मनुष्यों को जागरूक करने के लिए भगवान ने बार - बार धरती पर जन्म लिया लेकिन मनुष्य पाप का , अधर्म का रास्ता ही नहीं छोड़ता l कितने भी नियम - कानून बन जाएँ , जब तक व्यक्ति के विचारों का परिष्कार नहीं होगा , उनके संस्कार में परिवर्तन नहीं होगा , तब तक आकर्षक योजनाओं से भी कुछ नहीं होता l ऐसे में संसार को सुधारने का दायित्व प्रकृति स्वयं अपने हाथ में लेती है l ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करते , वे जिससे प्रसन्न हैं उसे सद्बुद्धि देते हैं और जिससे नाराज हैं उसे दुर्बुद्धि देते हैं l जब बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है तब व्यक्ति स्वयं अपने अंत का रास्ता चुन लेता है l इसका सबसे बड़ा उदाहरण है पर्यावरण प्रदूषण l मनुष्य स्वयं अपनी भ्रष्ट बुद्धि से ऐसे पदार्थ खोज लेता है जिनके प्रयोग से कृषि , खाद्य पदार्थ ऐसे प्रदूषित हो जाएँ जो मनुष्य के शरीर में धीमा जहर भरकर उसे बीमार कर दें l दुर्बुद्धिग्रस्त व्यक्ति बीमारी से रक्षा के लिए ऐसी दवा , आदि का प्रयोग करने लगता है जो उसकी शारीरिक और मानसिक शक्ति को क्षीण कर दे l मृत्यु से डरने वाला स्वयं आत्महत्या की ओर बढ़ने लगता है l
29 October 2021
28 October 2021
WISDOM -----
संसार में इतना तनाव , इतनी अशांति क्यों है ? इसके लिए मनुष्य स्वयं जिम्मेवार है l देवता और असुरों में शुरू से ही वैर रहा है l देवत्व को , अच्छाई को असुर कभी सहन नहीं करते l उसे मिटाने के लिए वे छल , कपट , षड्यंत्र , दूसरे को नीचा दिखाना , उनका हक छीनना , अत्याचार , अन्याय आदि हर संभव उपाय करते हैं l कर्म करना व्यक्ति की अपनी इच्छा है लेकिन जब उसे अपने दुष्कर्मों का फल मिलता है तब वह तनाव से घिर जाता है , उसका सुख - चैन सब खत्म हो जाता है l यह सिलसिला युगों से चला आ रहा है , कभी समाप्त नहीं होता l सम्पूर्ण धरती पर मानव जाति की यही गाथा है l त्रेतायुग में रावण ने छल- कपट किया , वह तो असुर था , यह तो उसका लक्षण ही था l उधर अयोध्या में माता सीता के साथ अन्याय हुआ -------- फिर द्वापर युग में महाभारत हुआ ---- यह असुरता ख़त्म नहीं होती l प्रकृति इसे सहन नहीं करती l जब अत्याचार - अन्याय अपने चरम पर पहुँच जाता है तब सामूहिक दंड के रूप में महामारी , बाढ़ , भूकंप युद्ध आदि आपदाएं आती हैं l लेकिन मनुष्य फिर भी नहीं सुधरता , इन समस्याओं से उबरकर फिर से अपराध , भ्रष्टाचार , छल - कपट आदि अपने स्वाभाव अनुसार दुष्कर्म में संलग्न हो जाता है l क्यों नहीं सुधरता ? आचार्य का , ऋषियों का कहना है कि जब तक संस्कार नहीं बदलते , व्यक्ति सुधरता नहीं है l यदि किसी अपराधी ने आत्मसमर्पण कर दिया , गलत काम न करने का संकल्प ले भी लिया तो संभव है वह सुधर जाये लेकिन उसने जो अपराध किये वे संस्कार रूप में उसकी किसी संतान में अवश्य आ जाते हैं , फिर यह सिलसिला चलता ही रहता है l बड़े - बड़े अपराधियों , षड्यंत्रकारियों का यदि इतिहास पता किया जाये तो यह निश्चित है कि उनके पूर्वजों में कोई ऐसा अपराधी अवश्य होगा l इसलिए पहले जमाने में घर के बड़े - बुजुर्ग कहा करते थे कि बेटी के विवाह से पहले लड़के की सात पीढ़ियों का पता कर लो --किसी को कोई भयंकर बीमारी न हो , कोई बड़ा अपराधी न हो , पता नहीं उस संतान में कब वो दूषित संस्कार जाग जाएँ l कहते हैं जनकपुर के लोग अभी भी अपनी बेटी का विवाह अयोध्या में नहीं करते l आज संसार को ऐसे सिद्ध पुरुषों की , योगियों की आवश्यकता है जो वह राह दिखा सकें कि बचपन से ही संस्कार परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो जाये l
27 October 2021
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ------ ' इस संसार में अंधकार भी है और प्रकाश भी , स्वर्ग भी है और नरक भी , पतन भी है और उत्थान , त्रास भी है और आनंद भी l इन दोनों में से जिसे चाहे , मनुष्यं चुन सकता है l कुछ भी करने की सभी को छूट है , पर प्रतिबन्ध इतना ही है कि कर्म के फल से बचा नहीं जा सकता l स्रष्टा के निर्धारित क्रम को तोडा नहीं जा सकता l
26 October 2021
WISDOM ----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- ' हम अपने जीवन में जितना आगे बढ़ते जाते हैं , उतनी ही आलोचनाएं भी बढ़ती हैं l यदि कोई व्यक्ति आलोचनाओं को सहन करना सीख लेता है तो वह अपने को पहले से ज्यादा संतुलित बना पाता है l आलोचना सुनने का अभ्यास हमें असुविधाजनक स्थिति में भी खुद पर नियंत्रण करना सिखाता है l समय के साथ हमें इस बात का अभ्यास हो जाता है कि कौन सी आलोचना उचित है और कौन सी अनुचित है l किन्हे स्वीकार करना चाहिए और किन्हे अस्वीकार करते हुए छोड़ देना चाहिए l हमारे कार्यों में स्वाभाविक रूप से गलतियां हो जाती हैं , यदि कोई व्यक्ति उन गलतियों को उजागर करता है तो उस पर नाराज होने की बजाय उनको स्वीकार कर लेना चाहिए l कमियों को सुधार लेना म ही हमें सक्षम और समर्थ बनाता है l
25 October 2021
WISDOM -----
ऋषि वचन है -----' हित चाहने वाला पराया भी अपना है और अहित करने वाला अपना भी पराया है l रोग अपनी देह में पैदा होकर भी हानि पहुंचाता है और औषधि वन में पैदा होकर भी हमारा लाभ ही करती है l " ईर्ष्या -द्वेष , लोभ - लालच , कामना - वासना , अहंकार ये सब ऐसी मानसिक विकृतियां हैं जो अपने पराये के भेद को समाप्त कर देती हैं l कुछ पाप तो अनजाने में हो जाते हैं लेकिन इन दुष्प्रवृतियों से ग्रस्त व्यक्ति जानबूझकर पापकर्म करता है l अत्याचार में भी एक आकर्षण होता है , ये दुष्प्रवृत्तियाँ ही व्यक्ति को असुर बना देती हैं , यदि ऐसे व्यक्ति के अहंकार पर चोट पहुँचती है तो अत्याचार का स्तर कितना होता है --- भगवान कृष्ण की बाल्यावस्था में उन पर सबसे ज्यादा अत्याचार मामा कंस ने ही किया l प्रह्लाद को उनके पिता हिरण्यकश्यप ने ही सताया l महाभारत में दुर्योधन ने अपने ही भाइयों पर अत्याचार किया , उन्हें वन में भटकने को विवश किया , अपनी ही कुलवधु द्रोपदी को अपमानित किया l यही संसार है l जो पापकर्म करता है , उसे देर - सवेर अपने अपने कर्मों की सजा अवश्य मिलती है , प्रकृति में क्षमा का प्रावधान नहीं है l जो बुद्धि और विवेक से इन अत्याचारियों की हर चुनौती का सामना करता है वह अर्जुन आदि पांडवों की तरह शक्तिशाली होकर जीवन में सफल होता है l
24 October 2021
WISDOM -------
एक संस्मरण है ----- भारत के पूर्व केंद्रीय मंत्री और न्यायविद स्वर्गीय करीम भाई छागला एक बार अपनी रूस यात्रा से वापस आये तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघसंचालक श्री गोलवलकर जी उनसे मिलने गए l दोनों के बीच काफी देर तक बातचीत हुई l गोलवलकर जी ने उनसे पूछा --- ----- " छागला जी , आपको भारत और रूस में क्या अंतर दिखाई दिया l उत्तर में छागला जी ने एक घटना सुनाई कि वे मास्को में एक खेल के मैदान में गए , वहां खेल रहे युवकों से पूछा ---- " तुम प्रतिदिन कितने घंटे यहाँ खेलते और व्यायाम करते हो ? " उत्तर मिला --- " छह - सात घंटे l " छागला जी आश्चर्य से भर उठे --- " इतना समय खेल पर क्यों खर्च करते हो भाई ? " जवाब मिला --- " दुनिया के देशों में अपने देश की शान बढ़ाने के लिए l हम चाहते हैं हमारा देश हर खेल में विजय प्राप्त करे l " अर्थात वहां का हर व्यक्ति खेल के मैदान से लेकर विज्ञान की प्रयोगशाला तक में अपने देश के लिए खेलता , शोध करता हुआ मिला l यही हाल अमेरिका , जापान , जर्मनी , फ़्रांस और इंग्लैण्ड का भी है l व्यक्तियों से मिलकर समाज और समाज से मिलकर राष्ट्र बनता है l देश के लोगों का उत्साह और राष्ट्रीय चरित्र ही उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं l
23 October 2021
WISDOM -----
सत्संग से कैसे रूपांतरण होता है , इस सन्दर्भ में कथा है ---- जब महर्षि वाल्मीकि दस्यु रत्नाकर हुआ करते थे l इस अपकर्म को करते हुए जीवन के कितने ही वर्ष बीत गए थे l ईश्वर की कृपा से एक दिन उन्हें देवर्षि नारद मिले l नारद जी ने उनसे पूछा -- ' तुम यह सब क्यों करते हो , क्या तुम्हारे परिवार के स्वजन तुम्हारे इस कर्मफल के भी भागीदार होंगे ? " उन्होंने कहा --- ' अवश्य ' l तब देवर्षि ने कहा --- " ऐसे नहीं , तुम उन लोगों से पूछकर मुझे अपना उत्तर दो l " तब वे देवर्षि को एक पेड़ से बांधकर उत्तर पूछने अपने परिवार के पास गए l सभी लोगों ने एक स्वर से मना करते हुए कहा --- " अपने कर्मफल का भोग तुम्हे स्वयं भोगना पड़ेगा l तुम्हारे कर्म को हम क्यों भोगेंगे l " यह सुनकर उन्हें बहुत निराशा हुई और वे भागकर देवर्षि की शरण में आये l तब देवर्षि ने उन्हें ' राम नाम जपने को कहा l दस्यु कर्म के कारण ' राम ' जपना बहुत कठिन लगा , तब देवर्षि ने कहा --- ' कोई बात नहीं तुम ' मरा - मरा ' जपो l भगवान का यह उल्टा नाम उनका अमोघ मन्त्र बन गया , साधना शुरू हुई l ' मरा - मरा ' कब ' राम - राम ' में बदल गया पता ही नहीं चला l अनेकों बाधाएं आईं , देवर्षि धीरज बंधाते रहे कि तुम प्रभु को पुकारते रहो सब बाधाएं दूर होंगी l समय बीतता गया , अंधकार दूर हुआ , रूपांतरण हुआ और संसार को महर्षि वाल्मीकि मिले l उनके जीवन ने सिखाया कि महापुरुषों का पल भर का सत्संग भी दुर्लभ और अमोघ होता है l