1 May 2020

WISDOM -----

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  लिखा  है ---- '  धन  का  संचय  तो  कितनी  ही  बड़ी  मात्रा  में   बिना  उचित - अनुचित  का  विचार  किए  हुए  किया  जा  सकता  है  ,  पर  उसके  उपयोग  के  लिए  एक  सीमा  निर्धारित  है  l   कोई  अमीर  भी    एक  मन  भोजन  नहीं  कर  सकता  ,  सौ   फुट  लम्बे  पलंग  पर  सोने   और  उतना  ही  बड़ा  बिस्तर  बिछाते   किन्ही  धनिकों  को  भी  नहीं  देखा  जा  सकता   l   अधिक  उपार्जन  और  अधिक  संग्रह   मन  बहलाने  भर  का  है   l  अंतत:  वह  इसी  धरती  पर  पड़ा  रह  जाता  है   l   जिस  पर  वह  अनादि  काल  से  पड़ा  हुआ  है   और  अनंत  काल  तक  पड़ा  रहेगा   l  सम्पदा  का  इस  हाथ  से  उस  हाथ  हस्तांतरण   तो  हो  सकता  है  ,  पर  इससे  शरीर  निर्वाह  में   काम  आने  वाले   साधनों  को  छोड़कर   शेष  को  इसी  दुनिया  की   सुरक्षित  पूंजी  के  रूप  में  जहाँ  का  तहाँ   छोड़ना  पड़ता  है   l  यह  तथ्य  सामान्य  समय  में  समझ  में  नहीं  आता  l   बादशाह  सिकन्दर   ने   मरते  समय   अपने  दोनों  हाथ  ताबूत  से  बाहर   निकाल  दिए  थे  कि  अपार  धन  सम्पदा   का  स्वामी  होते  हुए  भी   बिना  एक  पाई  साथ  लिए   खाली  हाथ  चला  गया   l
 आचार्य श्री  लिखते  हैं  --- जीवन  सम्पदा  महत्वपूर्ण  कार्यों  के  लिए  धरोहर   के  रूप  में  मिली  है  l  उसे  उन्ही  प्रयोजनों  में  खर्च  किया  जाना  चाहिए  , जिसके  निमित  ईश्वर  ने   सौंपा  है  l   यदि  अत्यधिक  धन - संपदा   है   तो  उसका  उपयोग  परमार्थ  प्रयोजन  में ,   पिछड़े  को  बढ़ाने  और  गिरे  हुओं  को   उठाने  में   करना  चाहिए  l   तभी  उस  धन  की  सार्थकता  है  l    दुरूपयोग  की  नीति   अपनाने  पर  तो  अमृत  भी  विष  बन  जाता  है   l 

30 April 2020

WISDOM ------

  कहते  हैं  जो     व्यक्ति   अनीति    और  अधर्म  की  राह  पर  चलता  है     ,  समाज  को  उत्पीड़ित   करता  है    , वह  अंदर  से  बहुत  कमजोर  होता  है  l   बाहर  से  वह  कितना  ही  ताकतवर  हो  ,  लेकिन  उसकी  आत्मा  उसे  सदा  कचोटती  रहती  है   इसलिए  उसका  मनोबल  गिरा  हुआ  होता  है  l   ऐसे  में    यदि    सन्मार्ग  पर  चलने  वाले  लोग  संगठित  होकर  उसका  विरोध  करें   तो  उसे  पस्त   होते  देर  न  लगेगी   l
               ऐसा  ही  एक  उदाहरण   रावण  का  है   ,   अनीति  और  अधर्म  की  राह  पर  चलने  के  कारण  उसका  मनोबल  बहुत  कमजोर  हो  गया  था   l   इतना  विद्वान् , शक्तिशाली ,  लंकापति  रावण  जब  सीताजी  का   हरण  करने  चला    तो    उसने     भिखारी    का  रूप  बना  लिया ,  उसकी  दशा  बहुत  दयनीय  थी   l   भिखारी  का  वेश  धरने  पर  इधर - उधर  देख  रहा  था   कि   कहीं  कोई  उसे  देख  न  ले   l    गलत  राह  पर  चलने  वाले  व्यक्ति  का  तेज , बल  , बुद्धि  -- सारे  सद्गुण     नष्ट  हो  जाते  हैं  l 

29 April 2020

WISDOM ------- स्वाभिमान जरुरी है l

    अहंकार  के  वशीभूत  होकर   जिसने  भी  स्वयं  को   भगवान   मानने   का  प्रयास  किया  उसका  अंत   होता  है   l   अहंकारी  अपनी  महत्वाकांक्षा  हेतु  अनीति  और  अधर्म  का  सहारा  लेता  है   l   प्राचीन  से  लेकर  आधुनिक  समय  तक    चाहे    रावण  हों ,  हिरण्यकश्यप  हों  ,, अथवा  सिकंदर , हिटलर , मुसोलिनी   कोई  भी  हों  ,  इन  सब  को  अपनी  शक्ति  का  बहुत  अहंकार  था   जिसका  उन्होंने  दुरूपयोग  किया  ,  उनका  अंत  हुआ  l
   अहंकार  का  सबसे  बड़ा  कारण  है --- धन  और  शक्ति    का  प्राप्त  होना  l   जिसके  पास  ये  दोनों  है  वह  सबसे  बड़ा  अहंकारी  हो  जाता  है  ,  फिर  अपनी  शक्ति  को  निरंतर  बढ़ाते  हुए   वह   पूरे   संसार  को  अपनी  मर्जी  से  चलाना   चाहता  है  l   जो  उसके  इस  अहंकार  के  आगे  सिर   न  झुकाए    ,  उसे  वह  बर्दाश्त  नहीं  करता  है  l
  रामचरितमानस  में    विभीषण  का  चरित्र   आज  के  युग  में  हमें   स्वाभिमान  से  जीने  की  प्रेरणा  देता  है   l   विभीषण  ने    रावण  के  अहंकार  के  आगे  अपना  सिर   नहीं  झुकाया  l   विभीषण  जानता   था  कि   रावण  ने  अनीति  और  अधर्म    से   सोने  की  लंका  खड़ी  की  है   और  अपनी  शक्ति  के  बल  पर  वह  राक्षसों  को   ,  अपने  एजेंटों  को  भेजकर  ऋषियों  पर  और  निर्दोष  जनता  पर  अत्याचार  करता  है  l   अत्याचार  की  अति  तो  तब  हो  गई  जब  उसने  नारी  पर  अत्याचार  किया  ,  माँ  सीता  का  अपहरण  किया  l   विभीषण  ने  यही  कहा  कि   ---'- इस  अधर्म  के  मार्ग  को  छोड़ो ,  यदि   अनीति  , अत्याचार   की  नीति   को  नहीं  छोड़ना  है   तो  तुम्हारी  लंका  तुम्हे  मुबारक  l   हम  वनवासी  राम  के  साथ  कष्ट  सहकर  रह  लेंगे   l '
विभीषण  ने  रावण  का  सारा  वैभव    छोड़  दिया  ,  सारे  सुखों  को  तिलांजलि  देकर   वह   वनवासी  राम  के  पास  आ  गया  l   सत्य  और  धर्म  के  साथ  चलकर  थोड़ा - बहुत  कष्ट  भी  हो  तो  वह  स्वीकार  है  l
     आज  संसार  में   चारों   ओर    धन  का  बोलबाला  है  l     अहंकार  उनका  दुर्गुण  है ,  लेकिन  हम  अपनी  जरूरतों  के  लिए  उनके  आगे   सिर   झुककर   उनके  अहंकार  को  पोषित  करते  हैं  ,  इसलिए  उनका  अहंकार  बढ़ता  जाता  है  l
व्यक्ति  हो  या  कोई  देश    यदि  अपने  साधनों  में  संतुष्ट  रहे   ,  जो  कुछ  अपने  पास  है   उसी  का  सर्वोत्तम  उपयोग  कर  के  अपनी  तरक्की  का  प्रयास  करे     तो  सुख - शांति  से  जीवन  जी  सकता  है   और  अहंकारियों  द्वारा  किए   जाने  वाले  उत्पात  से  भी  बच  सकता  है  l 

WISDOM ------

  प्राचीन  काल  में   जो  राजा  बहुत  वीर , शक्तिशाली  और  प्रजापालक  होते  थे   ,  वे  संसार  के  विभिन्न  राजाओं  को  अपने  आधीन  कर  ' चक्रवर्ती  सम्राट '  कहलाते  थे  l   विभिन्न  देशों  व  क्षेत्रों  में    वहां  के  कार्य  संचालन   के  लिए  राजा  तो  होते  थे    लेकिन  वे ' चक्रवर्ती   सम्राट '  के  ध्वज  तले   ही  काम  करते  थे  ,  उन्ही  के  आदेशानुसार  ,  उन्ही  की  नीतियों  के  अनुसार  राज - काज  होता  था  l   ये  सम्राट  प्रजापालक  थे  ,  इनका  उद्देश्य  संसार  में  सुख - शांति  स्थापित  करना   और  कला , साहित्य  आदि  हर  क्षेत्र  में  विकास  करना  था  l  ऐसे  प्रजापालक  सम्राटों  का  युग  इतिहास   में  ' स्वर्ण  युग ' कहलाता  है   l
                धीरे - धीरे  वक्त  बदला  ,   धन - सम्पदा   को  बहुत  अधिक  महत्व   दिया  जाने  लगा   l   फिर    शासन  व्यवस्था  चाहे  जो  हो  ,  जिसके  पास  भी  शक्ति  हो  ,  जनता  का  शोषण  कर  धन  संग्रह  करना   जीवन  का  प्रमुख  लक्ष्य  हो  गया  l ' चक्रवर्ती  सम्राट'  के  भी    मायने  बदल  गए  l   अब  वीरता  और  प्रशासनिक  कुशलता  और  प्रजापालक    की  जरुरत  नहीं  रह  गई    l   जिसके  पास  धन  है ,  पूंजी  है  वह  व्यक्ति  हो  या  संगठन    संसार  को  अपने   हिसाब  से  चला  सकता  है   l  वही  चक्रवर्ती  सम्राट  है  l   तुलसीदास जी  ने  कहा  भी  है  ----'  समरथ    को  नहि   दोष    गुसाईं  l  '

28 April 2020

WISDOM -----

 हमारे  महाकाव्य   हमें  जीवन  जीना   सिखाते  हैं   l  ईश्वर  ने  धरती  पर  जन्म  लेकर  अपने  कार्यों  से ,  आचरण  से  संसार  को  शिक्षण  दिया  l  एक  ही  शिक्षण  को  आसुरी  प्रवृति  के  लोग  अपने  स्वार्थ  के  लिए  इस्तेमाल  करते  हैं  ,  लेकिन  सन्मार्ग  पर  चलने  वाले   उसी  शिक्षण  से  अपनी  रक्षा  करते  हुए  जीवन - पथ  पर  आगे  बढ़ते  हैं  l   एक  प्रसंग  है  ----
  महाभारत  के  युद्ध  में    आचार्य  द्रोण   सेनापति  बने   l   जब  तक  उनके  हाथ  में  शस्त्र   है , तब  तक  उन्हें  हराना  असंभव  था  l   अर्जुन  आदि  सभी  उनके  शिष्य  थे  ,  उन्हें  कैसे   पराजित  कर  पाते  l   किन्तु  द्रोणाचार्य  अधर्म  के  साथ  थे  इसलिए  उन्हें  पराजित  तो  होना  ही  था  l   भगवान   कृष्ण  के  निर्देशन   में  सब  पता  किया  गया  तो  ज्ञात  हुआ  कि   यदि   द्रोणाचार्य  को  यह  कह  दिया  जाये  कि   उनका  पुत्र  अश्वत्थामा  मारा  गया   तो  वे  निराश  होकर  अपने  हथियार  रख  देंगे   , तब   पांडव  पक्ष  का  सेनापति  धृष्टद्द्युम्न   उनका  वध   कर देगा  ( धृष्टद्दुम्न  का  जन्म  ही  द्रोणाचार्य  के  वध  के  लिए  हुआ  था  l ) 
     इस  के  लिए  यह  योजना  बनाई  गई  की  कि  कौरव  पक्ष  में  अश्वत्थामा  नामक  एक  हाथी   है ,  उसका  वध  कर  के   यह  अफवाह  फैला  देंगे  कि   ' अश्वत्थामा  मारा  गया  l '   द्रोणाचार्य  शस्त्र  और  शास्त्र  दोनों  के  ज्ञाता  हैं ,  वे  इस  बात  का  विश्वास  नहीं  करेंगे   और  निश्चित  रूप  से  सत्यवादी  धर्मराज  युधिष्ठिर  से  अवश्य  सत्य  जानना  चाहेंगे   l   शेष  पांडवों  और  कृष्ण  ने   युधिष्ठिर  को  बहुत  समझाया  कि    द्रोणचार्य  के  पूछने  पर  वे  झूठ  बोल  दें  कि  ' हाँ , अश्वत्थामा  मारा  गया '     लेकिन  युधिष्ठिर  किसी  तरह  राजी  नहीं  हुए  l  तब  यह  तय  हुआ  कि  धर्मराज  युधिष्ठिर  इस  तरह  कहेंगे -- ' अश्वत्थामा  हतो  , नरो  व  कुंजरो '   ( अश्वत्थामा  मारा  गया , मनुष्य  नहीं ,  हाथी ) आगे  जो  होगा  पांडव  संभल  लेंगे  l
               अगले  दिन  युद्ध  शुरू  हुआ  ,  भीम  ने  अश्वत्थामा  नामक  हाथी   को  मार  दिया  ,  और  घंटे - घड़ियाल  के  साथ   सब  तरफ  यह  शोर  मचा  दिया ,  अफवाह  फैला  दी  कि  ' अश्वत्थामा  मारा  गया  " l   कौरव  सेना  में  भगदड़  मच  गई  कि  अश्वत्थामा  मारा  गया ,  अब  क्या  होगा  ?  कितने  सैनिक  तो  उस  भगदड़  में  दबकर  मर  गए  l   यह  अफवाह  द्रोणाचार्य  के  कानों  तक  पहुंची  ,  उनको  विश्वास  नहीं  हुआ  l   अफवाह  इतनी  तेजी  से  फैलती  है  कि   सामान्य जन  असलियत  जानने  की  कोशिश  ही  नहीं  करता  ,  उस  पर  विश्वास  कर  लेता  है   l   द्रोणाचार्य  जिससे  भी  पूछें ,  सब  यही  कहें  कि  ' हाँ , अश्वत्थामा  मारा  गया  l  अब  उन्होंने  सारथि  से  कहा  --- रथ  युधिष्ठिर  के  सामने  ले  चलो ,  वे  सत्यवादी हैं , धर्मराज  हैं , वही  सत्य  बताएँगे  l
गुरु  द्रोण   ने  युधिष्ठिर  से  पूछा  --- " युधिष्ठिर  !  तुम  सत्यवादी  हो , तुम  बताओ ,  क्या  मेरा  पुत्र  अश्वत्थामा  मारा  गया   ? "
युधिष्ठिर  पर  जैसा   दबाव  था ,  उन्होंने  कहा ---' अश्वत्थामा  हतो ---    युधिष्ठिर  के  इतना  बोलते  ही   भीम  आदि  पांडवों  ने  शंख , घंटे - घड़ियाल  सहित   इतना   शोर  किया   कि   आगे  का  शब्द ----' मनुष्य  नहीं  हाथी '   द्रोणाचार्य   को    सुनाई  ही  नहीं  दिया  ,  वे  अपने  पुत्र  से  बहुत  स्नेह  करते  थे ,  एकदम  निराश  हो  गए  ,  उनका  आत्मबल  गिर  गया ,  उन्होंने  अपने  अस्त्र - शस्त्र  सब  रख  दिए  ,  उसी  समय  उनके  जन्मजात  शत्रु   धृष्टद्दुम्न   ने  उनका  वध  कर  दिया  ,  चारों  तरफ  अफरा - तफरी  मच  गई  ,  कितने  ही  सैनिक  उसमे  मर  गए   l
  कहते  हैं   युधिष्ठिर  सत्यवादी  थे  ,  उनका  रथ  जमीन   से  ढाई  अंगुल  ऊपर  चलता  था  ,  यह  उनके  सत्य  की , धर्माचरण  की  शक्ति  थी   लेकिन    न  चाहते  हुए  भी   इस  झूठ  की  वजह  से  उनका  रथ  इस  पृथ्वी  से   स्पर्श  कर  चलने  लगा   और  मृत्यु  के  बाद  इस  एक  झूठ  की  वजह  से  उन्हें  एक  पल  का  नरक  भोगना  पड़ा   l
 महाभारत   का  यह  प्रसंग  हमें  इस  सत्य  को  बताता  है    कि   ंजन सामान्य   एक  साधारण  व्यक्ति  की  बात  का  विश्वास  नहीं  करता  ,  लेकिन   यदि  कोई  उच्च  पद  पर  प्रतिष्ठित  व्यक्ति    चाहे  किसी  के  दबाव  में  ही  झूठ  बोल  दे ,  किसी  अफवाह  पर  अपनी  मोहर   लगा  दे   तो  सामान्य  जन    उसे  सच  मानकर   उसका  विश्वास  कर  लेता  है  l   इसलिए  ऋषियों  ने  कहा  है  कि   उच्च  पद  पर  बैठे  व्यक्तियों  को   अपना  प्रत्येक  कदम  बहुत  सोच -  विचारकर  उठाना  चाहिए   
   

27 April 2020

WISDOM ------

  समय  परिवर्तनशील  है    l   एक  समय  था   जब  वर्ण  व्यवस्था  थी  ,   यह  एक  प्रकार  का  श्रम  विभाजन  था  ,  उस  समय  समाज  के  धन - संपन्न  वर्ग     राज  कार्य  में  सहयोग  के  लिए   धन  देते  थे  ,  सामाजिक  कार्यों  में  भी  सहयोग  देते  थे   l   इसके  पीछे  उनमे  लोक कल्याण  का  भाव  था  l   वे  जो  भी  दान - पुण्य  करते  थे   वह  परोपकार  के  लिए  करते  थे  ,  शासन  की  नीतियों  में  उनका  कोई  हस्तक्षेप  नहीं  होता  था  l
   भौतिक  प्रगति  के   साथ   धन  का   महत्व     बढ़ता  गया  l   जो  ंजितना  धनी   है  उसे  उतना  ही  सम्मान   मिलने  लगा   l   महत्वाकांक्षा  बढ़ती  गई  ,  धीरे - धीरे  उन्होंने  शासन  की  नीतियों   में     हस्तक्षेप  शुरू  कर  दिया  l   अहंकार  भी  आ  गया  कि   जब  हम  इतना  सहयोग  करते  हैं   तो  नीतियां  भी   हमारे  हित    की  होनी  चाहिए  l   तभी  से  राजनीति   व्यवसाय  बन  गई  l   इसी  का  परिणाम  हुआ  कि   अमीर  और  अधिक  अमीर  होते  गए  l   वे  चाहते  भी  नहीं  हैं  कि  गरीबों  के  जीवन  में  कोई  सुधार  हो  ,  उनके  प्रयास  तो  गरीबों  का  शोषण  कर  के   उन्हें  दीन - हीन    बनाये  रखने  के  ही  हैं  l   इस  निर्धन  और  शोषित  वर्ग  को  स्वयं  जागना  होगा   l 

WISDOM ------

  महाभारत  में  विभिन्न  प्रसंगों  के  माध्यम  से     संसार  को  शिक्षण  दिया  गया  है   जो  प्रत्येक  युग  में  और  प्रत्येक  व्यक्ति  के  लिए  उपयोगी  है   l   एक  प्रसंग  है  ----   अर्जुन  को  किसी  अन्य  राजा  के  साथ  युद्ध  में  उलझकर  द्रोणाचार्य  ने  चक्रव्यूह  की  रचना  की  l   पांडव  पक्ष  में  केवल  अभिमन्यु  ही  चक्रव्यूह  भेदना   जानता    था  l   चक्रव्यूह  में  सात  दरवाजे    थे  , अत:  यह  निश्चय  किया  गया  कि   प्रथम  द्वार  में  जैसे  ही  अभिमन्यु   प्रवेश  करेगा  ,  वैसे  ही  चारों  पांडव  भी  उसके  पीछे  उसमे  प्रवेश  कर  लेंगे  l
  प्रथम  द्वार  पर  जयद्रथ  था  ,  अभिमन्यु   ने  उसे  परास्त  कर   चक्रव्यूह  में  प्रवेश  कर  लिया  l   जयद्रथ  बहुत  वीर  था  और  उसे  वरदान  भी  प्राप्त  था  कि  अर्जुन  को  छोड़कर  वह  शेष  चार  पांडवों  को  एक  साथ  पराजित  कर  सकता  है  l   अत:  उसने  चारों  पांडवों  को  द्वार  पर  ही  रोक  दिया  , अंदर  नहीं  जाने  दिया  l   अभिमन्यु  अकेला  रह  गया  ,  जहाँ  अंत  में  सात  महारथियों  ने  मिलकर  उसे  मार  दिया  l
   अर्जुन  जब  सांयकाल  युद्ध  से  लौटा   और  ये  दुःखद   समाचार  सुना    तो  उसने  मालूम  किया   कि    उसके  पुत्र  की  हत्या  का  वास्तविक  जिम्मेदार  कौन  है  l
   तब  ज्ञात  हुआ  कि   प्रथम  द्वार  पर  जयद्रथ  था   जिसकी  वजह  से  चारों  पांडव  चक्रव्यूह   प्रवेश  नहीं  कर  सके  l   तब  अर्जुन  ने  प्रतिज्ञा  की  कि  '  यदि  कल  के  युद्ध  में  सूर्यास्त   से  पहले     वह  जयद्रथ  का  वध  नहीं  कर  सका   तो  स्वयं  को  अग्नि  में  समर्पित  कर  देगा , आत्मदाह  कर  लेगा  l '
   ' जयद्रथ  वध '  प्रसंग  के  माध्यम  से   इस  बात  को   स्पष्ट  किया  गया  है  कि   आसुरी  प्रवृति  के  लोग   अपने  ऊपर  मुसीबत  आने  पर  या  मुसीबत  आने  की  संभावना  होने  पर  छुप  जाते  हैं   लेकिन   प्रतिपक्षी  को  परेशान     देखकर  ,  जन - साधारण  को  भी  मुसीबत   में  झोंककर   उन्हें  बड़ा  सुकून  मिलता  है  ,  अपनी  ख़ुशी  छुपा  नहीं  पाते  और  सामने  आ  जाते  हैं  ,  तभी  हम  उन्हें  आसानी  से  पहचान  सकते  हैं  
   आज  के  युग  में   जब  सब  तरह  के  अपराधी  जमानत  लेकर  समाज  में  घुल-मिलकर  रहते  हैं  ,  न्याय   की  प्रक्रिया  है  ,  तब  हम  आसुरी  प्रवृति  के  लोगों  को  पहचानकर  सतर्क  होकर  रह  सकते  हैं   l
             अगले    दिन   युद्ध  शुरू  हुआ   l   दुर्योधन  ने  जयद्रथ  को  ऐसे  छुपा  दिया  कि   पूरा  दिन  बीत  गया  ,  लेकिन  अर्जुन ,    जयद्रथ  को  नहीं    ढूंढ   पाया  l   सूर्यास्त  हो  गया   l  प्रतिज्ञा   के  अनुसार      अब  चिता   सजाई  जाने  लगी  ,  अर्जुन  आत्मदाह  से   पूर्व  सबसे  विदा  लेने  लगा   l   यह  सब  देखकर  दुर्योधन  आदि  कौरव  बहुत  प्रसन्न  हुए   और  जयद्रथ  से  कहने  लगे  ---  चलो  ,  अर्जुन  चिता    में  समाने  जा  रहा  है  ,  ऐसा  सुन्दर  दृश्य  फिर  देखने  को  मिले , न  मिले  l   अब  सूर्यास्त  हो  गया   l ( उस  समय  सूर्यास्त  के  बाद  युद्ध  नहीं  होता  था  )    जयद्रथ  बहुत  प्रसन्न  था  ,  दुर्योधन  आदि  के  साथ  वहां  आ  गया  जहाँ  अर्जुन  आत्मदाह  की   तैयारी    में  था  l   जयद्रथ  अपनी  ख़ुशी  रोक  नहीं  पा  रहा  था  ,  उसने  कृष्ण  से  कहा ----( कवि   के  शब्दों  में )  --- गोविन्द  अब  क्या  देर  है  ,  प्रण   का  समय  जाता  टला    l 
  शुभ  कार्य  जितना  शीघ्र  हो ,  है  नित्य  उतना  ही  भला  l 
कौरव  चाहते  थे   अर्जुन  जल्दी  से  चिता     में  समा   जाये  जिससे   वे   बहुत  ख़ुशी  मना  सकें   l
     सुनकर  जयद्रथ  का  कथन  हरि   को  हंसी  कुछ  आ  गई ,  गंभीर  श्यामल  मेघ  में  विद्दुत  छटा  सी   छा   गई  l  भगवान   कृष्ण  ने  अर्जुन  से  कहा -- हे  पार्थ  ! प्रण   पालन  करो ,  देखो  अभी  दिन  शेष  है  l "
  दूसरों  का  विनाश  देखने  की  ख़ुशी  में  जयद्रथ  सामने  आ  गया  l   अर्जुन  के  साथ  स्वयं  भगवान   थे  ,  उसकी  चेतना  जाग्रत  थी  ,  उसने  उस  पल  का  उपयोग  करते  हुए  जयद्रथ  का  वध  कर    अपना  प्रण   पूरा  किया   l