'मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है ',राजकुमार सिद्धार्थ और मंत्री पुत्र देवदत्त दोनों बाग में घूमने जा रहे थे | सहसा सिद्धार्थ ने देखा दो सुंदर राजहंस आकाश में जा रहे हैं | उन्होंने प्रसन्न होकर कहा -देवदत्त !देखो कितने सुंदर पक्षी जा रहे हैं | देवदत्त ने ऊपर देखा और अपना धनुष -बाण उठाकर ,एक पक्षी को मार गिराया | सिद्धार्थ की प्रसन्नता ,शोक और व्याकुलता में बदल गई | सिद्धार्थ ने रक्त से सने राजहंस को गोदी में उठा लिया और रोने लगे | देवदत्त ने कहा -"इसे मैंने बाण से मारा है इसलिये इस पक्षी पर मेरा अधिकार है "| सिद्धार्थ बिना कुछ कहे सुने अपने महल चले गये और बड़े प्यार से पक्षी की सेवा करने लगे | देवदत्त ने न्याय के लिये राजा से शिकायत की | महाराज ने दोनों को दरबार में बुलाया | एक ओर देवदत्त खड़े थे और दूसरी ओर सिद्धार्थ पक्षी को गोद में लेकर खड़े थे | देवदत्त ने अपना तर्क प्रस्तुत किया कि मैंने पक्षी को बाण मारा है इसलिये इस पर मेरा अधिकार है | सिद्धार्थ ने कहा मैंने इसे बचाया है इसलिये इस पर मेरा अधिकार है | दोनों के तर्क सुनने के बाद महाराज ने पक्षी को दोनों के बीच में छुडवा दिया और वह पक्षी स्वयं सिद्धार्थ के पास चला गया | इसी भावना ने उन्हें विश्वमानव भगवान बुद्ध बनाया |
24 March 2013
23 March 2013
व्यक्ति धर्म -उपदेशक हो अथवा विद्वान मनीषी ,वह अपने आप को कितना तपा सका ,इस पर उसकी आन्तरिक वरिष्ठता निर्भर है | संत राबिया जंगल में तप कर रहीं थीं | पशु -पक्षी उनके इर्द -गिर्द बैठे हंस खेल रहे थे | हसन उधर से निकले ,उन्हें भी पहुंचा हुआ संत माना जाता था | हसन जैसे ही राबिया के नजदीक पहुंचे ,सारे पशु -पक्षी उन्हें देखते ही भाग खड़े हुए | उन्हें अचम्भा हुआ ,उन्होंने राबिया से पूछा -जानवर परिन्दे तुम्हारे इतने नजदीक रहते हैं और मुझे देखकर भागते हैं ,इसका क्या कारण है ?राबिया ने पूछा -आप खाते क्या हैं ?हसन ने कहा -अधिकांशत:गोश्त ही खाने को मिलता है | राबिया हंस पड़ी | लोग आप को जो भी समझें उनकी मर्जी | पर आपका दिल कैसा है ,उसे यह नासमझ जानवर अच्छी तरह जानते हैं |
गायत्री मन्त्र
गायत्री विद्दा ही प्राण विद्दा है | 24 अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र में प्राण विद्दा का समस्त विज्ञान -विधान निहित है | सूर्य ही समस्त स्रष्टि के प्राणों का आदि स्रोत है | सभी जीवधारी ,वृक्ष -वन
स्पति इसी से प्राणों का अनुदान पाते हैं | इसी की प्रचंड ऊर्जा प्रखर प्राण चेतना बनकर समूचे ब्रह्मांड में संव्याप्त रहती है और गायत्री महामंत्र के उपास्य ही सविता देव हैं | गायत्री महामंत्र ही स्रष्टि एवं जीवन का सार है | गायत्री महामंत्र का जप एवं सवि
ता देव का ध्यानही प्राण को सुपुष्ट ,मन को सतेज ,इंद्रियों को सचेतन ,ह्रदय को पवित्र एवं जीवन को बलवान बनाता है |
गायत्री विद्दा ही प्राण विद्दा है | 24 अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र में प्राण विद्दा का समस्त विज्ञान -विधान निहित है | सूर्य ही समस्त स्रष्टि के प्राणों का आदि स्रोत है | सभी जीवधारी ,वृक्ष -वन
स्पति इसी से प्राणों का अनुदान पाते हैं | इसी की प्रचंड ऊर्जा प्रखर प्राण चेतना बनकर समूचे ब्रह्मांड में संव्याप्त रहती है और गायत्री महामंत्र के उपास्य ही सविता देव हैं | गायत्री महामंत्र ही स्रष्टि एवं जीवन का सार है | गायत्री महामंत्र का जप एवं सवि
ता देव का ध्यानही प्राण को सुपुष्ट ,मन को सतेज ,इंद्रियों को सचेतन ,ह्रदय को पवित्र एवं जीवन को बलवान बनाता है |
22 March 2013
JUDGEMENT
उपासना का अर्थ मात्र देवालय बना देना नहीं ,वैसा जीवन भी जीना भी होता है |
यमदूतों द्वारा दो व्यक्तियों को चित्रगुप्त के सम्मुख पेश किया गया | यमदूतों ने प्रथम व्यक्ति का परिचय कराते हुए कहा -"यह नगर सेठ है ,इनके यहां धन की कोई कमी नहीं | खूब धन कमाया है और समाज हित के लिये धर्मशाला ,मंदिर ,कुआँ ,विद्दालय आदि अनेक निर्माण कार्यों में उसे व्यय किया है | "अब दूसरे व्यक्ति की बारी थी | उसके लिये यमदूत ने कहा -"यह व्यक्ति बहुत गरीब है ,दो समय का भोजन जुटाना भी इसके लिये मुश्किल है | एक दिन जब ये भोजन कर रहा था ,एक भूखा कुत्ता इनके पास आया | इसने स्वयं भोजन न करके सारी रोटियां कुत्ते को दे दीं | स्वयं भूखे रहकर दूसरे की क्षुधा शांत की | अब बताइये इन दोनों के लिये क्या आज्ञा है ?"चित्रगुप्त जी ने बड़ी गंभीरता से कहा -"धनी व्यक्ति को नरक में और निर्धन व्यक्ति को स्वर्ग में भेजा जाये | "चित्रगुप्त के इस निर्णय को सुनकर दोनों आश्चर्य में पड़ गये | चित्रगुप्त ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा -"धनी व्यक्ति ने निर्धनों और असहायों का बुरी तरह शोषण किया है और उस धन से ऐश और आराम का जीवन व्यतीत किया है | निर्माण कार्यों के पीछे इनकी यह भावना थी कि लोग प्रशंसा करें ,यश गायें | गरीब ने पसीना बहाकर जो कमाई की ,उस रोटी को भी समय आने पर भूखे कुत्ते के लिये छोड़ दिया | यदि यह साधन -संपन्न होता तो न जाने कितने अभावग्रस्त लोगों की सहायता करता | पाप और पुण्य का संबंध मानवीय भावनाओं से है ,क्रियाओं से नहीं | अत:मेरे द्वारा दिया गया निर्णय ही अंतिम है | "
यमदूतों द्वारा दो व्यक्तियों को चित्रगुप्त के सम्मुख पेश किया गया | यमदूतों ने प्रथम व्यक्ति का परिचय कराते हुए कहा -"यह नगर सेठ है ,इनके यहां धन की कोई कमी नहीं | खूब धन कमाया है और समाज हित के लिये धर्मशाला ,मंदिर ,कुआँ ,विद्दालय आदि अनेक निर्माण कार्यों में उसे व्यय किया है | "अब दूसरे व्यक्ति की बारी थी | उसके लिये यमदूत ने कहा -"यह व्यक्ति बहुत गरीब है ,दो समय का भोजन जुटाना भी इसके लिये मुश्किल है | एक दिन जब ये भोजन कर रहा था ,एक भूखा कुत्ता इनके पास आया | इसने स्वयं भोजन न करके सारी रोटियां कुत्ते को दे दीं | स्वयं भूखे रहकर दूसरे की क्षुधा शांत की | अब बताइये इन दोनों के लिये क्या आज्ञा है ?"चित्रगुप्त जी ने बड़ी गंभीरता से कहा -"धनी व्यक्ति को नरक में और निर्धन व्यक्ति को स्वर्ग में भेजा जाये | "चित्रगुप्त के इस निर्णय को सुनकर दोनों आश्चर्य में पड़ गये | चित्रगुप्त ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा -"धनी व्यक्ति ने निर्धनों और असहायों का बुरी तरह शोषण किया है और उस धन से ऐश और आराम का जीवन व्यतीत किया है | निर्माण कार्यों के पीछे इनकी यह भावना थी कि लोग प्रशंसा करें ,यश गायें | गरीब ने पसीना बहाकर जो कमाई की ,उस रोटी को भी समय आने पर भूखे कुत्ते के लिये छोड़ दिया | यदि यह साधन -संपन्न होता तो न जाने कितने अभावग्रस्त लोगों की सहायता करता | पाप और पुण्य का संबंध मानवीय भावनाओं से है ,क्रियाओं से नहीं | अत:मेरे द्वारा दिया गया निर्णय ही अंतिम है | "
'उस धन से क्या लाभ ,जो याचक को नहीं दिया जाता ,उस बल से क्या ,जो शत्रु को रोक न सके ,उस ज्ञान से क्या ,जो आचरण में न आ सके और उस आत्मा (व्यक्ति )से क्या जो जितेंद्रिय से न बन सके | '
प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉ.क्रोनिन बड़े गरीब थे | डाक्टर बनकर वे धनवान हो गये और उनका मन धन संचय करने में पड़ गया | उनकी पत्नी ने कहा ,"हम गरीब ही ठीक थे ,कम से कम दिल में दया तो थी ,अब उसे खोकर कंगाल हो गये | "डॉ
.क्रोनिन ने कहा ,"सच है ,धनी धन से नहीं मन से होते हैं | तुमने मुझे सही राह दिखाई ,नहीं तो हम ऐसी स्थिति में पहुंच जाते ,जहां परस्पर स्नेह के सूत्र भी कमजोर पड़ने लगते | "
प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉ.क्रोनिन बड़े गरीब थे | डाक्टर बनकर वे धनवान हो गये और उनका मन धन संचय करने में पड़ गया | उनकी पत्नी ने कहा ,"हम गरीब ही ठीक थे ,कम से कम दिल में दया तो थी ,अब उसे खोकर कंगाल हो गये | "डॉ
.क्रोनिन ने कहा ,"सच है ,धनी धन से नहीं मन से होते हैं | तुमने मुझे सही राह दिखाई ,नहीं तो हम ऐसी स्थिति में पहुंच जाते ,जहां परस्पर स्नेह के सूत्र भी कमजोर पड़ने लगते | "
21 March 2013
SUCCESS
लक्ष्य का निर्धारण ठीक हो तो असफलता भी सफलता में बदल जाती है | बिखराव से असफलता हाथ लगती है और द्रढ़ संकल्प व सुनियोजन से सफलता |
सिफलिस रोग की औषधि खोजने वाले प्रसिद्ध विज्ञानी डा.ऐर्लिक ने अपनी दवा का नाम '606 'रखा | ऐसा इसलिये क्योंकि उन्होंने 605 बार बुरी तरह असफल रहने के बाद 606 वीं बार सफलता पाई थी | इस विलक्षण नाम के पीछे उद्देश्य मात्र इतना था कि लोग यह जान सकें कि असफलता ही सफलता की जननी है | असफलता से निराश नहीं होना चाहिए |
सिफलिस रोग की औषधि खोजने वाले प्रसिद्ध विज्ञानी डा.ऐर्लिक ने अपनी दवा का नाम '606 'रखा | ऐसा इसलिये क्योंकि उन्होंने 605 बार बुरी तरह असफल रहने के बाद 606 वीं बार सफलता पाई थी | इस विलक्षण नाम के पीछे उद्देश्य मात्र इतना था कि लोग यह जान सकें कि असफलता ही सफलता की जननी है | असफलता से निराश नहीं होना चाहिए |
समय ही जीवन और श्रम ही वैभव है | कौन कितने दिन जिया ,इसका लेखा -जोखा जन्म दिन से लेकर मरण के दिन गिनकर नहीं ,वरन इस आधार पर लगाया जाना चाहिए कि किसने अपने समय का उपयोग महत्वपूर्ण प्रयोजन के लिये किया | आदि शंकराचार्य मात्र 32 वर्ष जिये | विवेकानंद ने 36 वर्ष की स्वल्प आयु पाई | रामतीर्थ 33 वर्ष की आयु में ही चल बसे | ऐसे अनेक व्यक्ति इस संसार में हुए हैं जिन्हें लंबी अवधि तक जीने का अवसर नहीं मिला ,पर उन्होंने अपने समय का श्रेष्ठतम उपयोग किया | कितने ही लोग लंबी आयु तक जीते हैं ,उनका आधा समय कुचक्रों और शेष समय आलस्य -प्रमाद में चला जाता है | इसे वे पहले तो जान नहीं पाते किंतु जब विदाई का दिन आता है तो आँखे खुलती हैं और हाथ मलते हुए रुधे कंठ और भरी आँखों से इतना ही कह पाते हैं कि उन्होंने बहुमूल्यअवसर निरर्थक कामों में गंवाया |
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