10 May 2013

REVERENCE

अंत:करण की उत्कृष्टता को श्रद्धा के नाम से जाना जाता है | श्रद्धा का अर्थ है -श्रेष्ठता के प्रति अटूट आस्था | यह आस्था जब सिद्धांत एवं व्यवहार में उतरती है तो उसे निष्ठा कहते हैं | श्रद्धा का आविर्भाव सरलता और पवित्रता के संयोग से होता है | राम चरित मानस में श्रद्धा को भवानी और विश्वास को शंकर बताया गया है ,इन्ही दोनों की सहायता से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है | श्रद्धा तप है ,यह ईश्वरीय आदेशों पर निरंतर चलते रहने की प्रेरणा देती है | आलस्य से बचाती है ,कर्तव्य पालन में प्रमाद से बचाती है ,सेवा धर्म सिखाती है ,अंतरात्मा को प्रफुल्ल ,प्रसन्न रखती है | इस प्रकार के तप और त्याग से श्रद्धावान व्यक्ति के ह्रदय में पवित्रता एवं शक्ति का भंडार अपने आप भरता चला जाता है |

        एक बणिक था ,नाम था -शौर पुच्छ | उसने एक बार भगवान बुद्ध से कहा -"भगवन !मेरी सेवा स्वीकार करें | मेरे पास एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ हैं ,वह सब आपके काम आयें | "बुद्ध कुछ न बोले चुपचाप चले गये | कुछ दिन बाद वह पुन:तथागत की सेवा में उपस्थित हुआ और कहने लगा -"देव !ये वस्त्र और आभूषण लें ,दुखियों के काम आयेंगे ,मेरे पास अभी बहुत सा धन शेष है | "बुद्ध बिना कुछ कहे वहां से उठ गये | शौर पुच्छ बड़ा दुखी था कि वह गुरुदेव को किस तरह प्रसन्न करे ?
वैशाली में उस दिन महान धर्म सम्मेलन था हजारों व्यक्ति आये थे | बड़ी व्यवस्था जुटानी थी | सैंकड़ों शिष्य और भिक्षु काम में लगे थे | आज शौर पुच्छ ने किसी से कुछ न पूछा ,काम में जुट गया | रात बीत गई ,सब लोग चले गये ,पर शौर पुच्छ बेसुध कार्य में निमग्न रहा | बुद्ध उसके पास पहुँचे और बोले -"वत्स !तुमने प्रसाद पाया या नहीं ?"शौर पुच्छ का गला रुंध गया | भाव -विभोर होकर उसने तथागत को प्रणाम किया | बुद्ध ने कहा वत्स !परमात्मा किसी से धन और संपति नहीं चाहता ,वह तो निष्ठा का भूखा है वह लोगों की निष्ठा में ही रमण किया करता है |
         
       ईश्वर को न किसी से मनुहार चाहिये ,न उपहार | चरित्रवान और लोकसेवी बनकर ही हम उसे प्रसन्न कर सकते हैं | 

9 May 2013

CALAMITY

महान विचारक रूसो से किसी ने एक बार पूछा -"आपने किस स्कूल में शिक्षा प्राप्त की ?"स्कूल के तो कभी दर्शन नहीं किये थे ,परंतु शिक्षा तो अवश्य प्राप्त की थी | किस पाठशाला का नाम लें ?रूसो ने उत्तर दिया -"विपति की पाठशाला में "|
विपति नित्य खुली रहने वाली बहुत बड़ी पाठशाला है | आने वाली विपतियाँ हमें सिखाने के लिये ऐसी महत्वपूर्ण शिक्षायें अपने साथ लेकर आती हैं कि यदि कोई उन्हें सीख सके तो वह अपने जीवन को ,व्यक्तित्व को सफल बना सकता है | अधिकांश लोग विपतियों के आने पर रोने ,घबड़ाने लगते हैं अथवा उनसे पलायन की बात सोचने लगते हैं | विपतियाँ न तो रोने के लिये हैं और न जीवन से पलायन करने के लिये हैं | विपति रूपी स्कूल में सफल होने के लिये कुछ बातें आवश्यक हैं -----
1 -विपतियों के प्रति स्वीकारात्मक द्रष्टिकोण -न तो विपतियों से भागना और न उनसे घबराना | विपतियों को एक परीक्षा ,एक चुनौती मानकर उनमे जीने का साहस किया जाये तो विपतियाँ सचमुच वरदान बन जाती हैं | 'विपदायें ऐसी परीक्षायें हैं जो हमें मजबूत बनाने ,हमारे मनोबल को परखने और हमारे जीवट को जांचने के लिये आती हैं |
2 विवेक बुद्धि को जाग्रत रखना और धीरज बनाये रखना विपति की पाठशाला में सफल होने का दूसरा सूत्र है | विपति आने पर मनोबल बनाये रखते हुए संकट का धैर्य पूर्वक सामना किया जाये | विपतियाँ कुछ समय की हैं और जीवन बहुत लम्बा है |
3 तीसरा सूत्र है -व्यस्त जीवन क्रम और समय का सदुपयोग | खाली समय में ही चिंतायें पैनी बनकर तीर की तरह चुभती हैं | अत:शरीर और मन मस्तिष्क को किसी उपयोगी कार्य में व्यस्त रखा जाये तब उनसे संघर्ष करने का नया मार्ग भी निकाला जा सकेगा | महान विचारक रूसो का प्रारंभिक जीवन बड़ी कठिनाइयों में गुजरा ,उनके माता -पिता शैशव काल में गुजर चुके थे | वे दिन भर मेहनत कर शेष समय पढ़े -लिखे लोगों से अनुनय विनय कर अपने शैक्षणिक विकास में लगाते थे ,समय के सदुपयोग के कारण ही वे महान विचारकों और नई समाज व्यवस्था के मनु पद तक पहुंच सके |

4 विपतियों पर विजय का महत्वपूर्ण सूत्र है -जीवन के उज्जवल पक्ष पर ध्यान केन्द्रित करना | प्रख्यात धनपति हैराल्ड एबोट के जीवन की सारी कमाई किसी संकट के कारण नष्ट हो गई ,उनपर कर्ज चढ़ गया ,जिसे चुकाने के लिये वर्षों परिश्रम की आवश्यकता थी ,मन चिंताओं से भरा था | पराजित व्यक्ति के समान दुखी होकर वे कहीं चले जा रहे थे | सड़क पर एक अपंग व्यक्ति दिखाई दिया ,जिसकी दोनों टांगे कट गईं थीं वह हाथों के सहारे चलता था | उसने हँसते हुए हैराल्ड साहब का स्वागत किया और प्रसन्नता से बोला -कैसा सुहाना प्रभात है ,कहिये अच्छे तो हैं ?इस अपंग व्यक्ति के प्रसन्नचित ,उल्लास और हर्ष ने हैराल्ड एबोट की सभी चिंताओं को मिटाकर रख दिया | वे सोचने लगे जब यह अपंग और लाचार व्यक्ति भी इतना आनंदित है तो इसकी तुलना में मैं बहुत भाग्यशाली हूं |
विपतियाँ चाहें जितनी भयंकर और विकराल हों और भले ही व्यक्ति का सब कुछ छिन जाये परन्तु फिर भी उसके पास कुछ न कुछ ऐसा बचा ही रहता है जिसके आधार पर वह अपने भविष्य को पुन:संवार सकता है | 

8 May 2013

WISDOM

संसार रूपी इस जीवन -समर में ,जो स्वयं को आनंदमय बनाये रखता है ,दूसरों को भी हँसाता रहता ,वह ईश्वर का प्रकाश ही फैलाता है | यहां जो कुछ भी है ,आनंदित होने तथा दूसरों को प्रसन्नता देने के लिये ही उपजाया गया है | जो कुछ भी बुरा व अशुभ है ,वह मनुष्यों को प्रखर बनाने के लिये मौजूद है | जो प्रतिकूलताओं से डरकर रो पड़ता है ,कदम पीछे हटाने लगता है ,उसकी आध्यात्मिकता पर कौन विश्वास करेगा |
             कठिनाइयाँ एक ऐसी खराद की तरह हैं ,जो मनुष्य के व्यक्तित्व को तराश कर चमका दिया करती हैं | कठिनाइयों से लड़ने और उन पर विजय प्राप्त करने से मनुष्य में जिस आत्मबल का विकास होता है ,वह एक अमूल्य संपति होती है ,जिसको पाकर मनुष्य को अपार संतोष होता है | कठिनाइयों से संघर्ष पाकर जीवन में ऐसी तेजी उत्पन्न हो जाती है ,जो पथ के समस्त झाड़ -झंखाड़ों को काटकर दूर कर देती है | 

SELF - CONFIDENCE

'भाग्य की कल्पना मूढ़ लोग करते हैं और भाग्य पर आश्रित हो कर वे अपना नाश कर लेते हैं | बुद्धिमान लोग तो पुरुषार्थ द्वारा ही उत्कृष्ट पद को प्राप्त करते हैं | '
              एक बढ़ई किसी मजिस्ट्रेट की मेज को बहुत अधिक सावधानी से तैयार कर रहा था |किसी ने पूछा तुम इसे इतने परिश्रम से क्यों बना रहे हो ?बढ़ई ने इस प्रकार उत्तर दिया -"जब मैं मजिस्ट्रेट बनकर इस मेज पर काम करूं तो मुझे यह सुंदर लगे | "कुछ वर्ष बाद वह वास्तव में मजिस्ट्रेट बनकर उस मेज पर काम करने लगा |
आत्म -विश्वास में वह शक्ति है ,जिसके सहारे हम सहस्त्र विपतियों का सामना कर उन पर विजय प्राप्त कर सकते हैं | 

TOLERANCE

'उदार सहिष्णु और शांत जीवन जीने की शिक्षा हमें वृक्षों से मिलती है | "
उपद्रवों ,व्यंग -कटाक्षों को मुस्कराते हुए सुन लेना ,सह लेना और अपने लक्ष्य में निरत रहना ही सहिष्णुता है | संवेदनशील व्यक्ति क्रोधी नहीं होता | वह तो सतत अपने लक्ष्य की पूर्ति में ,आदर्शों को साकार करने में स्वयं को खपाता रहता है |
         
                लुकमान जिस नगर में रहते थे वहीँ एक सेठ भी रहता था जो अपने नौकरों पर सख्ती के लिये मशहूर था| उसका एक नौकर जो हकीम लुकमान के ही रूप रंग का था ,एक दिन भाग खड़ा हुआ उसकी खोज करते हुए सेठ की भेंट लुकमान से हो गई | उसने लुकमान को ही नौकर समझकर पकड़ लिया और घर लाकर काम पर लगा दिया | लुकमान ने भी कोई प्रतिरोध नहीं किया ,मेहनत से काम में जुट गये | एक वर्ष बीत गया |
तब वह पुराना नौकर आ गया ,अब सेठ को चिंता हो गई कि धोखे से किसे पकड़ लिया | सेठ ने लुकमान से पूछा -"सच कहो ,कौन हो आप ,मुझसे बड़ी गलती हो गई | "लुकमान ने कहा -"हकीम लुकमान "जो  हुआ उसका दुःख न करो ,मुझे मजदूरी करना आ गया | "

6 May 2013

CALMNESS

मानसिक संतुलन बनाये रहना उत्तेजित परिस्थितियों का सामना करने का सबसे अच्छा इलाज है |
          क्रोध को शांति से,अभिमान को नम्रता से ,माया को सरलता से और लोभ को संतोष से जीतना चाहिये |

         एक बार लोकमान्य तिलक को एक सभा में भाषण देना था | सरकारी पक्ष के कितने ही किराये के उपद्रवी सभा में उपद्रव करने लगे | ढेले और ईंट फेंकने लगे | लोकमान्य ज्यों के त्यों खड़े रहे | जब उपद्रवी शांत हो गये तब उन्होंने अपना शेष भाषण निर्भीकता पूर्वक कहा | उपस्थित जनता पर अच्छा असर पड़ा ,उपद्रवी भी शांत होकर वापस चले गये | लोक मान्य इस प्रकारघर लौटे मानो कुछ हुआ ही नहीं |


                  परिस्थिति का सामना करें
अलबानिया की रानी ऐलजाबेथ एक दिन समुद्री यात्रा पर जा रहीं थीं तूफान आया और जहाज बुरी तरह डगमगाने|लगा  मल्लाहों का धीरज टूट गया वे डूबने की आशंका व्यक्त करने लगे | रानी ने गंभीर मुद्रा में मल्लाहों से कहा ,-"अलबानिया के राज परिवार का कोई सदस्य अभी तक ज लयान दुर्घटना में डूबा नहीं | मैं जब तक इस पर सवार बैठी हूँ तब तक तुममे से किसी को भी डूबने की आशंका करने की जरुरत नहीं है ।मल्लाह निश्चिन्त होकर डांड चलाते रहे | तूफान शांत हुआ और जहाज शांति पूर्वक निश्चित स्थान पर पहुँच गया | यदि उन्हें घबराहट रही होती तो जहाज को डुबो बैठते | 

GENEROSITY

'उदारता वह दिव्य गुण है ,जो भावनाओं के तल से उभरता है ,अंकुरित होता है | यह तर्क का विषय नहीं है ,इसमें हम अपना नुकसान झेलकर भी औरों की प्रसन्नता एवं सहायता के लिये सब कुछ अर्पित करने के लिये तत्पर रहते हैं
                             हर्बर्ट हूबर अमेरिका के इकतीसवें (31 )राष्ट्रपति थे | | उनका बचपन एवं किशोर अवस्था घोर आर्थिक अभाव में व्यतीत हुआ | इन्ही अभाव के दिनों में जब वे कैलिफोर्निया कॉलेज में पढ़ रहे थे ,तब वहां पोलैंड के विश्वविख्यात संगीतज्ञ पेदेरेवस्की   अपनी मंडली के साथपधारे | हूवर ने एक योजना बनाई -उन्होंने उनसे 2 0 0 0 डॉलर में कांट्रेक्ट किया | इसमें यह था कि पेदेरेवस्की को 2 0 0 0 डॉलर देने के बाद शेष राशि उन्ही की होगी ,परंतु दुर्भाग्य टिकट की बिक्री बहुत कम हुई और समस्या यह आई कि 2 0 0 0 डॉलर कैसे चुकता किये जायें | हूवर बेहद हताश हो गये ,उन्होंने सारी स्थिति पेदेरेवस्की को बताई और कहा -"टिकट की बिक्री से केवल 837डॉलर मिले थे ,आप ये लें ,हॉल आदि का किराया मैं चुकाता रहूंगा | "सब बातें जानकर उन महान संगीतज्ञ ने कहा -बेटे !चिंता मत करो ,यह राशि तुम रखो और इससे आयोजन का खर्च चुकता कर दो | "फिर उन्होंने कुछ डॉलर हूवर के हाथ में थमाते हुए कहा -यह तुम्हारे कठोर परिश्रम और अटूट लगन का पारितोषिक है ,इसे स्वीकार करो और अपने जीवन में संवेदनशील बनना ,उदारता का परिचय देना |
           समय बीतता गया ,उन्होंने खानों में काम किया | हूवर उन महान संगीतज्ञ को कभी नहीं भूले |
प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर यूरोप की दयनीय दशा में सुधार लाने के लिये अमेरिका ने जो दस करोड़ डॉलर का ऋण स्वीकृत किया ,उसके वितरण की जिम्मेदारी उन्हें मिली | ऋण वितरित करते समय हूवर ने कहा -"मैं यह अमेरिका का धन नहीं पोलैंड के संगीतज्ञ पेदेरेवस्की की दी गई संवेदनाएँ बांट रहा हूं | "
            संवेदनाओं के इस वितरक को अमेरिका निवासियों ने राष्ट्रपति के सर्वोच्च आसन पर बैठाया ,विश्व ने इन्हें 'हर्बर्ट हूवर 'के नाम से जाना ,उन्होंने अपने जीवन के अंत तक औरों की सेवा -सहायता की |
1 9 अक्टूबर 1 9 6 4 की शाम उन्होंने अपनों के बीच कहा -"जीवन में किसी के प्रति निष्करुण मत होना ,सदा
     औरों की सेवा करना ,उदारता का परिचय देना | "इसके दूसरे दिन वे सदा के लिये इस संसार से विदा हो गये ,उनका जीवन औरों को सदा प्रेरित करता रहेगा |