मेजिनी उन महामानवों में से थे जो किसी एक देश या जाति की सम्पति नहीं होते वरन समस्त संसार उनको अपना समझता है और वे भी सदैव मनुष्य मात्र की कल्याण की भावना से ही कार्य किया करते थे l उन्होंने ' ड्यूटी आफ़ मैंन ' में मानवीय अधिकारों और कर्तव्यों की जो विवेचना की है वह समस्त संसार को द्रष्टि में रखकर की गई है l अपने साथियों को प्रेरणा देते हुए उनके अमर शब्द हैं ----- " दुनिया में दुष्ट और कुमार्गगामी जितने अधिक होते जायेंगे उतना ही अधिक उन लोगों का उत्तरदायित्व बढ़ता चला जायेगा , जो सच्चाई को कायम रखना चाहते हैं l स्वार्थ जितने बल से अपने पैर जमाने की चेष्टा करेगा , उतनी ही अधिक आवश्यकता इस बात की है कि उसका मुकाबला द्रढ़ता से किया जाये और आलसी पीढ़ियों की शिक्षा में स्वार्थ के बीज को नष्ट कर दिया जाये l लोगों में नास्तिकता के विचार जितने अधिक फैलते जायेंगे , उतनी ही अधिक आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने ह्रदय को परमात्मा का मंदिर बनाये और अपने विश्वास की मजबूती से उसकी पवित्रता को स्थिर रखने की कोशिश करें l "
8 July 2017
6 July 2017
वास्तविक मनुष्य वही है जो अपने दोषों को खोज उनके निवारण का सच्चे ह्रदय से प्रयत्न करे ------ महात्मा गाँधी
प्रसिद्ध विचारक हरिभाऊ उपाध्याय के एक मित्र थे जो गांधीजी के कटु आलोचक थे l उपाध्याय जी के उन मित्र को गांधीजी की अहिंसा बड़ी आपत्तिजनक लगती थी l उन्होंने कहा कि आप एक बार महात्मा जी से मेरी मुलाकात करा दें तो देश का भला होगा l क्योंकि मेरा मन महात्मा जी को खूब खरी - खोटी सुनाने का है ताकि वे अपनी अहिंसा की रीति - नीति बदलें और उनकी अहिंसा से देश को जो नुकसान हो रहा है , वह बंद हो जाये l
संयोग से एक दिन गांधीजी ट्रेन में कहीं जाने के लिए बैठे और सामना होने पर उपाध्यायजी को यह कहना पड़ा --- " बापू ! यह हमारे आर्य समाजी मित्र हैं , बड़े दबंग और आपके कटु आलोचक हैं l कई बार आपसे मिलने के लिए कह चुके हैं l " गांधीजी ने हँसते हुए कहा -- " हाँ --हाँ जरुर सुनूंगा l " वे महाशय डिब्बे के अन्दर पहुंचे और गांधीजी को खरी - खोटी कहने लगे l बापू उनकी बात सुनते हुए बोले ----कृपया बैठ जाएँ इससे आपको सुनाने में सुविधा होगी और मुझे सुनने में l
इतने में ट्रेन चल दी , उन महाशय को कुछ ख्याल न रहा , उनने आलोचना जारी रखी l उन्हें पता तब चला जब गाड़ी ने गति पकड़ ली , अब उपाध्यायजी के मित्र के चेहरे पर घबराहट आ गई गांधीजी ने उनकी घबराहट का कारण समझ लिया और कहा --" आप चिंता न करें l आपकी बहुत सी बातों से मेरा भला हो रहा है l " इतने में टिकट चेकर ने टिकट माँगा l तत्काल गांधीजी ने कहा ---- " ये मेरे साथ हैं , अभी अजमेर से सवार हुए हैं l जल्दी के कारण टिकट नहीं बन सका इसलिए इनका टिकट बना दीजिये l " टिकट बनाकर टी.टी, चला गया तो गांधीजी ने सहज भाव से आलोचक से कहा ---- आप अपनी बात जारी रखिये l
लेकिन अब आलोचक महोदय से कुछ कहते नहीं बन रहा था l वह सोच रहा था कि कैसा विचित्र व्यक्ति है यह जो अपने आलोचक के प्रति भी मैत्री भाव रखता है l उसे इतनी कटु आलोचना करने पर भी 'हाँ या अच्छा 'से अधिक कुछ सुनने को नहीं मिला l बापू ने उसके असमंजस को भांप लिया और कहा ---- " प्रत्येक में दोष भी रहते हैं और गुण भी l मेरी भी यही स्थिति है l पर वास्तविक मनुष्य वही है जो अपने दोषों को खोजकर उनके निवारण का सच्चे ह्रदय से प्रयत्न कर रहा हो l आपने दोषों को खोजने में मेरी मदद की अत: आपसे बड़ा मित्र और कौन होगा l "
संयोग से एक दिन गांधीजी ट्रेन में कहीं जाने के लिए बैठे और सामना होने पर उपाध्यायजी को यह कहना पड़ा --- " बापू ! यह हमारे आर्य समाजी मित्र हैं , बड़े दबंग और आपके कटु आलोचक हैं l कई बार आपसे मिलने के लिए कह चुके हैं l " गांधीजी ने हँसते हुए कहा -- " हाँ --हाँ जरुर सुनूंगा l " वे महाशय डिब्बे के अन्दर पहुंचे और गांधीजी को खरी - खोटी कहने लगे l बापू उनकी बात सुनते हुए बोले ----कृपया बैठ जाएँ इससे आपको सुनाने में सुविधा होगी और मुझे सुनने में l
इतने में ट्रेन चल दी , उन महाशय को कुछ ख्याल न रहा , उनने आलोचना जारी रखी l उन्हें पता तब चला जब गाड़ी ने गति पकड़ ली , अब उपाध्यायजी के मित्र के चेहरे पर घबराहट आ गई गांधीजी ने उनकी घबराहट का कारण समझ लिया और कहा --" आप चिंता न करें l आपकी बहुत सी बातों से मेरा भला हो रहा है l " इतने में टिकट चेकर ने टिकट माँगा l तत्काल गांधीजी ने कहा ---- " ये मेरे साथ हैं , अभी अजमेर से सवार हुए हैं l जल्दी के कारण टिकट नहीं बन सका इसलिए इनका टिकट बना दीजिये l " टिकट बनाकर टी.टी, चला गया तो गांधीजी ने सहज भाव से आलोचक से कहा ---- आप अपनी बात जारी रखिये l
लेकिन अब आलोचक महोदय से कुछ कहते नहीं बन रहा था l वह सोच रहा था कि कैसा विचित्र व्यक्ति है यह जो अपने आलोचक के प्रति भी मैत्री भाव रखता है l उसे इतनी कटु आलोचना करने पर भी 'हाँ या अच्छा 'से अधिक कुछ सुनने को नहीं मिला l बापू ने उसके असमंजस को भांप लिया और कहा ---- " प्रत्येक में दोष भी रहते हैं और गुण भी l मेरी भी यही स्थिति है l पर वास्तविक मनुष्य वही है जो अपने दोषों को खोजकर उनके निवारण का सच्चे ह्रदय से प्रयत्न कर रहा हो l आपने दोषों को खोजने में मेरी मदद की अत: आपसे बड़ा मित्र और कौन होगा l "
5 July 2017
असाधारण देशभक्त ------- भामाशाह
कर्तव्य का दायित्व बड़ा कठिन होता है l जब देश के सभी प्राणी उसके लिए स्वार्थ त्याग करने को प्रस्तुत हो जाते हैं और अपनी सम्पति , धन -बल , जन -बल , सर्वस्व देश सेवा के लिए अर्पण कर देते हैं l भामाशाह जी प्रशंसा करते हुए एक लेखक ने लिखा है ----- " जिस तरह मेवाड़ की अन्य घटनाएँ अपूर्व हैं उसी तरह भामाशाह की यह स्वामिभक्ति भी अभूतपूर्व तथा अतुलनीय है l उसके स्वार्थ त्याग ने उसका नाम अजर - अमर कर दिया l
जब महाराणा प्रताप अपने को सर्वथा असहाय समझ कर और शत्रु का दबाव बढ़ता देखकर मेवाड़ को त्यागने का विचार कर चुके थे और उसकी सीमा पर पहुँच चुके थे तो यह समाचार भामाशाह ने सुना l वह जाति का वैश्य था , राज्य कार्य और व्यापार आदि के द्वारा उसके पूर्वजों ने अपार सम्पति एकत्र की थी l मेवाड़ की स्वाधीनता के लिए वह सम्पति उन्होंने महाराणा प्रताप को सौंप दी l कहा जाता है की भामाशाह के भंडार में उस समय इतना धन था जिससे पच्चीस हजार सैनिकों का खर्च बारह वर्ष तक चलाया जा सकता था l
जब महाराणा प्रताप अपने को सर्वथा असहाय समझ कर और शत्रु का दबाव बढ़ता देखकर मेवाड़ को त्यागने का विचार कर चुके थे और उसकी सीमा पर पहुँच चुके थे तो यह समाचार भामाशाह ने सुना l वह जाति का वैश्य था , राज्य कार्य और व्यापार आदि के द्वारा उसके पूर्वजों ने अपार सम्पति एकत्र की थी l मेवाड़ की स्वाधीनता के लिए वह सम्पति उन्होंने महाराणा प्रताप को सौंप दी l कहा जाता है की भामाशाह के भंडार में उस समय इतना धन था जिससे पच्चीस हजार सैनिकों का खर्च बारह वर्ष तक चलाया जा सकता था l
4 July 2017
जातीयता और संस्कृति की संरक्षक ------ गोल्डामेयर
गोल्डामेयर का जन्म 1898 में रूस में हुआ था l उन दिनों रूस में यहूदियों को क्रान्तिकारी मानकर विशेष रूप से कष्ट दिए जाते थे , अत: उनका परिवार अमेरिका आकर बस गया l यहूदियों पर अकथनीय अत्याचारों का उनके मन पर इतना असर हुआ कि जब वे हाई स्कूल में थीं तभी से उनके मन में यह प्रेरणा उठी कि यहूदियों के लिए ' स्वदेश ' हो , यहूदी -राज्य हो l गोल्डा का स्पष्ट उद्देश्य कष्ट और सब प्रकार की असुविधाएं सहकर भी अपनी जाति के उद्धार के लिए प्रयत्न करना था l 1923 में अमेरिका का सुविधापूर्ण जीवन त्याग कर गोल्डा पैलेस्टाइन पहुंची और दूसरे ही दिन से तेज धूप में कृषि फार्म में बारह घंटे कार्य करने लगीं l विरोधी धर्म वालों द्वारा शासित और सैकड़ों वर्षों से उजाड़ पड़े हुए देश को निवास योग्य बनाने के लिए कड़ा परिश्रम अनिवार्य था l सार्वजनिक जीवन में उन्होंने इतना काम किया कि पैलेस्टाइन के निवासी ही नहीं इंग्लैंड और अमेरिका के हजारों प्रसिद्ध पुरुष उनके प्रशंसक बन गए l 1949 में ' इसराइल ' राष्ट्र के स्थापित होते ही सबसे बड़ी समस्या अरब शासक के आक्रमण का मुकाबला करने के लिए सैन्य सामग्री खरीदना l इसके लिए पचासों करोड़ रु. की आवश्यकता थी l तब गोल्डा कर्ज और चंदे के रूप में धन इकट्ठा करने अमेरिका गईं l स्वयं इसराइल के खजांची ने कहा अमेरिका से पचास - साठ डालर से अधिक ऋण नहीं मिल सकेगा l पर गोल्डा ने ढाई महीने में पांच करोड़ डालर इकट्ठा कर के दिखा दिया l उस अवसर पर इसराइल राष्ट्र के प्रथम प्रधान मंत्री बेनगुरियो ने कहा ---- " किसी दिन जब इसराइल राष्ट्र का इतिहास लिखा जायेगा , तो लोग जान सकेंगे कि एक यहूदी स्त्री थी जिसने धन इकट्ठा कर के दिया और उसी से राष्ट्र का स्थिर रह सकना संभव हुआ l "
अरब लोगों से मार -काट आरम्भ हो जाने पर गोल्डा बहुत बड़ा खतरा मोल लेकर अरब स्त्री वेश धारण करके बड़ी चालाकी से जॉर्डन बादशाह अब्दुल्ला मिलने गईं और एक चतुर राजनीतिज्ञ की तरह अपने विरोधी अरब शासकों में से एक प्रमुख व्यक्ति को अप्रत्यक्ष रूप से अपने अनुकूल बना लिया जिससे युद्ध कुछ समय के लिए रुका रहा , यहूदियों ने अपनी शक्ति बढ़ा ली और अंत में उनके कथनानुसार यहूदियों की ही विजय हुई l
इसराइल की स्थापना के बाद जब गोल्डामेयर को राजदूत बनाकर रूस भेजा गया तो वहां के यहूदियों ने उनका बहुत उत्साह से स्वागत किया और यहूदियों के ' सिनागोग ' ( धर्म मंदिर ) में उन्हें देखने के लिए 40 हजार व्यक्तियों की भीड़ लग गई l जब इसराइल के श्रम मंत्री पद पर उन्हें नियुक्त किया गया तो उन्होंने मजदूरों के लिए सस्ते और सुविधा जनक मकान बनाये जाने की व्यवस्था की l 1956 में जब गोल्डामेयर विदेश मंत्री बनी तो आठ वर्षों में उन्होंने प्रयत्न कर के
40 देशों से इसराइल राष्ट्र का राजनीतिक संबंध स्थापित किया l 18 मार्च 1969 को वो देश की सर्वोच्च शासक चुन ली गईं l
अरब लोगों से मार -काट आरम्भ हो जाने पर गोल्डा बहुत बड़ा खतरा मोल लेकर अरब स्त्री वेश धारण करके बड़ी चालाकी से जॉर्डन बादशाह अब्दुल्ला मिलने गईं और एक चतुर राजनीतिज्ञ की तरह अपने विरोधी अरब शासकों में से एक प्रमुख व्यक्ति को अप्रत्यक्ष रूप से अपने अनुकूल बना लिया जिससे युद्ध कुछ समय के लिए रुका रहा , यहूदियों ने अपनी शक्ति बढ़ा ली और अंत में उनके कथनानुसार यहूदियों की ही विजय हुई l
इसराइल की स्थापना के बाद जब गोल्डामेयर को राजदूत बनाकर रूस भेजा गया तो वहां के यहूदियों ने उनका बहुत उत्साह से स्वागत किया और यहूदियों के ' सिनागोग ' ( धर्म मंदिर ) में उन्हें देखने के लिए 40 हजार व्यक्तियों की भीड़ लग गई l जब इसराइल के श्रम मंत्री पद पर उन्हें नियुक्त किया गया तो उन्होंने मजदूरों के लिए सस्ते और सुविधा जनक मकान बनाये जाने की व्यवस्था की l 1956 में जब गोल्डामेयर विदेश मंत्री बनी तो आठ वर्षों में उन्होंने प्रयत्न कर के
40 देशों से इसराइल राष्ट्र का राजनीतिक संबंध स्थापित किया l 18 मार्च 1969 को वो देश की सर्वोच्च शासक चुन ली गईं l
3 July 2017
व्यावहारिक अध्यात्म के धनी --------- श्री जुगल किशोर बिरला
' श्री जुगल किशोर बिरला आध्यात्मिक महापुरुष थे जिन्होंने वेद भगवान के कथनानुसार दो हाथों से उपार्जित कर अनेक हाथों से उसे सत्कर्मों में वितरण किया l उनमे आंतरिक सेवा भावना और अहंकार -शून्यता थी कि सामान्य लोगों की सहायता करने को स्वयं तैयार रहते थे l '
पिलानी (राजस्थान) में एक बार मुसलाधार वर्षा हुई, जिससे चारों तरफ जल भर गया और कच्चे मकान धड़ाधड़गिरने लगे l यह देखकर वहां के बिरला कॉलेज के अध्यापक और विद्दार्थी सहायता के लिए पहुंचे और गरीबों की झोपड़ियों के पास पानी को काटकर निकालने का प्रयत्न करने लगे l इतने में देखा कि जुगलकिशोर जी स्वयं भी धोती चढ़ाये और वर्षा में भीगते हुए वहां उपस्थित थे l उसी समय उन्होंने व्यवस्था की कि जिनके घर टूट गए हैं उनको अतिथि गृह और 'कुवेर-भंडार ' में ले जाकर टिका दिया जाये l हरिजन लोगों के घर भी डूब रहे थे , पर उन्होंने तब तक अपने घरों को छोड़ने में असहमति प्रकट की जब तक कि उनका सामान भी उनके साथ सुरक्षित न पहुंचा दिया जाये l बिरला जी ने विद्दार्थियों से कहकर उनका सामान उन्ही की चारपाइयों पर रखकर ठहरने की जगह पहुँचाने की व्यवस्था कर दी l
जब तक लोग उनके यहाँ ठहरे तब तक सबको भोजन भिजवाते रहे और जब पानी हट गया तो मकानों की मरम्मत के लिए ईंट , बल्ली , टीन आदि भी दिए जाने की व्यवस्था की l उनके जीवन की ऐसी असंख्य घटनाएँ हैं कि उन्होंने न केवल देश के लोगों की वरन विदेशों से आने जाने वाले लोगों की आर्थिक सहायता की l उनका दान सात्विक था l
पिलानी (राजस्थान) में एक बार मुसलाधार वर्षा हुई, जिससे चारों तरफ जल भर गया और कच्चे मकान धड़ाधड़गिरने लगे l यह देखकर वहां के बिरला कॉलेज के अध्यापक और विद्दार्थी सहायता के लिए पहुंचे और गरीबों की झोपड़ियों के पास पानी को काटकर निकालने का प्रयत्न करने लगे l इतने में देखा कि जुगलकिशोर जी स्वयं भी धोती चढ़ाये और वर्षा में भीगते हुए वहां उपस्थित थे l उसी समय उन्होंने व्यवस्था की कि जिनके घर टूट गए हैं उनको अतिथि गृह और 'कुवेर-भंडार ' में ले जाकर टिका दिया जाये l हरिजन लोगों के घर भी डूब रहे थे , पर उन्होंने तब तक अपने घरों को छोड़ने में असहमति प्रकट की जब तक कि उनका सामान भी उनके साथ सुरक्षित न पहुंचा दिया जाये l बिरला जी ने विद्दार्थियों से कहकर उनका सामान उन्ही की चारपाइयों पर रखकर ठहरने की जगह पहुँचाने की व्यवस्था कर दी l
जब तक लोग उनके यहाँ ठहरे तब तक सबको भोजन भिजवाते रहे और जब पानी हट गया तो मकानों की मरम्मत के लिए ईंट , बल्ली , टीन आदि भी दिए जाने की व्यवस्था की l उनके जीवन की ऐसी असंख्य घटनाएँ हैं कि उन्होंने न केवल देश के लोगों की वरन विदेशों से आने जाने वाले लोगों की आर्थिक सहायता की l उनका दान सात्विक था l
1 July 2017
एक संघर्षशील व्यक्तित्व ------- त्रलोक्यनाथ चक्रवर्ती
देश को आजाद कराने के लिए त्रलोक्यनाथ चक्रवर्ती ( जन्म 1888 ) ने अपनी जिन्दगी के बेहरतीन तीस वर्ष जेल की काल कोठरियों में बिताये l उनका संघर्षशील व्यक्तित्व अन्याय , अनीति से जीवनपर्यन्त जूझने की अनूठी कहानी है l जो प्रेरक है और रोमांचक भी l
1916 में उन्हें अंडमान की काल - कोठरियों में नारकीय यंत्रणा सहने के लिए भेज दिया गया l वे इसे सजा नहीं तपस्या मानते थे और यह विश्वास करते थे कि उनकी इस तपस्या के परिणाम स्वरुप भारतवर्ष को स्वतंत्रता मिलेगी l वीर सावरकर और गुरुमुख सिंह जैसे क्रान्तिकारी उनके साथ रहे थे l इन लोगों ने वहां संगठन शक्ति के बल पर रचनात्मक कार्य किया l
वीर सावरकर के सहयोगी के रूप में उन्होंने जेल में ही हिन्दी भाषा के प्रचार का कार्य अपनाया l सावरकर से हिन्दी सीखने वाले वे पहले व्यक्ति थे l परतंत्र भारत में भी वह स्वतंत्र भारत की बातें सोचा करते थे l उन्हें विश्वास था कि अब देश स्वतंत्र हो जायेगा ---- इस विशाल देश को एक सूत्र में बाँधने के लिए एक भाषा का होना बहुत आवश्यक है l यह भाषा हिन्दी ही हो सकती है l अत: इस भाषा के प्रचार का कार्य उन्होंने सावरकर के साथ वहीँ काले पानी की जेल में ही आरम्भ कर दिया था l उनके सम्मिलित प्रयास से २00 से भी अधिक कैदियों ने वहां हिंदी सीखी l चाहें जेल की दीवारें हों या काले पानी की कोठरियां , वहां भी मनस्वी और कर्म निष्ठ चुप नहीं बैठते l
1934 में वे जेल से फरार हो गए l जब देश आजाद हुआ तो उनकी जन्म भूमि पूर्वी पाकिस्तान के क्षेत्र में आई वहां अल्प संख्यक हिन्दुओं पर अत्याचार होते थे , ऐसी स्थिति में उन्होंने वहीँ रहकर अपने अल्प संख्यक भाइयों के हितों की रक्षा के लिए अन्याय से संघर्ष करना ही अपना लक्ष्य बनाया l
पाकिस्तान सरकार ने उन्हें वर्षों तक नजरबन्द बनाये रखा l 1970 में वे तीन महीने के लिए भारत आये और 1 अगस्त 1970 को उनका देहावसान हो गया l उसके दो वर्ष बाद उस धरती से पाकिस्तान का नाम ही उठ गया l
1916 में उन्हें अंडमान की काल - कोठरियों में नारकीय यंत्रणा सहने के लिए भेज दिया गया l वे इसे सजा नहीं तपस्या मानते थे और यह विश्वास करते थे कि उनकी इस तपस्या के परिणाम स्वरुप भारतवर्ष को स्वतंत्रता मिलेगी l वीर सावरकर और गुरुमुख सिंह जैसे क्रान्तिकारी उनके साथ रहे थे l इन लोगों ने वहां संगठन शक्ति के बल पर रचनात्मक कार्य किया l
वीर सावरकर के सहयोगी के रूप में उन्होंने जेल में ही हिन्दी भाषा के प्रचार का कार्य अपनाया l सावरकर से हिन्दी सीखने वाले वे पहले व्यक्ति थे l परतंत्र भारत में भी वह स्वतंत्र भारत की बातें सोचा करते थे l उन्हें विश्वास था कि अब देश स्वतंत्र हो जायेगा ---- इस विशाल देश को एक सूत्र में बाँधने के लिए एक भाषा का होना बहुत आवश्यक है l यह भाषा हिन्दी ही हो सकती है l अत: इस भाषा के प्रचार का कार्य उन्होंने सावरकर के साथ वहीँ काले पानी की जेल में ही आरम्भ कर दिया था l उनके सम्मिलित प्रयास से २00 से भी अधिक कैदियों ने वहां हिंदी सीखी l चाहें जेल की दीवारें हों या काले पानी की कोठरियां , वहां भी मनस्वी और कर्म निष्ठ चुप नहीं बैठते l
1934 में वे जेल से फरार हो गए l जब देश आजाद हुआ तो उनकी जन्म भूमि पूर्वी पाकिस्तान के क्षेत्र में आई वहां अल्प संख्यक हिन्दुओं पर अत्याचार होते थे , ऐसी स्थिति में उन्होंने वहीँ रहकर अपने अल्प संख्यक भाइयों के हितों की रक्षा के लिए अन्याय से संघर्ष करना ही अपना लक्ष्य बनाया l
पाकिस्तान सरकार ने उन्हें वर्षों तक नजरबन्द बनाये रखा l 1970 में वे तीन महीने के लिए भारत आये और 1 अगस्त 1970 को उनका देहावसान हो गया l उसके दो वर्ष बाद उस धरती से पाकिस्तान का नाम ही उठ गया l
30 June 2017
बुद्धि , बल और साहस के धनी ------ मेवाड़ के महाराणा राजसिंह
' जब तक जी सकते हैं शान से जियें , मनुष्य की गौरव गरिमा से जियें , अन्याय से संघर्ष कर के जियें l अन्यायी कितना ही बड़ा और शक्तिवान क्यों न हो ईश्वर उसके साथ नहीं होता अत: उसे हारना ही पड़ता है l
सौ गांवों का एक छोटा सा राज्य था --- रूपनगर l वहां दिल्ली से एक चित्र बेचने वाली आई l राजकुमारी चारुमती ने उससे वीर हिन्दू राजाओं के साथ औरंगजेब का चित्र भी खरीदा और उसी के सामने फाड़ कर फेंक दिया , उसकी सहेलियों ने उसे पांव तले रौंदा l चित्र बेचने वाली ने उस चित्र के टुकड़े औरंगजेब को दिखाए साथ ही चारुमती के सौन्दर्य वर्णन भी किया l औरंगजेब ने कहला भेजा कि राजकुमारी का विवाह उससे किया जाये अन्यथा वह रूपनगर की ईंट से ईंट बजा देगा l राजकुमारी के पिता विक्रम सिंह समर्थ नहीं थे अत: उन्होंने औरंगजेब का आदेश स्वीकार कर लिया किन्तु चारुमती ने साहस नहीं छोड़ा , उसने मेवाड़ के राणा राजसिंह से अपने उद्धार की प्रार्थना की l
अपने सरदारों से मंत्रणा के बाद उन्होंने राजकुमारी की रक्षा लिए औरंगजेब का सामना करने का निश्चय किया l बड़ी होशियारी से उनके सैनिकों ने औरंगजेब की सेना को एक संकरे स्थान पर रोक दिया और राणा स्वयं वेष बदल कर चारुमती की डोली उदयपुर ले आये और कहा -- ' आप स्वेच्छा से मेवाड़ की महारानी बनना चाहती हैं तो आपका स्वागत है l हमने कोई अहसान नहीं किया , यह तो हमारा धर्म था l " राजकुमारी ने मेवाड़ की महारानी बनना स्वीकार किया l
अपनी असफलता का समाचार सुन औरंगजेब बौखला गया और बड़ी सेना का संगठन कर अपने परिवार और बेगम सहित और खजाने सहित मेवाड़ पर आक्रमण करने चल पड़ा l विलासी और असंयमी पुरुष चाहे कितनी ही सम्पदा और शक्ति का धनी हो पर संयम का बल उसके पास नहीं होता l युद्ध क्षेत्र में भी जो विलासिता से रहे , वह भला राणा राजसिंह जैसे संयमी और चरित्रवान पुरुष से क्या जीत सकता था l
मेवाड़ राज्य के चारों ओर ऊँची पर्वत श्रेणियों परकोटा है , संकरे दर्रे हैं l राजसिंह की कुशल युद्ध नीति से औरंगजेब बुरी तरह हारा , उसे अपमानजनक सन्धि करनी पड़ी l उसकी बेगम व शहजादी जेबुन्निसा को उदयपुर में बंदिनी बन कर रहना पड़ा l उन्हें सम्मान सहित रखा गया l
औरंगजेब ने तीसरी बार भी मेवाड़ पर आक्रमण किया और उसे असफल होना पड़ा l
महाराणा राजसिंह सदा -सर्वदा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वालों को प्रेरणा प्रकाश देते रहेंगे l
सौ गांवों का एक छोटा सा राज्य था --- रूपनगर l वहां दिल्ली से एक चित्र बेचने वाली आई l राजकुमारी चारुमती ने उससे वीर हिन्दू राजाओं के साथ औरंगजेब का चित्र भी खरीदा और उसी के सामने फाड़ कर फेंक दिया , उसकी सहेलियों ने उसे पांव तले रौंदा l चित्र बेचने वाली ने उस चित्र के टुकड़े औरंगजेब को दिखाए साथ ही चारुमती के सौन्दर्य वर्णन भी किया l औरंगजेब ने कहला भेजा कि राजकुमारी का विवाह उससे किया जाये अन्यथा वह रूपनगर की ईंट से ईंट बजा देगा l राजकुमारी के पिता विक्रम सिंह समर्थ नहीं थे अत: उन्होंने औरंगजेब का आदेश स्वीकार कर लिया किन्तु चारुमती ने साहस नहीं छोड़ा , उसने मेवाड़ के राणा राजसिंह से अपने उद्धार की प्रार्थना की l
अपने सरदारों से मंत्रणा के बाद उन्होंने राजकुमारी की रक्षा लिए औरंगजेब का सामना करने का निश्चय किया l बड़ी होशियारी से उनके सैनिकों ने औरंगजेब की सेना को एक संकरे स्थान पर रोक दिया और राणा स्वयं वेष बदल कर चारुमती की डोली उदयपुर ले आये और कहा -- ' आप स्वेच्छा से मेवाड़ की महारानी बनना चाहती हैं तो आपका स्वागत है l हमने कोई अहसान नहीं किया , यह तो हमारा धर्म था l " राजकुमारी ने मेवाड़ की महारानी बनना स्वीकार किया l
अपनी असफलता का समाचार सुन औरंगजेब बौखला गया और बड़ी सेना का संगठन कर अपने परिवार और बेगम सहित और खजाने सहित मेवाड़ पर आक्रमण करने चल पड़ा l विलासी और असंयमी पुरुष चाहे कितनी ही सम्पदा और शक्ति का धनी हो पर संयम का बल उसके पास नहीं होता l युद्ध क्षेत्र में भी जो विलासिता से रहे , वह भला राणा राजसिंह जैसे संयमी और चरित्रवान पुरुष से क्या जीत सकता था l
मेवाड़ राज्य के चारों ओर ऊँची पर्वत श्रेणियों परकोटा है , संकरे दर्रे हैं l राजसिंह की कुशल युद्ध नीति से औरंगजेब बुरी तरह हारा , उसे अपमानजनक सन्धि करनी पड़ी l उसकी बेगम व शहजादी जेबुन्निसा को उदयपुर में बंदिनी बन कर रहना पड़ा l उन्हें सम्मान सहित रखा गया l
औरंगजेब ने तीसरी बार भी मेवाड़ पर आक्रमण किया और उसे असफल होना पड़ा l
महाराणा राजसिंह सदा -सर्वदा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वालों को प्रेरणा प्रकाश देते रहेंगे l
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