' जब नाश मनुज पर छाता है , पहले विवेक मर जाता है l ' यह मनुष्य की दुर्बुद्धि है कि वह वैज्ञानिक प्रगति तो करता है लेकिन उसमे सृजन के तत्वों को भूलकर केवल विनाश के पक्ष पर अपना ध्यान केंद्रित कर लेता है l जिन साधनों से सारा संसार जगमगा सकता है , उन्हें वह अंधकार में डुबो देना चाहता है और केवल इसलिए कि वह लाशों पर राज कर सके l असुरता में अहंकार है , उसका पोषण जरुरी है , अन्यथा वह घाव बनकर रिसने लगता है l लाशें कभी विद्रोह नहीं करतीं , कोई जुलूस , कोई आंदोलन नहीं करतीं l किसी भी तकनीक से उन्हें खड़ा कर के ' सलाम ' कराया जा सकता है l इसी से अहंकारी को सुकून मिल जाता है l यह दुर्बुद्धि ही है कि असुरता स्वयं को अमर समझकर दूसरों के विनाश के लिए हर संभव कार्य करती है l केवल कुछ लोगों के अहंकार के कारण समूची मानव जाति , प्रकृति , पर्यावरण सब पर संकट आ जाता है l इन सब के लिए संसार में जो भी प्रयास किए गए , वे सब एक नाटक सा लगने लगते हैं l
28 February 2022
26 February 2022
WISDOM ----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " परमात्मा न तो अपने हाथ से किसी को कुछ देता है और न छीनता है l वह इन दोनों के लिए मनुष्यों की आंतरिक प्रेरणा द्वारा परिस्थितियां उत्पन्न करा देता है , और आप तटस्थ भाव से मनुष्यों के उत्थान - पतन देखा करता है l " मनुष्य के जैसे संस्कार है , जैसी उसकी प्रवृति है , उसी के अनुरूप वह कर्म करता है , अपना मार्ग चुनता है और उसके कर्म का फल कब और क्या होगा यह काल निश्चित करता है l महाभारत युद्ध निश्चित हो गया , अर्जुन और दुर्योधन दोनों के सामने विकल्प था कि वे भगवान को चुनें या उनकी सेना को l दुर्योधन में अहंकार था , वह तो भगवान को भी अशुभ शब्द बोलता था , जब कृष्ण जी शांति दूत बन कर गए थे तब वह उनको बाँधने चला था l उसे अपनी शक्ति का घमंड था और वह शक्ति उसके किसी काम न आई l आज यदि संसार में शांति चाहिए तो स्वयं को शक्तिशाली समझने वालों को रामायण और महाभारत का अध्ययन कर उसमे जो तथ्य छुपा है उसे समझना चाहिए l रावण की नाभि में अमृत था अर्थात जिस शक्ति का उसे घमंड था वह नाभि में थी , उसी केंद्र में बाण लगने से विस्फोट हुआ और नामोनिशान मिट गया l हर असुर के साथ यही होता है , असुर अपनी शक्ति का दुरूपयोग करता है इसलिए उसकी शक्ति , उसको मिला हुआ वरदान ही उसके अंत का कारण बन जाता है l भस्मासुर को वरदान था कि जिसके सिर पर हाथ रखे वह भस्म हो जाये l उसकी बुद्धि ऐसी भ्रष्ट हुई कि उसने अपने ही सिर पर हाथ रख लिया और भस्म हो गया l
WISDOM -------
महाभारत का युद्ध चल रहा था l द्रोणाचार्य और अर्जुन आमने - सामने थे l द्रोणाचार्य ने अर्जुन को धनुर्विद्द्या सिखाई थी , उसके बावजूद वे उसके सामने असहाय दिख रहे थे l कौरवों ने प्रश्न किया ---- " आश्चर्य की बात है कि गुरु हार रहे हैं और शिष्य जीत रहा है l " द्रोणाचार्य बोले ---- " मुझे राजाश्रय की सुख - सुविधा भोगते हुए वर्षों गुजर गए , जबकि अर्जुन इतने ही समय तक कठिनाइयों से जूझता रहा है l सुविधासम्पन्न अपनी सामर्थ्य गँवा बैठते हैं और संघर्ष शील निरंतर शक्तिसम्पन्न बनते रहते हैं l " महर्षि अरविन्द ने कहा है ---- " दुःख भगवान के हाथ का हथौड़ा है , उसी के माध्यम से मनुष्य का जीवन सँवरता है l " पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- " जीवन में दुःख , कठिनाइयाँ हमें कुछ सिखाने आती हैं , हम उसे चुनौती मानकर उसका सकारात्मक ढंग से सामना करें l रो कर , विलाप कर उस समय को न गुजारें , दुःख को तप बना लें l यदि जीवन में सुख का समय आता है तो उसे ईश्वर की देन मानकर निरंतर निष्काम कर्म करें , उसे आलस - प्रमाद , भोग - विलास में न गंवाएं l "
25 February 2022
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " शक्तिसम्पन्न , समर्थ - बलशाली होने से अधिक महत्वपूर्ण है सद्गुण संपन्न होना , क्योंकि सद्गुणों के अभाव में शक्ति के दुरूपयोग की संभावना हमेशा बनी रहती है l गुणहीन व्यक्तियों के पास जो भी शक्ति आती है , वो हमेशा उसका दुरूपयोग करते हैं , फिर यह शक्ति चाहे सामाजिक हो , राजनीतिक हो या फिर वैज्ञानिक अथवा आध्यात्मिक l " भौतिक विज्ञान में मनुष्य ने बहुत प्रगति की है लेकिन यदि यह शक्ति किसी गुणहीन , संवेदनहीन व्यक्ति के हाथ में आ जाये तो वह पूरी दुनिया को कब्रिस्तान बना सकता है l रावण कितना विद्वान् और शक्तिसम्पन्न था लेकिन अपने अहंकार के वशीभूत होकर उन शक्तियों का दुरूपयोग करता था और स्वयं को गर्व से असुरराज कहा करता था l रावण एक विचार है , जब धन - वैभव और शक्ति के मद में लोगों की बुद्धि दुर्बुद्धि में बदल जाती है , उन्हें करने के लिए कोई सकारात्मक कार्य नजर ही नहीं आता तब वे मानवता को कष्ट पहुँचाने वाले , प्रकृति और पर्यावरण को नष्ट करने वाले कार्य कर के ही अपने जीवन को धन्य समझते हैं l ईश्वर ने प्राणीमात्र के लिए अनेक योनियां निश्चित की हैं , अब चयन करना व्यक्ति के हाथ में है , मनुष्य ही अपने कर्मों द्वारा अपने लिए चयन करता है कि उसे मनुष्य बनना है , पशु - पक्षी , कीट -पतंगे अथवा पिशाच l
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मनुष्य धन से नहीं मन से अमीर होता है ---- एक फकीर को एक स्वर्ण मुद्रा मिली , उसने निश्चय किया कि जो सबसे गरीब होगा , उसे ही मैं यह स्वर्ण मुद्रा दूँगा l एक दिन उसे पता लगा कि उसके देश का राजा एक छोटे पड़ोसी देश पर आक्रमण करने जा रहा है l फ़क़ीर के मन में कोई लालच व अहंकार नहीं था इसलिए उसे उस स्वर्ण मुद्रा की जरुरत भी नहीं थी l फकीर बहुत दूर पैदल चलकर राजमहल तक गया और वह स्वर्ण मुद्रा राजा को दे दी l राजा ने इसका कारण पूछा तो फ़क़ीर बोला ---- " मैंने इस स्वर्ण मुद्रा को सबसे गरीब व्यक्ति को देने का निश्चय किया , इसलिए आपको दे दी l यह गरीबी को दूर करने में कुछ सहायक होगी l " राजा बोला ----- " मेरे पास धन , विशाल सेना , राज - वैभव सब है , अमूल्य हीरे = जवाहरात भी हैं , फिर मैं सबसे गरीब कैसे हुआ ? " फ़क़ीर बोला ---- " इतना सब होते हुए भी आप अपने से कमजोर राष्ट्र पर आक्रमण कर रहे हैं , निर्दोष लोगों को जान - माल से बेघर कर रहे हैं , फिर आप से गरीब इस संसार में और कौन होगा ? " यह सुनकर राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ l
24 February 2022
WISDOM -----
जीवन में सफल होने के लिए जरुरी है कि हम श्रेष्ठ साहित्य का स्वाध्याय करें l हमारी नीति कथाएं हमें सावधानीपूर्वक जीवन जीना सिखाती हैं ----- ' एक व्यक्ति नदी किनारे बैठा हुआ था l उसने एक बिच्छू को देखा , जो पानी में बहा जा रहा था l उस व्यक्ति को बिच्छू पर दया आ गई l उसने पानी में डुबकी लगाकर बिच्छू को पकड़ लिया , पकड़ते ही बिच्छू ने उसे डंक मार दिया l वह व्यक्ति दर्द से चीख पड़ा और बिच्छू वापस पानी में गिर गया l उस व्यक्ति ने उसे पुन: दो बार और बचाया लेकिन हर बार उसे डंक का कष्ट भोगना पड़ा l एक विद्वान् व्यक्ति वहीँ खड़ा यह दृश्य देख रहा था , उसने उसे समझाया कि --- ' बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना , वह अपना स्वभाव कभी भी नहीं बदलता l यदि जीवन में तुम्हारा सामना ऐसे लोगों से हो जिनकी कुटिलता और छल कपट के कारण तुम्हे कष्ट हुआ हो l तब चाहे उनसे समझौता हो भी जाये , पर तब भी हमेशा उनसे सावधान रहो क्योंकि बिच्छू की तरह वो भी अपनी कुटिलता कभी नहीं छोड़ेंगे , अवसर पाकर डंक अवश्य मारेंगे l '
23 February 2022
WISDOM-------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' ईश्वर का प्यार केवल सदाचारी व कर्तव्य परायणों के लिए सुरक्षित है l ' कहते हैं सनंदन आचार्य शंकर के प्रथम दीक्षित शिष्य थे l एक दिन की बात है सनंदन किसी काम से अलकनंदा नदी के उस पार पुल से होकर गए थे l तभी आचार्य शंकर ने सनंदन को बड़े ही करुण स्वर में पुकारना शुरू किया l गुरु की पुकार सुनकर सनंदन बेचैन हो गए , उन्होंने सोचा गुरु अवश्य किसी मुसीबत में होंगे , यदि मैंने पुल का रास्ता अपनाया तो पहुँचने में देर हो जाएगी l नदी का प्रवाह बड़ा प्रबल था l लेकिन उनके मन में गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा थी , अत: उन्होंने उफनती अलकनंदा में छलांग लगा दी l गुरु भक्ति देखकर अलकनंदा ने भी उनकी मदद की और सनंदन के प्रत्येक कदम के नीचे कमल के फूल खिला दिए l जिन पर पैर रखते हुए वे तुरंत ही आचार्य शंकर के पास पहुँच गए l अन्य सभी शिष्य इस अलौकिक घटना को देखकर आश्चर्य चकित रह गए l आचार्य शंकर ने कहा ---- " आज से सनंदन पद्मपाद के नाम से प्रसिद्ध होंगे l " गुरु कृपा ही भवसागर को पार करने का एकमात्र उपाय है l