2 January 2014

उपासना

'सह्रदयता  मानवीय  गरिमा  का  मेरुदंड  है  | जिसका  संबल  पाकर  ही  व्यक्ति  और  समाज  ऊँचे  उठते  हैं  एवं  मानवीय  गुणों  से  भरे-पूरे  बनते  हैं   |'
  महाभारत  युद्ध  का  प्रसंग  है --युधिष्ठिर  रात्रि  में  व्यक्तिगत  उपासना  हेतु  वेश  बदलकर
  जाते  थे  | एक  दिन  भीम ,नकुल  सहदेव  ने  उनका  पीछा  किया , ताकि  जान  सकें  कि  वे  कहाँ  जाते  हैं  |  उन्होंने  देखा  कि  वे  युद्धस्थल  की  ओर  जा  रहें  हैं  |  उन्होंने  देखा  कि  वे  प्रत्येक  घायल  के  पास  जाते  हैं , चाहे  वह  कौरव  पक्ष  का  हो  या  पांडव  पक्ष  का  उसकी  सेवा  करते  हैं  , किसी  के  घावों  पर  मलहम-पट्टी  की , किसी  को  जल  पिलाया , किसी  को  अन्न  आहार  दिया , किसी  को  सांत्वना  दी  |
    अब  भाइयों  ने  पूछा --तात ! आप  छिपकर  यहां  क्यों  आये  ?  युधिष्ठिर  बोले --" भाइयों ! यदि  मैं  प्रकट  होकर  आता  तो  वे  अपने  मन  की  बात  मुझसे  न  कह  पाते  और  मैं  सेवा  कार्य  से  वंचित  रह  जाता  | "  भीम  बोले --"यह  समय  तो  आपकी  व्यक्तिगत  उपासना  का  है  ?
वे  बोले --" दुखियों  पीड़ितों  की  सेवा  करना  ही  सच्ची  उपासना  है  | मैंने  वही  किया  है  | " सुनकर  सब  नतमस्तक  हो  गये  |

1 January 2014

HUMAN NATURE

मनुष्य   किसी   भी   व्यवस्था   से   संतुष्ट   नहीं   हो   पाता  । इनसान   समग्रता   में   जीना   चाहता   है  और   सभी   आयामों   में   विकसित   होना   चाहता   है  ।  समग्रता   का  तात्पर्य   है -- शारीरिक , मानसिक  एवं   भावनात्मक   रूप   से   समृद्ध   होना  । वह   शारीरिक   रूप   से   तृप्त   होना   चाहता   है , उसकी   इंद्रियां   अतृप्त   रहना   नहीं   चाहतीं  ।
शारीरिक   रूप   से   तृप्ति   होने   के   बाद   वह   मानसिक   रूप   से   तुष्ट   होना   चाहता   है  ।
जब   व्यक्ति   शरीर   एवं   मन   से   तृप्त   एवं  तुष्ट   हो   जाता   है   तो   वह   भावनात्मक   रूप   से   पुष्ट   होना   चाहता   है   । जब   तक   उसे   भावनात्मक   संबल   नहीं   मिलता   है , तब   तक  वह   सब   कुछ   पाकर   भी  कुछ   खोये   हुए   को   पाने   के   लिये   भाग - दौड़  मचाता   रहता   है  । यह   भाग - दौड़  भावनात्मक   एवं   आत्मीयता   के   सतरंगी   सौंदर्य   को   पाने   के   लिये   होती   है  ।  यही   है   समग्रता   और   व्यक्ति   इसी   में   जीना   चाहता   है  ।
       व्यक्ति   ऊँची   उड़ान   भरना   चाहता   है , आसमान   की   सर्वोच्च   बुलंदियों   को   छू   लेना   चाहता   है  ।  वह   वहाँ   भी   रहना   चाहता   है   और  वहाँ   से   वापस   आकर  जमीन   में   भी   जीना   चाहता   है  । वह   न   तो   केवल   जमीन   से   ही   जुड़े   रहना   चाहता   है   और   न   ही   पंख   लगाये   केवल   आसमान   में   उड़ते   रहना   चाहता   है  ।  वह   दोनों   जगत   में   समान   रूप   से   जीना   चाहता   है  ।
           यही   तो   अध्यात्म   है   ।
उपनिषदों  में   इसी   अप्रतिम   और   सर्वोच्च   उड़ान   की   कल्पना   की   गई   है  ।
व्यक्ति   ऐसी   व्यवस्था   चाहता   है  जहां   वह   समग्र   रूप   से   विकास   कर   सके  ।  शरीर   से , मन   से   एवं   भावनाओं   से  वह   सभी   रूपों   में   संतुष्टि   प्राप्त   कर   सके  ।
      आज   ऐसे   ही   समग्र   समाज   की   आवश्यकता   है , जहां   व्यक्ति   श्रेष्ठ   एवं   सभ्य   हो   और   अपने   विचारों   एवं   भावनाओं   से   ऊँची   उड़ान   भर   सकता   हो  ।
ऐसी   नवीन   मानवता   के   लिये   व्यक्ति   को  स्वयं   को   बदलना   होगा  , अपने   मनोभावों   को   श्रेष्ठता   के   प्रति   समर्पित   करना   होगा   ।
जीवन   में   संवेदना , सेवा , सहायता   एवं   पवित्रता   के   बीज   का   अंकुरण   करके   ही   समग्रता   को   प्राप्त   किया   जा   सकता   है   ।  

WISDOM

' मनुष्य   पाप   करके   यह   सोचता   है   कि   मेरा   पाप   कोई   नहीं   जानता ,पर   उसके   पाप   को   न   केवल   देवता   जानते   हैं , बल्कि   सबके   ह्रदय   में   स्थित   परमपिता   परमेश्वर   भी   जानते   हैं  । '

30 December 2013

WISDOM

हर   इनसान   के   अंदर  देवता   का   वास   होता   है , जो   उसे   अच्छे   कार्य   के   लिये   प्रेरित   करता   है   और   ठीक   इसके   विपरीत   हर   इनसान   के   भीतर   एक   शैतान   भी   होता   है   ।   शैतान   हमेशा   अपने   लिये   राह   ढूँढ़ता  रहता  है  , उचित   परिस्थिति   का   इंतजार   करता   रहता   है  और   अनुकूल   परिस्थितियां   पाते   ही   बाहर   निकल   आता   है  , यहीं   से   अपराध   की   यात्रा   प्रारम्भ   होती   है   जो   व्यक्ति   को   एक   गहरे   दलदल   में   धकेल   देती   है   ।   ऐसा   व्यक्ति   स्वयं   परेशान   रहता   है   और   औरों   को   भी   परेशान  करता   है   । 
       इसके   विपरीत   अंदर   के   देवता   को   प्रश्रय   देने   पर   वह   हमें   सत्प्रेरणा   प्रदान   करता   है  ।  उत्कृष्ट   विचार   और   श्रेष्ठ   चिंतन   करने   से  , सतत   श्रेष्ठ   कर्म   करने   से   हमारे   अंदर   देवत्व   का   उदय   होता   है   ।  निष्काम   कर्म   करने   से  , औरों   के   प्रति   सदभाव   रखने   से  , कष्ट   सहकर   भी   सेवा   कार्य   करने   से   भावनाएं   निर्मल   होती   हैं , ह्रदय   परिष्कृत   होता   है  ।  अंदर   की   शैतानियत   को   मारने   की   यही   प्रक्रिया   है   ।  हमें   ईश्वर   से   प्रार्थना   करनी   चाहिए   कि   हम   सबको   सद्बुद्धि   मिले  ।   हमारे   अंतर्जगत   और   बाह्य   जगत   में   सर्वत्र   सद्बुद्धि   का   प्रकाश   हो 

25 December 2013

WISDOM

 


मनुष्य  जीवन   का   अक्षय   श्रंगार   है -- आंतरिक   विकास  । ह्रदय   की   पवित्रता   एक  ऐसा   प्रसाधन
है   जो   मनुष्य   को   बाहर -भीतर  से   एक   ऐसी   सुंदरता  से   ओत - प्रोत  कर   देता   है  , जिसका   आकर्षण  जन्म - जन्मांतर   तक  एक   सा  बना   रहता   है  ।
        ईसामसीह अपने   शिष्यों   के   साथ यरूशलम  पहुंचे  । वहां   के   गिरिजाघर   की  शान-शौकत   को   देखकर  वे   बोले --" इसकी   सारी   भव्यता   बेकार   है  । एक   दिन   ये   गिरकर   तबाह   हो   जायेगा  । " उनकी   बात   सुनकर  उनके   शिष्य  दुखी   हो   गये  और   उनसे   कहने   लगे --"आप   प्रभु   के   घर   के   बारे   में  ऐसा   क्यों   सोचते   हैं  ?" ईसामसीह   बोले --" मैं   तुम्हे   अपना   ध्यान  भगवान   के   उस  मंदिर   में   लगाने   को   कहता   हूँ , जो   कभी   नष्ट   नहीं   हो   सकता  । तुम्हारी   अंतरात्मा   प्रभु   का   शाश्वत   निवास   स्थान   है  ।  सारी   दुनिया   खत्म   भी   हो   जाये   तो   भी   तुम   अपने   प्रभु   का   दर्शन   वहां   हमेशा   कर   सकते   हो   ।"

24 December 2013

आदर्श की राह

जीवन  सागर  पर  तूफान  हमेशा  बने  रहते  हैं  |  आदर्श  न  हो  तो  जीवन  की  नौका  के   डूबने  के  सिवाय  और  कोई  विकल्प  नहीं  बचता  |
स्वामी  विवेकानंद  के वचन  हैं--" आदर्शों  की  ताकत   चर्मचक्षुओं  से  न  दिखने  पर  भी  अतुलनीय  है  | पानी  की  एक  बूँद  को  यों  देखें  तो  उसमें  कुछ  भी  ताकत  नजर  आती, लेकिन  यदि  उसे  किसी  चट्टान  की  दरार  में  जमकर  बरफ  बनने  का  अवसर  मिल  जाये, तो  वह  चट्टान  को  फोड़  देगी  | इस  जरा  से  परिवर्तन  से  चट्टान  को  कुछ  हो  जाता  है  और  उसमें  सोई  हुई ताकत  सक्रिय  एवं  परिणामकारी  हो  उठती  है  | ठीक  यही  बात  आदर्शों  की  है  | जब  तक  वे  विचार  रूप  में  रहते  हैं, उनकी  शक्ति  परिणामकारी  नहीं  होती, लेकिन  जब  वे  किसी  के  व्यक्तित्व  और  आचरण  में  ठोस  रूप  लेते  हैं, तब  उनसे  विराट  शक्ति  और  महत  परिणाम  उत्पन्न  होते  हैं  |  आदर्श  केवल  आकांक्षा  भर  नहीं  हैं, यह  साहस  भरा  संकल्प   और  कठोर  श्रम  की  कठिन  तप-साधना  भी   है  | जो  भी  आदर्शों  की  राह  पर  चलें  हैं  उन  सभी  का  निष्कर्ष  है-- जिस  आदर्श  में  व्यवहार  का  प्रयत्न  न  हो, वह  निरर्थक  है  और  जो  व्यवहार  आदर्श  से  प्रेरित  न  हो, वह  भयावह  है  |

23 December 2013

अनुशासन

ईश्वरीय  विधान  अनुशासन  का  पर्याय  है  | यदि  अनुशासन  नहीं  होता  तो  स्रष्टि  की  गति  अवरुद्ध  हो  जाती  , प्रकृति  अनुशासन  से आबद्ध  है  | जो  भी  इस  अनुशासन  को  तोड़ेगा, उसे  क्षमा  नहीं  मिल  सकती  है | प्रकृति  क्षमा  नहीं  करती  है,  ईश्वरीय  विधान   में  क्षमा का  प्रावधान  नहीं  है  |
      अनुशासन  के  प्रतिकूल  चलना  अनुशासनात्मक  कार्रवाई  के  अंतर्गत  आता  है  | ईश्वरीय  विधान  स्रष्टि  की  स्वसंचालित  प्रक्रिया  है  | जो  इस  विधान  के  अनुरूप  चलता  है  वह  पुरस्कार  का  भागीदार  होता  है, परंतु  इसके  प्रतिकूल  चलने  वाला  या  इस  विधि-व्यवस्था  में  दखल  देने  वाला  दंड  पाता  है  |
 ' ईश्वर  को  प्रिय  है - अनुशासन  |'