लालच और स्वार्थ ये ऐसे दुर्गुण हैं जिनकी प्रत्येक युग में निंदा की गई है l यदि ये दुर्गुण किसी साधारण व्यक्ति में होते हैं तो इससे उसकी स्वयं की और उसके परिवार एवं कुछ निकट के लोगों की ही हानि होती है लेकिन यदि ये दुर्गुण समाज को दिशा देने वाले किसी व्यक्ति हों , ऐसे व्यक्ति जो समाज के एक बहुत बड़े भाग को प्रभावित करते हैं तो ऐसे दुर्गुणों से सम्पूर्ण समाज की इतनी बड़ी हानि होती है जिसका आंकलन करना कठिन है l जैसे गुरु द्रोणाचार्य को शस्त्र और शास्त्र दोनों का ज्ञान था l वे प्रारम्भ में बहुत निर्धन थे लेकिन कौरव और पांडवों को शिक्षा देने के दौरान उन्हें राजसत्ता के निकट रहने का सुख मिला , राजमहल के सब सुख उन्हें मिले l इस सुख -वैभव में वे इतने बंध गए कि कौरवों और पांडवों की शिक्षा के बाद भी वे राजमहल से जा न सके l दुर्योधन युवराज था , सारा जीवन द्रोणाचार्य ने दुर्योधन का नमक खाया इसलिए यह जानते हुए भी कि दुर्योधन अनीति और अधर्म की राह पर है , वे उसका विरोध न कर सके , उसकी प्रत्येक अनीति पर वे मौन रहे अर्थात मौन रहकर दुर्योधन की अनीति , छल -कपट षडयंत्र का समर्थन किया l इतने महान , नीति और धर्म के ज्ञाता , शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता का समर्थन जब उसे मिला तब उसके अहंकार को और अधिक बल मिला , उसने पांडवों को सुई की नोक बराबर भूमि देने से मना कर दिया , इसका परिणाम महाभारत तो होना ही था l गुरु द्रोणाचार्य का सम्पूर्ण जीवन और उनका अंत आज के धर्म गुरुओं के लिए एक चेतावनी है कि जीवन की आवश्यकताओं के लिए धन जरुरी है लेकिन सुख -वैभव से बंध जाना गलत है l इस संसार में एक नहीं अनेक दुर्योधन और दु:शासन हैं जो अपने स्वार्थ के लिए उनका इस्तेमाल करते हैं l