16 June 2013

RITUALS

'फूल को किसी भी नाम से पुकारने पर उसकी सुगंध में अंतर नहीं पड़ता | भगवान को किसी भी नाम से पुकारो इससे फर्क क्या पड़ता है | '
                                        "आप माला के दाने बाहर की ओर फेरते हैं और हम अंदर की ओर | बताइये इन दोनों में से कौन सा तरीका श्रेष्ठ है ?"पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह जी ने सिख साम्राज्य के विदेश मंत्री फकीर अजीजुद्दीन से पूछा | फकीर ने बड़ी बुद्धिमत्तापूर्वक इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में दिया --
"महाराज !मुसलमान माला के दाने बाहर की ओर फेरकर दोष निकालने का प्रयास करते हैं ,जबकि हिंदु अंदर की ओर फेरकर गुण ग्रहण करने का यत्न करते हैं | "उनके उत्तर से प्रसन्न होकर महाराज ने उनकी प्रशंसा भरे दरबार में की |



15 June 2013

ART IS TRUTH, AND TRUTH IS RELIGION

महात्मा भगवान दीन की सभा में यदि कभी लोग ताली बजा देते तो वे बड़े उदास हो जाते | सोचते कहीं कोई असत्य बात मुँह से निकल गई ?एक बार वे 'सत्य 'पर ही बोल रहे थे | लोगों ने तालियाँ बजाई | वे थोड़ी देर रुके ,चारों ओर देखा पुन:बोलने लगे | थोड़ी देर बाद लोगों ने फिर तालियाँ बजाई | वे फिर रुके और बोले -"मेरे द्वारा सत्य के विषय में कही जा रही बातों से आप सब सहमत होकर ही ताली बजा रहें ?भीड़ एक स्वर में चिल्लाई --हाँ | उन्होंने दूसरा प्रश्न किया -"तब वे लोग हाथ ऊपर उठायें जो सत्य आचरण भी करते हैं | "अब सब लोग एक दूसरे का मुँह देखने लगे | महात्मा बोले -"ताली बजाने से पूर्व यह बात सोचनी चाहिये थी कि सत्य बोलना और सुनना ही पर्याप्त नहीं है ,आचरण में भी उतारा जाना चाहिये | "


AMAZEMENT

युगों पहले यक्ष ने युधिष्ठिर से यह सवाल पूछा था कि -'सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?'धर्म का मर्म जानने वाले युधिष्ठिर ने इस सवाल के उत्तर में यक्ष से कहा था -"हजारों लोगों को रोज मरते हुए देखकर भी अपनी मौत से अनजान बने रहना ,खुद को मौत से मुक्त मान लेना ,जीते रहने की लालसा में अनेको दुष्कर्म करते रहना ही सबसे बड़ा आश्चर्य है | "
अनेकों शव यात्राएँ रोज निकलती हैं ,ढेरों लोग इनमे शामिल भी होते हैं | इसके बावजूद भी वे अपनी शव यात्रा की कल्पना नहीं कर पाते | काश !अपनी मौत के कदमों की आहट सुनी जा सके तो निश्चित ही जीवन द्रष्टि संसार से हटकर सत्य पर केन्द्रित हो सकती है |

          दार्शनिक च्वान्गत्से को रात्रि के समय कब्रिस्तान से होकर गुजरते समय पैर में ठोकर लगी ,टटोल कर देखा तो किसी मुर्दे की खोपड़ी थी | उठाकर उनने उसे झोली में रख लिया और सदा साथ रखने लगे | शिष्य ने उनसे पूछा -यह इतना गंदा और कुरूप है ,इसे आप साथ क्यों रखते हो ?च्वान्गत्से ने उत्तर दिया -"यह मेरे दिमाग का तनाव दूर करने की अच्छी दवा है | जब अहंकार का आवेश चढ़ता है ,लालच सताता है ,तो इस खोपड़ी को गौर से देखता हूँ | कल परसों अपनी भी ऐसी ही दुर्गति होगी तो अहंकार और लालच किसका किया जाये ?"

13 June 2013

MORAL WISDOM

अपने विचारों पर पैनी नजर रखिये क्योंकि वे कुछ ही दिनों में शब्द बनकर मुखर होने लगेंगे |
अपने शब्दों पर और भी तीखी नजर रखिये क्योंकि वे धीरे -धीरे कर्म बन कर प्रकट होते हैं |
अपने कर्मों का परीक्षण करते रहिये क्योंकि वे फिर आदत बन कर ही रहेंगे |
अपनी आदतों को भुलावे में मत डालिये क्योंकि वे चरित्र बने बिना नहीं रह सकतीं |
अपने चरित्र पर द्रष्टि रखें क्योंकि वही आपके भविष्य का जन्म दाता है | 

11 June 2013

PEARL

'निज अस्तित्व की चिंता छोड़कर समाज के कल्याण के लिये जो अग्रसर होते हैं ,वे बन जाते हैं -जन -मानस के मोती | '
          विनोबा भावे अपनी भूदान यात्रा के दौरान दक्षिण भारत में पेनुगोड़ें कुट्टी से मिले | वे अपने गुणों के कारण दक्षिण के विनोबा के नाम से प्रख्यात हुए | हमेशा दूसरों की सेवा के लिये तत्पर कुट्टी जी के दोनों हाथ पक्षाघात के आक्रमण के कारण खराब हो गये | लोगों ने उनसे सहानुभूति दरसाई | वे बोले -"जहाँ भावनाओं से परिपूर्ण ह्रदय ,सक्रिय सतेज मस्तिष्क हो ,सुद्रढ़ -भार उठाने वाले पैर हों ,वहां क्या कठिनाई है !"
लोगों ने पूछा कि इनसे कैसे सहायता करेंगे ?उनने कहा -"जितनी आवश्यकता आज मनुष्यों को मानसिक सहायता की है ,उतनी और किसी की नहीं | "उनने पद यात्रा आरंभ की | पूरा कर्नाटक ,तमिलनाडु उनने दस वर्षों में पैदल घूम डाला | तमाम तरह की समस्याओं को वे हँसते हुए सुलझा देते | निरंतर सत्साहित्य का वे स्वाध्याय करते | सभी के चिंतन में विधेयात्मकता का समावेश करते | लोगों को लोगों के द्वारा ही आर्थिक सहायता करवा देते ,विद्दालयों के लिये धन एकत्र करा देते | विनोबा ने कुट्टी जी को चलता फिरता विश्वविद्दालय कहा था | 

FRIEND

'सच्चा मित्र हीरे के समान बहुमूल्य है ,भले ही वह संख्या में कम हों | झूठे मित्र तो सड़े पत्तों की तरह दुर्गंध फैलाते और जगह घेरते हैं ,भले ही वे संख्या में बहुत हैं | "
       एक भला खरगोश था | सभी पशुओं की सहायता करता और मीठा बोलता था | जंगल के सभी जानवर उसके मित्र हो गये | एक बार खरगोश बीमार पड़ा | उसने आड़े समय के लिये कुछ चारा दाना अपनी झाड़ी में जमा कर रखा था | सहानुभूति प्रदर्शन के लिये जिसने सुना ,वही दौड़ा आया और आते ही संचित चारे दाने में मुँह मारना शुरू किया | एक ही दिन में उस सबका सफाया हो गया | खरगोश अच्छा तो हो गया ,पर कमजोरी में चारा ढूंढने न जा सका और भूख से मर गया |
       उथली मित्रता और कुपात्रों की सहानुभूति सदा हानिकारक ही सिद्ध होती है | दुर्घटना का समाचार सुनकर दौड़े आने वाले सहानुभूति प्रदर्शनकर्ता प्राय:यही करते हैं |  

POWER

'पशु द्वन्द युद्ध से अपनी बलिष्ठता सिद्ध करते हैं और मनुष्य साहस और विवेक के आधार पर | '
 इस संसार में कुल तीन शक्तियां हैं जिन पर हमारा सारा जीवन व्यापर चल रहा है |
1. पहली शक्ति है -श्रम -इससे हमें धन और यश मिलता है | जितनी भी सफलताओं का इतिहास है ,वह मनुष्य के श्रम की उपलब्धियों का इतिहास है |
2. दूसरी शक्ति है -ज्ञान की ,विचार करने की शक्ति | हमें जो भीप्रसन्नता मिलती इसी ज्ञान की शक्ति से मिलती है | जब हमारा मस्तिष्क संतुलित होता है तो हर परिस्थिति में हमें चारों ओर प्रसन्न्ता ही प्रसन्नता दिखाई देती | जीवन का आनंद सदैव भीतर से आताहै | यदि हमारे सोचने का तरीका सही हो तो बाहर जो भी क्रिया कलाप चल रहे हैं ,उन सभी में हमको ख़ुशी ही ख़ुशी बिखरी दिखाई पड़ेगी | दाराशिकोह मस्ती में डूबते चले गये | जेबुनिस्सा ने पूछा -"अब्बा जान !आपको क्या हुआ आज | आप तो पहले कभी शराब नहीं पीते थे ,फिर यह मस्ती कैसी "?वे बोले आज मैं हिन्दुओं के उपनिषद पढ़कर आया हूँ ,जमीन पर पैर नहीं पड़ रहे हैं | जीवन का असली आनंद उनमे भरा पड़ा है |
3. तीसरी शक्ति है -रूहानी -आदमी का व्यक्तित्व |आदमी की कीमत है उसका व्यक्तित्व ,ऐसे व्यक्ति दुनियां की फिजां को बदलते हैं ,देवताओंको अनुदान बरसाने के  लिये मजबूर करते हैं | व्यक्तित्व श्रद्धा से बनता है | श्रद्धा अर्थात  सिद्धांतों व आदर्शों के प्रति अटूट व अगाध विश्वास | व्यक्तित्व ऐसा वजनदार बन जाता है कि देवता तक नियंत्रण में आ जाते हैं |