18 May 2013

THE DIFFERENCE BETWEEN EXISTENCE AND LIFE IS THE INTELLIGENT USE OF LEISURE

'श्रमशीलता 'साहस 'धैर्य 'बुद्धि 'शक्ति और पराक्रम -ये 6 गुण जिसके पास होते हैं 'देवता उसकी सहायता करते हैं | '
कुम्हार ने परिश्रम किया .बरतन बनाये और खाना खाकर वहीँ सो गया | वहां से एक राहगीर गुजरा | उसने कुम्हार पर सहानुभूति दिखाते हुए कहा -"तुम जमीन पर सोते हो 'इतने अच्छे बरतन बनाते हो | इन्हें बाजार में बेचकर और अधिक धन कमाओ ,बड़ा मकान बनाओ ,खूब धन एकत्र कर बड़ा आदमी बन जाओ | "
कुम्हार ने कहा -"इससे क्या होगा ?"उसने कहा -"फिर तुम्हे जमीन पर नहीं सोना पड़ेगा ,नौकर -चाकर होगें ,हाथ से काम भी नहीं करना पड़ेगा | कुम्हार ने कहा -"फिर तो बड़ा आदमी बनना मुझे पसंद नहीं ,क्योंकि यदि मैं मेहनत नहीं करूँगा तो मेरा यह जीवन मिट्टी से भी बदतर होगा | मिट्टी के तो बरतन भी बन जाते हैं ,किंतु मेरे अकर्मण्य जीवन का मोल तो मिट्टी के इन बरतनों जितना भी नहीं होगा | "पथिक निरुतर होकर चला गया | 

17 May 2013

PEARLS OF WISDOM

अपनी गलती को मान लेना ,दोष को न छिपाना ,अज्ञानवश हुई गलती का सुधार कर लेना ,अपने जीवन की खुली तस्वीर रखना ,ताकि सब उसको देख -परख सकें ,यही जीवन का विकास करने और आनंद प्राप्त करने की उत्तम कसौटी है |


                   आदर पूर्वक जीने का तरीका यह है कि जैसा अपने को दिखाना चाहते हैं ,वस्तुत:भीतर से भी वैसा ही बने | 

16 May 2013

बार -बार रंग बदलने की अपनी पटुता का प्रदर्शन करते हुए गिरगिट ने कछुए से कहा -"महाशय !देखा मैं संसार का कितना योग्य व्यक्ति हूं | "कछुए ने धीरे से कहा -"महाशय !दूसरों को धोखा देने की इस योग्यता से तो तुम अयोग्य बने रहते तो अच्छा था | कम से कम लोग भ्रम में तो न पड़ते | 

PRAKHARTA

'नन्ही सी चिनगारी !तुम भला मेरा क्या बिगाड़ सकती हो ,देखती नहीं ,मेरा आकार ही तुमसे हजार गुना बड़ा है ,अभी तुम्हारे ऊपर गिर पडूँ तो तुम्हारे अस्तित्व का पता भी न लगे | '-तिनकों का ढेर अहंकारपूर्वक बोला |
चिनगारी बोली कुछ नहीं ,चुपचाप ढेर के समीप जा पहुंची | तिनके उसकी आंच में भस्मसात होने लगे | अग्नि की शक्ति ज्यों ज्यों बढ़ी ,तिनके जलकर नष्ट होते गये ,देखते -देखते भीषण रूप से आग लग गई और सारा ढेर राख में परिवर्तित हो गया |
यह द्रश्य देख रहे आचार्य ने अपने शिष्यों को बताया  -" बालकों !जैसे आग की एक चिनगारी ने अपनी प्रखर शक्ति से तिनकों का ढेर खाक कर दिया | वैसे ही तेजस्वी और क्रियाशील एक व्यक्ति ही सैकड़ों बुरे लोगों से संघर्ष में विजयी हो जाता है | "

15 May 2013

PEACEFUL

मनुस्मृति में मानव धर्म के दस प्रधान लक्षण बताये गये हैं -धैर्य ,क्षमा ,दम ,चोरी न करना ,पवित्रता (आंतरिक एवं बाह्य ),इन्द्रिय निग्रह ,बुद्धि ,आध्यात्म विद्दा ,सत्य तथा अक्रोध |
इनमे सबसे अंतिम है -अक्रोध -यह दैवी संपदा है |
अक्रोध -का अभिप्राय है शांत चित वृति | जिस मन में उद्वेग ,चिंता .घबराहट नहीं है ,सब वृतियाँ शांत स्वरुप भगवान पर एकाग्र हैं ,जो सबसे प्रेम करता है और शत्रु तक के लिये मन में क्रोध ,ईर्ष्या के बुरे भाव नहीं हैं ,ऐसी हितैषी वृति को शांत प्रकृति कहते हैं | ऐसा शांत प्रकृति का व्यक्ति सदभावना द्वारा सभी पर दैवी प्रभाव डाला करता है |

                                 खलीफा उमर का सारा जीवन धार्मिक सेवा में ही बीता ,अंत में तो उन्हें धर्म के लिये तलवार भी उठानी पड़ी | एक दिन उनका अपने प्रतिद्वंदी से सामना हो गया | दोनों में गुत्थम -गुत्था हो गई | उमर ने उसे पछाड़ दिया और छाती पर चढ़ बैठे | जैसे ही उसका सिर काट डालने के लिये उन्होंने अपनी तलवार निकाली कि प्रतिद्वंदी ने उन्हें गाली दे दी | गाली सुनते ही खलीफा उमर उठकर खड़े हो गये और अपनी तलवार म्यान में बंद कर ली |
उनके साथ जो सैनिक थे ,उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ | उन्होंने कुछ रुष्ट स्वर में कहा -"श्रीमानजी !आपने यह क्या किया ?आपको तो इसे मार देना चाहिये था | "खलीफा उमर गंभीर हो गये और बोले -"भाई !मैंने युद्ध न्याय के लिये बिना क्रोध के किया था ,किंतु जब इसने मुझे गाली दी तो मुझे क्रोध आ गया | इस स्थिति में इसे मारने से पहले अपने क्रोध को मारना आवश्यक हो गया | अब मेरा क्रोध शांत हो गया है इसलिये दोबारा युद्ध करूँगा | "खलीफा उमर के यह निष्काम शब्द सुनकर प्रतिद्वंदी आप पराभूत होकर उनके पैरों पर गिर गया और सदैव के लिये उनका भक्त बन गया |
 बाहरी शत्रु से भी भयंकर है ,आंतरिक शत्रु | इसलिये पहले इसको जीतना चाहिये | 

14 May 2013

SABSE BADA DAANI PARMESHVAR

निखिल विश्व की समस्त गतिविधि 'दान 'के सतोगुणी नियम के आधार पर चल रहीं हैं | परमेश्वर ने कुछ ऐसा क्रम रखा है कि 'पहले दो तब मिलेगा 'जो कोई भी तत्व अपने दान की प्रक्रिया बंद कर देता है ,वही नष्ट हो जाता है ,जीवन युद्ध में धराशायी हो जाता है |
यदि कुएँ जल दान देना बंद कर दें ,खेत अन्न देना रोक दें ,पेड़ फल ,पत्तियां ,छाल देना बंद कर दें ,हवा ,जल ,धूप ,गाय ,भैंस अपनी सेवाएं रोक दें तो समस्त स्रष्टि का संचालन बंद हो जायेगा | परमेश्वर की रचना में दान तत्व प्रमुख है ,परमेश्वर तो हर पल ,हर घड़ी हमें कुछ न कुछ प्रदान करता रहता है |
                   
 दान का अभिप्राय है -संकीर्णता से छुटकारा ,आत्म संयम का अभ्यास और दूसरे की सहायता की भावना | दान करते समय हमारे मन में यश प्राप्ति की इच्छा ,फल की आशा या अहंकार की भावना नहीं होनी चाहिये | दान तो स्वयं प्रसन्नता ,सुख एवं संतोष का दाता है | देते समय जो संतोष की उच्च सात्विक द्रष्टि अंत:करण में उठती है ,वह इतनी महान है कि कोई भी भौतिक सुख उसकी तुलना नहीं कर सकता |

                                       सात्विक    दान
बुद्ध पाटलिपुत्र आये | बिंबिसार राजकोष से कीमती हीरे ,मोती आदि लेकर आये | बुद्ध ने एक हाथ से स्वीकार कर शिष्यों को दे दिये | मंत्रियों ,श्रेष्ठियों ,व्यापारियों के उपहार भी एक हाथ से लेकर दे दिये गये ,ताकि संघारामो के निर्माण .प्रव्रज्या में उनका उपयोग हो | इतने में एक वयोवृद्ध महिला किसी तरह चलती हुई आई और बोली -"भगवन !आपके आने का समाचार मिला | मेरे पास कुछ था नहीं | यह मेरा ही खाया आधा अनार था ,जो आपकी सेवा के लिये लाई हूं | स्वीकार कीजिये | "बुद्ध ने दोनों हाथों से भेंट स्वीकार की और उसे माथे से लगाया | बिंबसार ने कहा -हे भगवन !आपने हमारी भेंट तो एक हाथ से ली और इस वृद्धा की भेंट दोनों हाथों से ली ,माथे से लगाई ,इसका क्या रहस्य है ?
तब तथागत बोले -"तुम्हारा दान सात्विक नहीं था | इस वृद्धा ने भावपूर्वक अपना सर्वस्व मुझे दान में दिया है | मैं तो भावना का भूखा  हूं| भले ही यह निर्धन है  पर इसे मुझसे प्रेम ,करुणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिये | वही भाव मैंने प्रकट किये हैं | "बिंबिसार यह सुनकर धन्य हो गये | 

13 May 2013

FEELINGS -SYMPATHY

सुप्रसिद्ध गायत्री साधक ,आर्य समाज के एक स्तंभ महात्मा आनंद स्वामी के पास एक धनपति आये | बहुत बड़ा व्यवसाय था उनका ,चारों ओर वैभव का साम्राज्य था ,पर वे अंदर से बड़ा खालीपन अनुभव करते थे | उनकी भूख चली गई थी और रात्रि की नींद भी | अपनी यह व्यथा उन्होंने स्वामीजी को सुनाई | महात्मा आनंद स्वामी ने कहा -"आपने जीवन में कर्म एवं श्रम को तो महत्व दिया ,पर भावना को नहीं | सत्संग ,कथा -श्रवण आदि से तो विचारों को पोषण मिलता है | अंदरकी शुष्कता कम करने के लिये अब प्रेम ,धन ,श्रम लुटाना आरंभ कीजिये | अपने आपे का विस्तार कीजिये | सबको स्नेह दें ,अनाथों -निर्धनों के बीच जायें और उन्हें स्वावलंबी बन सकने योग्य सहायता दें | अपना शरीर -श्रम भी जितना इस पुण्य कार्य में लग सके ,लगाइये | दिनचर्या सुव्यवस्थित रखिये | फिर देखिये ,आपकी भूख लौट आयेगी तथा नित्य चैन की नींद सोयेंगे | आपका स्वास्थ्य भी ठीक हो जायेगा | "
सेठजी ने ऐसा ही किया ,इस चमत्कारी परिवर्तनने  उन्हें जो सेहत ,शांति ,प्रसन्नता दी ,वह पहले उन्हें कभी नहीं मिली थी | लोकमंगल युक्त परमार्थ परक भावनाओं और संवेदनाओं को अपने जीवन -व्यवहार में अधिकाधिक स्थान देने से ही अंदर की शुष्कता और खालीपन दूर होगा ,भावनात्मक तृप्ति मिलेगी