एक संत भ्रमण पर निकले हुए थे l उन्हें मार्ग में एक राजा मिला , जो पड़ौसी राज्य पर हमला करने के लिए निकला था l संत को देखकर उसने प्रणाम किया और बोला ---- " महाराज ! मैं चक्रवर्ती सम्राट हूँ l मेरे पास अपार धन - दौलत है और आज मैं उसे और बढ़ाने के लिए दूसरे राज्य पर आक्रमण करने निकला हूँ l आप मुझे आशीर्वाद दें l " संत धीरे से हँसे और उसके हाथ पर एक रूपये का सिक्का रख दिया l राजा को आश्चर्य हुआ l वह बोला ---- " महाराज ! आपने शायद सुना नहीं कि मैं बड़ा धनवान हूँ , मुझे इस एक रूपये की आवश्यकता नहीं l " संत बोले ---- " बेटा ! यही सुनकर मैंने ये रुपया तुझे दिया l मुझे ये मुद्रा पड़ी मिली थी और मैंने सोचा था कि इसे सबसे दरिद्र व्यक्ति को दूंगा l आज तुझसे मिलकर मुझे लगा कि सबसे दरिद्र यदि कोई है , तो वो तू ही है , जो अपार धन - संपदा होते हुए भी दूसरों का घर लूटने चला है l ' संत की बात सुनते ही राजा का सिर शरम से झुक गया और उसने जीवन की राह बदलने का संकल्प किया l लालच और महत्वाकांक्षा पर नियंत्रण जरुरी है l
4 March 2021
3 March 2021
WISDOM ------
धार्मिक - आध्यात्मिक पत्रिका ' कल्याण ' के प्रथम संपादक एवं गीता प्रेस , गोरखपुर के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार जी पत्रकार , साहित्यकार , प्रकाशक , संपादक होने के साथ और होने के पूर्व वह देश की स्वाधीनता के लिए जूझने वाले कर्मठ सिपाही थे l भाई जी सदा पीड़ितों की सेवा में अग्रणी और क्रांतिधर्मी देशभक्त रहे l 1936 में जब गोरखपुर में बाढ़ आई तो पं. नेहरू भी बाढ़ - क्षेत्र के निरीक्षण के लिए आए , उस समय अंग्रेज कलेक्टर ने लोगों को धमकाया कि कोई भी व्यक्ति नेहरू जी को कार नहीं देगा , जो ऐसा करेगा , उससे सख्ती से निबटा जायेगा l लेकिन भाई जी निर्भीक थे , उन्होंने अपनी कार नेहरू जी को उपलब्ध करवाई l देश की स्वाधीनता से पहले अंग्रेजों ने उन्हें रायबहादुर और रायसाहब की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा , जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया l
2 March 2021
WISDOM ------ शांति पदार्थ को जानने से नहीं , मानव चेतना को जानने से आती है ---- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
आचार्य श्री लिखते हैं ---- " मानव चेतना को सही और समग्र ढंग से जाने बिना विज्ञान को जानना अधूरा ज्ञान है l वह ऐसा ही है कि सारे जगत में तो प्रकाश हो और अपने ही घर में अँधेरा हो l यह अपने ही हाथों लगाईं गई फाँसी हो जाती है l जीवन में शांति और संतोष मानव चेतना को जानने से ही आता है l " इस अधूरेपन से उपजी परिस्थिति का विश्लेषण करते हुए पॉल टिलिच ने लिखा है ----- "आधुनिक मनुष्य जीवन का अर्थ खो चुका है l इस खोएपन की शून्यता को प्राय: उथली विज्ञान पूजा से भरा जाता है l इस कारण वह अपने नैतिक जीवन में , यहाँ तक कि भावनात्मक समस्याओं के लिए भी वैज्ञानिक समाधान खोजता है l इस खोजबीन में उसे तनाव , कुंठा व असुरक्षा ही हाथ लगती है l " आचार्य श्री लिखते हैं ----- " अब तक विज्ञान और अध्यात्म में जो विरोध रहा है , उसका परिणाम अशुभ है l जिन्होंने मात्र विज्ञान की खोज की है , वे शक्तिशाली हो गए , पर अशांत और संतापग्रस्त हैं और जिन्होंने मात्र अध्यात्म का अनुसन्धान किया है , वे शांत तो हो गए , पर लौकिक दृष्टि से अशक्त और दरिद्र हैं l आवश्यकता वैदिक ज्ञान की परंपरा को नवजीवन देने की है l आचार्य श्री कहते हैं --- शक्ति और शांति का , विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय जरुरी है
1 March 2021
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- विपरीत परिस्थितियां , कठिनाइयाँ हमें सिखाने आती हैं l सीखने वाली मानसिकता इससे बहुत कुछ सीख जाती है , इसके संकेतों को पहचान लेती है l कठिनाइयों से जूझने के लिए कभी - कभी ईश्वरीय संकेत आता है l जो इस संकेत को समझ लेता है और पुरुषार्थ करता है , वही संघर्ष के दरिया को पार कर लेता है l कठिनाइयों में कुछ ऐसा रसायन है , जो आदमी को फौलाद के समान बना देता है l ' विपरीत परिस्थितियों में हम अत्यंत संवेदनशील हो जाते हैं और ईश्वर का ध्यान , स्मरण करते है , परमात्मा की ऒर उन्मुख होते हैं l ----- महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था l महाराज युधिष्ठिर एवं महारानी द्रोपदी राजसिंहासन पर विराजमान थे l उस समय योगेश्वर कृष्ण ने राजमाता कुंती से पूछा ---- ' बुआ ! अब तुम्हारे पुत्र विजेता हैं l आप राजमाता हैं l ऐसे में आपको और क्या चाहिए ? " तब कुंती ने कहा ---- " हे कृष्ण ! यदि तुम मुझे कुछ देना ही चाहते हो तो मुझे दुःखों का वरदान दो l " कृष्ण जी ने कहा --- ' वह क्यों बुआ ? आपने तो सारा जीवन दुःख उठाया है l दीर्घकाल के बाद ये सुख के क्षण आए हैं , तब ऐसा क्यों कह रही हैं ? ' राजमाता कुंती बोलीं ---- ' वह इसलिए , क्योंकि दुःखों में तुम्हारे भजन का क्रम अखंड बना रहता है l परिस्थितियों में भले ही दुःखों की काली छाया बनी रहे , परन्तु मन:स्थिति में भक्ति का उजाला निरंतर बना रहता है l '
28 February 2021
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " महानता एक प्रतीक है l जो महान दीखता हो , जिसे सब जानते हों , जो ख़बरों में प्रमुखता से हो , वास्तव में वह महान हो , यह जरुरी नहीं l महानता की झलक देखनी है तो उस बच्चे में भी दीख सकती है , जो अनुशासित है और अपने बड़ों से भी यही अपेक्षा करता है l घर में बाहर से आकर काम करने वाली वह महिला भी महान है , जो माँ - बाप की अनुपस्थिति में बच्चे को माँ का दुलार देती है , उसकी परवरिश का जिम्मा लेती है l सड़क पर चलता हुआ वह युवक भी महानता की श्रेणी में आता है , जो अपने समय व पैसे की परवाह किए बगैर किसी जरूरतमंद की मदद के लिए आगे बढ़ता है l इस तरह ऐसे कई उदाहरण हैं , जो महानता की झलक दिखलाते हैं l महानता के इन लक्षणों को जो जीवन भर बनाए रखते हैं , इन्हे अपने व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बना लेते हैं , वे ही एक दिन महानता का शिखर छूते हैं l " कन्फ्यूशियस के अनुसार --- जो साधारण हैं , वे भी महान हैं क्योंकि महानता हमारी सोच में है , यह हमारे अंदर बसती है l '
27 February 2021
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि भावनाओं का परिष्कार है l भावनाएं न हों तो जीवन नीरस हो जायेगा l जीवन का उल्लास भावात्मक आधार पर ही बन पाता है l ये भावनाएं यदि पवित्र हो जाएँ , अंत:करण प्रेम और शीतलता से भर उठे तो मानवीय व्यक्तित्व , शांति व सुगंध का प्रतीक बन जाता है l उसमें से कुछ ऐसी सुगंध निकलती है , जो कस्तूरी मृग की कस्तूरी की तरह से समस्त उपवन को सुरभित करने में पीछे नहीं रहती l पवित्र अंत:करण वाले व्यक्तित्व इसी प्रकार समस्त वातावरण को सुगन्धित एवं सुरभित बनाते हैं l '
संत रविदास
स्वामी रामानंद जी ने चर्मकारों की बस्ती मडुआडीह में जाकर जन्म लिए बालक को ढूंढ़ा , उसके बत्तीस लक्षणों से उसे पहचाना एवं बीस दिन के बालक का नाम रविदास रखा l रविदास बड़े हुए l जूते सीने के काम में लग गए l उनकी पत्नी लोना भी उनके रंग में रंग गई l एक दिन पिता से अपने जन्म का विवरण सुन वे काशी में स्वामी रामानंद जी के आश्रम में पहुंचे l गुरु ने शिष्य को विधिवत दीक्षा दी एवं मन्त्र दिया l गरीबी की स्थिति में रहकर समाज को सच्चे अध्यात्म का शिक्षण देने का उपदेश दिया l संत रविदास ने उस समय के समाज में अपनी जाति की घोषणा कर अपनी प्रतिष्ठा सभी संतों में की l उनने लिखा ---- ' मेरी जाति कमीनी पाँति कमीनी ओछा जनमु हमारा l तुम सरनागति राजा रामचंद कहि रविदास तुम्हारा l जाति भी ओछी , करम भी ओछा किसन हमारा l नीचे से प्रभु ऊँच कियो है , कह रैदास चमारा l ' उनको धर्मोपदेश देते देख पंडित लोग चिढ़े l राजा से शिकायत की l महल में शास्त्रार्थ हुआ l सभी पंडित पराजित हुए l उनकी प्रार्थना पर मूर्ति , मंदिर से निकलकर उनकी गोदी में आ गई l सभी ने रैदास की जय -जयकार की l एक बार रैदास झाला रानी के भंडारे में भोजन भोजन कर रहे थे l उन्हें अछूत समझने वाले ब्राह्मणों ने अपना स्वयं का अलग भंडारा किया और वे खाने बैठे l खाना खाते समय का दृश्य बड़ा ही विस्मयकारक था , जब ब्राह्मणों का समूह खाने बैठा तो देखा कि प्रत्येक की बगल में रैदास बैठे हैं l तब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि हम जिन्हे अछूत समझ रहे हैं वे असाधारण व्यक्ति हैं l