स्व. प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री की पत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री ने अपने जीवन के रोचक प्रसंग सुनाते हुए बताया ------- " जब मैं पहली बार अपने पति के साथ रूस यात्रा के लिए तैयार हुई , तो मुझे बड़ा डर लग रहा था l मैं सोच रही थी कि मैं सीधी - सादी भारतीय गृहणी हूँ l राजनीति का मुझे ज्ञान नहीं , विदेशी तौर - तरीकों का पता नहीं l कहीं मुझसे ऐसे प्रश्न न किए जाएँ , जिनका उत्तर मैं ठीक से न दे पाऊं और तब मेरे पति अथवा देश का गौरव कुछ घटे अथवा उनकी हंसी हो l किन्तु फिर मैंने यह निश्चय करके अपना डर दूर कर लिया कि मैं एक महान देश के प्रधानमंत्री की पत्नी के रूप में अपने को प्रस्तुत नहीं करुँगी l मैं तो सबके सामने अपने को एक एक साधारण भारतीय गृहणी के रूप में रखूंगी l मैंने जाकर अपने को एक गृहणी के रूप में ही पेश किया l वहां के अच्छे लोगों ने मुझसे घर - गृहस्थी के विषय में ही बातचीत की , जिसका उत्तर देकर मैंने सबको संतुष्ट कर दिया l इस प्रकार मैंने एक बहुमूल्य अनुभव यह पाया कि मनुष्य वास्तव में जो कुछ है , यदि उसी रूप में स्वयं को दूसरों के सामने पेश करे , तो उसे कोई असुविधा नहीं होती और उसकी सच्ची सरलता उपहास का विषय न बनकर स्नेह और श्रद्धा का विषय बनती है l "
23 April 2017
22 April 2017
जिन्होंने अपने पति श्री जमनालाल बजाज के छोड़े हुए कार्यों को पूरा करने के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया -------- जानकी देवी बजाज
भारत के स्वाधीनता संग्राम के एक सुद्रढ़ स्तम्भ श्री जमनालाल जी बजाज की पत्नी जानकी देवी बजाज ने पति की मृत्यु के बाद ' अर्द्धांगिनी ' का नाम चरितार्थ करने के लिए अपना जीवन सार्वजनिक सेवा के लिए अर्पित कर दिया l उन्होंने अपना कर्तव्य इतने प्रशंसनीय ढंग से पूरा किया कि वे भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन और प्रगति की एक मुख्य अंग बन गईं l
जन्म से वे मारवाड़ी घराने की एक अपढ़ , गहनों से लदी, परदे में रहने वाली , छुआछूत की भावना से ग्रस्त बालिका थीं l उनका विवाह प्रसिद्ध पूंजीपति सेठ श्री जमनालाल बजाज से हुआ l जमनालाल जी को देश सेवा की गहरी लगन थी l जब उन्हें सरकार ने ' राय बहादुर की उपाधि दी , उन्होंने अपनी पत्नी को पत्र में लिखा ----- " सद्बुद्धि और स्वार्थ रहित सेवा करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए ईश्वर से सदैव प्रार्थना करनी चाहिए l यह जीवन स्वप्न के समान है l हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि हम जो कुछ सेवा करें स्वार्थ रहित होकर करें l "
जमनालाल जी के आदेश पर जानकी देवी ने गहने त्यागे , घूँघट हटाया और उनके हर कार्य की साथी बन गईं l इसके बाद जानकी देवी ने मारवाड़ी समाज से परदा- प्रथा हटाने का पूरा आन्दोलन आरम्भ कर दिया l उनने स्थान - स्थान पर महिला - मंड,ल बनाये , नारी - जागरण का कार्य किया l उनके द्वारा किया गया एक महत्वपूर्ण कार्य है ----- प्यासे ग्रामीणों के लिए कूप ( कुंए ) निर्माण l वे बहनों से कहती थीं ---- कार्य कोई नहीं ' सौ तोले की जगह हम दस तोले के आभूषण पहन लेंगी लेकिन कुंआं बनायेंगी l इससे बड़ा पुण्य कार्य कोई नहीं l विनोबा भावे के साथ मिलकर उन्होंने कूप दान के संकल्प कराये , हजारों तोला सोना एकत्र कर कुएं खुदवाये , जिससे सबको पानी मिल सका |
जन्म से वे मारवाड़ी घराने की एक अपढ़ , गहनों से लदी, परदे में रहने वाली , छुआछूत की भावना से ग्रस्त बालिका थीं l उनका विवाह प्रसिद्ध पूंजीपति सेठ श्री जमनालाल बजाज से हुआ l जमनालाल जी को देश सेवा की गहरी लगन थी l जब उन्हें सरकार ने ' राय बहादुर की उपाधि दी , उन्होंने अपनी पत्नी को पत्र में लिखा ----- " सद्बुद्धि और स्वार्थ रहित सेवा करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए ईश्वर से सदैव प्रार्थना करनी चाहिए l यह जीवन स्वप्न के समान है l हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि हम जो कुछ सेवा करें स्वार्थ रहित होकर करें l "
जमनालाल जी के आदेश पर जानकी देवी ने गहने त्यागे , घूँघट हटाया और उनके हर कार्य की साथी बन गईं l इसके बाद जानकी देवी ने मारवाड़ी समाज से परदा- प्रथा हटाने का पूरा आन्दोलन आरम्भ कर दिया l उनने स्थान - स्थान पर महिला - मंड,ल बनाये , नारी - जागरण का कार्य किया l उनके द्वारा किया गया एक महत्वपूर्ण कार्य है ----- प्यासे ग्रामीणों के लिए कूप ( कुंए ) निर्माण l वे बहनों से कहती थीं ---- कार्य कोई नहीं ' सौ तोले की जगह हम दस तोले के आभूषण पहन लेंगी लेकिन कुंआं बनायेंगी l इससे बड़ा पुण्य कार्य कोई नहीं l विनोबा भावे के साथ मिलकर उन्होंने कूप दान के संकल्प कराये , हजारों तोला सोना एकत्र कर कुएं खुदवाये , जिससे सबको पानी मिल सका |
21 April 2017
WISDOM
' प्रबुद्ध व्यक्तियों के पद - चिन्हों का अनुसरण करने का नियम संसार में सभी जगह है |
जब महारानी क्षेमा को वैराग्य हो गया और महाराज बिम्बसार से अनुमति लेकर वे आत्म कल्याण हेतु दीक्षा लेने भगवान बुद्ध के पास पहुंची | तो हजारों की संख्या में नर - नारी एकत्रित होकर आश्रम पहुँचने लगे और दीक्षा का आग्रह करने लगे l
तब भीड़ की ओर इशारा करते हुए भगवान बुद्ध ने कहा ----- क्षेमा ! देखो कितनी भीड़ तुम्हारा अनुकरण कर रही है , जानती हो क्यों ? सामान्य जन के ह्रदय में भी ऐसी ही भक्ति होती है , जैसी कि तुम्हारे ह्रदय में उमड़ रही है l किन्तु इनके पास न विचार होता है न विवेक l ये केवल प्रबुद्ध व्यक्तियों के पद - चिन्हों का अनुकरण करते हैं | आज तक तुम्हारा वैभव - विलास का जीवन रहा , उसका अनुकरण ये लोग करते रहे l खान - पान , रहन - सहन , व्यवहार बर्ताव में इनने वह सब बुराइयाँ पाल लीं , जो राज घरानों में होती हैं l इस स्थिति में इन्हें छोड़कर अकेले तुम्हे दीक्षा कैसे दी जा सकती है ? फिर यह भी आवश्यक है कि इन सब में भी उसी तरह का विचार - विवेक और वैराग्य जाग्रत हो , जैसा तुम्हारे अंत:करण में उदित हुआ है l
भगवान बुद्ध ने कहा ----- ' क्षेमा ! तुम्हे कुछ दिन जन - जन के बीच रहकर ज्ञान दान द्वारा इनमे सत्प्रवृत्तियों का विकास और समाज - कल्याण करना होगा , तब तुम दीक्षा की पात्र बनोगी l "
क्षेमा उस दिन से जन - जन में ज्ञान दान के वितरण में जुट गई l वर्षों तक समाज सेवा के कार्य किये फिर भगवान बुद्ध ने उन्हें दीक्षा दी और आत्म कल्याण की साधना में प्रवेश कराया l
जब महारानी क्षेमा को वैराग्य हो गया और महाराज बिम्बसार से अनुमति लेकर वे आत्म कल्याण हेतु दीक्षा लेने भगवान बुद्ध के पास पहुंची | तो हजारों की संख्या में नर - नारी एकत्रित होकर आश्रम पहुँचने लगे और दीक्षा का आग्रह करने लगे l
तब भीड़ की ओर इशारा करते हुए भगवान बुद्ध ने कहा ----- क्षेमा ! देखो कितनी भीड़ तुम्हारा अनुकरण कर रही है , जानती हो क्यों ? सामान्य जन के ह्रदय में भी ऐसी ही भक्ति होती है , जैसी कि तुम्हारे ह्रदय में उमड़ रही है l किन्तु इनके पास न विचार होता है न विवेक l ये केवल प्रबुद्ध व्यक्तियों के पद - चिन्हों का अनुकरण करते हैं | आज तक तुम्हारा वैभव - विलास का जीवन रहा , उसका अनुकरण ये लोग करते रहे l खान - पान , रहन - सहन , व्यवहार बर्ताव में इनने वह सब बुराइयाँ पाल लीं , जो राज घरानों में होती हैं l इस स्थिति में इन्हें छोड़कर अकेले तुम्हे दीक्षा कैसे दी जा सकती है ? फिर यह भी आवश्यक है कि इन सब में भी उसी तरह का विचार - विवेक और वैराग्य जाग्रत हो , जैसा तुम्हारे अंत:करण में उदित हुआ है l
भगवान बुद्ध ने कहा ----- ' क्षेमा ! तुम्हे कुछ दिन जन - जन के बीच रहकर ज्ञान दान द्वारा इनमे सत्प्रवृत्तियों का विकास और समाज - कल्याण करना होगा , तब तुम दीक्षा की पात्र बनोगी l "
क्षेमा उस दिन से जन - जन में ज्ञान दान के वितरण में जुट गई l वर्षों तक समाज सेवा के कार्य किये फिर भगवान बुद्ध ने उन्हें दीक्षा दी और आत्म कल्याण की साधना में प्रवेश कराया l
20 April 2017
धार्मिक नव - चेतना के अवतार -------- महाप्रभु चैतन्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कीर्तन का प्रचार हिन्दू जाति को जाग्रत और संगठित करने के लिए किया था , जिससे वह विदेशी आक्रमणकारियों का सामना अच्छी तरह कर सकें | उन्होंने कीर्तन में राम - कृष्ण का नाम लेने के साथ उनके आत्म - त्याग , समाज - सेवा आदि गुणों को भी अपनाया था l कीर्तन के माध्यम से उन्होंने समाज को सन्मार्ग पर चलने , सद्गुणों को अपनाकर जाग्रत और संगठित होने की प्रेरणा दी l
गौरांग महाप्रभु चैतन्य देव जब नित्यानंद के साथ कीर्तन करते निकलते तो दो डाकू जघाई - मघाई उनसे झगड़ते , कहते ----- " हमारी नींद मत खराब किया करो l ' बोल हरि बोल ' का कीर्तन कहीं और कर लिया करो , पर हमारे घर के सामने नहीं l " पर चैतन्य महाप्रभु ने अपना मार्ग नहीं बदला l उनने उन्हें नित्य जगाना आरम्भ किया और कहा कि---- अच्छा तुम यह नहीं बोल सकते तो हित की बात बोलो , इससे तुम्हारा परम हित सध जायेगा l ढोल , मृदंग - झांझ की थाप पर वे कीर्तन करते ------ ' मागुर माछेर झोल --- जुवति में एक कोल , बोल हरि बोल l ( मागुर मछली का झोल मिलेगा , नारी का साथ होगा , पर पहले हरि बोल )
संसार के दो सुख ---- स्वाद और वासना --- इसकी चर्चा कर सभी संसारी लोगों को आकर्षित कर उनने उनकी जीवन द्रष्टि बदल दी l कीर्तन ने कीकट देश , बंगाल व उड़ीसा की भूमि के संस्कार बदल दिए एवं सारा क्षेत्र भक्ति प्रधान हो गया l
गौरांग महाप्रभु चैतन्य देव जब नित्यानंद के साथ कीर्तन करते निकलते तो दो डाकू जघाई - मघाई उनसे झगड़ते , कहते ----- " हमारी नींद मत खराब किया करो l ' बोल हरि बोल ' का कीर्तन कहीं और कर लिया करो , पर हमारे घर के सामने नहीं l " पर चैतन्य महाप्रभु ने अपना मार्ग नहीं बदला l उनने उन्हें नित्य जगाना आरम्भ किया और कहा कि---- अच्छा तुम यह नहीं बोल सकते तो हित की बात बोलो , इससे तुम्हारा परम हित सध जायेगा l ढोल , मृदंग - झांझ की थाप पर वे कीर्तन करते ------ ' मागुर माछेर झोल --- जुवति में एक कोल , बोल हरि बोल l ( मागुर मछली का झोल मिलेगा , नारी का साथ होगा , पर पहले हरि बोल )
संसार के दो सुख ---- स्वाद और वासना --- इसकी चर्चा कर सभी संसारी लोगों को आकर्षित कर उनने उनकी जीवन द्रष्टि बदल दी l कीर्तन ने कीकट देश , बंगाल व उड़ीसा की भूमि के संस्कार बदल दिए एवं सारा क्षेत्र भक्ति प्रधान हो गया l
19 April 2017
कर्म से ब्राह्मण ------- ऐतरेय
इतरा शूद्र कुल में उत्पन्न हुई थी , पर उसे महर्षि शाल्विन की धर्मपत्नी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ | उसके एक पुत्र भी था l एक बार राजा ने बड़ा यज्ञ आयोजन किया , उसमे सभी ब्राह्मणों और ब्रह्म कुमारों का सत्कार हुआ किन्तु इतरा के पुत्र को शूद्र कहकर सम्मान से वंचित कर दिया गया l शाल्विन , इतरा दोनों ही बहुत दुखी हुए , बच्चा भी उदास था l इस दुःख में एक नया प्रकाश मिला | तीनों ने मिलकर यह निश्चय किया कि वे जन्म से बढ़कर कर्म की महत्ता सिद्ध करेंगे l शिक्षण का नया दौर प्रारम्भ हुआ l इतरा के पुत्र ऐतरेय को धर्म शास्त्रों की शिक्षा दी गई देखते - देखते वह अपनी अदभुत प्रतिभा का परिचय देने लगा l
एक बार वेद ऋचाओं के अर्थ की प्रतिस्पर्धा हुई l दूर देश के राजा और विद्वान एकत्रित हुए और सभी की पांडुलिपियाँ जांची गई | सर्वश्रेष्ठ ऐतरेय घोषित किये गए l
' ऐतरेयब्राह्मण ' वेद ऋचाओं को प्रकट करने वाला अदभुत ग्रन्थ है , इसका स्रजेता जन्म से शूद्र होते हुए भी कर्म से ब्राह्मण बना l
एक बार वेद ऋचाओं के अर्थ की प्रतिस्पर्धा हुई l दूर देश के राजा और विद्वान एकत्रित हुए और सभी की पांडुलिपियाँ जांची गई | सर्वश्रेष्ठ ऐतरेय घोषित किये गए l
' ऐतरेयब्राह्मण ' वेद ऋचाओं को प्रकट करने वाला अदभुत ग्रन्थ है , इसका स्रजेता जन्म से शूद्र होते हुए भी कर्म से ब्राह्मण बना l
18 April 2017
WISDOM---- क्षुद्र क्षमता पर अहंकार व्यर्थ है
भगवत्कार्य ( सत्कर्म ) में कोई भी कर्ता नहीं , मात्र निमित्त ही होता है l अपने से कितना भी बड़ा एवं विशिष्ट कार्य संपन्न हो जाने पर भी यदि स्वयं को निमित्त मात्र ही माना जाये , तो अहंकार नहीं होता | '
एक बार भगवान विष्णु वाहन गरुड़ को अहंकार हो गया कि उनकी सेवा के बिना विष्णु एक डग भी नहीं चल सकते , विष्णु मेरे अधीन हैं , कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता l इस अहंकार में उन्होंने शिव के प्रमुख सर्प मणि को कैद कर लिया | जब शाम हुई और मणि को न पाकर शिवजी ने नंदी को कहा कि विष्णु लोक जाकर मणि को गरुड़ से मुक्त करा लाओ |
भगवान विष्णु ने नन्दी से शिव का सन्देश सुनकर गरुड़ को बुलाया और मणि को मुक्त करने का आदेश दिया l अहंकार के आवेश में गरुड़ ने कहा ---- " मैं मणि को आज मुक्त नहीं करूँगा l भगवन मैंने आपकी बहुत सहायता की है , आपकी हर विजयश्री के लिए मैं ही निमित्त हूँ , आपकी सभी यात्राएँ मेरे ही कारण संपन्न हुई हैं | "
भगवन विष्णु सोचने लगे कि गरुड़ को अहंकार हो गया , यदि यह अहंकार दूर न हुआ तो इसका अनिष्ट हो जायेगा l
भगवान विष्णु बोले ---- " गरुड़ हमें तुम पर गर्व है , यह सच है कि कई विजय हमें तुम्हारे ही कारण मिली हैं l तुमने हमारे भारी- भरकम शरीर को योजनों दूरी तक ढोया है l " ऐसे बातों - ही - बातों में भगवान ने अपने दाहिने पैर का अंगूठा गरुड़ पर रख दिया l
जैसे ही अंगूठा रखा , गरुड़ बोझ के मारे तिलमिलाने लगा , उसे लगा कि इस बोझ से प्राण ही निकल जायेंगे | क्षण भर तो वह चुप रहा , पर जब सहन नहीं हुआ तो बोला ---- " भगवन ! जरा अंगूठा ------ मैं दबकर पिसा जा रहा हूँ l "
भगवान बोले ---- " क्यों , अंगूठे से क्या हुआ ? तुमने तो हमारा शरीर कोसों ढोया है l "
गरुड़ अब तक सारी बात समझ चुके थे l वह धीरे - धीरे बोले ---- भगवन मुझे क्षमा करें l मुझे अहंकार हो गया था l आपने मेरा अहंकार नष्ट कर मुझ पर उपकार किया l मैं मणि को अभी मुक्त कर दूंगा , मुझे क्षमा कर दें l " भगवान ने अंगूठा हटाया तो गरुड़ की रूकती साँसे चलने लगी l उन्होंने इस सत्य को गहराई से अनुभव किया कि --- ' भगवत्कार्य में कोई भी कर्ता नहीं
होता ,मात्र निमित्त ही होता है l '
एक बार भगवान विष्णु वाहन गरुड़ को अहंकार हो गया कि उनकी सेवा के बिना विष्णु एक डग भी नहीं चल सकते , विष्णु मेरे अधीन हैं , कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता l इस अहंकार में उन्होंने शिव के प्रमुख सर्प मणि को कैद कर लिया | जब शाम हुई और मणि को न पाकर शिवजी ने नंदी को कहा कि विष्णु लोक जाकर मणि को गरुड़ से मुक्त करा लाओ |
भगवान विष्णु ने नन्दी से शिव का सन्देश सुनकर गरुड़ को बुलाया और मणि को मुक्त करने का आदेश दिया l अहंकार के आवेश में गरुड़ ने कहा ---- " मैं मणि को आज मुक्त नहीं करूँगा l भगवन मैंने आपकी बहुत सहायता की है , आपकी हर विजयश्री के लिए मैं ही निमित्त हूँ , आपकी सभी यात्राएँ मेरे ही कारण संपन्न हुई हैं | "
भगवन विष्णु सोचने लगे कि गरुड़ को अहंकार हो गया , यदि यह अहंकार दूर न हुआ तो इसका अनिष्ट हो जायेगा l
भगवान विष्णु बोले ---- " गरुड़ हमें तुम पर गर्व है , यह सच है कि कई विजय हमें तुम्हारे ही कारण मिली हैं l तुमने हमारे भारी- भरकम शरीर को योजनों दूरी तक ढोया है l " ऐसे बातों - ही - बातों में भगवान ने अपने दाहिने पैर का अंगूठा गरुड़ पर रख दिया l
जैसे ही अंगूठा रखा , गरुड़ बोझ के मारे तिलमिलाने लगा , उसे लगा कि इस बोझ से प्राण ही निकल जायेंगे | क्षण भर तो वह चुप रहा , पर जब सहन नहीं हुआ तो बोला ---- " भगवन ! जरा अंगूठा ------ मैं दबकर पिसा जा रहा हूँ l "
भगवान बोले ---- " क्यों , अंगूठे से क्या हुआ ? तुमने तो हमारा शरीर कोसों ढोया है l "
गरुड़ अब तक सारी बात समझ चुके थे l वह धीरे - धीरे बोले ---- भगवन मुझे क्षमा करें l मुझे अहंकार हो गया था l आपने मेरा अहंकार नष्ट कर मुझ पर उपकार किया l मैं मणि को अभी मुक्त कर दूंगा , मुझे क्षमा कर दें l " भगवान ने अंगूठा हटाया तो गरुड़ की रूकती साँसे चलने लगी l उन्होंने इस सत्य को गहराई से अनुभव किया कि --- ' भगवत्कार्य में कोई भी कर्ता नहीं
होता ,मात्र निमित्त ही होता है l '
17 April 2017
WISDOM
प्रसिद्ध चिकित्सक जीवक ने कठोर परिश्रम द्वारा तक्षशिला विश्वविद्यालय द्वारा आयुर्वेदाचार्य की उपाधि हासिल की | उनके आचार्य ने उन्हें मगध जाकर लोगों की सेवा करने का निर्देश दिया | जीवक को अपने कुल गोत्र का कोई ज्ञान नहीं था , उन्होंने कहा --- " आचार्य ! मगध राज्य की राजधानी है , सभी कुलीन लोग वहां निवास करते हैं | क्या वे मुझ जैसे कुलहीन से अपनी चिकित्सा करवाना स्वीकार करेंगे ? मुझे आशंका है कि कहीं मुझे अपमान का सामना न करना
पड़े | " जीवक के गुरु ने कहा ----- " वत्स ! आज से तुम्हारी योग्यता , क्षमता , प्रतिभा और ज्ञान ही तुम्हारे कुल और गोत्र हैं , तुम जहाँ भी जाओगे , अपने इन्ही गुणों के कारण सम्मान के भागीदार बनोगे l कर्म से मनुष्य की पहचान होती है , कुल और गोत्र से नहीं l सेवा ही तुम्हारा धर्म है l " जीवक की आत्महीनता दूर हो गई और अपने सेवा भाव से वह प्रसिद्ध चिकित्सक बना |
पड़े | " जीवक के गुरु ने कहा ----- " वत्स ! आज से तुम्हारी योग्यता , क्षमता , प्रतिभा और ज्ञान ही तुम्हारे कुल और गोत्र हैं , तुम जहाँ भी जाओगे , अपने इन्ही गुणों के कारण सम्मान के भागीदार बनोगे l कर्म से मनुष्य की पहचान होती है , कुल और गोत्र से नहीं l सेवा ही तुम्हारा धर्म है l " जीवक की आत्महीनता दूर हो गई और अपने सेवा भाव से वह प्रसिद्ध चिकित्सक बना |
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