इस परिवर्तनशील संसार में एक ही अटल सत्य है और वह है -' मृत्यु ' l जो भी इस धरती पर आया है उसे एक दिन जाना ही है और यह कब और कैसे जाना है , यह सब पहले से ही निश्चित है l किसी प्राणी की मृत्यु जहाँ भी होनी है वह स्वयं ही उस स्थान पर पहुँच जाता है ---' तुलसी जसी तस भव्यता तैसी मिले सहाय , आप न आवे ताहि पे , ताहि तहां ले जाए l " आचार्य श्री कहते हैं ---- जीवन को ऐसे जिओ कि मृत्यु भी एक उत्सव बन जाए l मृत्यु के बाद क्या होगा , कोई नहीं जानता लेकिन हमारे महाकाव्यों के अध्ययन से एक बात समझ में आती है कि यदि मृत्यु के समय ईश्वर हमारे सामने हों या ईश्वर का नाम हमारी जुबां पर हो तो मुक्ति मिल जाती है जैसे रावण को राम ने ही मारा , ईश्वर उसके सामने थे , वह सीधा भगवान के धाम ही गया l महाभारत का युद्ध हुआ l दुर्योधन आदि कौरवों ने कितने छल -कपट , षडयंत्र किए लेकिन युद्ध भूमि में उस समय स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उपस्थित थे , सभी को अपने अंतिम समय में उनके दर्शन हुए इसलिए वे सब स्वर्ग के अधिकारी हुए लेकिन इस कलियुग में ईश्वर के दर्शन संभव नहीं हैं इसलिए ऋषियों ने कहा है कि हर पल ईश्वर का नाम -स्मरण करो l अंतिम समय में भी ईश्वर का नाम मन में गूंजेगा तो मृत्यु का कष्ट भी कम होगा और मुक्ति भी मिलेगी l ऋषि कहते हैं ---' भज ले हरि नाम अरे रसना , फिर अंत समय में हिली न हिली l ' अंत समय में तो जीवन में किए गए सारे भले -बुरे कर्म आँखों के सामने एक फिल्म की तरह चलते हैं इसलिए ईश्वर के 'नाम -स्मरण ' की प्रैक्टिस शुरू से ही करनी चाहिए जैसे महात्मा गाँधी ने जीवन भर राम का नाम लिया तो अंत समय में भी उन्होंने ' हे राम ! ' कहा और हाथ जोड़कर मृत्यु को स्वीकार किया l
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