संसार में आज जितनी भी समस्याएं हैं उनके लिए मनुष्य स्वयं जिम्मेदार है l जीवन का कोई भी क्षेत्र हो , यदि उसमें संतुलन न हो तो अशांति उत्पन्न होती है l जैसे किसी राज्य में सुख - शांति हो , कुशल प्रशासन हो , इसके लिए एक विशेष प्रशासनिक योग्यता की आवश्यकता होती है l इसी तरह व्यापारिक कार्यों के लिए एक अलग कुशलता की आवश्यकता होती है l ये दोनों योग्यता बिलकुल अलग है और इन दोनों के उद्देश्य भी अलग हैं l अब यदि राजनीति में व्यापारिक बुद्धि का दखल हो जायेगा , तो संतुलन भंग हो जायेगा फिर उनके गुणा - भाग , लाभ सक्रिय हो जायेंगे , इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ेगा l ' व्यापार ' यह ऐसा ही है , जिस भी क्षेत्र में घुस जाये , चाहे वह शिक्षा हो , चिकित्सा हो , सुरक्षा हो , उसी क्षेत्र का बंटाधार कर देता है l इसलिए हमारे प्राचीन ऋषियों ने हर क्षेत्र की मर्यादा निर्धारित की थी l
6 March 2022
5 March 2022
WISDOM ----
यह एक निश्चित तथ्य है कि जो लोग छल - कपट, षड्यंत्र , अत्याचार , अन्याय , अपराध या कोई भी अनैतिक कार्य करते हैं तो इसकी शुरुआत उनके बचपन से ही हो जाती है l यदि उन्हें उसी वक्त उस गलती को करने से रोका जाये , उस गलती के लिए दंडित किया जाये तो वह बुराई आगे नहीं बढ़ेगी लेकिन जब समझदार लोग मूक दर्शक बने रहते हैं तो वह गलती आगे चलकर विकराल रूप ले लेती है महाभारत का प्रसंग है ----- कौरव , पांडव के बचपन का प्रसंग है कि वे सब नदी के किनारे खेल रहे थे तब ईर्ष्यावश दुर्योधन आदि ने भीम के भोजन में विष मिला दिया और उसे नदी में फेंक दिया l भीम की मृत्यु हो जाने से पांडव कमजोर हो जायेंगे और इस तरह उसके मार्ग की सब बाधा दूर हो जाएगी l दुर्योधन की इस गलती पर भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य , धृतराष्ट्र, महात्मा विदुर ने कुछ नहीं कहा l इससे दुर्योधन की हिम्मत और बढ़ गई और उसने जीवन भर मामा शकुनि के साथ अनेक षड्यंत्र रचे जिसका परिणाम अंत में महाभारत हुआ l प्रश्न यह है कि इतने वीर , ज्ञानी और धर्मात्मा होते हुए भी वे खामोश क्यों रहे ? जब भीष्म पितामह शर शय्या पर लेटे थे और पांडवों को धर्म का , नीति का उपदेश दे रहे थे तब द्रोपदी को हँसी आ गई l युधिष्ठिर ने पूछा --- ऐसे गंभीर समय में तुम्हे हँसी कैसे आ गई ? द्रोपदी ने कहा --- पितामह के ये उपदेश और धर्म व नीति उस समय कहाँ थी जब मेरा चीर हरण हो रहा था ? तब भीष्म पितामह ने कहा --- उस समय मैं दुर्योधन का कुधान्य खाता था , अब शर शय्या पर लेटने से वह सब रक्त के साथ बह गया और मन निर्मल हो गया , इसलिए यह उपदेश देने में समर्थ हुआ l " आज संसार में इतनी अशांति , इतना तनाव इसीलिए है कि लोग अपने स्वार्थ के लिए अपराधियों को संरक्षण देते हैं , उनकी सहायता से अपनी अनेक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करते हैं l कामना , वासना , तृष्णा , स्वार्थ , अहंकार ये सब मानसिक विकृतियाँ ही संसार में उत्पात मचाती हैं l
WISDOM -----
इतिहास में पढ़ते हैं कि जब भारत ज्ञान और वैभव में अपने चरम शिखर पर था , तब यूरोप में असभ्य जातियों का निवास था l इसके बाद उन अनेक देशों ने जिन्हे हम विकसित कहते हैं भौतिक प्रगति तो बहुत की , किन्तु अध्यात्म में रूचि न होने के कारण उनका यह विकास एकांगी रहा l मनुष्य के भीतर देवता और असुर दोनों होते हैं l अध्यात्म का अर्थ है --- व्यक्तित्व का परिष्कार , चिंतन और चेतना का परिष्कार l यह अध्यात्म ही है जो मनुष्य के भीतर के असुर को मार कर उसके देवत्व को जगाता है l विकसित कहे जाने वाले देशों ने विज्ञान के साथ अध्यात्म को नहीं जोड़ा , इसलिए उनके भीतर की असुरता समाप्त नहीं हुई और ज्ञान और बुद्धि के दुरूपयोग से यह असुरता एक विशालकाय असुर में तब्दील हो गई l कहावत है -' हाथ कंगन को आरसी क्या ' वे स्वयं ही संसार को अपनी असुरता का सबूत दे रहे हैं l असुरता में स्वयं ही उसके विनाश के बीज विद्यमान हैं l उन्हें तो अंधकार ही पसंद है l इसलिए प्रकृति उन्हें वापस वहीँ पहुंचा देगी l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " ऊँट को नकेल से , बैल को डंडे से , घोड़े को लगाम से और हाथी को अंकुश के सहारे वश में किया जाता है l सरकस के जानवरों को उनका शिक्षक चाबुक से डराकर इच्छित कृत्य सिखाता है और कराता है l ईश्वर विश्वास और आस्तिकता की भावना मनुष्य की उच्श्रृंखलता पर अंकुश लगाती है l व्यक्ति के जीवन क्रम और चरित्र को बनाने के लिए अध्यात्म की , ईश्वर भक्ति की आवश्यकता है ताकि मनुष्य जाति का जीवन श्रेष्ठ व समुन्नत बना रहे l "
4 March 2022
WISDOM -----
हमारी नीति कथाएं हमें जीवन जीने की कला सिखाती हैं l यह कथा बताती है कि अपनी कमजोरी पर नियंत्रण रखो , डरो नहीं , अन्यथा लोग उसका फायदा उठाने को तैयार रहेंगे l ----- एक लोमड़ी किसी जंगल में रहती थी l उसी क्षेत्र में गधों की भरमार थी l लोमड़ी को उनसे असुविधा होती थी l उसके खाने योग्य साधन गधों की बहुलता से अस्त - व्यस्त हो जाते थे l लोमड़ी ने एक चालाकी भरी योजना बनाई कि किसी प्रकार गधों को डरा कर भगाया जाये l वह गधों के पास पहुंची और बोली मैं तुम्हे एक गुप्त सूचना देती हूँ --- मछलियों ने मिलकर एक सेना गठित की है और वे दलबल के साथ तुम सब गधों का बंटाधार करने वाली हैं l गधों ने वास्तविकता जानने का प्रयत्न ही नहीं किया , डर से भयभीत होकर गांव की ओर भागे जहाँ उन्हें पनाह मिल सके l गाँव धोबियों का था l उन्होंने गधों की भय - व्याकुलता देखी l कारण पूछा और सहायता करने का आश्वासन दिया l गधों ने लोमड़ी से सुनी सारी बातें कह सुनाई l धोबियों ने उन्हें बचा लेने का आश्वासन दिया l साथ ही उनके गले में रस्सी बांधकर खूंटे से भी बांध दिया l गधे स्थायी रूप से उनके चंगुल में बंध गए l
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एक कहावत है ---- ' खाली बैठे क्या करें , आओ पड़ोसन लड़ें l " एक सत्य घटना है --- लोगों को लड़ने का बहुत शौक होता है l झुग्गी झोंपड़ी में रहने वाली दो महिलायें बात कर रहीं थीं -- एक ने कहा --मैं बकरी खरीदूंगी l दूसरी ने कहा --- तेरी झुग्गी में जगह तो है नहीं कहाँ बांधेगी ? ' पहली स्त्री ने कहा --- ' तेरी झुग्गी में बांध दूंगी , क्या कर लेगी मेरा ! ' बस ! इसी बात पर दोनों में बहस छिड़ गई , घर के पुरुष भी इसमें सम्मिलित हो गए l अब झुग्गी में तो इतनी जगह नहीं थी , इसलिए उनकी लड़ाई सड़क पर आ गई l एक -एक कर के अन्य झुग्गी वाले भी इस लड़ाई में जुट गए , बवाल मच गया l इस बीच भयंकर आँधी चलने लगी , मूसलाधार पानी बरसने लगा , ओले भी गिरे l महिलाएं तो किसी तरह अपनी झुग्गी में चलीं गईं l लेकिन पुरुषों में तो अहंकार होता है , अपने पौरुष को सार्थक करने का कोई मौका चाहिए l वे अपने - अपने घर से छाता ले आए , जिसके पास छाता नहीं था , उसने सिर पर से बोरी ओढ़ ली और खूब लड़े l ' ------ यह हाल आजकल पूरी दुनिया का है l झुग्गी में रहने वाले , गरीब लोग , निम्न जाति के लोग , जो बदरंग हैं वे लोग और अनपढ़ आपस में लड़ें तो बात समझ में आती है लेकिन जब रंग - रूप , ज्ञान - विज्ञानं , धन - वैभव , सुख - सुविधाएँ , जाति - धर्म हर दृष्टि से स्वयं को श्रेष्ठ कहने वाले लोग ऐसी लड़ाई करें कि धरती शमशान बन जाये तो मन में एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि श्रेष्ठ कौन ? सभ्य कौन ? यह दुर्बुद्धि ही है कि सकारात्मक कोई कार्य नजर नहीं आता तो घमासान युद्ध कर के , निर्दोष प्राणियों की हत्या कर के ही लोग समझते हैं कि उनका जीवन सार्थक हो गया l ऐसी बुद्धि !
3 March 2022
WISDOM ------
महर्षि व्यास श्लोक बोलते गए और गणेश जी लिखते गए तब यह महाकाव्य -' महाभारत ' की रचना हुई l यह कोई सामान्य ग्रंथ नहीं है , इसमें बहुत ही स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जब भी अन्याय , अत्याचार , उत्पीड़न , अनैतिकता , शोषण की अति हो जाती है , फिर चाहे यह परिवार में हो , किसी संस्था में हो , राष्ट्र में या फिर वैश्विक स्तर पर हो , उसका अंत किस प्रकार होता है l ------- जब संसार में असुरता बहुत शक्तिशाली हो जाती है और देव पक्ष कमजोर हो जाता है तब गीता में दिए गए वचन को निभाने भगवान को आना पड़ता है l भगवान कृष्ण ने जैसे अर्जुन का मार्गदर्शन किया वैसे ही वे देव पक्ष का मार्गदर्शन करते हैं और भगवान शिव का तृतीय नेत्र खुल जाता है l महाभारत में प्रसंग है --- द्रोपदी का चीर -हरण के लिए दु:शासन उसे उसके केश पकड़ कर घसीटते हुए लाया था , तब द्रोपदी ने प्रतिज्ञा की थी कि जब दु:शासन के रक्त से अपने केश धोऊंगी तभी उन्हें गूथूंगी l उस दिन आने तक वे खुले ही रहेंगे , इसलिए जब भी भगवान कृष्ण उनके सामने आते तो द्रोपदी उन्हें अपने खुले केश दिखातीं , उनकी आँखों में प्रश्न होता , भगवन कब तक ? तब भगवान कृष्ण ने उन्हें समझाया -- अवतार का उद्देश्य अधर्म का नाश और धर्म व न्याय की स्थापना है l केवल मात्र दुर्योधन और दु;शासन के अंत से यह उद्देश्य पूरा नहीं होगा , तुम धैर्य रखो l युद्ध निश्चित हो गया , संसार के जितने भी शक्तिशाली राजा दुर्योधन के , अन्याय और अत्याचार के पक्ष में थे , एक - एक कर के उन सब का अंत हुआ फिर आखिरी में दुर्योधन का भी अंत हो गया l अत्याचारी , अन्यायी कभी अकेला नहीं होता उसके तार पूरी धरती पर फैले होते हैं l उस युग में दुर्योधन हो या रावण , यह स्पष्ट था कि उनके आदेश पर ही यह अन्याय हो रहा है l आज के युग में दुर्योधन , रावण या कहें ' डॉन ' कौन है ? यह तो ईश्वर ही जानते हैं , बस ! क्रम वही है , पहले उसके चाटुकारों का , अधर्म , अन्याय का साथ देने वालों का अंत होगा , उसका नंबर सबसे आखिरी में आएगा l पहले के युद्ध मैदान में होते थे , निर्दोष प्रजा , बच्चे फिर भी सुरक्षित थे लेकिन यह कलियुग है , असुरता की भूख बहुत बढ़ गई है , गेहूं के साथ घुन भी पिस जाते हैं l
2 March 2022
WISDOM -----
हमारे महाकाव्य संसार के लिए मार्गदर्शक हैं , उनसे शिक्षा लेने की जरुरत है l कहते हैं जो महाभारत में है , वही इस धरती पर है l अत्याचार और अन्याय के अंत के लिए ही महाभारत हुआ लेकिन इसमें भीष्म पितामह जैसे धर्मपरायण , द्रोणाचार्य और महादानी कर्ण भी पराजित हुए , उनका अंत हुआ l इसका एक ही कारण था कि उन्होंने दुर्योधन द्वारा किए जाने वाले अत्याचार और अन्याय का मौन रहकर समर्थन किया l दुर्योधन के साथ उनका स्वार्थ जुड़ा था , उसके राज्य में रहकर उन्हें राज- वैभव के सारे सुख प्राप्त थे l यह तथ्य आज भी सर्वत्र देखने को मिलता है l अत्याचारी और अन्यायी सब जगह हैं , वे फल - फूल रहे हैं और डंके की चोट पर अन्याय उन पर करते हैं जो उनके अहंकार और स्वार्थ पूर्ति में बाधक है l शेष सब भीष्म , द्रोण और कर्ण की तरह मूक दर्शक बने रहते हैं क्योंकि उनका उससे कोई न कोई स्वार्थ जुड़ा है l ईश्वर के न्याय से कोई नहीं बच सकता l दुर्योधन से पहले ही उनका अंत हो गया l अत्याचारी केवल खुद नहीं डूबता , वो अपना समर्थन करने वाले , साथ देने वाले सबको ले डूबता है l जब अर्जुन युद्ध के मैदान में अपने ही परिवार के प्रियजनों को देखकर शस्त्र नीचे रख देता है तब भगवान कृष्ण उसे गीता का उपदेश देते ,हैं कहते हैं ----- यदि अत्याचार और अन्याय को हम नहीं मिटायेंगे तो वे हमें मिटा डालेंगे l ' अहंकारी और उन्मादी किसी का सगा नहीं होता l