8 June 2013

ARDENT DESIRE

'तृष्णा का कोई अंत नहीं | आकाश की तरह उसके पेट में बहुत कुछ भरा होने पर भी खाली ही रहता है | '
       हनुमानजी लंका जा रहे थे | समुद्र के बीच में कई छोटे द्वीप थे | उनमे एक में सुरसा नाम राक्षसी रहती थी | उसे अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त थीं । उनमे एक यह भी थी कि वह अपना शरीर जब चाहे तब जितना छोटा या बड़ा कर ले |
वह लंका की प्रहरी थी | जब हनुमानजी को ऊपर से जाते देखा तो सुरसा ने अपना मुँह बड़ा करके हनुमानजी को दबोच लिया
     हनुमानजी को भी सिद्धियाँ प्राप्त थीं | उन्होंने भी अपना शरीर बढ़ाया ताकि सुरसा के मुँह से निकल सकें | सुरसा अपना मुँह बढ़ाती गई ,हनुमानजी भी बढ़ाते गये |
    इस प्रतिस्पर्धा में विस्तार तो बढ़ता जा रहा था पर कोई हल नहीं निकल रहा था | हनुमानजी को दूसरी तरकीब सूझी | उन्होंने अपना रूप छोटा किया और सहज ही बाहर निकल गये ,सुरसा का मुँह फटा का फटा रह गया |
       तृष्णा सुरसा है | महत्वाकांक्षी अपने वैभव का विस्तार करते हैं पर वे उतने नहीं बढ़ पाते जितनी की तृष्णा बढ़ जाती है |
 संतोष अपनाकर विनम्र बन कर ही इस संकट से उबरा जा सकता है | 

ONE WAY

सिकंदरिया का राजा टालेमी ,यूक्लिड से ज्यामिति सीख रहा था ,किंतु यह कठिन विद्दा उसके पल्ले नहीं पड़ रही थी | एक दिन टालेमी अपना धैर्य खो बैठा | उसने अपने गुरु से पूछा -"क्या ज्यामिति सीखने का कोई सरल मार्ग नहीं है ?"युक्लिड ने गंभीरता से कहा -"राजन !आपके राज्य में जनसाधारण और अभिजात  वर्ग के लिये पृथक मार्ग हो सकते हैं ,किंतु ज्ञान का मार्ग सबके लिये एक सा ही है | इसमें अभिजात वर्ग के लिये कोई राजमार्ग नहीं है | "
बात टालेमी की समझ में आ गई | फिर इसके बाद टालेमी ज्यामिति सीखने के लिये कठोर परिश्रम करने लगा | 

7 June 2013

THE PATH TO VICTORY

ईसा ने लोगों से कहा था -"जो बीज तुम बोते हो वह गले बिना नहीं उगता | भौतिक रूप से तुम गलोगे तो आध्यात्मिक रूप से ऊँचे उठोगे | "
बीज की तीन ही गति हैं --1. या तो वह बीज बनकर गले और अपने को सुविकसित पौधे के रूप में परिणत कर अपने जैसे अनेक बीज पैदा करे |
2. या पिसकर आटा बन जाये फिर रोटी के रूप में प्राणी का पेट भरे और अंत में दुर्गन्धित विष्ठा बनकर किसी आड़ में उपेक्षित पड़ा रहे |
3. या भीरुता और संकीर्णता से ग्रसित आत्म रक्षा की बात सोचता रहे और कीड़े -मकोड़ों अथवा सीलन -सड़न द्वारा नष्ट कर दिया जाये |
            मनुष्य जीवन की भी यही तीन गतियाँ हैं --
1. परमार्थ -प्रयोजन में अपने को संलग्न कर यशस्वी जीवन जिये और संसार की सुख -शांति में योगदान करे 2. अपने शरीर और परिवार पर ध्यान केन्द्रित कर ,पेट और प्रजनन की समस्याओं में उलझा रहे | उचित -अनुचित का विचार न कर पशु स्तर की जिंदगी गुजारे और अंतत:विष्ठा जैसी घिनौनी परिणति प्राप्त करे |
3. तीसरी गति अति कृपणता ,अति संकीर्णता और अति स्वार्थ बुद्धि की है | उस स्तर के लोग न परमार्थ सोचते और न स्वार्थ |
                 मनुष्य जीवन की सार्थकता और मानवी बुद्धि की प्रशंसा इस बात में है कि वह प्रथम गति का वरण करे और परमार्थ का श्रेष्ठ मार्ग का अवलम्बन करे | 

6 June 2013

PRAYER

'प्रार्थना ह्रदय की ,अंत:करण की निश्छल पुकार है ,जो सीधे परमात्मा तक पहुंचती है और बदले में प्रार्थी को कृतकृत्य कर देती है | '
 प्रार्थना ईश्वर से वार्तालाप करने की सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक प्रणाली है जिसमे किसी मंत्र ,छंद  और कर्मकांड की आवश्यकता नहीं पड़ती |
प्रार्थना पुकार है अस्तित्व के प्रति कि हे ईश्वर !आपका सहारा चाहिये ,प्रत्युतर भी इसी का मिलता है |
 प्रार्थना वह मन:स्थिति है ,जिससे व्यक्ति शंका और संदेह के जाल से निकलकर श्रद्धा की भूमिका में प्रवेश करता है |
             अपने अहं को गलाकर समर्पण की नम्रता स्वीकार करना और मनोविकारों को ठुकरा कर परमेश्वर का आदेश स्वीकार करने का नाम प्रार्थना है | इसमें यह संकल्प भी जुड़ा रहता है कि भावी जीवन परमेश्वर के निर्देश के अनुसार पवित्र और परमार्थी बनकर जिया जायेगा | ऐसी गहन अंत:करण से निकली हुई प्रार्थना ,जिसमे आत्म परिवर्तन की आस्था जुड़ी हो ,भगवान का सिंहासन हिला देती है |
          प्रार्थना के द्वारा हम अपने अहंकार ,पाप ,कषाय -कल्मष एवं दुखों के अंधकार को छिन्न -भिन्न कर सकते हैं | मन को साधने एवं शिक्षित करने की सबसे पहली सीढ़ी प्रार्थना है | अपने किए हुए दुष्कर्मों के लिये पश्चाताप करना और दुबारा किसी तरह के पापकर्म में संलिप्त न होने के लिये संकल्प शक्ति की अभिवृद्धि के लिये ईश्वर से प्रार्थना करना सुधार का प्रथम सोपान है |
 रवींद्रनाथ टैगौर की एक कविता जिसमे उन्होंने यह प्रार्थना की है --हे भगवान !जब हम आपसे मुसीबत से छुटकारा पाने के लिये प्रार्थना करें तो आप इनकार कर देना और हमसे कहना अपनी गलतियों से मुसीबत बुलाई है ,गलती ठीक करो | हे भगवान !जब हम आपसे संपति मांगे तो आप इनकार कर देना और यह कहना कि यदि अपनी कलाइयों और अक्ल का ठीक इस्तेमाल किया होता तो चैन की जिंदगी जी रहे होते | आप हमारी कोई मदद मत करना ,लेकिन यदि आप दया करते हों तो एक वरदान देना ---
     कि जब हम पाप के पंक में गिर रहे हों तो हे ईश्वर !अपनी लंबी भुजाएं फैलाकर हमें रोक लेना ,ऊँचा उठा लेना ,बस और हमें कुछ नहीं चाहिये | 

5 June 2013

Bhakti - Bhavana

'भावना दिशा देती है और श्रद्धा से प्रकाश मिलता है | केवल तर्क का आश्रय लेने वाला तो झाड़ -झंखाड़ों में भटकता है | '
                  भावनात्मक तृप्ति मानव जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है | सब कुछ पाकर भी मनुष्य अतृप्त ही बना रह्ता है | भक्ति ही मनुष्य को तृप्ति प्रदान करती है | आज भावनाओं की सार्थकता खो गई है | आज का सबसे बड़ा दुर्भिक्ष भावनाओं के क्षेत्र का है | इसी के कारण जीवन के प्रत्येक स्तर पर समस्याएं उत्पन्न हुईं हैं |
                     मनोरोग और कुछ नहीं ,मनुष्य की दबी ,कुचली ,रौंदी गई भावनाएं ही हैं | सकारात्मक भावनाओं की प्राप्ति से इन रोगों का निराकरण हो सकता है | इसके लिये भक्ति की आवश्यकता है |
                      भक्ति का अर्थ है --परमात्मा एवं उसके असंख्य रूपों के प्रति प्रेम |
 जिसके ह्रदय में भक्ति की पवित्र ज्योति जलती हो उसे संसार का अँधेरा छू भी नहीं सकता |
भक्ति अमृत रूपा है | जिसमे भक्ति अपनी सम्पूर्णता में खिली ,वह व्यक्तित्व स्वयं में अमृत का निर्झर बन जाता है | असंख्य उसके पावन स्पर्श से नव -जीवन ,दिव्य -जीवन पाते हैं |
सच्चे भक्त की पहचान दीन -दुखियों को उसी परम सत्ता का अंश मानकर ,उनकी सेवा करने से होती है |
'दरिद्र नारायण की सेवा ही भगवान की साधना है |
परमार्थ से ,निष्काम कर्म से भावनाएं परिष्कृत होती हैं और जीवन की आंतरिक नीरसता व खोखलापन दूर होता है |

        रविन्द्रनाथ टैगौर की एक कविता है ----"मैं गया दरवाजे -दरवाजे पर भीख मांगने के लिये |
                                                                     अनाज से भर ली मैंने झोली |
                                                                      एक आया भिखारी ,उसने पसारा हाथ ,
                                                                        हमको भी दे कुछ ,जो तेरे पास है |
                                                                        मैंने बड़ी कंजूसी से ,बड़ी हिम्मत को इकट्ठा किया
                                                                       और एक दाना निकाल करके उस भिखारी की हथेली पर रखा |
                                                                      भिखारी उस दाने को लेकर हँसता -मुस्कराता चला गया |
                                                                      मैं आया अपने घर और घर आकर मैंने देखा ,
                                                                      एक बड़ा सा सोने का दाना उस अनाज के बीच में रखा हुआ था |
                                                                     समझ गया मैं कि ये सोने का दाना कहाँ से आया
                                                                        मैं सिर धुन -धुन कर पछताया कि मैंने अपनी झोली के सारे
                                                                         दाने क्यों न भिखारी के हाथ में दिये ,ताकि मेरी झोली के सारे
                                                                        दाने सोने के होकर आ गये होते |
                                                                       

HONESTY

'आत्म कल्याण के इच्छुक को सदैव अपने परिश्रम और ईमानदारी से कमाया हुआ अन्न ही ग्रहण करना चाहिये '|
             "एक ही रात में इतने ढेर सारे रुपयों की थैली !अरे !यह तो बता -"माँ ने कड़क कर बेटे से पूछा -"यह धन तू कहाँ से लाया ?"
         "  सेंध लगाकर | माँ तू ही तो कहती थी कि मनुष्य को सदैव परिश्रम की कमाई ही खानी चाहिये | |महाजन की सेंध काटने में मुझे कितना परिश्रम करना पड़ा ,तू इस बात को समझ भी नहीं सकती | "
           चपत लगाते हुए माँ ने कहा -"मूर्ख !मैंने इतना ही नहीं कहा कि मनुष्य को परिश्रम का खाना चाहिये ,वरन यह भी कहा था कि वह ईमानदारी से कमाया हुआ भी हो | उठा यह धन ,जिसका है ,उसे लौटा कर आ और अपने गाढ़े पसीने की कमाई का भरोसा कर | "
   माता की इस शिक्षा को शिरोधार्य करने वाला युवक अंतत: महासंत श्रमनक के नाम से विख्यात हुआ |  

4 June 2013

GENEROUS

'भक्ति भावना सही अर्थों में दीन -दुखियों के लिये अंत:से उत्पन्न परमार्थ भावना ही है | ईश्वर इसे ही मान्यता देते हैं |
           हज यात्रा पूरी करके एक दिन अब्दुल्ला बिन मुबारक कावा में सोए हुए थे | सपने में उन्होंने दो फरिश्तों को आपस में बातें करते देखा | एक ने दूसरे से पूछा -"इस वर्ष हज के लिये कितने आदमी आये और उनमे से कितनों की दुआ कबूल हुई ?'जवाब में दूसरे फरिश्ते ने कहा -"यों हज करने को 40 लाख आये थे ,पर इनमे से किसी की दुआ कबूल नहीं हुई है | इस वर्ष दुआ सिर्फ एक की कबूल हुई है और वह भी ऐसा है ,जो यहां नहीं आया | " पहले फरिश्ते को बहुत अचंभा हुआ ,उसने पूछा -"भला वह कौन खुशनसीब है ,जो यहां आया भी नहीं और उसकी हज कबूल हो गई ?"
     दूसरे फरिश्ते ने बताया -"वह है दमिश्क का मोची -अली बिन मूफिक | "
उस पाक हस्ती को देखने के लिये अब्दुल्ला बिन मुबारक अगले ही दिन दमिश्क के लिये चल पड़े और वहां उन्होंने मोची मूफिक का घर ढूंढ निकाला | और उनसे पूछा -"क्या तुम हज को गये थे ?"
मूफिक की आँखों में आँसू भर आये और सिर हिलाते हुए कहा -"मेरा भाग्य ऐसा कहाँ ,जो हज को जा पाता | जिंदगी भर की मेहनत से 700 दिरम उस यात्रा के लिये जमा किये थे ,पर एक दिन मैंने देखा कि पड़ोस के गरीब लोग पेट की ज्वाला बुझाने के लिये उन चीजों को खा रहे थे ,जिन्हें खाया नहीं जा सकता | उनकी बेबसी ने मेरा दिल हिला दिया और हज के लिये जो रकम जमा की थी ,सो उन गरीबों को बाँट दी | "
  दीन -दुखियों की सहायता ही सच्ची तीर्थ यात्रा है |

'मानव ह्रदय से बढ़ कर कोई तीर्थ नहीं | भगवान इसी में बसते हैं और वहां तक पहुँचने वाले को दर्शन दिये बिना नहीं लौटने देते | '