4 March 2021

WISDOM ------ दरिद्र कौन ?

    एक  संत  भ्रमण  पर  निकले   हुए  थे  l   उन्हें  मार्ग  में  एक  राजा  मिला  ,  जो  पड़ौसी  राज्य  पर  हमला  करने   के  लिए  निकला  था   l   संत  को  देखकर  उसने  प्रणाम  किया   और  बोला ---- " महाराज  !  मैं  चक्रवर्ती  सम्राट  हूँ   l   मेरे  पास  अपार  धन - दौलत  है   और  आज  मैं  उसे   और  बढ़ाने  के  लिए   दूसरे  राज्य  पर  आक्रमण  करने  निकला  हूँ   l   आप  मुझे  आशीर्वाद  दें   l  "  संत  धीरे  से  हँसे   और  उसके  हाथ  पर  एक  रूपये  का  सिक्का  रख  दिया   l   राजा  को  आश्चर्य  हुआ  l   वह  बोला  ---- " महाराज  !  आपने  शायद  सुना  नहीं   कि   मैं  बड़ा  धनवान  हूँ   ,  मुझे  इस  एक  रूपये  की  आवश्यकता  नहीं   l  "  संत  बोले ---- " बेटा   !  यही  सुनकर   मैंने  ये  रुपया   तुझे  दिया   l   मुझे  ये  मुद्रा  पड़ी  मिली  थी   और  मैंने  सोचा   था   कि  इसे  सबसे  दरिद्र  व्यक्ति  को  दूंगा   l   आज  तुझसे  मिलकर   मुझे  लगा  कि   सबसे  दरिद्र   यदि  कोई  है  ,  तो  वो  तू  ही  है   ,  जो  अपार  धन - संपदा   होते  हुए  भी  दूसरों  का  घर  लूटने  चला  है   l  '  संत  की  बात  सुनते  ही  राजा  का  सिर   शरम   से  झुक  गया   और  उसने  जीवन  की  राह  बदलने  का  संकल्प  किया     l   लालच  और  महत्वाकांक्षा  पर  नियंत्रण  जरुरी  है  l  

3 March 2021

WISDOM ------

  धार्मिक - आध्यात्मिक  पत्रिका  ' कल्याण ' के  प्रथम  संपादक  एवं  गीता प्रेस  ,  गोरखपुर  के   संस्थापक  हनुमान  प्रसाद  पोद्दार  जी    पत्रकार , साहित्यकार , प्रकाशक , संपादक  होने  के  साथ  और  होने  के  पूर्व   वह  देश  की  स्वाधीनता  के  लिए  जूझने  वाले   कर्मठ  सिपाही  थे   l   भाई जी  सदा   पीड़ितों की  सेवा  में  अग्रणी  और  क्रांतिधर्मी  देशभक्त  रहे  l    1936   में  जब  गोरखपुर  में  बाढ़  आई   तो  पं.  नेहरू  भी   बाढ़ - क्षेत्र  के  निरीक्षण   के  लिए  आए ,  उस  समय  अंग्रेज  कलेक्टर  ने   लोगों  को  धमकाया   कि   कोई  भी  व्यक्ति  नेहरू जी  को  कार  नहीं  देगा   ,  जो  ऐसा  करेगा  , उससे  सख्ती  से  निबटा   जायेगा   l   लेकिन  भाई जी  निर्भीक  थे  ,  उन्होंने   अपनी कार  नेहरू जी  को  उपलब्ध   करवाई   l   देश  की  स्वाधीनता  से  पहले  अंग्रेजों  ने  उन्हें    रायबहादुर   और  रायसाहब   की  उपाधि  देने   का प्रस्ताव  रखा  ,  जिसे  उन्होंने  अस्वीकार  कर  दिया  l 

2 March 2021

WISDOM ------ शांति पदार्थ को जानने से नहीं , मानव चेतना को जानने से आती है ---- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

 आचार्य श्री  लिखते  हैं ---- " मानव  चेतना   को सही   और    समग्र  ढंग  से  जाने  बिना  विज्ञान   को  जानना  अधूरा    ज्ञान  है   l   वह  ऐसा  ही  है   कि   सारे  जगत  में   तो  प्रकाश  हो   और  अपने  ही  घर  में  अँधेरा  हो   l  यह   अपने  ही  हाथों  लगाईं  गई  फाँसी   हो  जाती  है  l   जीवन  में  शांति   और  संतोष   मानव  चेतना  को  जानने  से  ही  आता  है   l "  इस  अधूरेपन  से  उपजी   परिस्थिति  का  विश्लेषण  करते  हुए  पॉल   टिलिच   ने  लिखा  है ----- "आधुनिक  मनुष्य  जीवन  का  अर्थ  खो   चुका  है  l   इस  खोएपन   की  शून्यता  को   प्राय:  उथली   विज्ञान   पूजा  से  भरा  जाता  है  l   इस  कारण  वह  अपने  नैतिक  जीवन  में  , यहाँ  तक  कि   भावनात्मक  समस्याओं  के  लिए  भी   वैज्ञानिक  समाधान  खोजता  है  l   इस  खोजबीन  में  उसे  तनाव ,  कुंठा  व  असुरक्षा  ही  हाथ  लगती  है   l  "         आचार्य  श्री   लिखते  हैं  ----- " अब  तक  विज्ञान   और  अध्यात्म  में   जो  विरोध  रहा  है  ,  उसका  परिणाम   अशुभ  है   l  जिन्होंने  मात्र  विज्ञान   की  खोज  की  है  ,  वे  शक्तिशाली  हो  गए  ,  पर  अशांत   और संतापग्रस्त  हैं    और  जिन्होंने   मात्र  अध्यात्म  का  अनुसन्धान   किया  है  ,  वे  शांत  तो  हो  गए  ,  पर  लौकिक  दृष्टि  से    अशक्त  और  दरिद्र  हैं   l   आवश्यकता    वैदिक   ज्ञान  की  परंपरा   को  नवजीवन  देने  की    है   l   आचार्य श्री  कहते  हैं  --- शक्ति  और  शांति  का  ,      विज्ञान   और  अध्यात्म  का  समन्वय  जरुरी  है  

1 March 2021

WISDOM ------

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी   लिखते  हैं   -----  विपरीत  परिस्थितियां ,  कठिनाइयाँ   हमें  सिखाने   आती   हैं  l   सीखने   वाली  मानसिकता  इससे  बहुत  कुछ  सीख  जाती  है  ,  इसके  संकेतों  को  पहचान  लेती  है  l  कठिनाइयों  से  जूझने  के  लिए  कभी - कभी  ईश्वरीय  संकेत   आता  है   l   जो  इस  संकेत  को  समझ  लेता  है   और  पुरुषार्थ  करता  है  ,  वही  संघर्ष  के  दरिया  को  पार  कर  लेता  है   l   कठिनाइयों  में  कुछ  ऐसा  रसायन  है  ,  जो  आदमी  को  फौलाद  के  समान  बना  देता  है   l  '        विपरीत  परिस्थितियों  में    हम  अत्यंत  संवेदनशील  हो  जाते  हैं    और  ईश्वर  का  ध्यान , स्मरण  करते  है  , परमात्मा      की  ऒर   उन्मुख  होते  हैं   l -----   महाभारत  का  युद्ध  समाप्त  हो  चुका  था  l   महाराज  युधिष्ठिर   एवं  महारानी  द्रोपदी  राजसिंहासन  पर  विराजमान  थे   l    उस  समय   योगेश्वर  कृष्ण  ने  राजमाता  कुंती  से  पूछा  ---- ' बुआ  !  अब  तुम्हारे  पुत्र    विजेता   हैं   l  आप  राजमाता  हैं   l   ऐसे  में  आपको  और  क्या  चाहिए   ? "  तब  कुंती   ने कहा ---- "  हे  कृष्ण  !  यदि  तुम  मुझे  कुछ  देना  ही  चाहते  हो   तो  मुझे   दुःखों   का  वरदान  दो   l  "  कृष्ण जी  ने  कहा --- ' वह  क्यों  बुआ   ?  आपने  तो  सारा  जीवन  दुःख   उठाया  है   l   दीर्घकाल  के  बाद  ये  सुख  के  क्षण   आए   हैं  ,  तब  ऐसा  क्यों  कह  रही    हैं  ? '   राजमाता  कुंती  बोलीं  ---- ' वह  इसलिए  ,  क्योंकि  दुःखों   में  तुम्हारे   भजन   का  क्रम   अखंड  बना  रहता   है  l  परिस्थितियों  में   भले  ही  दुःखों   की  काली  छाया  बनी   रहे  ,  परन्तु   मन:स्थिति  में  भक्ति  का  उजाला  निरंतर  बना  रहता  है   l  '  

28 February 2021

WISDOM -----

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- "  महानता  एक  प्रतीक   है  l  जो  महान  दीखता  हो ,  जिसे  सब  जानते  हों ,  जो  ख़बरों  में  प्रमुखता  से  हो  ,  वास्तव  में   वह  महान  हो  ,  यह  जरुरी  नहीं   l   महानता  की  झलक  देखनी  है  तो   उस  बच्चे  में  भी   दीख  सकती  है  ,  जो  अनुशासित  है   और    अपने  बड़ों  से  भी    यही  अपेक्षा  करता  है   l   घर  में  बाहर  से  आकर   काम  करने  वाली   वह  महिला  भी  महान  है  ,  जो  माँ - बाप   की अनुपस्थिति  में  बच्चे  को  माँ  का  दुलार  देती  है  ,  उसकी  परवरिश  का  जिम्मा  लेती  है   l   सड़क  पर  चलता  हुआ  वह  युवक  भी  महानता  की  श्रेणी  में  आता  है  ,  जो  अपने  समय  व  पैसे  की  परवाह    किए   बगैर  किसी   जरूरतमंद  की  मदद  के  लिए   आगे  बढ़ता  है   l   इस  तरह  ऐसे  कई  उदाहरण  हैं  ,  जो   महानता  की  झलक   दिखलाते  हैं   l   महानता  के  इन  लक्षणों  को  जो  जीवन  भर   बनाए   रखते  हैं   ,  इन्हे  अपने  व्यक्तित्व   का  अभिन्न  अंग   बना   लेते हैं  ,  वे  ही  एक  दिन  महानता   का  शिखर   छूते   हैं   l  "  कन्फ्यूशियस   के  अनुसार   ---  जो  साधारण  हैं  ,  वे  भी  महान  हैं   क्योंकि  महानता   हमारी  सोच  में  है  ,  यह  हमारे  अंदर   बसती   है   l '

27 February 2021

WISDOM ------

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- 'मनुष्य  जीवन  की  सबसे  बड़ी  उपलब्धि   भावनाओं  का  परिष्कार  है   l   भावनाएं  न  हों  तो  जीवन  नीरस  हो  जायेगा  l   जीवन  का  उल्लास   भावात्मक  आधार  पर  ही  बन  पाता   है   l   ये   भावनाएं  यदि  पवित्र  हो  जाएँ   ,  अंत:करण   प्रेम  और  शीतलता  से  भर  उठे    तो  मानवीय  व्यक्तित्व  ,  शांति  व  सुगंध  का   प्रतीक   बन  जाता  है   l   उसमें  से  कुछ   ऐसी सुगंध  निकलती  है  ,  जो  कस्तूरी  मृग  की   कस्तूरी  की  तरह  से  समस्त  उपवन  को   सुरभित  करने  में  पीछे  नहीं  रहती   l   पवित्र  अंत:करण   वाले  व्यक्तित्व   इसी  प्रकार   समस्त  वातावरण  को  सुगन्धित  एवं  सुरभित  बनाते  हैं   l  '

संत रविदास

     स्वामी  रामानंद जी  ने   चर्मकारों  की  बस्ती    मडुआडीह   में  जाकर   जन्म  लिए   बालक  को  ढूंढ़ा ,  उसके  बत्तीस  लक्षणों  से  उसे  पहचाना   एवं  बीस  दिन  के  बालक  का  नाम   रविदास  रखा   l  रविदास  बड़े  हुए  l   जूते   सीने  के  काम  में  लग  गए   l   उनकी  पत्नी  लोना  भी  उनके  रंग  में  रंग  गई   l   एक  दिन  पिता  से  अपने  जन्म  का  विवरण  सुन   वे  काशी   में   स्वामी  रामानंद जी  के  आश्रम  में   पहुंचे   l   गुरु   ने शिष्य   को विधिवत   दीक्षा  दी   एवं  मन्त्र  दिया  l   गरीबी  की  स्थिति  में  रहकर   समाज  को   सच्चे  अध्यात्म   का  शिक्षण  देने  का  उपदेश  दिया  l   संत  रविदास  ने  उस  समय  के  समाज  में  अपनी  जाति   की  घोषणा  कर   अपनी  प्रतिष्ठा  सभी  संतों  में  की  l   उनने  लिखा ---- ' मेरी  जाति   कमीनी   पाँति  कमीनी   ओछा  जनमु  हमारा  l    तुम  सरनागति  राजा  रामचंद  कहि   रविदास  तुम्हारा   l   जाति   भी  ओछी  ,  करम  भी  ओछा  किसन   हमारा   l   नीचे  से  प्रभु  ऊँच   कियो  है  ,  कह  रैदास  चमारा   l '    उनको  धर्मोपदेश  देते  देख    पंडित  लोग  चिढ़े   l   राजा  से  शिकायत  की  l   महल  में  शास्त्रार्थ  हुआ   l   सभी  पंडित  पराजित  हुए  l   उनकी  प्रार्थना  पर   मूर्ति  ,  मंदिर  से   निकलकर    उनकी  गोदी  में  आ  गई   l   सभी  ने  रैदास  की  जय -जयकार  की  l   एक  बार  रैदास  झाला  रानी  के  भंडारे  में  भोजन भोजन   कर रहे  थे  l   उन्हें  अछूत  समझने  वाले  ब्राह्मणों  ने    अपना  स्वयं  का  अलग  भंडारा  किया   और  वे  खाने  बैठे  l   खाना  खाते   समय  का  दृश्य  बड़ा  ही  विस्मयकारक  था  ,  जब  ब्राह्मणों   का समूह  खाने  बैठा   तो  देखा  कि   प्रत्येक  की  बगल  में  रैदास  बैठे  हैं  l   तब  उन्हें  यह  ज्ञात  हुआ  कि   हम  जिन्हे  अछूत  समझ  रहे  हैं  वे  असाधारण  व्यक्ति  हैं   l