28 April 2020

WISDOM -----

 हमारे  महाकाव्य   हमें  जीवन  जीना   सिखाते  हैं   l  ईश्वर  ने  धरती  पर  जन्म  लेकर  अपने  कार्यों  से ,  आचरण  से  संसार  को  शिक्षण  दिया  l  एक  ही  शिक्षण  को  आसुरी  प्रवृति  के  लोग  अपने  स्वार्थ  के  लिए  इस्तेमाल  करते  हैं  ,  लेकिन  सन्मार्ग  पर  चलने  वाले   उसी  शिक्षण  से  अपनी  रक्षा  करते  हुए  जीवन - पथ  पर  आगे  बढ़ते  हैं  l   एक  प्रसंग  है  ----
  महाभारत  के  युद्ध  में    आचार्य  द्रोण   सेनापति  बने   l   जब  तक  उनके  हाथ  में  शस्त्र   है , तब  तक  उन्हें  हराना  असंभव  था  l   अर्जुन  आदि  सभी  उनके  शिष्य  थे  ,  उन्हें  कैसे   पराजित  कर  पाते  l   किन्तु  द्रोणाचार्य  अधर्म  के  साथ  थे  इसलिए  उन्हें  पराजित  तो  होना  ही  था  l   भगवान   कृष्ण  के  निर्देशन   में  सब  पता  किया  गया  तो  ज्ञात  हुआ  कि   यदि   द्रोणाचार्य  को  यह  कह  दिया  जाये  कि   उनका  पुत्र  अश्वत्थामा  मारा  गया   तो  वे  निराश  होकर  अपने  हथियार  रख  देंगे   , तब   पांडव  पक्ष  का  सेनापति  धृष्टद्द्युम्न   उनका  वध   कर देगा  ( धृष्टद्दुम्न  का  जन्म  ही  द्रोणाचार्य  के  वध  के  लिए  हुआ  था  l ) 
     इस  के  लिए  यह  योजना  बनाई  गई  की  कि  कौरव  पक्ष  में  अश्वत्थामा  नामक  एक  हाथी   है ,  उसका  वध  कर  के   यह  अफवाह  फैला  देंगे  कि   ' अश्वत्थामा  मारा  गया  l '   द्रोणाचार्य  शस्त्र  और  शास्त्र  दोनों  के  ज्ञाता  हैं ,  वे  इस  बात  का  विश्वास  नहीं  करेंगे   और  निश्चित  रूप  से  सत्यवादी  धर्मराज  युधिष्ठिर  से  अवश्य  सत्य  जानना  चाहेंगे   l   शेष  पांडवों  और  कृष्ण  ने   युधिष्ठिर  को  बहुत  समझाया  कि    द्रोणचार्य  के  पूछने  पर  वे  झूठ  बोल  दें  कि  ' हाँ , अश्वत्थामा  मारा  गया '     लेकिन  युधिष्ठिर  किसी  तरह  राजी  नहीं  हुए  l  तब  यह  तय  हुआ  कि  धर्मराज  युधिष्ठिर  इस  तरह  कहेंगे -- ' अश्वत्थामा  हतो  , नरो  व  कुंजरो '   ( अश्वत्थामा  मारा  गया , मनुष्य  नहीं ,  हाथी ) आगे  जो  होगा  पांडव  संभल  लेंगे  l
               अगले  दिन  युद्ध  शुरू  हुआ  ,  भीम  ने  अश्वत्थामा  नामक  हाथी   को  मार  दिया  ,  और  घंटे - घड़ियाल  के  साथ   सब  तरफ  यह  शोर  मचा  दिया ,  अफवाह  फैला  दी  कि  ' अश्वत्थामा  मारा  गया  " l   कौरव  सेना  में  भगदड़  मच  गई  कि  अश्वत्थामा  मारा  गया ,  अब  क्या  होगा  ?  कितने  सैनिक  तो  उस  भगदड़  में  दबकर  मर  गए  l   यह  अफवाह  द्रोणाचार्य  के  कानों  तक  पहुंची  ,  उनको  विश्वास  नहीं  हुआ  l   अफवाह  इतनी  तेजी  से  फैलती  है  कि   सामान्य जन  असलियत  जानने  की  कोशिश  ही  नहीं  करता  ,  उस  पर  विश्वास  कर  लेता  है   l   द्रोणाचार्य  जिससे  भी  पूछें ,  सब  यही  कहें  कि  ' हाँ , अश्वत्थामा  मारा  गया  l  अब  उन्होंने  सारथि  से  कहा  --- रथ  युधिष्ठिर  के  सामने  ले  चलो ,  वे  सत्यवादी हैं , धर्मराज  हैं , वही  सत्य  बताएँगे  l
गुरु  द्रोण   ने  युधिष्ठिर  से  पूछा  --- " युधिष्ठिर  !  तुम  सत्यवादी  हो , तुम  बताओ ,  क्या  मेरा  पुत्र  अश्वत्थामा  मारा  गया   ? "
युधिष्ठिर  पर  जैसा   दबाव  था ,  उन्होंने  कहा ---' अश्वत्थामा  हतो ---    युधिष्ठिर  के  इतना  बोलते  ही   भीम  आदि  पांडवों  ने  शंख , घंटे - घड़ियाल  सहित   इतना   शोर  किया   कि   आगे  का  शब्द ----' मनुष्य  नहीं  हाथी '   द्रोणाचार्य   को    सुनाई  ही  नहीं  दिया  ,  वे  अपने  पुत्र  से  बहुत  स्नेह  करते  थे ,  एकदम  निराश  हो  गए  ,  उनका  आत्मबल  गिर  गया ,  उन्होंने  अपने  अस्त्र - शस्त्र  सब  रख  दिए  ,  उसी  समय  उनके  जन्मजात  शत्रु   धृष्टद्दुम्न   ने  उनका  वध  कर  दिया  ,  चारों  तरफ  अफरा - तफरी  मच  गई  ,  कितने  ही  सैनिक  उसमे  मर  गए   l
  कहते  हैं   युधिष्ठिर  सत्यवादी  थे  ,  उनका  रथ  जमीन   से  ढाई  अंगुल  ऊपर  चलता  था  ,  यह  उनके  सत्य  की , धर्माचरण  की  शक्ति  थी   लेकिन    न  चाहते  हुए  भी   इस  झूठ  की  वजह  से  उनका  रथ  इस  पृथ्वी  से   स्पर्श  कर  चलने  लगा   और  मृत्यु  के  बाद  इस  एक  झूठ  की  वजह  से  उन्हें  एक  पल  का  नरक  भोगना  पड़ा   l
 महाभारत   का  यह  प्रसंग  हमें  इस  सत्य  को  बताता  है    कि   ंजन सामान्य   एक  साधारण  व्यक्ति  की  बात  का  विश्वास  नहीं  करता  ,  लेकिन   यदि  कोई  उच्च  पद  पर  प्रतिष्ठित  व्यक्ति    चाहे  किसी  के  दबाव  में  ही  झूठ  बोल  दे ,  किसी  अफवाह  पर  अपनी  मोहर   लगा  दे   तो  सामान्य  जन    उसे  सच  मानकर   उसका  विश्वास  कर  लेता  है  l   इसलिए  ऋषियों  ने  कहा  है  कि   उच्च  पद  पर  बैठे  व्यक्तियों  को   अपना  प्रत्येक  कदम  बहुत  सोच -  विचारकर  उठाना  चाहिए   
   

27 April 2020

WISDOM ------

  समय  परिवर्तनशील  है    l   एक  समय  था   जब  वर्ण  व्यवस्था  थी  ,   यह  एक  प्रकार  का  श्रम  विभाजन  था  ,  उस  समय  समाज  के  धन - संपन्न  वर्ग     राज  कार्य  में  सहयोग  के  लिए   धन  देते  थे  ,  सामाजिक  कार्यों  में  भी  सहयोग  देते  थे   l   इसके  पीछे  उनमे  लोक कल्याण  का  भाव  था  l   वे  जो  भी  दान - पुण्य  करते  थे   वह  परोपकार  के  लिए  करते  थे  ,  शासन  की  नीतियों  में  उनका  कोई  हस्तक्षेप  नहीं  होता  था  l
   भौतिक  प्रगति  के   साथ   धन  का   महत्व     बढ़ता  गया  l   जो  ंजितना  धनी   है  उसे  उतना  ही  सम्मान   मिलने  लगा   l   महत्वाकांक्षा  बढ़ती  गई  ,  धीरे - धीरे  उन्होंने  शासन  की  नीतियों   में     हस्तक्षेप  शुरू  कर  दिया  l   अहंकार  भी  आ  गया  कि   जब  हम  इतना  सहयोग  करते  हैं   तो  नीतियां  भी   हमारे  हित    की  होनी  चाहिए  l   तभी  से  राजनीति   व्यवसाय  बन  गई  l   इसी  का  परिणाम  हुआ  कि   अमीर  और  अधिक  अमीर  होते  गए  l   वे  चाहते  भी  नहीं  हैं  कि  गरीबों  के  जीवन  में  कोई  सुधार  हो  ,  उनके  प्रयास  तो  गरीबों  का  शोषण  कर  के   उन्हें  दीन - हीन    बनाये  रखने  के  ही  हैं  l   इस  निर्धन  और  शोषित  वर्ग  को  स्वयं  जागना  होगा   l 

WISDOM ------

  महाभारत  में  विभिन्न  प्रसंगों  के  माध्यम  से     संसार  को  शिक्षण  दिया  गया  है   जो  प्रत्येक  युग  में  और  प्रत्येक  व्यक्ति  के  लिए  उपयोगी  है   l   एक  प्रसंग  है  ----   अर्जुन  को  किसी  अन्य  राजा  के  साथ  युद्ध  में  उलझकर  द्रोणाचार्य  ने  चक्रव्यूह  की  रचना  की  l   पांडव  पक्ष  में  केवल  अभिमन्यु  ही  चक्रव्यूह  भेदना   जानता    था  l   चक्रव्यूह  में  सात  दरवाजे    थे  , अत:  यह  निश्चय  किया  गया  कि   प्रथम  द्वार  में  जैसे  ही  अभिमन्यु   प्रवेश  करेगा  ,  वैसे  ही  चारों  पांडव  भी  उसके  पीछे  उसमे  प्रवेश  कर  लेंगे  l
  प्रथम  द्वार  पर  जयद्रथ  था  ,  अभिमन्यु   ने  उसे  परास्त  कर   चक्रव्यूह  में  प्रवेश  कर  लिया  l   जयद्रथ  बहुत  वीर  था  और  उसे  वरदान  भी  प्राप्त  था  कि  अर्जुन  को  छोड़कर  वह  शेष  चार  पांडवों  को  एक  साथ  पराजित  कर  सकता  है  l   अत:  उसने  चारों  पांडवों  को  द्वार  पर  ही  रोक  दिया  , अंदर  नहीं  जाने  दिया  l   अभिमन्यु  अकेला  रह  गया  ,  जहाँ  अंत  में  सात  महारथियों  ने  मिलकर  उसे  मार  दिया  l
   अर्जुन  जब  सांयकाल  युद्ध  से  लौटा   और  ये  दुःखद   समाचार  सुना    तो  उसने  मालूम  किया   कि    उसके  पुत्र  की  हत्या  का  वास्तविक  जिम्मेदार  कौन  है  l
   तब  ज्ञात  हुआ  कि   प्रथम  द्वार  पर  जयद्रथ  था   जिसकी  वजह  से  चारों  पांडव  चक्रव्यूह   प्रवेश  नहीं  कर  सके  l   तब  अर्जुन  ने  प्रतिज्ञा  की  कि  '  यदि  कल  के  युद्ध  में  सूर्यास्त   से  पहले     वह  जयद्रथ  का  वध  नहीं  कर  सका   तो  स्वयं  को  अग्नि  में  समर्पित  कर  देगा , आत्मदाह  कर  लेगा  l '
   ' जयद्रथ  वध '  प्रसंग  के  माध्यम  से   इस  बात  को   स्पष्ट  किया  गया  है  कि   आसुरी  प्रवृति  के  लोग   अपने  ऊपर  मुसीबत  आने  पर  या  मुसीबत  आने  की  संभावना  होने  पर  छुप  जाते  हैं   लेकिन   प्रतिपक्षी  को  परेशान     देखकर  ,  जन - साधारण  को  भी  मुसीबत   में  झोंककर   उन्हें  बड़ा  सुकून  मिलता  है  ,  अपनी  ख़ुशी  छुपा  नहीं  पाते  और  सामने  आ  जाते  हैं  ,  तभी  हम  उन्हें  आसानी  से  पहचान  सकते  हैं  
   आज  के  युग  में   जब  सब  तरह  के  अपराधी  जमानत  लेकर  समाज  में  घुल-मिलकर  रहते  हैं  ,  न्याय   की  प्रक्रिया  है  ,  तब  हम  आसुरी  प्रवृति  के  लोगों  को  पहचानकर  सतर्क  होकर  रह  सकते  हैं   l
             अगले    दिन   युद्ध  शुरू  हुआ   l   दुर्योधन  ने  जयद्रथ  को  ऐसे  छुपा  दिया  कि   पूरा  दिन  बीत  गया  ,  लेकिन  अर्जुन ,    जयद्रथ  को  नहीं    ढूंढ   पाया  l   सूर्यास्त  हो  गया   l  प्रतिज्ञा   के  अनुसार      अब  चिता   सजाई  जाने  लगी  ,  अर्जुन  आत्मदाह  से   पूर्व  सबसे  विदा  लेने  लगा   l   यह  सब  देखकर  दुर्योधन  आदि  कौरव  बहुत  प्रसन्न  हुए   और  जयद्रथ  से  कहने  लगे  ---  चलो  ,  अर्जुन  चिता    में  समाने  जा  रहा  है  ,  ऐसा  सुन्दर  दृश्य  फिर  देखने  को  मिले , न  मिले  l   अब  सूर्यास्त  हो  गया   l ( उस  समय  सूर्यास्त  के  बाद  युद्ध  नहीं  होता  था  )    जयद्रथ  बहुत  प्रसन्न  था  ,  दुर्योधन  आदि  के  साथ  वहां  आ  गया  जहाँ  अर्जुन  आत्मदाह  की   तैयारी    में  था  l   जयद्रथ  अपनी  ख़ुशी  रोक  नहीं  पा  रहा  था  ,  उसने  कृष्ण  से  कहा ----( कवि   के  शब्दों  में )  --- गोविन्द  अब  क्या  देर  है  ,  प्रण   का  समय  जाता  टला    l 
  शुभ  कार्य  जितना  शीघ्र  हो ,  है  नित्य  उतना  ही  भला  l 
कौरव  चाहते  थे   अर्जुन  जल्दी  से  चिता     में  समा   जाये  जिससे   वे   बहुत  ख़ुशी  मना  सकें   l
     सुनकर  जयद्रथ  का  कथन  हरि   को  हंसी  कुछ  आ  गई ,  गंभीर  श्यामल  मेघ  में  विद्दुत  छटा  सी   छा   गई  l  भगवान   कृष्ण  ने  अर्जुन  से  कहा -- हे  पार्थ  ! प्रण   पालन  करो ,  देखो  अभी  दिन  शेष  है  l "
  दूसरों  का  विनाश  देखने  की  ख़ुशी  में  जयद्रथ  सामने  आ  गया  l   अर्जुन  के  साथ  स्वयं  भगवान   थे  ,  उसकी  चेतना  जाग्रत  थी  ,  उसने  उस  पल  का  उपयोग  करते  हुए  जयद्रथ  का  वध  कर    अपना  प्रण   पूरा  किया   l 

26 April 2020

WISDOM ---- मन: शक्ति का दुरूपयोग न होने पाए --- जनवरी २००८ में अखण्ड ज्योति में प्रकाशित एक लेख का अंश

'  योगशास्त्र  के  ज्ञाता  तपस्वीजन  अपनी  मन: शक्ति  का  उपयोग  आत्मचेतना  के  परिष्कार  में  करते  हैं  l   इससे  निजी  जीवन  में  पवित्रता , प्रखरता  और  ऋद्धि - सिद्धियों  के  अनुदान - वरदान  तो  मिलते  ही  हैं  , सामाजिक  जीवन  में  भी   उसके  सुखद  परिणाम  सामने  आते  हैं  l ---- विगत  कुछ  वर्षों  से  परामनोविज्ञानियों  ने   मानवीय  मन: शक्ति  पर  गहन  अनुसन्धान  किये  हैं   और  अब  उसका  उपयोग 
 ' साइकिक  वेपन्स '--- मानसिक  अस्त्र  के  रूप  में  करने  की  योजनाएं   बना  रहे  हैं  l   रूस , चीन  व  अमेरिका   जैसे  संपन्न  राष्ट्र   इस  दिशा  में  सर्वाधिक  अग्रणी  माने  जाते  हैं   l   स्टार  वार  से  भी   आगे  बढ़कर   ' मांइड  वार '  की  इस  युद्ध  योजना  को   अधिक  प्रभावी  एवं   अचूक  अस्त्र  माना  जा  रहा  है   l   इसके  द्वारा  शत्रु  पक्ष  के   सभी  आयुधों   एवं   रणनीति  को   विफल  किया  जा  सकेगा   l   मानसिक  तरंगों  के  माध्यम  से   विपक्ष  की  गुप्त  योजनाएं   जान  लेने   और  उन्हें  असफल  बना  देने  की   तैयारियां   मूर्धन्य  वैज्ञानिकों   के  निर्देशन  में   क्रियान्वित  हो  रही  हैं   l -------
  रामायण  और  महाभारत  काल  में  कितने  ही  अस्त्र - शस्त्र  मन  की  गति  से  संचालित  होते  थे   और  शत्रु  पक्ष  का  विनाश  कर  के  प्रयोक्ता  के  पास  वापस  लौट   आते  थे  l   ' अप्वा ' नामक  अस्त्र  की   शक्ति  के  प्रयोग  से   दुश्मन  के  तत्काल  मूर्छित  होने  के  प्रमाण  भी  मिलते  हैं  l  यह  एक  प्रकार  से  भय   की  व्याधि  है   ,  जिससे  व्यक्ति  की  आंतरिक  सुख - शांति  सदा - सर्वदा  के  लिए    भंग   हो  जाती  है  l ---
  इस  सदी  के  युद्ध  विज्ञानी  भी   अब  ऐसे  ही  कुछ   प्रयोग - परीक्षणों  में   निरत  हैं   l 
  मानव  मन  असीम  संभावनाओं   एवं   क्षमताओं  से   परिपूर्ण  है  l   आज  के  संपन्न  व  समर्थ  कहे  जाने  वाले  राष्ट्र   मनुष्य  की  प्रकृतिदत्त   इन्ही   क्षमताओं  का  उपयोग   युद्ध  जैसे  विनाशक  प्रयोजनों  की  पूर्ति   करने  में  तत्पर  हैं   l   प्रतिवर्ष   अरबों - खरबों  डॉलर   की  विपुल  धनराशि   ' माइंड  वार '  जैसी   योजनाओं  में  खरच  की  जा  रही  है   l  मन: शक्ति  से  संचालित   युद्ध  - आयुधों  के   अनुसन्धान  एवं   प्रयोग - परीक्षणों  का   सिलसिला  बड़ी  तेजी  के  साथ  चल  रहा  है  ,  जिससे  शत्रु  पक्ष  का  विनाश   अतिशीघ्र  किया  जा  सके   l -------------- 

25 April 2020

WISDOM --- आध्यात्मिक ज्ञान का समावेश होने से ही वैज्ञानिक अविष्कार मानव के लिए उपयोगी हो सकते हैं --पं. श्रीराम शर्मा आचार्य l

   प्राचीन  समय  में  मनुष्य   विज्ञान   के  अविष्कार  सृजन  के  लिए  करते  थे  ,  विध्वंस  के  लिए  नहीं  l   उस  समय  की  विशेषता  थी  कि   गुरु  विद्दा  देते  समय   वचन   लेते    थे  कि   इनका  दुरूपयोग  मत  करना   l   महाभारत  में  ' पाशुपत  अस्त्र ' का  वर्णन  आता  है   l   अर्जुन  ने  शिवजी  की  तपस्या  कर   यह  अस्त्र  प्राप्त  किया  ,  भगवान   शिव  ने  चलाने  और  लौटाने   की  विधि  भी  सिखाई  ,  और  साथ  ही  यह  आदेश  भी  दिया   था  कि   इस  अस्त्र  को  केवल   राक्षस  या  राक्षस  वृत्ति  वाले  लोगों  पर  ही  चलाना   अन्यथा  यह  तुम्हारा  ही  विनाश  करेगा  l   इसी  प्रकार  ' नारायण  अस्त्र '  द्रोणाचार्य  के  पास  था  l   इस  हथियार  के  चलते  ही   सब  शस्त्र   व्यर्थ  हो  जाते  थे  l   जब  आचार्य  द्रोण   ने  यह  अस्त्र  चलाया   तो  भगवन  कृष्ण  ने  कहा  --- " तुम  सब  अपने  हथियार  फेंककर   सिर    झुका  दो ,  यही  इस  अस्त्र  से  बचने  का   उपाय  है  l  "
 भारतीय  योगी  और  सिद्ध  संत   अपनी  आत्मशक्ति  और  क्षमताओं  का  प्रयोग   चमत्कार  दिखाने   और  दूसरों  का  अहित  करने  में  नहीं  करते  थे  ,  वे  ब्रह्मास्त्र  आदि  को  मन्त्र  शक्ति  से  छोड़ना  और  वापिस  बुलाना  भी  जानते  थे  l   लेकिन  आज  मनुष्य  के  लिए  अपनी  स्वार्थपूर्ति  ही  सब  कुछ  है  l   अब  मनुष्य  की  इन  प्रकृतिदत्त  क्षमताओं  का   उपयोग  संपन्न  राष्ट्र    शत्रु  पक्ष  का  विनाश  करने  के  लिए  और  संसार  के  लोगों  के ' माइंड ' पर    नियंत्रण  करने    के  लिए     करते  हैं  l
  शत्रु  अदृश्य  हो  तो   प्रतिपक्षी  के  समस्त  युद्ध  आयुध , बम  और  रणनीति  विफल  हो  जाती  है   और  आक्रमणकारी    अपना  प्रभुत्व  ज़माने  के  साथ - साथ   लोगों  के  मन  पर  ,  उनके  व्यक्तिगत  जीवन  के  क्रियाकलाप  पर  भी  नियंत्रण  करने  में  सफल  हो  जाता  है  l   विज्ञानं  ने  मानव  को  सब  भौतिक  सुख - सुविधाएँ  तो   दीं   पर  साथ  ही  यह  रिफाइंड  गुलामी  भी  दे  दी   l 

WISDOM ------ मनुष्य जन्म से नहीं , कर्म से अच्छा या बुरा होता है

 कहते  हैं   महाभारत   में  कौरव  वंश  में    दुर्योधन ,  दु:शासन    का  नाम  सुयोधन  और  सुशासन  था  l   वे  एक  उच्च  कुल  में  पैदा  हुए  ,  भीष्म  पितामह  के  संरक्षण  में  रहे ,  आचार्य  द्रोण   ने  उन्हें  शिक्षा  दी   लेकिन  अधर्म  पर  चलने  के  कारण  वे   पूरे   कौरव  वंश  के   अंत  के  लिए  उत्तरदायी   बने   l
           जन्म  से  वे  बुरे  नहीं  थे  ,  लेकिन  उन्हें   मामा   शकुनि  का  साथ  मिला   जिसने  दिन - रात   छल - प्रपंच ,  षड्यंत्र   की  बात  कर  के  दुर्योधन   के  सोचने - समझने  की  शक्ति  को   क्षीण  कर  दिया  l   जिसे  आज  की  भाषा  में  कहते  हैं  ' माइंड  वाश '  कर  दिया   l   दुर्योधन  जिद्दी  और  अहंकारी  बन  गया  ,  उसने  पितामह  भीष्म ,  आचार्य  द्रोण   भगवान   कृष्ण  की  बात  को  भी  नहीं  माना   और  महाभारत  में  भीषण  नर  संहार  करा  के   सुयोधन  से  दुर्योधन  कहलाया   l
 महाभारत  में    शकुनि  के  माध्यम  से   संसार  को  यही  शिक्षा  दी  गई  है   कि   शकुनि  जैसी  मनोवृति  के  लोगों  से  दूर  रहे  ,  ऐसे  लोग  जहाँ   भी  रहेंगे  , अपने  विनाश  के  साथ - साथ   अपने  संपर्क  में  आने  वालों  को  भी  पतन  के  गर्त  में   डाल   देते  हैं   l 

24 April 2020

WISDOM -----

  विवेक  के  अभाव  में  व्यक्ति  भेड़  चाल  चलता  है  l   एक  भेड़   सबसे  आगे  चलते - चलते  कुएं  में  गिर  जाती  है   तो  सब  भेड़ें  उसके  पीछे  कुएं  में  गिर  जाती  हैं  l   इसी  तरह  मनुष्य  कितना  ही  पढ़ा - लिखा  हो  ,  विद्वान्  हो  लेकिन  यदि  उसका  विवेक  जाग्रत  नहीं  है  ,  चेतना  परिष्कृत  नहीं  है   तो  वह  किसी  भी  बात  की  तह  में   जा  कर  सच्चाई  को  परखने  की  कोशिश    ही  नहीं  करता   l  बिना  सोचे  समझे  बस ,  अंधानुकरण  करता  है  l
 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  कहा  है  -- भौतिक  प्रगति  के  साथ  जीवन  में  अध्यात्म  का  प्रवेश  जरुरी  है  l   चेतना  का  परिष्कार  ही  सच्चा  अध्यात्म  है  l '