21 October 2021
WISDOM -----
20 October 2021
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ऋषियों का कहना है ---- जिस प्रकार हजारों गायों के बीच बछड़ा अपनी माँ को पहचान लेता है , उसी प्रकार मनुष्य के कर्म उसे ढूंढ़ ही लेते हैं l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- ' आप चाहते यह हैं कि आपको अच्छे कर्मों का फल मिले , पर बुरे कर्मों के बारे में इतने लापरवाह क्यों हैं कि हम राम -नाम ले लेंगे , पंचामृत पी लेंगे , गंगा जी में डुबकी मार लेंगे तो इन दिल्लगी - मजाकों मात्र से पाप से छूट जायेंगे l यह मुमकिन नहीं है l जहर खाया है तो आपको मरना होगा l आपने गलतियां की हैं तो उनका फल भुगतना होगा या फिर प्रायश्चित कीजिए , जितनी खाई खोदी है उतनी भरिये l आध्यात्मिक क्षेत्र की सच्चाई आपको समझनी होगी कि कर्मफल एक वास्तविकता है और उसमें भूतकाल के कर्मों का आपका जो डिपॉजिट है , वह ज्यों का त्यों है l वह चिन्ह पूजा से नहीं मिटेगा , उसका भी विधि - विधान है l "
18 October 2021
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- ' क्रोध एक ऐसा विष है , जो मनुष्य के चिंतन और व्यक्तित्व को विषाक्तता में बदल देता है l क्रोध करने पर हित अनहित में , शुभ अशुभ में , शांति अशांति में , हिंसा अहिंसा में , परमार्थ स्वार्थ में , विनम्रता अहंकार में , बदल जाता है l क्रोध एक ऐसे विकार के रूप में है जो कई तरह की बीमारियों को जन्म देता है l चिकित्सकों के अनुसार कैंसर , उच्च रक्त चाप , सिरदर्द और मानसिक रोगों की एक मुख्य वजह क्रोध ही है l क्रोध एक ऐसा मनोविकार है जो बुद्धि , विवेक और भावनाओं सबको नष्ट कर देता है l '
17 October 2021
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' जो ईश्वर से भय खाता है , उसे दूसरा भय नहीं सताता l ' अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार संकीर्ण स्वार्थ ,.
जो ईश्वर से भय खाता है उसे दूसरा भय नहीं सताता l ' अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार संकीर्ण स्वार्थ , वासना एवं अहंकार से युक्त अनैतिक जीवन भय का प्रमुख कारण है l वैराग्य शतक में भतृहरि ने भय की स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण किया है --' भोग में रोग का भय , ,सत्ता में गिरने का , शत्रुओं का भय , सौंदर्य में बुढ़ापे का भय , शरीर में मृत्यु का भय l इस तरह संसार में सब कुछ भय से युक्त है l जब स्वर्ग के राजा इंद्र तक भयभीत हैं तो इस संसार में उच्च पदों पर बैठे लोग कितने भयभीत होंगे , इसका अंदाजा लगाया जा सकता है l हर व्यक्ति इस भय से निपटने के लिए अपनी मानसिक स्थिति और अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रयास करता है l जितना पाने की लालसा है , उतना ही खोने का भय है l आचार्य श्री लिखते हैं ---' देवराज इंद्र के भय का कारण सिर्फ इतना है कि वे वासना के शिखर पर बैठे हैं , ऐसे में जब भी कोई ऊपर उठने की कोशिश करता है तो वे घबराने लगते हैं और उसे गिराने के लिए अप्सराएं उसके पास भेजते हैं l इससे बेहतर कोई दूसरा उपाय नहीं है l l ' यह भय ही तनाव का कारण है l जितने मजे से एक सामान्य आदमी सोता है , उतने मजे से वह नहीं सो सकता , दार्शनिक लाओत्से ने कहा है --- ' अगर मजे से रहना है तो आखिरी में रहना l जो अंतिम में खड़ा है , उसे कोई धक्का देने नहीं आएगा l अगर प्रथम होने की कोशिश होगी तो फिर अनेकों आ जायेंगे पीछे खींचने के लिए
15 October 2021
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मनुष्य सारा जीवन क्षण भंगुर लालसाओं की तृप्ति के लिए भागता रहता है , इसके लिए कितने दांव -पेंच भी लगाता है , अंत में समझ आता है सब कुछ खाली है , रिक्त है , पूरा जीवन व्यर्थ हो गया l इसलिए पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " क्षण भंगुर लालसाओं और उनकी तृप्ति को लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता l लक्ष्य को तो सदा शाश्वत और शांतिदायक होना चाहिए l " महान संत गुरजिएफ अपने शिष्यों से कथा कहते थे ------- " आकाश में उड़ने वाली चिड़िया को अपने से थोड़ी दूर पर एक चमकता हुआ श्वेत बादल दिखा l उसने सोचा --- चलो मैं उड़कर उस बादल को छू लूँ l ऐसा सोचते हुए वह चिड़िया उस बादल को अपना लक्ष्य बनाकर अपनी पूरी क्षमता से उड़ चली , लेकिन हवाओं के साथ अठखेलियाँ करता हुआ वह बादल कभी पूर्व में जाता तो कभी पश्चिम में और कभी तो वहीँ रूककर चक्कर खाते हुए चक्रव्यूह रचने लगता , कभी छिपता , कभी प्रकट हो जाता l अपनी बहुत कोशिशों के बाद भी चिड़िया उस तक नहीं पहुँच सकी l प्रयासों के इस दौर में उसने पाया कि जिस बादल के पीछे वह अपने जीवन को दांव पर लगाकर भाग रही थी , वह अचानक हवा के तेज झोंकों से छँट गया l अपने अथक प्रयत्न के परिणाम में उस चिड़िया ने देखा कि अरे ! यहाँ तो कुछ भी नहीं है l इस सच को देखकर उसका विवेक जाग्रत हो गया , चिड़िया को अपनी भूल का एहसास हुआ उसके अंतर्विवेक ने कहा -- यह तो बड़ी भूल हो गई l यदि लक्ष्य बनाना हो तो क्षण भंगुर बादलों को नहीं , बल्कि पर्वत की चोटियों को बनाना चाहिए जो शाश्वत और अनंत हैं l " आचार्य श्री लिखते हैं --- गुरजिएफ की यह बोध कथा हम सभी के जीवन में घटित होती है l हम अपने विवेक को जाग्रत करें l "
14 October 2021
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श्रीमद भगवद्गीता में भगवान कहते हैं कि दुराचारी से दुराचारी के लिए भी उनकी दृष्टि बड़ी सहानुभूतिपूर्ण है l किसी से कोई गलती हो गई है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसके लिए अब सब द्वार बंद हो गए हैं l भगवान कहते हैं ---- यदि कोई बहुत ही दुराचारी अनन्य भाव से मेरी उपासना करता है तो वह भी साधु कहने योग्य हो जायेगा l ऐसा भगवद भक्त कभी नष्ट नहीं होता l भगवान की स्पष्ट घोषणा है कि भक्ति के माध्यम से पापी भी तर जाता है l भगवान ने सदन कसाई , अजामिल और गणिका को भी तार दिया l भगवान कहते हैं जिनसे गलतियां हो गई हैं , उनके लिए भी मार्ग है l भगवान मात्र सत्पुरुषों का नहीं , बुरों का भी भला करने आते हैं l इसके लिए मार्ग कहीं से भी निकल आता है l दुराचारी भी सन्मार्ग मिलने पर कल्याण पा जाता है l
13 October 2021
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी मानव मन के मर्मज्ञ थे , उनके विचार हमें जीवन जीने की कला सिखाते हैं l भावनाओं के संबंध में उन्होंने लिखा है -----" भावनाओं का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है l सकारात्मक भावनाएं जहाँ प्रसन्नता , हर्ष , उत्साह , उमंग , साहस , संतोष व आत्मविश्वास के रूप में अभिव्यक्त होती हैं , वहीँ नकारात्मक भावनाएं ईर्ष्या , द्वेष , दुःख , असंतोष , चिंता , आत्महीनता , असुरक्षा आदि के रूप में प्रकट होती हैं और व्यक्ति के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती हैं l आचार्य श्री लिखते हैं ----- " भावनाओं में बहकर कभी भी अपने जीवन के निर्णय नहीं लेने चाहिएं क्योंकि ऐसी नाजुक मन: स्थिति में लिए गए निर्णय भविष्य के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध होते हैं l भावनाओं पर नियंत्रण पाने के लिए हमें अपने जीवन में कठोर श्रम करना चाहिए और उससे मिलने वाले परिणामों को स्वीकार करना चाहिए l यदि परिणाम आशा के अनुकूल है तो ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए और आशा के विपरीत होने पर अपनी कमियों पर ध्यान देकर उन्हें सुधारना चाहिए l " आचार्य श्री एक बात और समझाते हुए कहते हैं ----- ' अपने जीवन में चाहें जितने भी रिश्ते हों , लेकिन एक रिश्ता भगवान से भी रखना चाहिए और अपने मन की हर बात को उनसे बताना चाहिए l यह संवाद भले ही एकतरफा होता है , लेकिन जिंदगी में बहुत सारी उलझनों को सुलझाता है l इससे हमारी भावनाओं को सम्बल मिलता है कि कहीं कोई तो है , जो हमारा ध्यान रखता है और मुसीबत के समय भी हमें गिरने नहीं देता है , संभाल लेता है l आचार्य श्री कहते हैं ---इसके साथ ही अपने कर्तव्य पालन और प्रबल पुरुषार्थ करने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए l "