11 June 2013

POWER

'पशु द्वन्द युद्ध से अपनी बलिष्ठता सिद्ध करते हैं और मनुष्य साहस और विवेक के आधार पर | '
 इस संसार में कुल तीन शक्तियां हैं जिन पर हमारा सारा जीवन व्यापर चल रहा है |
1. पहली शक्ति है -श्रम -इससे हमें धन और यश मिलता है | जितनी भी सफलताओं का इतिहास है ,वह मनुष्य के श्रम की उपलब्धियों का इतिहास है |
2. दूसरी शक्ति है -ज्ञान की ,विचार करने की शक्ति | हमें जो भीप्रसन्नता मिलती इसी ज्ञान की शक्ति से मिलती है | जब हमारा मस्तिष्क संतुलित होता है तो हर परिस्थिति में हमें चारों ओर प्रसन्न्ता ही प्रसन्नता दिखाई देती | जीवन का आनंद सदैव भीतर से आताहै | यदि हमारे सोचने का तरीका सही हो तो बाहर जो भी क्रिया कलाप चल रहे हैं ,उन सभी में हमको ख़ुशी ही ख़ुशी बिखरी दिखाई पड़ेगी | दाराशिकोह मस्ती में डूबते चले गये | जेबुनिस्सा ने पूछा -"अब्बा जान !आपको क्या हुआ आज | आप तो पहले कभी शराब नहीं पीते थे ,फिर यह मस्ती कैसी "?वे बोले आज मैं हिन्दुओं के उपनिषद पढ़कर आया हूँ ,जमीन पर पैर नहीं पड़ रहे हैं | जीवन का असली आनंद उनमे भरा पड़ा है |
3. तीसरी शक्ति है -रूहानी -आदमी का व्यक्तित्व |आदमी की कीमत है उसका व्यक्तित्व ,ऐसे व्यक्ति दुनियां की फिजां को बदलते हैं ,देवताओंको अनुदान बरसाने के  लिये मजबूर करते हैं | व्यक्तित्व श्रद्धा से बनता है | श्रद्धा अर्थात  सिद्धांतों व आदर्शों के प्रति अटूट व अगाध विश्वास | व्यक्तित्व ऐसा वजनदार बन जाता है कि देवता तक नियंत्रण में आ जाते हैं | 

9 June 2013

FAMILY RELATIONSHIP

'गृहस्थ एक तपोवन है जिसमे संयम ,सेवा और सहिष्णुता की साधना की जाती है | '
         गृहस्थ धर्म के परिपालन के लिये किया गया कोई भी प्रयास किसी तप से कम नहीं है | मनुष्य की सहज वृति कामवासना को पति -पत्नी में एक दूसरे के प्रति कर्तव्यनिष्ठा में परिवर्तित कर कामोपभोग को एक सांस्कृतिक संस्कार बनाकर सामाजिक मूल्य का रूप देना गृहस्थ आश्रम की ही देन है |
         श्रेष्ठ संतान ,सुसंतति देने की खान गृहस्थ धर्म को ही माना गया है | परिवार के बीच ही महामानव प्रशिक्षण पाकर निकलते और किसी समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं |
        श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं -"एक हाथ से ईश्वर के चरणकमल पकड़े रहो और दूसरे हाथ से गृहस्थी का काम करते रहो | भगवान को लेकर ही गृहस्थी में रहना होगा ,उन्हें छोड़कर नहीं | जितने दिन सांसारिक दायित्व हैं ,उतने दिन मन का एक अंश ईश्वर में ,दूसरा अंश संसार के कार्यों में रहे | दायित्व जैसे -जैसे घटे ,भगवान में उतना ही मन बढ़ाते जाओ | दायित्व पूर्ण होते ही दोनों हाथों से भगवान के चरणों को पकड़ लो ,समूचे मन से उन्ही का चिंतन करो | तभी यह संसार आनंद -कानन में परिणत होगा | 

RELATION

मानव जीवन में पनपने वाला संबंध भावनाओं के तल पर उपजता है | भावना मानव जीवन की आधार शिला है | भावनाओं की परिष्कृति एवं स्थिरता संबंधों को स्वस्थ एवं सुद्रढ़ बनाती है | भावनाएं संबंधों को पोषण देती हैं एवं विकसित करती हैं |
            यदि संबंध अच्छे होते हैं तो जीवन की सुंदरता ,खूबसूरती बढ़ जाती है और यदि संबंधों में कटुता पनपती है तो जीवन नरकतुल्य अर्थहीन लगता है | ऐसा इसलिये होता है क्योंकि संबंधों का आधार ही भावनाएं हैं |
              भावना का विकास ही संबंधों की पूर्णता है | यही जीवन का सच्चा सौंदर्य एवं सुख है | भावना के बिना अधूरेपन एवं अपूर्णता का कष्ट हमेशा चुभता रहता है और अपनों के बिना जीवन वीराना और शुष्क हो जाता है | यही अनेक मनोविकारों का मूल कारण है | अत:हमें अपनी भावनाओं को परिष्कृत एवं विकसित करना चाहिये ,जिससे हमारे संबंध प्रेमपूर्ण एवं सुखदायक हों | 

8 June 2013

ARDENT DESIRE

'तृष्णा का कोई अंत नहीं | आकाश की तरह उसके पेट में बहुत कुछ भरा होने पर भी खाली ही रहता है | '
       हनुमानजी लंका जा रहे थे | समुद्र के बीच में कई छोटे द्वीप थे | उनमे एक में सुरसा नाम राक्षसी रहती थी | उसे अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त थीं । उनमे एक यह भी थी कि वह अपना शरीर जब चाहे तब जितना छोटा या बड़ा कर ले |
वह लंका की प्रहरी थी | जब हनुमानजी को ऊपर से जाते देखा तो सुरसा ने अपना मुँह बड़ा करके हनुमानजी को दबोच लिया
     हनुमानजी को भी सिद्धियाँ प्राप्त थीं | उन्होंने भी अपना शरीर बढ़ाया ताकि सुरसा के मुँह से निकल सकें | सुरसा अपना मुँह बढ़ाती गई ,हनुमानजी भी बढ़ाते गये |
    इस प्रतिस्पर्धा में विस्तार तो बढ़ता जा रहा था पर कोई हल नहीं निकल रहा था | हनुमानजी को दूसरी तरकीब सूझी | उन्होंने अपना रूप छोटा किया और सहज ही बाहर निकल गये ,सुरसा का मुँह फटा का फटा रह गया |
       तृष्णा सुरसा है | महत्वाकांक्षी अपने वैभव का विस्तार करते हैं पर वे उतने नहीं बढ़ पाते जितनी की तृष्णा बढ़ जाती है |
 संतोष अपनाकर विनम्र बन कर ही इस संकट से उबरा जा सकता है | 

ONE WAY

सिकंदरिया का राजा टालेमी ,यूक्लिड से ज्यामिति सीख रहा था ,किंतु यह कठिन विद्दा उसके पल्ले नहीं पड़ रही थी | एक दिन टालेमी अपना धैर्य खो बैठा | उसने अपने गुरु से पूछा -"क्या ज्यामिति सीखने का कोई सरल मार्ग नहीं है ?"युक्लिड ने गंभीरता से कहा -"राजन !आपके राज्य में जनसाधारण और अभिजात  वर्ग के लिये पृथक मार्ग हो सकते हैं ,किंतु ज्ञान का मार्ग सबके लिये एक सा ही है | इसमें अभिजात वर्ग के लिये कोई राजमार्ग नहीं है | "
बात टालेमी की समझ में आ गई | फिर इसके बाद टालेमी ज्यामिति सीखने के लिये कठोर परिश्रम करने लगा | 

7 June 2013

THE PATH TO VICTORY

ईसा ने लोगों से कहा था -"जो बीज तुम बोते हो वह गले बिना नहीं उगता | भौतिक रूप से तुम गलोगे तो आध्यात्मिक रूप से ऊँचे उठोगे | "
बीज की तीन ही गति हैं --1. या तो वह बीज बनकर गले और अपने को सुविकसित पौधे के रूप में परिणत कर अपने जैसे अनेक बीज पैदा करे |
2. या पिसकर आटा बन जाये फिर रोटी के रूप में प्राणी का पेट भरे और अंत में दुर्गन्धित विष्ठा बनकर किसी आड़ में उपेक्षित पड़ा रहे |
3. या भीरुता और संकीर्णता से ग्रसित आत्म रक्षा की बात सोचता रहे और कीड़े -मकोड़ों अथवा सीलन -सड़न द्वारा नष्ट कर दिया जाये |
            मनुष्य जीवन की भी यही तीन गतियाँ हैं --
1. परमार्थ -प्रयोजन में अपने को संलग्न कर यशस्वी जीवन जिये और संसार की सुख -शांति में योगदान करे 2. अपने शरीर और परिवार पर ध्यान केन्द्रित कर ,पेट और प्रजनन की समस्याओं में उलझा रहे | उचित -अनुचित का विचार न कर पशु स्तर की जिंदगी गुजारे और अंतत:विष्ठा जैसी घिनौनी परिणति प्राप्त करे |
3. तीसरी गति अति कृपणता ,अति संकीर्णता और अति स्वार्थ बुद्धि की है | उस स्तर के लोग न परमार्थ सोचते और न स्वार्थ |
                 मनुष्य जीवन की सार्थकता और मानवी बुद्धि की प्रशंसा इस बात में है कि वह प्रथम गति का वरण करे और परमार्थ का श्रेष्ठ मार्ग का अवलम्बन करे | 

6 June 2013

PRAYER

'प्रार्थना ह्रदय की ,अंत:करण की निश्छल पुकार है ,जो सीधे परमात्मा तक पहुंचती है और बदले में प्रार्थी को कृतकृत्य कर देती है | '
 प्रार्थना ईश्वर से वार्तालाप करने की सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक प्रणाली है जिसमे किसी मंत्र ,छंद  और कर्मकांड की आवश्यकता नहीं पड़ती |
प्रार्थना पुकार है अस्तित्व के प्रति कि हे ईश्वर !आपका सहारा चाहिये ,प्रत्युतर भी इसी का मिलता है |
 प्रार्थना वह मन:स्थिति है ,जिससे व्यक्ति शंका और संदेह के जाल से निकलकर श्रद्धा की भूमिका में प्रवेश करता है |
             अपने अहं को गलाकर समर्पण की नम्रता स्वीकार करना और मनोविकारों को ठुकरा कर परमेश्वर का आदेश स्वीकार करने का नाम प्रार्थना है | इसमें यह संकल्प भी जुड़ा रहता है कि भावी जीवन परमेश्वर के निर्देश के अनुसार पवित्र और परमार्थी बनकर जिया जायेगा | ऐसी गहन अंत:करण से निकली हुई प्रार्थना ,जिसमे आत्म परिवर्तन की आस्था जुड़ी हो ,भगवान का सिंहासन हिला देती है |
          प्रार्थना के द्वारा हम अपने अहंकार ,पाप ,कषाय -कल्मष एवं दुखों के अंधकार को छिन्न -भिन्न कर सकते हैं | मन को साधने एवं शिक्षित करने की सबसे पहली सीढ़ी प्रार्थना है | अपने किए हुए दुष्कर्मों के लिये पश्चाताप करना और दुबारा किसी तरह के पापकर्म में संलिप्त न होने के लिये संकल्प शक्ति की अभिवृद्धि के लिये ईश्वर से प्रार्थना करना सुधार का प्रथम सोपान है |
 रवींद्रनाथ टैगौर की एक कविता जिसमे उन्होंने यह प्रार्थना की है --हे भगवान !जब हम आपसे मुसीबत से छुटकारा पाने के लिये प्रार्थना करें तो आप इनकार कर देना और हमसे कहना अपनी गलतियों से मुसीबत बुलाई है ,गलती ठीक करो | हे भगवान !जब हम आपसे संपति मांगे तो आप इनकार कर देना और यह कहना कि यदि अपनी कलाइयों और अक्ल का ठीक इस्तेमाल किया होता तो चैन की जिंदगी जी रहे होते | आप हमारी कोई मदद मत करना ,लेकिन यदि आप दया करते हों तो एक वरदान देना ---
     कि जब हम पाप के पंक में गिर रहे हों तो हे ईश्वर !अपनी लंबी भुजाएं फैलाकर हमें रोक लेना ,ऊँचा उठा लेना ,बस और हमें कुछ नहीं चाहिये |