2 October 2022

WISDOM ----

   लघु -कथा ----  बहुत  पुरानी  बात  है  जब  अरब  देशों  से  व्यापारी  हिंदुस्तान  आते  थे  l  एक  व्यापारी  ने  यहाँ  व्यापर  में  बहुत  धन  कमाया  और  अपने  साथियों  सहित  अपने  देश  लौट  रहा  था  l  रास्ते  में  जंगल  में  एक  संत  का  आश्रम  था , सुन्दर  बगीचा , ठंडा  पानी  --- उसने  संत  से  कुछ  दिन  वहां  रुकने  की  अनुमति  मांगी  l  संत  ने  अनुमति  दे  दी  और  कहा -- यहाँ  आश्रम  में  जितने  भी  पक्षी  आते -जाते  हैं  ,तुम  उन्हें  तंग  नहीं  करना  l  वह  व्यापारी  देखता  था  कि  आश्रम  में  दो -तीन  पिंजरे  हैं  जिनमे  तोते  आदि  के  लिए  दाना -पानी  रखा  है   और  वे  पिंजरे  खुले  हैं  ,  दो  तोते  आते  हैं  , दाना -पानी  ग्रहण  करते  , आपस  में  बहुत  बात  करते , मनुष्य  की  तरह  बोलना  भी  जानते   l  बहुत  प्रसन्न  थे  , जब  चाहे  पिंजरे  में  आते  , जब  चाहे  उड़  जाते  l  संत  के  साथ  रहकर  वे  मन्त्र  आदि  भी  सीख  गए  थे  l   एक  दिन   संत  कहीं  गए  हुए  थे  उसने  मौका  देखकर  एक  तोते  को  पकड़  लिए  और  अपने  साथियों  समेत  अपने  देश  को  चल  दिया  l  संत  के  नाम  एक  पत्र  छोड़  दिया , क्षमा  मांगते  हुए  उसने  लिखा  कि  वह  इस  तोते  को  बहुत  स्नेह  व  प्यार  से  रखेगा  l  अरब  पहुंचकर  उसने  तोते  को  एक  सुन्दर  पिंजरे  में  कैद  कर  दिया  l  वह  तोते  का  बहुत  ध्यान  रखता  , उससे  बातें  करता   लेकिन  पिंजरा  बंद  ही  रखता  था  l खैर !  एक  दो  वर्ष  बाद  उसे  पुन:  व्यापार    के  लिए  हिंदुस्तान  आना  था   उसने  तोते  से  कहा  --मैं  तुम्हारे  देश  जा  रहा  हूँ , अपने  मित्र  के  नाम  कोई  सन्देश  देना  हो  तो  बताओ  l "  तोते  ने  कहा --- " मित्र  से  कहना  --मैं  खुले  आकाश  में  तुमसे  मिलने  का , बातें  करने  का  इंतजार  कर  रहा  हूँ  , कब  और  कैसे  मेरी  यह  इच्छा  पूरी  होगी  ? "    हिंदुस्तान  में  बहुत   दिन  व्यापार  के  बाद  वह  लौटते  हुए  उस  आश्रम  में  गया   l  संयोग  से  उसका  मित्र  तोता  उस  खुले  पिंजरे  में  था  , व्यापारी  ने  उस  तोते  को  उसके  मित्र  का  सन्देश  सुना  दिया  l  सन्देश  सुनते  ही  वह  तोता  प्राणहीन  होकर  गिर  पड़ा  l  व्यापारी  बहुत  डरा  कि  संत  कही  उसे  श्राप  न  दे  दें इसलिए  वह  तुरंत  वहां  से  भागा  और  अपने  देश  पहुंचा  l  तोते  के  लिए  नया  पिंजरा , बहुत  सा  दाना  आदि  बहुत  उपहार  लेकर  आया  l  तोते  ने  पूछा ---- ' मेरे  मित्र  ने  सन्देश  सुनकर  क्या  जवाब  दिया  ? "  व्यापारी  ने  उसे  धैर्य  बंधाते  हुए  कहा  --- "  तुम्हारा  सन्देश  सुनते  ही  वह  मृत  होकर  गिर  पड़ा  l  "  यह  सुनते  ही  वह  तोता  भी  प्राण -हीन  होकर  पिंजरे  में  गिर  पड़ा  l  व्यापारी  ने  अपने  सेवकों  से  कहा --- 'यह  तो  मर  गया , इसे  बाहर  फेंकों  l "  सेवकों  ने  उसे  बाहर  निकाल  कर  जैसे  ही  फेंका  , वह  पंख  फड़फड़ा  कर  ऊपर  पेड़  पर  जा  बैठा   और  कहा --- यही  सन्देश  मेरे  मित्र  का  था  ,  जहाँ  ताकत  से  काम  नहीं  चलता , वहां  बुद्धि  और  विवेक  से  काम  लेना  पड़ता  है  l  "    अब  वह  आजाद  था ,  वहीँ  संत  के  आश्रम  में  दोनों  तोते  प्रसन्न  थे  l  

1 October 2022

WISDOM

  लघु -कथा ---- किसी  धर्मात्मा  ने   जंगल  में  एक  सुन्दर  मकान   और  उसकी  बगल  में  सुरम्य  उद्यान  इस  उद्देश्य  से  बनवा  रखा  था  कि  उधर  से  आने -जाने  वाले  यात्री   उसमे  ठहरें , विश्राम  करें  l  समय -समय  पर  अनेक  लोग  वहां  आते   और  ठहरते  रहे  l  वहां  पर  नियुक्त  दरबान  हर  एक  से  पूछता  --- " बताइए  मालिक  ने  इसे  किन  लोगों  के  लिए  बनाया  है  l  :  तो  आने  वाले  अपनी -अपनी  द्रष्टि  से  उसका  उद्देश्य  बताते  l  चोरों  ने  कहा ---- " एकांत  में  सुस्ताने , हथियार  जमा  करने  और  माल  का  बंटवारा  करने  के  लिए  l  "  व्यभिचारियों  ने  कहा --- " बिना  किसी  खटके  और  रोक -टोक  के  स्वेच्छाचारिता  बरतने  के  लिए  l  "  जुआरियों  ने  कहा  --- "  जुआ  खेलने  और  लोगों  की  आँखों  से  बचे  रहने  के  लिए  l " कलाकारों  ने  कहा --- " एकांत  का  लाभ  लेकर   एकाग्रता पूर्वक  कला  का  अभ्यास  करने  के  लिए   l  "  संतों  ने  कहा --- " शांत  वातावरण  में  भजन  करने  और  ध्यान  करने  के  लिए  l  "   जैसे  जिसके  संस्कार  होते  हैं    , उसका  किसी  को  देखने  का  नजरिया  भी  वैसा  ही  होता  है  l  

30 September 2022

WISDOM -----

  समय  परिवर्तनशील  है  लेकिन  मनुष्य  की  मानसिक  प्रवृत्तियां ---लोभ , लालच , महत्वाकांक्षा , कामना------ आदि  इनमें  परिवर्तन  नहीं  होता  l  एक  समय  था  जब  ब्रिटेन  का  सूर्य  कभी  अस्त  नहीं  होता  था  , अनेक  देश  गुलाम  थे  l   साम्राज्यवादी  नीति  की  आलोचना  हुई  , धीरे -धीरे  सब  देश  आजाद  हो  गए  l  लेकिन  स्वयं  को  श्रेष्ठ  समझने  का  अहंकार  और  गुलाम  बनाने  की  प्रवृत्ति  नहीं  गई  , वैज्ञानिक  प्रगति  के  साथ  उसका  रूप  बदल  गया  l  अब  किसी  देश  को  गुलाम  नहीं  बनाना  है  ,  उसके  विभिन्न  क्षेत्रों  जैसे  कृषि , शिक्षा , चिकित्सा  , मनोरंजन  आदि  पर  कब्ज़ा  कर  के  उसकी  पहचान  को  मिटाना  है   जैसे  जो   विश्व  के  अग्रणी  देश  हैं  वे  समझते  हैं  कि  उनके  बीज   , उनकी  खाद , उनकी , शिक्षा , चिकित्सा  आदि  सर्वश्रेष्ठ  है  तो  पूरी  दुनिया   उनको  माने  अपने  पुरातन  काल  से  चले  आ  रहे  तरीकों  को  छोड़  दे   l  जब  देशी  तरीके  से , देशी  बीजों  से  कृषि  उत्पादन  होता  था   तब  मटर , टमाटर , गोभी  आदि  कच्चा  भी  खा  लो  तो  फायदा  होता  था   लेकिन  अब  !  उसमे  ऐसी  रासायनिक  खाद , कीटनाशक  आदि  हैं   कि  कच्चा  खा  ले  तो  बीमार  हो  जाये  l  पका  कर  भी  खाओ  तब  भी  उनके  रसायन  शरीर  को  नुकसान  पहुंचाते  हैं  l  इसी  तरह  चिकित्सा  --आयुर्वेदिक  दवा  का  कोई  साइड  इफेक्ट  नहीं  होता   लेकिन  ऐलोपथिक  दवा  के  साइड  इफेक्ट  होते  हैं  , एक  बार  व्यक्ति  बीमार  हो  जाये  तो  कभी  भी  पूर्ण  स्वस्थ  नहीं  होता , एक  बीमारी  ठीक  हुई  तो  उसके  बाद  दूसरी , फिर  तीसरी  बीमारी  झेलते  हुए  ही  व्यक्ति  चला  जाता  है  l  इसी  तरह  हर  क्षेत्र  में   अपनी  पहचान  खोने  से  संस्कृति  पर  संकट  आ  जाता  है   l  जब  जागरूकता  होगी  तभी  समय  फिर  बदलेगा  l 

WISDOM -----

 आज  हम  संसार  में  देखते  हैं  कि  अमीर  बनने  की  होड़  है  l  और  संपत्ति  में  से  दान  करने  की  भी  होड़  सी  है  l  लेकिन  इतने  अधिक  दान -पुण्य  के  बावजूद  भी  संसार  में  सुख -शांति  नहीं  है , बड़े  युद्धों  का  खतरा  है , लोग  तनाव  में  हैं, दंगे , फसाद , गोलीकांड , आत्महत्या , भ्रष्टाचार , छल -कपट , षड्यंत्र  , धोखा    सामान्य  बात  हो  गई  है  l  जितने  बड़े  अस्पताल हैं , चिकित्सा  की  सुविधाएँ  हैं   उतनी  ही  बड़ी  बीमारियाँ  हैं  l  सामान्य  मृत्यु  कम  है ,  बीमारी  से  मरने  वालों  की  संख्या  बहुत  है   l  हमारे  प्राचीन  ऋषियों  का  और  आचार्य  का  कहना  है  कि  धन   कैसे  तरीकों  से  कमाया  जाता  है  और  उसको  दान  करने  के  पीछे  भावना  क्या  है  ?  उसका  प्रभाव  जन -मानस  पर  पड़ता  है  l  भगवान  बुद्ध  ने  कहा  है -- पात्र -कुपात्र  का  विचार  किए  बिना  सम्पदा  को  लुटा -फेंकने  का  नाम  दान  नहीं  है  l यश  बटोरने  के  लिए , अपने  अहम्  की  पूर्ति  के  लिए   दान  करने  के   सत्परिणाम    कम  और  दुष्परिणाम  अधिक  देखने  को  मिलते  हैं  l '   कहते  हैं  कलियुग  का  निवास  स्वर्ण  अर्थात  धन -सम्पदा  में  होता  है   l  महाराज  परीक्षित  ने  स्वर्ण मुकुट  पहना  था  तो  उनकी  बुद्धि  भ्रष्ट  हो  गई  थी  , यह  बात  आज  भी  उतनी  ही  सत्य  है   , आज  दान  के  पीछे  अपने  स्वार्थ  है  , व्यक्ति  एक  हाथ  से  दान  करता  है  तो  दूसरे  हाथ  से  उससे  डबल  कमाई  का  रास्ता  खोज  लेता  है  l  यदि  लोक  -कल्याण  का  भाव  होता  तो  युद्ध  न  होते ,  भूमि , जल , मिटटी , कृषि  आदि  प्रदूषित  न  होती  , संसार  में  कितने  ही  गरीब  देश  हैं  जहाँ  भुखमरी  है , वहां  खुशहाली  होती  l   कहते  हैं  यदि  धन  पवित्र  साधनों  से  कमाया  जाये  और  उसका  सदुपयोग  हो  तो  वह  संसार  में  खुशहाली  लाता  है   लेकिन  यदि  धन  सत्ता  पर  चढ़  बैठे   तो  वही  होता  है  जो  आज  हम  संसार  में  देख  रहे  हैं  l  प्राकृतिक  आपदाओं , बीमारी , महामारी  आदि  के  माध्यम  से  ईश्वर  हमें  संकेत  देते  हैं  l  आज  संसार  को  सद्बुद्धि  की  जरुरत  है  , इसके  लिए  सब  प्रार्थना  करें  l  

29 September 2022

WISDOM -----

 एक  व्यक्ति  एक  संत  के  पास  अपनी  जिज्ञासा  लेकर  पहुंचा   और  बोला ---- " महाराज  ! मैं  विवाह  करना  चाहता  हूँ  l  मैंने  अनेक  युवतियों  को  देख  भी  लिया  है  , परन्तु  अभी  तक  मुझे  कोई  सबसे  योग्य  युवती  नहीं  मिली  l "   संत  बोले ---- "  बेटा  ! तुम  पहले  फूलों  के  बगीचे  में  सबसे  सुन्दर  गुलाब  का  फूल  तोड़कर  लाओ  , लेकिन  शर्त  यह  है  कि  एक  बार  आगे  बढ़ने  के  बाद  पीछे  नहीं  मुड़ना  l "  थोड़ी  देर  बाद  व्यक्ति  खाली  हाथ  लौटा  l  संत  ने  पूछा --- " बेटा  ! तुम्हे  कोई  सुन्दर  फूल  नहीं  मिला  ? "  वह  व्यक्ति  बोला  --- " महाराज  ! मैं  अच्छे -से -अच्छे  फूल  की  चाहत  में  आगे  बढ़ता  गया  l  मार्ग  में  अनेक  सुन्दर  फूल  दिखे  ,  परन्तु  मैं  इस  चाहत  में  आगे  बढ़ता  गया   कि  आगे  और  भी  सुन्दर  फूल  होंगे  l  दुर्भाग्यवश  अंत  में  फिर  मुरझाये  फूल  मिले  l  "  संत  बोले  ---- " बेटा  !  जीवन  भी  इसी  प्रकार  है  l  सबसे  योग्य  की  तलाश  में  भटकते  रहोगे  तो  जो  संभव  है  ,  उससे  भी  हाथ  धो   बैठोगे  l  इसलिए  जो  प्राप्त  हो  सकता  है  ,  उसी  में  संतोष  करने  की  वृत्ति  पैदा  करो  --- यही  संभव  समाधान  है  l  "

28 September 2022

WISDOM -----

 लघु -कथा ---- राजा  अग्निमित्र  और  श्रेष्ठी  सोमपाल  मित्र  थे  l  उनमे  बहस  हो  गई  l  सोमपाल  ने  कहा  राज्य  का  संरक्षण  उपयोगी  तो  है  , पर  अनिवार्य  नहीं  l  ईश्वर प्रदत्त  विभूतियों  और  साधनों  से  मनुष्य  बहुत  मजे  में  रह  सकता  है  l  राजा  को  क्रोध  आ  गया  और  उन्होंने  चुनौती   दी --" अच्छा  एक  वर्ष  नगर  में  मत  घुसना , जंगल  की  सीमा  में  रहना  l  अन्दर  आए  तो  जेल  में  डाल  दूंगा  l  हार  मान  लो  तो  प्रतिबन्ध  हटा  दूंगा   और  यदि  एक  वर्ष  में  कुछ  उल्लेखनीय  कर  के  दिखा    दोगे  तो    मैं  हार  मान  लूँगा  l "  सोमपाल  सिमित  साधन  लेकर  जंगल  में  प्रवेश  कर  गए   l  वहां  एक  निराश  लकड़हारा  मिला  l  श्रम  बहुत  करने  पर  भी  परिवार  का  पोषण  ठीक  से  न  कर  पाने  के  कारण  दुखी  था  l  सोमपाल  ने  उसे  उत्साहित  किया   और  कहा , मित्र  , मैं  तुम्हारी  मदद  करूँगा  , दोनों  मिलकर  बड़ा   काम  करेंगे   l  लकड़हारा  राजी  हो  गया  l   सोमपाल  ने  उससे  कुल्हाड़ी  ले  ली  और  स्वयं  लकड़ी  काटने  लगे  और  उसे  नगर    के  समाचार  लेने  भेज  दिया  l  प्राप्त  सूचनाओं  के  आधार  पर  वे  उसके  द्वारा  जलाऊ  और  इमारती  लकड़ी  बेचने  लगे  l  धीरे -धीरे  काम  बढ़  निकला  , अधिक   मजदूर    लगाकर  अधिक  काम  होने  लगा  l  नगर वासी  भी  उससे  लाभान्वित  होने  लगे  l  तभी  पता  चला  नगर  में  विशाल  यज्ञ  होने  वाला  है  l  सोमपाल  ने  यज्ञ  के  लिए  समिधाओं  तथा  सुगन्धित  वनौषधियों  का  संग्रह  कर  लिया  l  यज्ञ  संयोजकों  को   सूचना   मिली  तो  अच्छे  मूल्य  पर   तैयार  वस्तुएं  खरीद  ली  गईं  l  इस  प्रकार  नगर  की  ढेरों  आवश्यकताएं  सोमपाल  के  तंत्र  से  पूरी  होने  लगी  l  जब  राजा  को  सुचना  मिली  तो  खोजा  गया  कि  इस  तंत्र  के  पीछे  कौन  है  l  तब  राजा  स्वयं  अपने  मित्र  सोमपाल  से  मिलने  गए  , प्रेम  से  मिले  और  पूछा --' तुम  तो  शहर  में  घुसे  नहीं  ,  यह  सब  कैसे  विकसित  किया  ? ' सोमपाल  बोले --- " मित्र , यह  मेरी  विचार शक्ति  और  लकड़हारे  की  शरीर  शक्ति  का  संयोग  है  l  इसी  के  संयोग  से  वन सम्पदा  नगर वासियों  के  काम  आई  और  एक  वर्ष  का  समय  हम  सब  के  लिए  बहुमूल्य  बन  गया  l  इस  कथा  से  हमें  यही  शिक्षा  मिलती  है   कि  ईश्वर  ने , प्रकृति  ने  मनुष्य  को  असीमित  अनुदान  दिए  हैं  ,  अपने  जीवन यापन  के  लिए  राज्य  या  किसी  की  ओर  मुंह  ताकने  के  बजाय  मनुष्य  अपनी  बुद्धि  और  श्रम  का  पूर्ण  मनोयोग  से  इस्तेमाल  कर  के  बहुत  कुछ  हासिल  कर  सकता  है  l  

27 September 2022

WISDOM

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- " ईर्ष्यालु  व्यक्ति  की  जीवन  यात्रा  अधूरी  सी  होती  है  ,  जिसमे  जो  मिलता  है ,  उसकी  कद्र  नहीं  होती  और  जो  नहीं  मिल  पाता  , उसका  विलाप  चलता  रहता  है  l  ऐसे  व्यक्ति  को  लगता  है  कि  दूसरों  का  जीवन  आसान  है  , उन्हें  कोई  कष्ट  नहीं   l  ईर्ष्यालु  व्यक्ति  कभी  भी  अपने  जीवन  से  संतुष्ट  नहीं  होता  , असंतोष  उसे  हर  पल  घेरे  रहता  है  l  उसे  लगता  हैहै  कि  सबसे  ज्यादा  तकलीफ  उसी  के  जीवन  में  है   और  दूसरे  बिना  किसी  कठिनाई  के  ही  आगे  बढ़ते  जा  रहे  हैं   l "  एक  कथा  है ------  एक  व्यक्ति  के  मरने  का  समय  आया  तो  देवदूत  उसे  लेने  पहुंचे  l  उस  व्यक्ति  ने  जीवन  में  कई  पुण्य  किए  थे  और  पाप  भी  l  देवदूत  उसके  हाथ  में  एक  पुस्तक  देते  हुए  बोले  --- 'तुम्हारे  पुण्य  कर्मों  के  बदले  यह  पुस्तक  तुम्हे  देते  हैं  l  यह  नियति  की  पुस्तक  है  , इसमें  सारे  प्राणियों  के  भाग्य  लिखे  हैं  , तुम  चाहो  तो  इसमें  कोई  एक  परिवर्तन  अपने  पुण्य  कर्मों  के  बदले  कर  सकते  हो  l "  उस  व्यक्ति  ने  पुस्तक  के  पन्ने  पलटने  आरंभ  किए  ,  अपना  पन्ना  देखने  से  पूर्व  वह  दूसरों  के  भाग्य  के  पन्ने  पढ़ने  लगा  l  जब  उसने  अपने  पड़ोसियों म के  भाग्य  के  पन्ने  देखे  तो  उनका  भाग्य  देखकर  वह  जल भुन  गया   और  मन  ही  मन  बोला  --मैं  कभी  इन  लोगों  को  इतना  सुखी  नहीं  होने  दूंगा  और  क्रोध  में  भरकर  वह  उनके  पन्नों  में  फेर -बदल  करने  लगा  l  देवदूतों  द्वारा  दिए  गए  निर्देश  के  अनुसार    परिवर्तन  केवल  एक  बार  ही  किया  जा  सकता  था  l  अत -:  जैसे  ही  उसने  एक  बदलाव  किया  ,  देवदूत  ने  वह  पुस्तक  उसके  हाथ  से  ले  ली  l  अब  वह  व्यक्ति  बहुत  पछताया  , क्योंकि  यदि  वह  चाहता  तो   अपनी  नियति  में  सुधार  कर  सकता  था  , पर  ईर्ष्या  के  वशीभूत  होकर  वह  दूसरों  की  नियति  बिगाड़ने  में  लग  गया   और  अवसर  गँवा  बैठा  l  मनुष्य  ऐसे  ही  जीवन  में  आए  बहुमूल्य  अवसरों  को  गँवा  देता  है  l