अंधकार की शक्तियों को यह अहंकार होता है कि वे अमर हैं , उन्हें कोई नहीं मिटा सकता लेकिन गहन अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य की एक किरण ही पर्याप्त है l मनुष्य संसार से छिपकर , नकाब पहनकर अनेक अपराध करता है , उसे यह विश्वास होता है कि उसे किसी ने नहीं देखा l स्वयं को भगवान समझने के कारण उसे ऐसी ग़लतफ़हमी होती है l यह बात उसकी समझ से परे है कि प्रकृति के कण -कण में भगवान हैं , वे उसे देख रहे हैं l डिवाइन टाइम होता है , तब वह सच सबके सामने आता है l ईश्वरीय शक्ति कब और कैसे मनुष्य के अहंकार को चकनाचूर करती है , देखने और समझने वालों के लिए वह चमत्कार होता है l -----------------" नन्ही सी चिनगारी! तुम भला मेरा क्या बिगाड़ सकती हो ! देखती नहीं मेरा आकार ही तुमसे कई गुना बड़ा है , अभी तुम्हारे ऊपर गिर पडूँ तो तुम्हारे अस्तित्व का पता भी न लगे l " तिनकों का ढेर अहंकार पूर्वक बोला l चिनगारी कुछ बोली नहीं , चुपचाप ढेर के समीप जा पहुंची l तिनके उसकी आंच में भस्मसात होने लगे l अग्नि की शक्ति ज्यों -ज्यों बढ़ी , तिनके जलकर नष्ट होते गए , देखते -देखते भीषण रूप से आग लग गई और सारा ढेर राख में परिवर्तित हो गया l यह द्रश्य देख रहे आचार्य ने अपने शिष्यों को बताया ---- " बालकों ! जैसे आग की एक चिनगारी ने अपनी प्रखर शक्ति से तिनकों का ढेर खाक कर दिया l वैसे ही तेजस्वी और क्रियाशील एक व्यक्ति ही सैकड़ों बुरे लोगों से संघर्ष में विजयी हो जाता है l "
8 April 2025
4 April 2025
WISDOM -------
ईश्वर ने इस धरती पर अनेकों बार विभिन्न रूपों में अवतार लिए l अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना के लिए ही ईश्वर को आना पड़ा l कुछ समय के लिए आसुरी शक्तियों का अंत हो जाता है लेकिन अति शीघ्र ये असुर फिर से प्रबल होकर आतंक मचाने लगते हैं l असुरता क्या है ? यदि बच्चों को आरम्भ से ही नैतिक शिक्षा न दी जाए , तो बालक समाज में व्याप्त दोष -दुर्गुणों को सीख जाता है , उसका आचरण दूषित हो जाता है , यही असुरता है l व्यक्ति शिक्षा प्राप्त कर बुद्धिमान तो बन जाता है लेकिन नैतिकता का ज्ञान न होने के कारण वह अपने ज्ञान का दुरूपयोग करता है l असुरता का सबसे बड़ा दोष यह है कि यह जंगल की आग की तरह भड़कती है l ईश्वरीय विधान से उन्हें उनके कर्मों का दंड भी समय -समय पर मिलता है लेकिन इस दंड के बाद उनके आसुरी कृत्य समाप्त नहीं होते समाप्त नहीं होते l अपना अंत आया देखकर और प्रबल हो जाते हैं l श्री हनुमान जी ने रावण की लंका जला दी , उसका पुत्र अक्षय कुमार और अनेक राक्षस मारे गए , इससे रावण कमजोर नहीं हुआ , उसने देवी की पूजा -साधना कर के और अधिक शक्ति प्राप्त कर ली l कंस ने तो आकाशवाणी सुन ली थी कि उसको मारने वाला पैदा हो चुका है लेकिन अपनी मृत्यु को निकट जानकार उसने कोई सत्कर्म नहीं किए बल्कि अबोध बालकों की हत्या कराना शुरू कर दिया , अत्याचार और अधिक करने लगा l यह स्थिति प्रत्येक युग में है l आसुरी प्रवृत्ति के लोग बड़े -बड़े अपराध करते हैं , जीवन का अंत आया देखकर भी सुधरते नहीं l अपनी सफलता के लिए किसी को भी अपने रास्ते से हटाने में परहेज नहीं करते l यह तो स्पष्ट हो चुका है कि असुरों को मारने से असुरता का अंत नहीं होता l यदि किसी विधि से उनके विचारों में सुधार हो जाये , विचार परिष्कृत हो जाएँ , उनमें सद्बुद्धि आ जाए तो रूपांतरण होने में कोई देर नहीं लगती l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने सद्बुद्धि के लिए ' गायत्री मन्त्र ' को संसार के लिए सुलभ कर दिया l इस मन्त्र में अद्भुत शक्ति है जिससे संसार का कल्याण संभव है l
1 April 2025
WISDOM -------
यदि मनुष्य ईश्वर के बनाए इस कर्मफल विधान को समझ जाए और होश में रहकर कर्म करे तो संसार से अत्याचार , अन्याय , अपराध और पापकर्मों का अंत हो जाए l संसार में इतना अत्याचार , अधर्म , अन्याय इसीलिए है क्योंकि अहंकार के वशीभूत होकर मनुष्य स्वयं को भगवान समझने लगा है और अपने अहंकार के पोषण के लिए मनमानी करता है l जो जितना बड़ा है उसका अहंकार भी उतना ही बड़ा है l यही कारण है कि परिवार , समाज , राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जितना भी अन्याय , युद्ध , षड्यंत्र , शोषण ----- यह सब अहंकारियों के कारण ही है l यदि धन , वैभव , पद , प्रतिष्ठा , शक्ति में जो उच्च स्तर पर हैं , वे किसी तरह कर्मफल विधान को समझ जाएँ तो संसार में भी शांति आ जाये और उनका परलोक और आगे आने वाले जन्म भी सुधर जाएँ l पुराणों में अनेक कथाएं हैं जिनमें बताया गया है कि स्वयं भगवान और कर्मों का निर्धारण करने वाले यमराज को भी कर्मफल भोगना पड़ता है तो मनुष्य इस विधान से कैसे बच सकता है l ऋषि कहते हैं ---कर्मों के परिणाम से बचने के लिए आप संसार के किसी भी कोने में छिप जाओ , कर्म आपको उसी तरह ढूंढ लेते हैं जैसे हजारों गायों के बीच बछड़ा अपनी माँ को ढूंढ लेता है l हमारे कर्म हमारी पर्सनल फ़ाइल है जो हमेशा हमारे साथ है l अच्छा -बुरा जो भी किया है उसका हिसाब जन्म -जन्मांतर की इस यात्रा में कभी न कभी चुकाना ही पड़ेगा l एक कथा है ---- एक चरवाहे की शिकायत पर राजा ने दूसरे पक्ष को सुने बिना ही अनजाने में महर्षि मांडाव्य को सूली की सजा सुना दी l सूली का भयंकर कष्ट सहन करते हुए महर्षि ने प्राण त्याग दिए और उनकी आत्मा यमलोक पहुंची l महर्षि की तपस्या के कारण स्वयं महर्षि को लेने यमराज यमलोक के द्वार पर पहुंचे l तब महर्षि ने यमराज से पूछा ---" यमराज ! मेरे द्वारा वह कौन सा कर्म था जिसके परिणाम स्वरुप मुझे सूली पर चढ़ने का घातक कष्ट भुगतना पड़ा l " तब यमराज ने चित्रगुप्त के पास उनके सभी कर्मों का हिसाब देखा और कहा --- " महर्षि ! जब आप आठ वर्ष के थे तब आपने एक कीड़े की गर्दन पर एक धारदार वस्तु से प्रहार किया था l वही कर्म आपको सूली पर चढ़ने के रूप में चुकाना पड़ा l " महर्षि ने कहा ---- " यमराज ! आठ वर्ष के बालक को कर्मों के शुभ -अशुभ होने का विवेक नहीं होता , उस बालक में इतनी समझ नहीं होती कि वो अपने कर्मों के दूरगामी परिणामों को महसूस कर सके l ऐसी स्थिति में कर्म के निर्धारण की सम्यक जिम्मेदारी इस पद पर आसीन होने के कारण तुम्हारी थी यमराज l इस जिम्मेदारी को पूर्ण करने में तुम सफल नहीं रहे इसलिए तुम्हे भी अपने कर्म दोष का परिणाम भुगतना पड़ेगा और तुम धरती पर एक साथ दो व्यक्तियों के रूप में जन्म लोगे l एक रूप में तुम शासक बनोगे , परन्तु जीवन भर भटकते रहोगे और दूसरे रूप में तुम ज्ञानी तो होगे , परन्तु अधिकार से शून्य रहोगे l " महर्षि का वचन सत्य हुआ l यमराज को धरती पर दो रूपों में जन्म लेना पड़ा l पहले रूप में वे युधिष्ठिर बने , जिसमें वे शासक तो थे , परन्तु जीवन भर भटकते रहे और दूसरे रूप में वे सूतपुत्र विदुर थे l विदुर ज्ञानी थे लेकिन उन्हें कोई महत्त्व और अधिकार नहीं मिला , गरीबी में जीवन व्यतीत किया l कर्म की गति गहन है l
30 March 2025
WISDOM -----
मनुष्य यदि सुधरना चाहे और सुख शांति से जीवन जीना चाहे तो प्रत्येक धर्म में उनके पवित्र ग्रन्थ हैं , प्रेरक कथाएं हैं लेकिन यदि उसमें विवेक नहीं है तो वह हर अच्छाई में से बुराई ढूंढकर , उस बुराई को ही अपने व्यवहार में लाकर उसे सत्य सिद्ध करने की हर संभव कोशिश करता है l जैसे रामायण पढ़कर , सीरियल देखकर भगवान राम की मर्यादा , भरत का आदर्श किसी ने नहीं सीखा l रावण के भी दुर्गुण सबने सीखे लेकिन उसके जैसा ज्ञानी और विद्वान कोई नहीं बना l इसी तरह महाभारत से अर्जुन जैसी वीरता , युधिष्ठिर का सत्य और धर्म का आचरण को अपने जीवन व्यवहार में लाना सबको ही कठिन लगता है लेकिन दुर्योधन का षड्यंत्र , शकुनि की कुटिल चालें और सात महारथियों का मिलकर अभिमन्यु को मारना सबको सरल लगता है l ऐसी विवेकहीनता ने ही कलियुग को अत्याचार और पाप के चरम शिखर पर पहुंचा दिया है l भगवान श्रीकृष्ण ने अधर्म के नाश के लिए जो नीति अपनायी उसका अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल बहुत बड़े पैमाने पर होता है l महाभारत का प्रसंग है कि --- शल्य पांडवों के मामा थे , वे पांडवों के पक्ष में ही युद्ध करने के लिए आ रहे थे l जब दुर्योधन को इस बात का पता चला तो उसने मार्ग में उनका स्वागत सत्कार कर अपनी कुटिलता से उनको अपने पक्ष में कर लिया l महाराज शल्य पांडवों के पास अफ़सोस व्यक्त करने आए कि अब वे विवश हैं और दुर्योधन के पक्ष में रहकर ही युद्ध करेंगे l तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा --जब आप युद्ध में कर्ण के सारथी बनो तब अपने शब्दों के मायाजाल से हर पल उसका मनोबल कम करते रहना l भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि कर्ण को पराजित करना असंभव है , यदि उसका मनोबल कम हो जायेगा , उसका आत्मविश्वास कम हो जायेगा तो उसे पराजित किया जा सकता है l शल्य ने यही किया l भगवान श्रीकृष्ण की यह नीति सफल हुई l कर्ण अधर्म और अन्याय के साथ था इसलिए उसे पराजित करना अनिवार्य था l अब इस युग में यह नीति लोगों को बहुत सरल लगती है l इसे सीखकर अब लोग अपनी सफलता के लिए कठिन परिश्रम नहीं करते , उनसे जो श्रेष्ठ है उसको हल पल अपमानित कर के , जो बुराइयाँ , जो कमियां उसमें नहीं हैं , उन्हें भी उस पर थोपकर , चारों तरफ उनका डंका पीटकर उसे बदनाम करने की हर संभव कोशिश करते हैं ताकि उसका मनोबल कम हो जाए , वो परिस्थितियों से हार जाए और वे हा -हा कर के हँसते हुए स्वयं को सफल और श्रेष्ठ बताकर सम्मान खींच लें l हिटलर ने भी कहा है --एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह सत्य लगने लगता है l कलियुग में ऐसे ही झूठ बोलने वालों की श्रंखला है l इस युग की सारी समस्याएं दुर्बुद्धि और विवेकहीनता के कारण हैं l आज की सबसे बड़ी जरुरत सद्बुद्धि की है l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा है --- 'गायत्री मन्त्र ' सद्बुद्धि प्रदान करता है , जैसे भी संभव को इस मन्त्र का वैश्विक स्तर पर जप होना चाहिए l तभी संसार में सुख -शांति होगी l
28 March 2025
WISDOM ----
हर युग की कहानी अलग है l उनकी तुलना संभव नहीं है l श्री राम और रावण का युद्ध धर्म और अधर्म का युद्ध था , रावण के अन्याय और अत्याचार का अंत करने के लिए था l लेकिन इसमें एक खास बात थी कि भगवान राम के पक्ष में कहीं से भी कोई राजा युद्ध करने नहीं आया l उन्होंने रीछ , वानर , भालुओं , बंदरों की मदद से यह युद्ध लड़ा और रावण का अंत किया l भगवान श्रीराम ने इन प्राणियों की मदद से युद्ध कर संसार को यह सन्देश दिया कि स्रष्टि का प्रत्येक प्राणी महत्वपूर्ण है , प्रकृति का प्रत्येक कण उपयोगी है और मानव की मदद के लिए है इसलिए हमें स्रष्टि के प्रत्येक कण के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहिए तभी हम जीवन में सफल हो सकते हैं l महाभारत का महायुद्ध भी अधर्म , अन्याय , अत्याचार का अंत कर धर्म और न्याय की स्थापना के लिए हुआ था l इस युद्ध के माध्यम से भगवान ने संसार को कर्मफल विधान को समझाया l इस युद्ध से यह स्पष्ट हुआ कि छल , कपट , षड्यंत्र , धोखा करने वालों का कैसा अंत होता है l व्यक्ति सबसे छिपकर छल , षड्यंत्र , धोखा करता है और सोचता है कि उसे किसी ने नहीं देखा , किसी ने नहीं जाना l लेकिन ईश्वर हजार आँखों से देख रहा है और ऐसे छिपकर अपराध करने वालों को कभी क्षमा नहीं करते l कलियुग की तो बात ही अलग है l यहाँ सत्य और धर्म पर चलने वाले बहुत कम है , उन्हें भी नकारात्मक शक्तियां चैन से जीने नहीं दे रहीं l इसलिए जब अधिकांश आसुरी प्रवृत्ति के हों तो धर्म और अधर्म की लड़ाई संभव ही नहीं है l कौन किस को मारे , सब एक नाव में सवार हैं l इसलिए कलियुग में प्राकृतिक आपदाएं , बाढ़ , भूकंप , सुनामी , महामारी आदि सामूहिक दंड के रूप में आती हैं किसी न किसी रूप में सभी पापकर्म में लिप्त हैं इसलिए सामूहिक दंड तो भोगना ही पड़ेगा जैसे एक मांसाहारी मांस खाकर पाप करता है तो उस मांस के लिए प्राणी का वध करने वाला , उसे बेचने वाला , उसे बेचने की अनुमति देने वाला , फिर उसे खरीदने वाला , यह सब देखने वाला , और देखकर चुप रहने वाला और ऐसे ही विभिन्न पापकर्मों में बहती दरिया में हाथ धोने वाला सभी पाप के भागीदार हैं l इसलिए उचित यही है कि सामूहिक दंड के लिए तैयार रहें l और ईश्वर से प्रार्थना करें , उनका नाम स्मरण करें ताकि मुक्ति तो मिले अन्यथा इस युग में ऐसे विभिन्न प्रकार के पाप करके भूत , -प्रेत , पिशाच और न जाने किन -किन योनियों में भटकना पड़े , ईश्वर का विधान कौन जान सकता है l कहते हैं जब जागो , तभी सवेरा l अब भी मनुष्य सुधर जाए , धर्म का नाटक करने के बजाय सन्मार्ग पर चले , अपनी गलतियों को सुधारे l फिर ईश्वर तो सब पर कृपा करते हैं l
25 March 2025
WISDOM -----
विधाता ने इस स्रष्टि में अनेक प्राणियों की रचना की l इन सब में मानव सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि मनुष्य के पास बुद्धि है , उसके पास अपनी चेतना को परिष्कृत करने के पर्याप्त अवसर हैं लेकिन अन्य प्राणियों को यह सुविधा नहीं है l मनुष्य शरीर में हम विभिन्न रिश्तों में बंधे हैं l ये सब रिश्ते हमारे विभिन्न जन्मों में किए गए कर्म हैं जिनका हिसाब हमें चुकाना पड़ता है l यदि हमारे पूर्व के कर्म अच्छे हैं तो उन रिश्तों से हमें सुख मिलेगा l जब विभिन्न सांसारिक रिश्तों को लेकर जीवन में दुःख मिलता है l अपमान , तिरस्कार , धोखा , षड्यंत्र , धन , संपदा और हक़ छीन लेना जैसे दुःख जब इन रिश्तों में मिलते हैं , तब हमें इस कष्टपूर्ण समय का सकारात्मक ढंग से सामना करना चाहिए l इन दुःखों के लिए हम ईश्वर को दोष देते हैं कि हमारे जीवन में ही ऐसा क्यों हुआ ? यदि ईश्वर को दोष देने के बजाय हम इस सत्य को समझें कि यह हमारे पूर्व जन्मों में किए गए विभिन्न कर्मों का हिसाब होगा , जो इस जन्म में हमें इन विभिन्न तरीकों से चुकाना पड़ रहा है तो हमारे मन को शांति मिलेगी l सुख का समय तो बड़ी आसानी से बीत जाता है लेकिन जब दुःख आता है तो सामान्य मनुष्य यही कहता है कि यदि ईश्वर हैं तो वे आकर संसार के कष्ट क्यों नहीं दूर कर देते l यह संसार कर्मफल के आधीन है l ईश्वर सर्वगुण संपन्न और श्रेष्ठता का सम्मुचय हैं , यदि हमारी पीठ पर पाप कर्मों की गठरी लदी है तो ईश्वर कैसे आयेंगे ? ईश्वर को पाने के लिए हमें अपने मन और आत्मा को परिष्कृत करना होगा l यदि हम अपनी चेतना को परिष्कृत करने का संकल्प लेते हैं और उस दिशा में आगे बढ़ने का निरंतर प्रयास करते हैं तो समय -समय पर इस मार्ग पर आने वाली कठिनाइयों से हमारी रक्षा करने के लिए ईश्वर अवश्य आते हैं l ईश्वर की सत्ता को केवल अनुभव किया जा सकता है l
24 March 2025
WISDOM ------
नारद जी ईश्वर के परम भक्त हैं l तीनों लोकों में वे भ्रमण करते हैं l इसी क्रम वे जब वे धरती पर भ्रमण कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि पापी तो बहुत सुख से जीवन व्यतीत कर रहे हैं और जो सज्जन हैं , पुण्यात्मा हैं , वे बड़ा कष्ट पा रहे हैं l उन्होंने भगवान विष्णु जी से कहा कि भगवान ! धरती पर तो अंधेरगर्दी चल रही है , पाप का साम्राज्य बढ़ता ही जा रहा है l ईश्वर भी क्या उत्तर दें ? यह तो कलियुग का प्रभाव है l द्वापर युग का अंत होने वाला था , तभी से कलियुग ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया था l युधिष्ठिर सत्यवादी थे , पांचों पांडव धर्म की राह पर चलते थे , स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनके साथ थे फिर भी सारा जीवन उन्हें कष्ट उठाना पड़ा , वन में भटकना पड़ा , राजा विराट के यहाँ वेश बदलकर नौकर बनकर रहना पड़ा l दूसरी ओर दुर्योधन अत्याचारी , अन्यायी था l सारा जीवन पांडवों के विरुद्ध षड्यंत्र करता रहा , फिर भी हस्तिनापुर का युवराज था , सारा जीवन राजसुख भोगता रहा l युद्ध भूमि में मारा गया तो मरकर भी स्वर्ग गया l पांडवों ने जीवन भर कष्ट भोगा l महाभारत के महायुद्ध के बाद राज्य भी मिला तो वह लाशों पर राज्य था , असंख्य विधवाओं और अनाथों के आँसू थे l धृतराष्ट्र और गांधारी के पुत्र शोक से दुःखी चेहरे का सामना करना मुश्किल था l पांडवों ने मात्र 36 वर्ष ही राज्य किया फिर वे अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को राजगद्दी सौंपकर हिमालय पर चले गए l यह सब ईश्वर का विधान है , इसका सही उत्तर किसी के पास नहीं है l कलियुग में भी भगवान पापियों और अत्याचारियों का अंत करने , उन्हें सबक सिखाने किसी न किसी रूप में अवश्य आते हैं लेकिन भगवान बहुत देर से आते हैं l एक बार महर्षि अरविन्द ने भी कहा था --भगवान को सबसे अंत में आने की आदत है l जब व्यक्ति का धैर्य चुक जाये , संघर्ष करते -करते हिम्मत टूट जाये , तब भगवान आते हैं l किसी कवि ने बहुत अच्छा लिखा है ---- " बड़ी देर भई , बड़ी देर भई , कब लोगे खबर मोरे राम l चलते -चलते मेरे पग हारे , आई जीवन की शाम l कब लोगे खबर मोरे राम ? " कलियुग में पाप का साम्राज्य बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यही है कि ईश्वर के न्याय का इंतजार करते -करते व्यक्ति का धैर्य समाप्त हो जाता है l ईश्वर मनुष्य के धैर्य की ही परीक्षा लेते हैं l इसलिए हमारे ऋषियों ने , आचार्य ने ईश्वर को पाने के लिए भक्ति मार्ग का सरल रास्ता बताया है l ईश्वर स्वयं अपने भक्तों की रक्षा करते हैं , भक्त के जीवन में कठिनाइयाँ तो बहुत आती हैं लेकिन ईश्वर स्वयं आकर उन्हें उन कठिनाइयों से उबार लेते हैं l सत्य के मार्ग पर कठिनाइयाँ तो बहुत हैं , लेकिन ईश्वर हमारे साथ है , वे हमारी नैया पार लगा देंगे , यह अनुभूति मन को असीम शांति प्रदान करती है , जो अनमोल है l