26 March 2024
25 March 2024
WISDOM ----
संसार में जिनके पास धन -वैभव , शक्ति , साधन सब कुछ है , उन्हें इस बात का अहंकार होता है कि वे इस भौतिक संपदा से सब कुछ खरीद सकते हैं l भौतिक संपदा के साथ बुराइयाँ तो बिना ख़रीदे ही खिंची चली आती है लेकिन यदि सद्गुण चाहिए तो उनके लिए कठिन साधना करनी पड़ती है l जैसे सत्य बोलना , दया , करुणा , ईमानदारी , कर्तव्यपालन , सब में एक ही परमात्मा को देखना ---आदि अनेक सद्गुणों को अपने व्यवहार में लाना हर किसी के लिए संभव नहीं है l जो ऐसे सद्गुणी होते हैं , ईश्वर के बताए मार्ग पर चलते हैं उन्हें ही ईश्वर ' सद्बुद्धि का , विवेक का ' वरदान देते हैं l' विवेक बुद्धि ' होने पर ही जीवन में सही निर्णय लेना संभव होता है l ----------------- सम्राट बिंबसार को सत्य का स्वरुप जानने की इच्छा हुई l उन्होंने भगवान महावीर से कहा --- " भगवन ! मैं सत्य को जानना चाहता हूँ l उसको प्राप्त करना चाहता हूँ और उसे प्राप्त करने के लिए मैं किसी भी ऊँचाई तक पहुँचने में सक्षम हूँ l " सम्राट की बात सुनकर भगवान महावीर को लगा कि दुनिया को जीतने वाला सम्राट सत्य को भी उसी प्रकार जीतने का इच्छुक है l अहंकार के वशीभूत होकर वह सत्य को भी क्रय करने की वस्तु मान बैठा है और उसे उसी तरह प्राप्त करने का इच्छुक है l उन्होंने बिंबसार को समझाया --- " वत्स ! सत्य को न तो ख़रीदा जा सकता है और न उसे दान या भिक्षा के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है l सत्य कोई राज्य भी नहीं है जिस पर आक्रमण कर के तुम विजय प्राप्त कर लो l सत्य को प्राप्त करने के लिए अहं को गलाना पड़ता है और अहंकार शून्य होने पर ही सत्य का बोध होता है l " बिंबसार को अपनी गलती का अनुभव हो गया l
24 March 2024
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " आज के युग की समस्या ही यह है कि आज जो अधर्म करते हैं , वे भी धर्म का नाम लेकर ही करते हैं l आज जो अनीति करते हैं , वे भी नीति की ही दुहाई देते हैं l इसलिए धार्मिक स्थलों पर अधर्म घटता है , विद्या के मंदिरों में उपद्रव होता है और नीति नियंताओं द्वारा अनैतिक कृत्य होता दिखाई पड़ता है l चोरी करने जाता व्यक्ति स्वयं को समझाता है कि मैं चोरी नहीं कर रहा हूँ , मैं तो अमीरों को मिला धन लेकर गरीबों में बाँट दूंगा l इस तरह वह स्वयं को यह प्रमाणित करने की कोशिश करता है कि वह जो कर रहा है , वो बड़ा धार्मिक कृत्य है l " श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं ---- आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति करता सब गलत है , पर मन में यह मानकर बैठता है कि वो बिलकुल सही है क्योंकि उसका चित्त अज्ञान और अहंकार से ढका हुआ है l धीरे -धीरे उसको सच का पता चलना ही बंद हो जाता है l श्री भगवान कहते हैं --- आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्यों को अपने सभी प्रतिस्पर्धी अपने दुश्मन नजर आते हैं , उनमें दूसरों को नष्ट करने की बड़ी तीव्र लालसा होती है l आसुरी प्रवृत्ति वाले स्वयं को सर्वसमर्थ , बलवान और सुखी मानते हैं l समस्या यह है कि आसुरी प्रवृत्ति का देवत्व में रूपांतरण बहुत कठिन है , व्यक्ति अपने अहंकार को नहीं छोड़ता l कभी किसी के जीवन में कोई ऐसी दिल को छू लेने वाली घटना घट जाए , कुछ ऐसा हो जाये जो उसने कभी सोचा भी न था तब वह व्यक्ति रूपांतरित हो जाता है l ऐसा लाखों में कोई एक के साथ होता है l इतने प्रवचन , सत्संग सब ऊपर से निकल जाते हैं , कुछ असर नहीं होता l एक प्रसंग है ---- निरजानंद नामक एक स्वामी थे l एटा के पास गंगा किनारे रहते थे l उनके गाँव में एक डकैत बीमार हो गया l कोई उसकी सेवा करने नहीं गया l स्वामी जी सब में ईश्वर का वास है , इस सत्य को मानते थे इसलिए उसकी सेवा करने गए l उन्होंने उस डकैत की दिन -रात सेवा की जिससे वह स्वस्थ हो गया और अब उसका जीवन बदल गया l वह बोला ---" महाराज ! हमारे जितने भी साथी थे , सब बीमारी के समय भाग गए , किसी ने भी नहीं पूछा l केवल आपने ही हमारी सेवा की l अब हम आपकी सेवा करेंगे l " अब वह स्वामी जी की पूजा की व्यवस्था कर देता , नित्य ही उनके लिए फलाहार आदि बना देता , उनके पैर दबाता , हर तरह से सेवा करता l स्वामी जी के महाप्रयाण के बाद वह उन्हें अपना गुरु मानकर उनकी फोटो की पूजा करने लगा , मन्त्र जपता , और गाँव में कोई बीमार हो , उनकी भी सेवा करता l अंतिम समय में भी वह अपने गुरु के ही ध्यान में डूबा था l उसने अपने कर्मों को सुधारा और अंतिम समय में अपने गुरु का ,ईश्वर का स्मरण करते हुए मृत्यु का आलिंगन किया l आचार्य श्री कहते हैं --- यह मनुष्य जीवन अनमोल है , हमारे पास अपने कर्मों को सुधारने का समुचित अवसर है l
23 March 2024
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " तप और वरदान की उपयोगिता तभी है , जब सद्बुद्धि का साथ में समावेश हो l आत्म परिष्कार और पात्रता के अभाव में सदा मस्तिष्क पर दुर्बुद्धि छाई रहती है l यदि अनायास ही कोई सुयोग आ टपके तो वही मांग बैठती है जो अंततः आत्मघाती सिद्ध होता है l " ----- पुराण की एक कथा है ---- राजा नहुष को पुण्यफल के बदले इन्द्रासन प्राप्त हुआ l वे स्वर्ग में राज करने लगे l प्रभुता पाकर किसे मद नहीं होता ? ऐश्वर्य और सत्ता का मद जिन्हें न आवे ऐसे कोई विरले ही होते हैं l नहुष भी सत्तामद से प्रभावित हुए बिना न रह सके l उनकी द्रष्टि रूपवती इन्द्राणी पर पड़ी , वे उन्हें अपने अंत:पुर में लाने का विचार करने लगे कि जब इन्द्रासन मिल गया तो इन्द्राणी भी उनके साथ हों l ऐसा प्रस्ताव उन्होंने इन्द्राणी के पास भेज दिया l इन्द्राणी बहुत दुःखी हुईं l राजा की आज्ञा का विरोध शक्ति से तो संभव न था , उन्होंने विवेक से काम लिया l ' सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे l उन्होंने नहुष के पास सन्देश भिजवाया कि मुझे आपका प्रस्ताव स्वीकार है लेकिन मेरी एक शर्त है कि आप पालकी में चढ़कर मेरे पास आयें और उस पालकी को सप्त ऋषि जोतें , अन्य कोई उसमें मदद न करे l अब सत्ता के मद में नहुष पर तो दुर्बुद्धि सवार थी , उन्होंने सप्त ऋषि पकड़ बुलाये , उन्हें पालकी में जोता गया l नहुष पालकी पर चढ़ बैठे l नहुष बहुत आतुर थे इसलिए ऋषियों से बार -बार कहने लगे ' जल्दी चलो -जल्दी चलो ' l ऋषियों की दुर्बल काया , इतनी दूर तक इतना भार लेकर तेज चलने में समर्थ न हो सके l ऐसा घोर अपमान और उत्पीड़न से वे क्षुब्ध हो उठे l एक ने कुपित होकर शाप दे डाला --- ' दुष्ट ! तू स्वर्ग से पतित होकर , पुन: धरती पर जा गिर l " शाप सार्थक हुआ l नहुष स्वर्ग से पतित होकर मृत्यु लोक में दीनहीन की तरह विचरण करने लगे l
22 March 2024
WISDOM ----
ईर्ष्या , द्वेष , लोभ , अहंकार, महत्वाकांक्षा , स्वार्थ , लालच आदि ----- ये सब ऐसे दुर्गुण हैं जिनसे मनुष्य तो क्या देवता भी अछूते नहीं हैं l आज संसार में जितना तांडव है , वह मनुष्य के इन्ही दुर्गुणों के कारण है l मनुष्य कितना भी बूढ़ा हो जाए , ये दुर्गुण उसका पीछा नहीं छोड़ते l सत्य तो यह है कि मनुष्य उनसे अपना पीछा छुड़वाना ही नहीं चाहता , इन्हें अपनी आत्मा से चिपकाए जन्म -जन्मान्तर की यात्रा करता है l जब व्यक्ति स्वयं सुधरना चाहे , अपने दुर्गुणों को दूर करने का संकल्प ले तभी रूपांतरण संभव है l ------ देवगुरु ब्रहस्पति इतने सम्मानित पद पर होने के बावजूद भी उनके जीवन में ईर्ष्या का दुर्गुण आ गया l उनके बड़े भाई संवर्त बहुत गुणवान थे , लोगों के ह्रदय में उनका बहुत सम्मान था l इसी बात से देवगुरु को उनसे बहुत ईर्ष्या थी , इस कारण वे अपने भाई को बहुत कष्ट देने लगे l इससे परेशान होकर संवर्त ने घर छोड़ दिया l उनके गुणों और पांडित्य के कारण वे जहाँ जाते वहां उनका सम्मान होता l देवगुरु ब्रहस्पति में उन दिनों एक बुराई यह भी आ गई थी कि वे किसी की तरक्की , किसी को आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकते थे l राजा मरुत ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया और उसमें देवगुरु ब्रहस्पति से आचार्य पद ग्रहण करने को कहा l देवगुरु ने सोचा कि इतना विशाल यज्ञ कर के मरुत तो इंद्र से भी शक्तिशाली हो जाएंगे , इसलिए उन्होंने आचार्यत्व ग्रहण करने से इनकार कर दिया l तब राजा मरुत ने देवगुरु के भाई संवर्त से आचार्य का पद सँभालने का निवेदन किया l वे बहुत विद्वान् थे , उनमें कोई अहंकार भी नहीं था , उन्होंने आचार्य बनना स्वीकार कर लिया l यह समाचार जब ब्रहस्पति ने सुना तो जल -भुन गए l ईर्ष्या चाहे मनुष्यों में हो या देवताओं में , यह शारीरिक , मानसिक शक्तियों को कम कर देती है , उसका पतन कर देती है l ब्रहस्पति अपने ही शिष्य इंद्र के सामने नतमस्तक हुए और कहा कि मरुत के यज्ञ को विध्वंस करो l इसके पहले उन्होंने अग्नि देव को उस यज्ञ को विध्वंस करने और राजा मरुत को अपमानित करने के लिए भेजा l लेकिन संवर्त के ब्रह्मचर्य और तेज को देखकर वे चुपचाप देवलोक लौट गए l अब इंद्र स्वयं आए यज्ञ को नष्ट करने l तब संवर्त ने उनसे प्रार्थना की कि यह यज्ञ तो वे विश्व कल्याण के लिए कर रहे हैं , आप हमारे देवता हैं यज्ञ में अपना भाग ग्रहण करें l संवर्त की उदारता , विनय , ज्ञान और उनके तेज से इंद्र बहुत प्रसन्न हुए , यज्ञ में भाग ग्रहण किया और आशीर्वाद देकर लौट आए l यह सब देख देवगुरु ब्रहस्पति बहुत लज्जित हुए l ईर्ष्या के कारण उन्हें अपमान और पश्चाताप सहना पड़ा l
21 March 2024
WISDOM ----
लघु कथा --- एक गोताखोर बहुत दिनों से असफल रह रहा था l घोर परिश्रम करने पर भी कुछ हाथ न लगा l पेट भरने के लाले पड़ गए l कोई रास्ता सूझता न था l एक दिन किनारे बैठकर उसने देवता की बहुत प्रार्थना की --- "आप सहारा न देंगे तो मैं जीवित कैसे रहूँगा ? " देवता को दया आ गई , उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया l अब उसने फिर डुबकी लगाईं तो एक पोटली हाथ लगी , खोलकर देखा तो उसमें छोटे -छोटे पत्थर भरे थे l दुर्भाग्य को उसने कोसा और देवता को निष्ठुर बताया l वह एक -एक कर के पत्थर के टुकड़ों को पानी में फेंकने लगा और सोचने लगा कि अब वह गोताखोरी छोड़कर मछली पकड़ेगा , इसमें लाभ है l इन्हीं विचारों के बीच जब उसने अंतिम टुकड़े को ध्यान से देखा , तो वह बहुमूल्य नीलम था l देवता के अनुग्रह से मिली इतनी राशि उसने अपने हाथों गंवाई , इसका उसे बहुत दुःख हो रहा था l तभी देवता प्रकट हुए और बोले --- " अकेले तुम ही इस दुनिया में प्रमादी नहीं हो , अन्य लोग भी इस रत्न राशि से बढ़कर बहुमूल्य जीवन संपदा को इसी प्रकार बरबाद करते हैं l जाओ जो बचा है उसे बेचकर कम चलाओ l बड़े भाग्य से मनुष्य का शरीर मिलता है , होश में रहकर जीवन जियो l "
19 March 2024
WISDOM -----
एक बार की बात है भगवान विष्णु धरती के निवासियों से बहुत प्रसन्न थे और मुक्त हस्त से सभी प्राणियों को उनकी इच्छानुसार धन -धन्य , सुख -स्वास्थ्य , धन -रत्न , पुत्र -पौत्र , वैभव -विलास सब वितरित कर रहे थे l वैकुण्ठ में बड़ी भीड़ थी l वैकुण्ठ का कोष रिक्त होते देख महालक्ष्मी ने विष्णु जी से कहा ---" यदि इस प्रकार मुक्त भाव से आप संपदा लुटाते रहे तो वैकुण्ठ में कुछ नहीं बचेगा , तब हम क्या करेंगे ? " विष्णुजी मंद -मंद हँसे और बोले ---- " देवी ! मैंने सारी संपदा तो नहीं दी l एक निधि ऐसी है जिसे नर , किन्नर , गन्धर्व , देवता , असुर किसी ने भी नहीं माँगा है l " महालक्ष्मी पूछ बैठीं --- " कौन सी निधि ? " विष्णु जी ने कहा ---- " शांति --- उसे कोई नहीं मांगता l ये प्राणी भूल गए हैं कि शांति के बिना कोई भी संपदा पास नहीं रह सकेगी l उन्होंने जो माँगा वह मैंने दिया l अपने लिए मैंने मात्र शांति की निधि सुरक्षित रख ली है l आज के युग की सच्चाई यही है , चाहे कितने ही सुख के साधन हो , लेकिन किसी के मन को शांति नहीं है , सब भाग रहे हैं , एक अंधी दौड़ है l यह शांति कैसे मिले ? ------- देवर्षि नारद के गुरु थे --सनत्कुमार जी l नारद जी ने उनसे ही सारी विद्याएँ , कलाएं सीखीं l गुरु ने अपनी दिव्य द्रष्टि से देखा कि इतने ज्ञान के बावजूद नारद के मन में आकुलता है , शांति नहीं है l सनत्कुमार जी ने नारद जी से कहा --- " तुम अपने ज्ञान का घमंड नहीं करो , भूल जाओ कि तुम ज्ञानी हो , अपने ज्ञान को भक्ति के साथ वितरित करना आरम्भ कर दो l ज्ञान , भक्ति और कर्म के संयोग से ही तुम्हारे मन को शांति मिलेगी l नारद जी ने भक्ति गाथा लिखी , संसार में भ्रमण करते हुए उसको जन -जन तक उसे पहुँचाया तब उनके मन को शांति मिली और वे भक्त शिरोमणि कहलाये l अनेकों को परामर्श देकर उनके जीवन की दिशा बदल दी l उनके परामर्श से ही ध्रुव , प्रह्लाद , महर्षि वाल्मीकि भक्ति के चरम पर पहुंचे l