कहते हैं जो कुछ महाभारत में है वही इस धरती पर भी है और अहंकार एक ऐसा रोग है जो शक्ति और सम्पन्नता के साथ रहने वाला असाध्य रोग है l इस अहंकार को किसी की सलाह पसंद नहीं है , किसी ने भी उनके अहं को चुनौती दी तो खैर नहीं ! यह स्थिति प्रत्येक युग में रही है l महाभारत में विदुर नीति निपुण , महाज्ञानी थे l धृतराष्ट्र को राज-काज संबंधी सही सलाह देते थे , कभी कुछ ऐसी सलाह दी जो युवराज दुर्योधन को सहन न हो सकी और उसने विदुर जी को राजमहल से , सभी राज सुख से बाहर कर दिया और तब विदुर जी महल से बाहर कुटिया बनाकर रहने लगे l उस समय ऐसे अपराध का यही दंड था , जेल या किसी प्रकार का उत्पीड़न नहीं था l ऐसी परिस्थिति में रहने पर विदुर जी का स्वाभिमान से जीवन जीना प्रेरणादायी है l उनके जीवन की श्रेष्ठता ऐसी थी कि उन्हें ईश्वर की कृपा मिल गई थी और जिसे ईश्वर की कृपा मिल जाए , उसके लिए सिंहासन , राजसुख सब मिटटी के समान हैं l विदुर जी के सामने दुर्योधन की सबसे बड़ी हार यही थी कि स्वयं भगवान कृष्ण दुर्योधन के राजमहल के मेवा , पकवान त्याग कर विदुर जी के यहाँ साग -रोटी खाकर तृप्त हुए l सुख कभी स्थायी नहीं होता , जिन्हें राज सुख का लालच था , अत्याचार और अनीति का साथ देने के कारण दुर्योधन के साथ उनका भी अंत हुआ l
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