के लिए है l इन महाकाव्यों के रचनाकार को पता था कि कलियुग में जब स्वार्थ , लालच , ईर्ष्या , द्वेष , महत्वाकांक्षा और दुर्बुद्धि का प्रतिशत बहुत बढ़ जायेगा तब ये पारिवारिक मतभेद और वीभत्स रूप ले लेंगे l ये महाकाव्य हमारे लिए प्रकाश स्तम्भ हैं l कलियुग में लोगों के पास बुद्धि तो बहुत है लेकिन विवेक नहीं है इसलिए वे अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करते हैं l परिवार में , समाज में स्वयं को अग्रणी और अन्यों को गिरा -पड़ा बनाने के लिए ताकि लोग मदद के लिए हमेशा उनका मुँह ताकते रहें , इसके लिए लोग तंत्र , मन्त्र , ब्लैक मैजिक , नकारात्मक क्रियाएं आदि का सहारा लेते हैं l इन कार्यों का सबूत तो केवल ईश्वर के पास होता है , कानून के पास नहीं l अपराध चाहे कैसा भी हो , यह सत्य है कि उसकी शुरुआत परिवार से ही होती है l परिवार में ही छोटी -छोटी चोरी कर के व्यक्ति बड़ा चोर बन जाता है l धन -संपत्ति चुराने से भी बड़ा एनर्जी वैम्पायर भी बन जाता है l ऐसे लोग रावण की तरह कई चेहरे वाले होते हैं l इन्हें पहचानना कठिन है क्योंकि समाज में इनकी बड़ी प्रतिष्ठा होती है , परिवार में भी यही दिखाते हैं कि वे ही सब के हितेषी हैं l ईश्वर की कृपा से जब ऐसे लोगों की असलियत समझ में आ जाये तो हमारे आचार्य , ऋषियों का मत है कि दुष्टों से न तो मित्रता करो और न ही वैर रखो l इन्हें त्याग दो जैसे विभीषण ने रावण को त्याग दिया और भगवान श्रीराम की शरण में आ गया l पांडव भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आ गए l जो ईश्वर का शरणागत हुआ वह सफल हुआ और अत्याचारी का अंत तो सुनिश्चित है l
14 June 2024
WISDOM --------
1. बात उन दिनों की है , जब बुद्ध के प्रथम शिष्य आनंद श्रावस्ती पहुंचे l नगर के श्रेष्ठियों ने उनसे पूछा ----- " बुद्धं शरणं गच्छामि ' का अर्थ महात्मा बुद्ध की शरण में जाना होता है क्या ? यदि ऐसा है तो यह क्या महात्मा बुद्ध के अहंकार का द्योतक नहीं ? " आनंद बोले ---- " श्रेष्ठि ! क्या आपको पता है कि जब श्रमण समूह चलता है तो यह सूत्र सभी बोलते हैं , स्वयं भगवान बुद्ध भी l व्यक्ति की शरण में जाने का भाव इसमें होता तो वे स्वयं न दोहराते l " आनंद ने स्पष्ट किया ----- " तथागत का नाम तो सिद्धार्थ था l ज्ञान के प्रकाश का बोध होने पर वे बुद्ध कहलाए l जिस प्रकाश ने उन्हें बुद्ध बनाया , उसी दिव्य -दूरदर्शी विवेक की शरण में जाने का संकेत इस सूत्र में है l "