9 September 2026

WISDOM -----

   मनुष्य  के  जीवन  में  सुख -दुःख  दिन  और  रात की  तरह  आते -जाते  रहते  हैं  l  सुख  का  समय  तो बहुत  जल्दी  बीत  जाता  है   लेकिन  दुःख  और  कष्ट  का  समय   , मन  को  शांत  रखते  हुए   व्यतीत  करना  बहुत  कठिन  होता  है  l  ऐसे  में  हमारे  ऋषियों  ने , संतों  ने  ईश्वर  विश्वास  और  ईश्वर  शरणागति  की  सलाह  दी  है  l   गीता  में  भी  भगवान  ने  अंत  में  यही  कहा  है  कि   ईश्वर  की  शरण  में  जाओ  l   ईश्वर  विश्वास  और  ईश्वर  शरणागति  कब  काम  करती  है  ,  इसे  स्वयं  ईश्वर  ने  ही  महाभारत  और  रामायण   और  अन्य  पुराणों  में  विभिन्न  प्रसंग  और   कथाओं  के  माध्यम  से  स्पष्ट  किया  है  l    ---- महाभारत  का  ही  प्रसंग  है  ---- जब  दु:शासन   महारानी  द्रोपदी  को  उनके  केश  खींचते  हुए    भरी  सभा  में   घसीटता  हुआ  लाया  l  उसकी  मंशा  उनके  चीर-हरण   की  थी  l  पांचाली  ने  सभा  में  बैठे  हुए   भीष्म पितामह , गुरु द्रोणाचार्य , धृतराष्ट्र  और  कुलगुरु  आदि  सभी  को  पुकारा  l  अपने  पांचों  पतियों  को  पुकारा   लेकिन  पासे  के  खेल  में  हार  जाने  के  कारण  वे  सभी  सिर  झुका  कर  चुप  थे , चारों  तरफ  सन्नाटा  था  l  कोई  भी  पांचाली  की  मदद  को  आगे  नहीं आया  l  सब  ओर  से  निराश  होने  पर  द्रोपदी  ने  श्रीकृष्ण  को  पुकारा  l   कहते  हैं  नारद  जी  भगवान  श्रीकृष्ण  के  पास  गए  और  कहा  --- हस्तिनापुर  की  राजसभा  में  यह  कैसा  अनर्थ  हो  रहा  है  , पांचाली  आपको  पुकार  रही  है  , आप   कृपा  कर  के   उसकी  रक्षा  के  लिए   जाएँ  ----- l  भगवान  श्रीकृष्ण  नारद जी  से  कहते  हैं  ---  देखो  नारद  , मैं  स्वयं   कर्मों  के  विधि -विधान  से  बंधा  हुआ  हूँ  ,  पांचाली  का  बहीखाता  देखो  ,  उसने  ऐसा  कोई  पुण्य   कर्म  किया  है   कि  मैं  उसकी  रक्षा  के  लिए  जाऊं  l  नारद जी  कहते  हैं  --- मैं  भूला  नहीं  हूँ  l  भगवान  !   जब  आपने  सुदर्शन  चक्र  से  शिशुपाल  का  वध  किया  था  , तब  आपकी  अंगुली  से  रक्त  बहने लगा  था  l  सब  रानी -महारानी  उस  सभा  में  थीं  , उन्हें  समझ  नहीं  आ  रहा  था  कि  क्या  करें   तब  महारानी  द्रोपदी  ने  अपनी  कीमती  साड़ी  फाड़कर  आपकी  अंगुली  में  पट्टी  बाँधी  थी  l '   उसी  एक  चीर   के  बदले  भगवान  ने  द्रोपदी  का  चीर  अनंत  कर  दिया  l  दु:शासन  का  दस  हजार   हाथियों  का  बल  भी  द्रोपदी  का  कुछ  नहीं  बिगाड़  सका  l  वह  थक -हारकर  जमीन  पर  गिर  गया  l  ----- पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  --- "  सत्कर्म  का  कोई  भी  मौका  हाथ  से  न  जाने  दो  l  सत्कर्मों  की  पूंजी   ही   विभिन्न  विपदाओं  से  हमारी  रक्षा  करती  l  आचार्य श्री  ने  बहुत  ही  सरल  ढंग  से  समझाया  है  कि  यदि   हम  ऐसी  जगह  पर  या  ऐसी  परिस्थिति  में  हैं  जहाँ  सत्कर्म  का  कोई  भी  अवसर  हमें  नहीं  मिलता   तो  हम  मन में  ही  गायत्री  मंत्र  और  महामृत्युंजय  मंत्र  का  जप  करें    , इससे  प्रकृति  को  पोषण  मिलता  है  , वातावरण  में  फैली  हुई  नकारात्मकता  दूर  होती  है  l  प्रकृति  ही  ईश्वर  है  ,  जब  ईश्वर  प्रसन्न  हों  , उनकी  कृपा  मिले   तब  तो  असंभव  भी  संभव  है  l  

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