हमारे प्राचीन ऋषि मानव मन के मर्मज्ञ थे l उन्होंने मानव समाज के कल्याण के लिए चार आश्रम की व्यवस्था की थी ---- ब्रह्मचर्य आश्रम , गृहस्थाश्रम , वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम l इस आश्रम व्यवस्था के पालन से संसार में शांति संभव है l आज सम्पूर्ण संसार में बेहद अशांति है , युवा वर्ग सबसे ज्यादा परेशान है l युवाओं का परेशान होना स्वाभाविक है क्योंकि उनकी एनर्जी का उत्पादक कार्यों में उपयोग नहीं हो रहा इसलिए वे भटक रहे हैं , उन्हें कोई सही रास्ता , सही दिशा नहीं मिल रही है l आश्रम व्यवस्था से यह समस्या हल हो सकती है l इसे सरल ढंग से इस तरह समझ सकते हैं जैसे ------ जब कभी सड़कों पर जाम लग जाता है , यदि जो लोग और वाहन आदि जो सबसे आगे हैं , यदि वे आगे नहीं बढ़ेंगे तो यह जाम बढ़ता ही जायेगा l यदि उचित व्यवस्था नहीं हुई तो जाम इतना अधिक हो जायेगा , निरंतर बढ़ता जायेगा l लोग परेशान होंगे और कोहराम मच जायेगा l आज सारे संसार में जाम लग गया है l हमारे ऋषियों ने वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की इसीलिए व्यवस्था की थी कि एक निश्चित आयु के बाद व्यक्ति सांसारिक आकर्षण में उलझा न रहे , अपने जीवन के अनुभव और समाज से जो मिला है , वह निष्काम भाव से समाज को दे , जिस से युवा पीढ़ी के लिए रास्ता खाली हो जाये और उन्हें अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करने का पर्याप्त अवसर मिले l लेकिन वर्तमान की जो स्थिति है उसमें त्याग का भाव कहीं नहीं है l हर क्षेत्र में जाम लगा है कहीं लालच का , कहीं महत्वाकांक्षा का l आयु की एक सीमा पार कर गए लोगों में कामना , वासना , अहंकार , स्वार्थ , भोग -विलास की लालसा इतनी अधिक है कि इस कारण युवा पीढ़ी को अपनी एक पहचान बनाने का मौका ही नहीं मिल रहा l युवा पीढ़ी का ज्ञान , उनकी वैज्ञानिक समझ , और अथक ऊर्जा का भण्डार , उनकी कुंठा के साथ मिलकर किस रूप में संसार के सामने आएगा यह तो वक्त ही बताएगा l
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