पुराण में अनेक कथाएं हैं l इन कथाओं में प्रत्येक युग की परिस्थितियों के अनुरूप मार्गदर्शन है l इस कलियुग में वर्तमान में संसार में युवा वर्ग में बहुत असंतोष है l इस असंतोष का कारण और उसका समाधान समझने के लिए हमें भक्त प्रह्लाद की कथा को समझना होगा l ----प्रह्लाद के पिता थे हिरण्यकश्यप l वे स्वयं को भगवान समझते थे और उनका सख्त आदेश था कि सम्पूर्ण प्रजा उन्हें ईश्वर मानकर उनकी पूजा करे l अपने इस आदेश को वे अपने पुत्र प्रह्लाद पर भी सख्ती से लागू करना चाहते थे l लेकिन प्रह्लाद का कहना था कि आप मेरे पिता हैं ,मैं आपका सम्मान करता हूँ लेकिन मैं आपको ईश्वर नहीं मान सकता l हिरण्यकश्यप का अहंकार बोल उठा --मेरे आदेश को कैसे नहीं मानोगे ? उसके पास जितने भी साधन थे , जितना भी बल था , उससे उसने प्रह्लाद को सताना शुरू कर दिया , प्रह्लाद को मारने का हर संभव प्रयास किया l लेकिन अंत में जीत किसकी हुई ? प्रह्लाद की l हिरण्यकश्यप को नृसिंह भगवान ने उसका पेट फाड़कर मार डाला l इस कथा में यही संकेत छिपा हुआ है कि आज जो पिता तुल्य आयु के लोग हैं , उनका अहंकार उनके सिर पर चढ़ गया है l इस आयु वर्ग के लोग परिवार में हैं , संस्था में , विभिन्न सरकारों में , जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हैं l समस्या इसीलिए है कि नई पीढ़ी की भावनाओं को समझने वाला , उनकी समस्या को सुनने वाला कोई नहीं है l कहीं कोई समाज में अपने स्टेटस के लिए , अपनी अधूरी इच्छा को पूरा करने के लिए युवा वर्ग पर अपना नियंत्रण करना चाहते हैं , कहीं कोई अपने स्वार्थ के लिए इनकी ऊर्जा का उपयोग करते हैं l उनके जीवन को सही दिशा देने वाला कोई नहीं है l प्रौढ़ और वृद्ध होते लोगों को अपनी सोच को बदलना होगा l सही अर्थों में संवेदनशील होंगे , युवाओं के मन को समझेंगे तभी संसार में शान्ति होगी अन्यथा धरती पर संतुलन लाने के लिए कब नृसिंह भगवान आ जाएँ हिरण्यकश्यप का अंत करने के लिए कोई नहीं जानता l
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