एक गुरु के दो शिष्य थे l दोनों किसान थे l भगवान का भजन भी दोनों करते थे l किन्तु एक बड़ा सुखी था , दूसरा बड़ा दुःखी था l गुरु की मृत्यु पहले हुई , उनके बाद दोनों शिष्यों की भी मृत्यु हो गई l संयोग से स्वर्गलोक में भी तीनों एक ही स्थान पर आ मिले l पर यहाँ भी स्थिति पहले जैसी थी l जो पृथ्वी पर सुखी था , वह यहाँ भी प्रसन्नता का अनुभव कर रहा था और जो पृथ्वी पर अशांत रहता था , वह यहाँ भी अशांत दिखाई दिया l दुःखी शिष्य ने गुरुदेव से पूछा --- " भगवन ! लोग कहते हैं कि ईश्वर भक्ति से स्वर्ग में सुख मिलता है , पर हम तो यहाँ भी दुःखी के दुःखी रहे l " गुरु ने गंभीर होकर उत्तर दिया ---- " वत्स ! भक्ति से स्वर्ग तो मिल सकता है , पर सुख और दुःख मन की देन है l मन शुद्ध है तो नरक में भी सुख है और मन शुद्ध नहीं है तो स्वर्ग में भी कोई सुख नहीं है l
11 March 2025
10 March 2025
WISDOM ------
इस संसार में मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतंत्र है , ईश्वर इसमें हस्तक्षेप नहीं करते l व्यक्ति अच्छा या बुरा जो भी कर्म करता है , उसके अनुरूप ही उसका फल उसे मिलता है l ईश्वर स्वयं इस कर्मफल से नहीं बचे हैं l जब महाभारत के महायुद्ध में सात महारथियों ने मिलकर अभिमन्यु को मारा था , तब अभिमन्यु की माँ सुभद्रा जो श्रीकृष्ण की सगी बहन थीं , उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा --- तुम्हे तो लोग भगवान कहते हैं , तुम मेरे ही पुत्र , अपने भानजे अभिमन्यु की रक्षा न कर सके ! " तब श्रीकृष्ण ने कहा --- 'यह संसार कर्मफल के आधीन है l हमारा वर्तमान जीवन कई जन्मों की यात्रा है l मनुष्य जो भी कर्म करता है उसका फल उसे कब , कैसे और किस जन्म में किस प्रकार मिलेगा , यह काल निश्चित करेगा l त्रेतायुग में मैंने बाली को छुपकर मारा था , वह बाण मेरे लिए भी रखा है l ' जब भगवान श्रीकृष्ण पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे तब व्याध का बाण लगने से उनकी मृत्यु हुई l कभी -कभी ऐसा भी होता है कि वर्तमान जन्म में हम जो कर्म करते हैं , उनका फल भी इसी जन्म में मिल जाता है l किसी की मदद करने से पहले भगवान भी देखते हैं कि उसके खाते में ऐसा कोई पुण्य है भी या नहीं , तभी प्रार्थना सुनते हैं l जब दु:शासन द्रोपदी का चीरहरण करने को तैयार था और द्रोपदी 'हे !कृष्ण ! कहकर भगवान को पुकार रही थी तब भगवान ने अपने अनुचरों से कहा --- द्रोपदी हमें पुकार रही है , देखो उसके खाते में ऐसा कोई पुण्य है कि उसकी मदद की जाए ? अनुचरों ने सब बहीखाते देखे और कहा --- हां भगवान ! जब आपने शिशुपाल को सुदर्शन चक्र से मारा था , तब आपकी अंगुली थोड़ी सी कट गई थी , उसमें खून बहने लगा था l तब आपकी महारानियाँ देखती रहीं , उन्हें समझ नहीं आया की क्या करें ? तब द्रोपदी ने अपनी कीमती साड़ी फाड़कर आपकी अंगुली में बाँधी थी l यह सुनते ही भगवान ने वस्त्रवातर धारण कर लिया l दु:शासन का दस हजार हाथियों का बल हार गया , सारी सभा साड़ियों के ढेर से भर गई , द्रोपदी का बाल बांका भी नहीं हुआ , ईश्वर ने उसकी लाज रखी l l इसी तरह पाप कर्मों का फल भी कभी इसी जन्म में मिल सकता है ,कभी किसी दूसरे जन्म में l कर्म की गति बड़ी न्यारी है , सामान्य व्यक्ति की समझ से परे है l इसलिए कहते हैं सत्कर्मों की पूंजी जोड़ते रहो l कौनसा पुण्य हमें कब किसी मुसीबत से बचा ले , ईश्वर की कृपा मिल जाए l
9 March 2025
WISDOM ------
महाभारत के विभिन्न प्रसंग हमें, जीवन जीने की कला सिखाते हैं ---- ऋषि कहते हैं यदि मनुष्य में विवेक और वैराग्य हो तो वह अनेक समस्याओं से मुसीबतों से बचकर सुरक्षित बाहर निकल सकता है l युधिष्ठिर धर्मराज थे , उनके भीतर विवेक था , क्या सही है और क्या गलत है , इसे वह अच्छी तरह जानते थे l वे जानते थे कि जुआ खेलना उचित नहीं है l जुआ खेलने के दुष्परिणाम वे अच्छी तरह जानते थे लेकिन फिर भी जब दुर्योधन ने उन्हें जुआ खेलने को आमंत्रित किया , तब उन्होंने इस आमंत्रण को सहज स्वीकार कर लिया l हारे हुए जुआरी के पीछे ऐसा दुर्भाग्य पड़ जाता है कि पांचों पांडवों को द्रोपदी सहित चौदह वर्ष वनवास भोगना पड़ा , राजा विराट के यहाँ वेश बदलकर नौकर की तरह रहना पड़ा l इसी तरह यदि हमारे मन में वैराग्य का भाव नहीं है अर्थात हम किसी के भी लालच में आ जाते हैं तो उसका दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है l जैसे कर्ण को सूतपुत्र होने के कारण अपमानित और उपेक्षित होना पड़ता था l उसकी वीरता को भी उचित सम्मान नहीं मिला l दुर्योधन कूटनीतिज्ञ था l वह समझ गया था कि कर्ण जैसा वीर उसके पक्ष में होगा तो उसके आगे की राह आसान हो जाएगी l उसने कर्ण को अंगदेश का राजा बनाने का और यथोचित सम्मान दिए जाने का लालच दिया l कर्ण जानता था कि दुर्योधन अत्याचारी , अन्यायी है लेकिन फिर भी उसने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया l कहते हैं यदि कर्ण दुर्योधन के साथ न होता तो शायद दुर्योधन महाभारत के महायुद्ध को करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता l कर्ण ने विवेक और वैराग्य से काम नहीं लिया l अत्याचारी का साथ देने का जो परिणाम होता है वही उसका हुआ l
7 March 2025
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' ज्ञान -चक्षुओं के अभाव में हम परमात्मा के अपार दान को देख और समझ नहीं पाते और सदा यही कहते रहते हैं कि हमारे पास कुछ नहीं है , हमें कुछ नहीं मिला l लेकिन यदि हमें जो नहीं मिला उसकी शिकायत करना छोड़कर , जो मिला है उसकी महत्ता को समझें तो मालूम होगा कि जो कुछ मिला है , वह कम नहीं , अद्भुत है l जो परमात्मा अनेक सुख देता है , यदि वह थोड़े से दुःख देता है , तो उन्हें भी प्रसन्नता पूर्वक सहन करना चाहिए l " -------- हकीम लुकमान जब एक अमीर आदमी के दास थे l वह अमीर कभी -कभी ईश्वर को भला बुरा कह देता था , लेकिन वह लुकमान की कर्तव्य परायणता के लिए उनसे स्नेह करता था l लुकमान बहुत नेक , आज्ञाकारी थे l एक दिन अमीर ने ककड़ी खानी चाही , लेकिन जैसे ही उसे मुख से लगाईं , वह उन्हें कड़वी लगी l उन्होंने उसे तुरंत लुकमान को दे दी और कहा ---- 'ले , तू इसे खा ले l हकीम लुकमान ने ककड़ी ले ली और बिना कुछ कहे उसे चुपचाप खा लिया , जैसे वह कोई मीठी ककड़ी हो l l अमीर को बड़ा आश्चर्य हुआ , उसने लुकमान से पूछा ---- " लुकमान , तुमने इतनी कड़वी ककड़ी किस तरह खा ली ? " लुकमान ने कहा --- " स्वामी आ! आप मुझे प्रतिदिन स्वादिष्ट भोजन देते हो , एक दिन कड़वा दिया तो क्या उसे फेंक दूँ या उसके लिए आपको दोष दूँ l अपने प्यारे लोगों की चार मिठास में एक कड़वाहट भी हो , तो क्या उसके लिए उसे दोषी ठहराना चाहिए l " अमीर समझ गया कि परमात्मा ने हमें अनेक सुख दिए हैं l यदि कोई दुःख जीवन में आया भी है तो उसके लिए परमात्मा को भला -बुरा नहीं कहना चाहिए l
6 March 2025
WISDOM ------
लघु -कथा --- एक ही रात में इतने सारे रुपयों की थैली देखकर माँ ने कड़ककर बेटे से पूछा ---- " यह धन तू कहाँ से लाया ? " बेटे ने कहा --- " सेंध काटकर ! माँ तू ही तो कहती थी कि मनुष्य को सदैव परिश्रम की कमाई ही खानी चाहिए l माँ , महाजन की सेंध काटने में मुझे कितना परिश्रम करना पड़ा , तू इस बात को समझ भी नहीं सकती l " चपत लगाते हुए माँ ने कहा --- " मूर्ख ! मैंने इतना ही नहीं कहा कि मनुष्य को परिश्रम का खाना चाहिए वरन यह भी कहा था कि वह ईमानदारी से कमाया हुआ भी हो l उठा यह धन , जिसका है उसे लौटकर आ और अपने गाढ़े पसीने की कमाई का भरोसा कर l " माता की इस शिक्षा को शिरोधार्य करने वाला चोर युवक अंततः महा संत श्रमनक के नाम से विख्यात हुआ l न्यायपूर्ण जीविकोपार्जन का अर्थ है परिश्रम और ईमानदारी से कमाया गया धन l
4 March 2025
WISDOM ------
मनुष्य की मूल प्रवृत्तियां --काम , क्रोध , लोभ , मोह , अहंकार --यह सब अति प्राचीन काल से ही मनुष्य में हैं l सतयुग में इसका प्रतिशत कम था लेकिन कलियुग में यह अपने चरम पर है l कलियुग में इन दुष्प्रवृत्तियों के साथ छल , कपट , धोखा , तिकड़म , दुष्प्रचार जैसे कायरतापूर्ण कार्य भी अत्यधिक होते हैं l रावण स्वयं को राक्षसराज रावण कहता था , लेकिन उसने अपने सगे -सम्बन्धियों के साथ धोखा , छल नहीं किया l रावण चाहता तो विभीषण को लालच दे सकता था कि तुम राम को छोड़कर वापस आ जाओ , तुम्हे आधा राज्य दे देंगे l विभीषण उसकी बातों में आकर वापस लौट जाता तो वह उसे मरवा देता l लेकिन रावण ने ऐसा नहीं किया , वो कायर नहीं था , वीर था l वेद -शास्त्रों का ज्ञाता और महापंडित था l इस कलियुग का सबसे बड़ा दोष यही है कि अब मनुष्य विश्वास के काबिल नहीं है l भाई -भाई के संपत्ति के झगड़े के मुक़दमे से अदालतें भरी हैं l धोखे से किसी को भी मारने की घटनाएँ सामान्य हैं l रिश्तों के नाम पर परस्पर स्नेह नहीं है , शोषण है l यह एक कटु सत्य है कि बड़े -बड़े अपराधियों की शुरुआत परिवार में ही छोटे -छोटे अपराधों को करने से होती है l ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि लालच , कामना , वासना अपने चरम शिखर पर है और ये दुर्गुण मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट कर देते हैं l उसे मौके की तलाश होती है और ऐसा मौका उसे परिवार में , मित्रों और निकट सम्बन्धियों में आसानी से मिल जाता है l यहीं से उसके अपराधिक जीवन की शुरुआत हो जाती है l जागरूकता बहुत जरुरी है l मनुष्य या तो स्वयं को सुधारने का प्रयास करे , अन्यथा ये दुर्गुण व्यक्ति को मानसिक रूप से विकृत कर देते हैं l फिर ये सम्पूर्ण समाज के लिए खतरा होते हैं l
3 March 2025
WISDOM -----
कर्मफल के सिद्धांत को माने या न माने , यह व्यक्ति की अपनी इच्छा है l लेकिन यह निश्चित है कि मनुष्य का जीवन प्रकृति के अनुसार ही चलता है l जैसे हर रात के बाद दिन होता है , फिर दिन के बाद रात l यह क्रम निरंतर चलता ही रहता है l इसी तरह मनुष्य के जीवन में कभी दुःख और कष्ट की अँधेरी रात होती है और कभी सुख का सुनहरा सूर्योदय होता है l कभी पतझड़ तो कभी वसंत l प्रकृति के इस नियम को स्वीकार करने पर ही व्यक्ति तनाव रहित जीवन जी सकता है l शांति का जीवन जीने के लिए उस अद्रश्य शक्ति पर गहरी आस्था होनी चाहिए l आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि मनुष्य स्वयं को भगवान समझने लगा है , फिर आस्था और विश्वास किस पर करें ?