24 July 2019

WISDOM ----- मनुष्य जन्म से नहीं , कर्म से महान होता है l

   हिन्दू  धर्म  के  संस्थापक  इतने  उदार , दूरदर्शी  व  न्यायप्रिय  थे   कि  वे  वर्तमान में  प्रचलित  जाति - पांति   के  कारण  चल  पड़े  , ऊँच - नीच  के   भेदभाव   को  कदापि  स्वीकार  नहीं  कर  सकते  थे   l  उनकी  आत्माएं  स्वर्ग  में  बैठी  रो  रहीं  होंगी    कि  हमने   किन  उच्च  उद्देश्यों  को  लेकर  वर्णाश्रम  धर्म  की  स्थापना  की  थी  और  आज  लोगों  ने    उसकी  कैसी   दुर्गति  बनाई  और  क्या  से  क्या  कर  के  रख  दिया  l    जाति , धर्म   आदि  के  आधार  पर  होने  वाले  अत्याचार  को  धर्म    कदापि  स्वीकार  नहीं  करता  l
  पं.  श्रीराम  शर्मा  आचार्य  ने  वाड्मय  ' संस्कृति - संजीवनी  श्रीमद्भागवत  एवं  गीता '  में  पृष्ठ  1.114  पर  लिखा  है ----- " भारतीय  संस्कृति  यदि  ऐसी  ओछी , संकीर्ण  एवं  अन्यायी  रही  होती   तो  संसार  में  इतने  दिनों  तक  उसका  अस्तित्व  न  टिक  सका  होता  l  विवेकशील  लोगों  ने   उसे  दुनिया  के  परदे  पर  से  कब  का  मिटा  दिया  होता   l  अन्यायी  व्यक्तियों  का  नाश  हुआ  है  तो  अन्यायी  परम्पराएँ  ही  कैसे  जीवित  बनी  रहतीं  ?  "   आचार्य श्री  आगे  लिखते  हैं  ---- "  जब  से  हमने  ऐसी  अहंवादी  अन्याय मूलक   परम्पराएँ  अपनायीं  तभी  से  हमारा  पतन  हुआ  l  पिछले  एक  हजार  वर्षों  तक   हमें  विदेशी  आक्रमणकारियों   के  जो  लोमहर्षक  अत्याचार  सहने  पड़े  , उन्हें  यदि  हमारी   अन्याय  मूलक  परम्पराओं  का  दंड  कहा  जाये  तो  अतिशयोक्ति  न  होगी  l    हमने  अपनों  को  सताया    दूसरे  हमें  सताने  आ  गए  l  सेर  को  सवा  सेर  मिल  गया  l   दूसरों  को  न्याय  का  उपदेश  देने  से  पहले  हमें  अपने  हाथ  अनीति  की  कीचड़  से  सने  हुए   न  रखने  का  प्रयत्न  करना  होगा  l  "
  गीता  का  समता  द्रष्टि  वाला  आदर्श  ---  'सब  प्राणियों  में  भगवान  है , एक  ही  आत्मा  सब  में  समाया  हुआ  है  '  हमें  अपने  व्यक्तिगत  और  सामाजिक  जीवन  में   सम्मिलित  रखना  चाहिए  l  इसके  बिना  हमारी  सामूहिक  प्रगति  अवरुद्ध  बनी  रहेगी  l 
  स्वामी  विवेकानन्द जाति  के  कायस्थ  थे  l  इस  जातीय कारण  से  उन्हें   बहुत  बार  अपमान  और  घोर  विरोध  का  भी  सामना  करना  पड़ा   लेकिन  भारत  को  धर्म  का  सन्देश  देने , विश्व  में  भारत  का  सम्मान  बढ़ाने,  जन - सेवा  के  कार्यक्रमों  को  चलाने, भारतीय  समाज  को  संगठित  करने  व  उसे  जगाने   के  लिए  वे  सदैव  प्रयास  करते  रहे   l  इन  महान  सेवाओं  के  कारण  स्वामी  विवेकानंद  भारत  की  महान  विभूतियों  की  श्रेणी  में  गिने  जाते  हैं   l  कायस्थ  की  द्रष्टि  से  उन्हें  कोई  नहीं  मानता  वरन   भारतीय  जनता  के  , युवाओं  के  प्रेरणा - स्रोत  ,  महापुरुष  के  रूप  में माने  जाते  हैं  l 
  महात्मा  गाँधी  वैश्य  जाति  में  उत्पन्न  हुए    पर  वे  अपनी  महानता  के  कारण  ब्राह्मणों  के  ब्राह्मण  ,  विश्व  में  पूजनीय  बापू  बने  l  

23 July 2019

WISDOM -----

  मनुष्य  के  शत्रु  दो  प्रकार  के  हैं --- एक  वे  शत्रु  जो  दिखाई  देते  हैं  -- इसमें  वे  लोग  सम्मिलित  होते  हैं  जो  अपने  से  द्वेष  भाव  रखते  हैं , हानि  पहुँचाने  की  कोशिश  करते  हैं  l  इसमें  वे  जीव  जैसे  सिंह , सांप , बिच्छू  आदि  भी  हैं  जो   अवसर  मिलने  पर  आक्रमणकारी  हो  जाते  हैं   l  इसके  अतिरिक्त  विभिन्न  प्रकार  के  रोग  भी  हमारे  बैरी  हैं  जो  धन  व  प्राणों  पर  संकट  उपस्थित  करते है  l  --  ये  सब  शत्रु  या  हमारे  बैरी  ऐसे  हैं   जिनको  हम  देखते  हैं , पहचानते  हैं  और  उनसे  अपनी  रक्षा  के  विभिन्न  उपाय  भी  कर  लेते  हैं  l 
 दूसरे   प्रकार  के   शत्रु  वे  हैं  जो  हमें  दिखाई  नहीं  देते  , पकड़  में  नहीं  आते  l  ये  हैं  हमारे  आंतरिक  शत्रु , हमारे  मनोविकार --- काम , क्रोध , लोभ , छल ,कपट , अहंकार , मद , मत्सर  आदि  अनेक  दुर्गुण  हैं , मनोविकार  हैं   जिन  पर  नियंत्रण नहीं  किया  गया   तो  ये मनुष्य  को  पतन  की   ओर  ले  जाते  हैं  l  ये  भीतरी  शत्रु  लकड़ी  में  लगे  घुन  की  तरह  मनुष्य  के   व्यक्तित्व   को  खोखला  करते  रहते  हैं   और  इन्ही  दुर्गुणों  के  कारण  मनुष्य  स्वयं  अशांत  रहता  है  ,  अपने   आसपास    के  लोगों  को  परेशान   करता  है  और  समाज  में  अशांति  फैलाता  है  l   इन  आसुरी  प्रवृतियों  को  नियंत्रित  कर  के  ही  समाज  में  सुख - शांति  से  रहा  जा  सकता  है  l  

22 July 2019

WISDOM ----- सुख - शान्ति से रहने के लिए भेद की इन रेखाओं को मिटाना होगा

  बंट्रेंड  रसेल  का  जन्म  इंग्लैण्ड  में  हुआ  था  l  वे  मानवतावादी  विचारक  थे  और  विश्व  को  एक  कुटुम्ब  के  रूप  में  देखना  चाहते  थे  l  मानव - मानव  के  बीच  धर्म , जाति , सम्प्रदाय  और  राष्ट्र  की  जो  ऊँची , ऊँची  दीवारें  हैं  , उन्हें  वे  तोड़ने  के  लिए  प्रयत्नशील  थे  l  अपने  एक  वक्तव्य  में   उन्होंने  यही  अपील  की  थी  कि   मनुष्य  को  यह  भूल  जाना  चाहिए  कि  वे  हिन्दू  के  यहाँ जन्मे  या  मुसलमान  के  यहाँ , यहूदी  या  ईसाई  के  यहाँ   l  कोई  भी  भूमि  आपको  जन्म  दे  सकती  है   l यदि  कोई  महत्वपूर्ण  बात  है  तो  वह  यह  है  कि   आप  इन्सान  हैं   l 
  जब  प्रथम  विश्व युद्ध  छिड़ा  तो  वे  बहुत  दुःखी  हुए    और  सोचने  लगे  कि  कितने  ही  नवयुवक  जो  देश  की  रचनात्मक  गतिविधियों  में  सक्रिय  रूप  से  सहयोग  दे  सकते  हैं  ,  युद्ध  की  अग्नि  उन्हें  अपने  में  समेट  लेगी  l    वे  कहते  थे  कि  भगवान  का  सबसे  महत्वपूर्ण  वरदान  बुद्धि  है   इसके  सदुपयोग  से  बड़े  से  बड़े  कार्य  संपन्न  किये  जा  सकते  हैं   l 
 चंद्रतल  को  अपने  पैरों  से  रौंदने  वाले  मानव  को  वे  अंत  तक  यही  सन्देश  देते  रहे  कि  इस  धरती  पर  हाथ  में  हाथ  मिलकर  प्रेम  से  चलने  का  प्रत्येक  व्यक्ति  को  प्रयत्न  करना  चाहिए  l  

21 July 2019

WISDOM ----- अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना प्रत्येक धर्मशील व्यक्ति का न्यायोचित कर्तव्य है

 लोग  तो  मनुष्य  योनि  पाकर  भी  अधम  कार्य  करते  हैं  एवं  अपना  इस  धरती  पर  आना  कलंकित  करते  हैं   l  गिद्ध  की  योनि  में  जन्म  लेकर  भी  धर्मात्मा  जटायु  ने   अत्याचार  व  अन्याय  के  विरुद्ध  रावण  से  संघर्ष  किया  और  अपने  जीवन  को  सार्थक  किया  l  
  रावण   आकाश  मार्ग  से  सीता  माँ का  छल  पूर्वक  हरण  कर   ले  जा  रहा  था  l पक्षीराज  जटायु  ने  सीता  का  करुण  क्रंदन  सुना  तो  ध्यान  से  उठकर  गुफा  से  बाहर  आये  और  ध्वनि  को  लक्ष्य  कर  उड़ान  भरी  l  लंका  के  राजा  रावण  को   बलात  हरण  करते  उन्होंने  पहचान  लिया  और  पुष्पक  विमान  के  आगे  जाकर  प्रतिरोध  में   उन  ने  टक्कर  मारी   l  रावण  ने  देखा  कि  विमान  की  गति   कैसे   रुक  गई   l  फिर  जटायु  को  पहचानते  हुए  उसने  खड्ग  निकाल  लिया  l  नि:शस्त्र  जटायु  ने  बड़ी  वीरता  से  रावण  से  युद्ध  किया  ,  फिर  पंख  कट  जाने  से   पृथ्वी  पर  आ  गिरे  l  रावण  ने  अट्टहास  किया   तो  जटायु  ने  उत्तर  दिया  --- " पापी  ! परोपकार  में  प्राण  देकर  मुझे  तो  सद्गति  मिलेगी  ,  पर  तेरा  सर्वनाश  अब  निश्चित  है  l "
भगवान  राम  ने  जब  घायल  जटायु  को  देखा  तो  अपनी  गोद  में  लिया  , जटायु  ने  भगवन  की  गोद  में  ही  अपने  प्राण  त्यागे  l  सत्कर्मों  के  कारण  गिद्ध  होते  हुए  भी  जटायु  ने   देवपद  पाया  l  

20 July 2019

WISDOM ------ प्रेरणाप्रद द्रष्टान्त ----' गरीब की हाय '

 एक  राजा  ने  किसी  विद्वान्  से  जानना  चाहा  कि  ' गरीब  की  हाय ' क्या  है  , इससे  क्या  होता  है  ?
 विद्वान्  ने  इस  प्रश्न  का  उत्तर  देने  के  लिए  तीन  माह  का  समय  माँगा  l  उसने  राजा  से  कहा --- महाराज  ! इस  प्रश्न  का  उत्तर  मैं  आपको  किसी   जंगल  में  दूंगा l  अत:  आपको  500  सैनिक  साथ  लेकर  चलना  होगा  l "  राजा  को  तो  प्रश्न  का  उत्तर  जानना  था  अत:  मंत्रियों  को  राज कार्य  समझा  दिया  और  सैनिकों  समेत  जंगल  को  प्रस्थान  किया  l 
घने  जंगल  में  पहुंचे  जहाँ  मनुष्य  तो  क्या  पक्षियों  की  बोली  भी  बहुत  कम  ही  सुनाई  देती  थी  l  विद्वान्  ने  कहा  --- यहीं  ठहरना  ठीक  है  l  राजा  की   आज्ञा    से  सैनिकों  ने  वहीँ  तम्बू  लगाया  ,  भोजन  आदि  व्यवस्था  की  l  अब  विद्वान्  ने  कहा --- राजन  !  मैं  आपके  प्रश्न  का  उत्तर  दूंगा , लेकिन  यह  सामने  वाला  बरगद  का  पेड़  इसमें  सबसे  बड़ी  बाधा  है  l  यह  पेड़  जब  तक  जड़  सहित  अपने  आप   न  गिर  जाये   तब  तक  मैं  आपके  प्रश्न  का  उत्तर   नहीं  बता  सकता  l  अत:  आप  इन  500  सैनिकों  को  उस  हरे - भरे  पेड़  की  देख - रेख  में  तैनात  कर  दें  l    यह  सख्त  आदेश  दें  कि  जब  तक  पेड़  सूख  न  जाये  कोई  भी  सैनिक  वहां  से  हटे  नहीं   और  उस  पेड़  को  नष्ट  करने  के  लिए  उस  पर  किसी  शस्त्र  का  प्रयोग  न  करें  l  जैसा  विद्वान्  ने  कहा  राजा  ने  सब  वैसा  कर  दिया  l    अब  500  सैनिक  उस  पेड़  की  देख - रेख  में  लग  गए  और  महाराज  स्वयं  उस  पेड़  के  सूखने  की  राह  देखने  लगे  l
दो - तीन  दिन  जैसे - तैसे  बीते  लेकिन  दिन  भर   जून  की  तपती  धूप,  लू   और  पानी  की  कमी  से   वे  बड़े  व्याकुल  हो  गए  l  सोते - जागते , उठते - बैठते , खाते -पीते  उनके  मुंह  से  यही  निकलता --हाय !  ये  पेड़  कब  सूखेगा  ?  कब  हम  अपने  घर  जायेंगे  ?  बच्चों  से  मिलेंगे  ?  वे  500 जवान  उस  पेड़  के  लिए  ह्रदय  से  दुःखी  हो  गए  l हाय  ! ये  पेड़  कब  सूखेगा  ? 
किसे  विश्वास  था  कि  यह  सैकड़ों  वर्षों  में  गिरने  वाला  पेड़  जल्दी  ही  सूखकर  गिर  जायेगा  l  लेकिन  यह  क्या  ?  तीन  महीने  भी  नहीं  हुए  कि  पेड़  के  तमाम  पत्ते   सूखकर    झड़  गए  ,  सबको  कुछ  आशा  बंधी  l  पूरे  छह  माह  भी  समाप्त नहीं  हुए  कि  वह  पेड़  जड़  सहित  जमीन  पर  गिर  गया  l  सबकी  खुशी  का  पार  न  रहा  l  एक  सिपाही ने  खुशी  के  मारे  दौड़कर  राजा  को  यह  संदेश  भी  सुना  दिया  कि  श्रीमान ,  बरगद  का  पेड़  जड़  सहित  अपने  आप  गिर  गया  l  राजा  और  विद्वान्  बड़ी  उत्सुकता  से  देखने  आये  l  सब  देखकर  विद्वान्  ने  सैनिकों  से  पूछा --- " तुमने  इस  हजारों  वर्षों  में   नष्ट  होने  वाले  पेड़  को  कैसे  गिरा  दिया  ?  क्या  तुमने  किसी  शस्त्र  की  सहायता  से  ऐसा  किया  ?
वे  सब  बोले -- " महाराज  !यह  तो  अपने  आप  ही  गिर  पड़ा  l  हमने  कोई  शस्त्र  का  प्रयोग  नहीं  किया  l  हाँ ! हम  सोते - जागते    यह   अवश्य   कहते  रहे    कि  हाय !  ये  पेड़ सूख जाये  ,  तब  हम  अपने  घर  जाएँ  l            तब  विद्वान्  ने  कहा ,-- " राजन  !  जिस  प्रकार  यह  हजारों  वर्षों  में  नष्ट  होने  वाला  पेड़   500  जवानों  की  'हाय '  खाकर  अपने  आप  जड़  सहित  गिर  पड़ा  ,  उसी  प्रकार  आदमी  भी  दीन - दुःखियों  को  सता  कर  ,  अनेकों  की  'हाय'  खाकर   अपने  आप  ही  नष्ट  हो  जाता  है  l  "  राजा  भी  समझ  गया  कि  हाय  से  क्या  नहीं  नाश  को  प्राप्त  हो  सकता  ?  

19 July 2019

WISDOM ---- इतिहास से शिक्षा लें ---

उचित  यही  है  कि  हम  इतिहास  से  शिक्षा  लें  और  गलतियों  को  सुधारें  l  कहते  हैं --- ' इतिहास  स्वयं  को  दोहराता  है  l ' ---- जाति - पांति  के  अंतर्गत   छोटे - बड़े  की  , ऊँच - नीच  की  भावना  फूट  फैलाती  है  ,  एक  दूसरे  को  अलग  करती  है  l  एक  देश  में  अनेकों  देश ,  एक  समाज  में  अनेकों  समाज ,  एक  वर्ग  जाति  में   अनेकों  जाति  उत्पन्न  करती  है  l  इस  फूट  का  दुष्परिणाम  पिछले  दिनों  सारे  समाज  को  भोगना  पड़ा  और  हमें  एक  हजार  वर्ष  की  गुलामी  का  दंड  भुगतना  पड़ा  l  यह  जरुरी  है  कि  अलगाव  की  दुष्प्रवृत्तियों  के  खतरे  को  समझा  जाये   और  उनसे  पिण्ड  छुड़ाने  का  प्रयत्न  किया  जाये  l
 जागरूक  होने  के  लिए  इन  उदाहरणों  का  मनन  करना  चाहिए ------
 विभीषण  रावण  से  क्रुद्ध  होकर  राम  से  जा  मिला  l  उसने  लंका  का  सारा  भेद  बता  दिया   l  फलस्वरूप  असुर  वंश  का  नाश  हो  गया  l 
जयचंद  मुहम्मद  गजनवी  से  जा मिला  और  भारत  के  सब  राजाओं  की  कमजोरी  उसे  बता  दी  l  उस  भेद  से  लाभ  उठाकर  ही  मुसलमान  थोड़े  प्रयत्न  से  ही  इतनी  आश्चर्य जनक  विजय   प्राप्त  कर  सके  l 
        राजपूतों  में  से  बहुत  से   मुसलमानों  से जा  मिले  थे  , यही  कारण    था  कि  इतने  लम्बे  समय  तक  भारत  को  गुलाम  बनाये  रह  सके  l 
  अंग्रेजों  को  यहाँ  के  प्रतिभाशाली  लोगों  का  सहयोग  न  मिला  होता   तो  वे  इतनी  थोड़ी  संख्या  में  होते  हुए   भी  इतने   अधिक  समय  तक  हमारा  शोषण  कर  सकने  में  कभी  सफल  नहीं  होते  l 
   शक्तिसिंह  और  राणा  प्रताप  में  फूट  पड़  जाने  से  ही   चित्तौड़  का  पतन  हुआ  l 
 ऐसी  कलंकित  गाथाएं  इतिहास  में  अनेकों  मिलती  हैं    जिनके  कारण  उस  फूट  के  मार्ग  पर  चलने  वाले  व्यक्तियों  का  ही  नहीं  , व्यापक  पैमाने  पर   सम्पूर्ण  समाज  का  अहित  ही  हुआ  है   l 
बन्दर  और  बिल्ली  की कहानी  प्रसिद्ध  है   जिसमे  एक  रोटी  को     दो  बिल्ली  आपस  में  बाँट  न  सकने  के  कारण  बन्दर  के  हाथों  उन्हें  पूरी  रोटी  गंवानी  पड़ी  l 
भारत  में  फैली  हुई  जाति - पांति , ऊँच - नीच , भाषावाद , प्रांतवाद  , लिंग  भेद   आदि  के  नाम  पर  फैली  हुई  अलगाव  की  प्रवृतियां  सब  प्रकार  से  घातक  और  अवांछनीय  हैं   l   इनका  जितनी  जल्दी  अंत  हो  और  एकता  की  भावना  का  उदय  हो  , उसमे  हम  सब   का  हित  है  l  

18 July 2019

WISDOM ----

बाहरी  शक्तियों  की  कुटिल  चालें  तभी  सफल  हो  पाती  हैं  ,  जब  हम  में  आपसी  फूट  होती  है   और  आपसी  फूट  तभी  पनपती  है  ,  जब  हम  परस्पर  एक - दूसरे  को  प्यार  और  अपनापन  देने  में  विफल  रहते  हैं  l 
  1920 - 21  का  समय  था  l  प्रिंस  ऑफ  वेल्स  दिल्ली  आ  रहे  थे  l  ' फूट  डालो  और  राज  करो '   यह  अंग्रेजों  की   नीति  थी  l  इस  अवसर  पर  उन्होंने   हिन्दू  समाज  में   पहले  से  विद्दमान  आपसी  फूट  का  लाभ  उठाने  की  योजना  बनाई    कि  अछूतों  की  भीड़  इकट्ठी  कर  के   इस  समारोह  को  सफल  बनाया  जाये   और  हजारों -- हजार    संख्या  में   अछूत  भाई - बहनों  को  ईसाई  बनाया  जाये  l  इस  अवसर  पर  सरकार  ने  अछूतों  को  दिल्ली  आने  के  लिए  मुफ्त  रेलगाड़ी  की  भी  व्यवस्था  की  थी  l 
  ऐसे  समय  में  स्वामी  परमानन्द  महाराज   जो  संत  होने  के  साथ  सुधारक  भी  थे  l  हिन्दू  समाज  की  कुरीतियों  को  समाप्त  करने  के  उद्देश्य  से  उन्होंने  अपने  आश्रम  में  हरिजन  पाठशाला  भी  खोली  थी  l  उन्होंने  अपने  शिष्य  श्री कृष्णानंद  से कहा  कि   आश्रम  की  हरिजन  पाठशाला  के  बच्चों  को  लेकर  दिल्ली  जाओ   और  वहां  के  समारोह  में  बच्चों  से  यह  भजन  गवाओ l  यह  भजन  था ---- ' धरम  मत  हारो  रे , जीवन  है  दिन  चार  l ---- "   प्रिंस  ऑफ  वेल्स  के  पधारने  पर  जैसे  ही  समारोह  शुरू  हुआ  ,  बच्चों  ने  खंजरी  बजाकर यह  भजन  गाना  प्रारंभ  कर  दिया  l  जब  लोगों  को  यह  बताया  गया  कि  ये  अछूतों  के  बच्चे  हैं   जो  भगवद भक्ति  आश्रम  रेवाड़ी  में  पढ़ते  हैं   तो  लोग  आश्चर्य चकित  रह  गए  कि  अछूतों  के  बच्चे  और  इतने  साफ - सुथरे  l 
 कृष्णानंदजी  इस  अवसर  पर  कुछ  हरिजन  बच्चों  के  अभिभावकों  को  भी  ले  गए  थे  l  उनमे  से  एक  वृद्ध  ने  खड़े  होकर  कहा  कि  जब  साधु - महात्मा  हमारे  बच्चों  को  ऐसे  प्रेम  से  पढ़ाते  हैं  तो  अब  हमें  धर्म  बदलने  की  जरुरत  ही  क्या  है   l  पूरे  आयोजन  स्थल  पर  उस  वृद्ध  की  बात  का  समर्थन  हुआ  कि  जब  हमें  अपने  धर्म  में  प्यार  व  अपनापन  मिल  रहा  है  तो  अब  हमें  धर्म  बदलने  की  जरुरत  नहीं  है  l  इस  प्रकार  अंग्रेजी  सरकार  का  यह  षड्यंत्र   विफल  हो  गया  l 
 यह  घटना  इस  सत्य  को  बताती  है  कि  अपने  धर्म  और  अपने  समाज  में  अपनापन   न   मिले  और  निरंतर  उपेक्षा  व  अपमान  मिले   --तो  ऐसी  स्थिति  धर्म  परिवर्तन  और  अन्य  जाति  में  विवाह  का  एक  बड़ा  कारण  बन  जाती  है  l