पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " किसी को ईश्वर संपदा , विभूति अथवा सामर्थ्य देता है तो निश्चित रूप से उसके साथ कोई न कोई सद्प्रयोजन जुड़ा होता है l हमें यह देखना चाहिए कि उसका लाभ गलत व्यक्ति तो नहीं उठा रहे हैं l नहीं तो ये अच्छाइयाँ व्यर्थ चली जाएँगी l " श्री हनुमान जी के चरित्र से हमें यही सीख मिलती है कि सद्प्रयोजनों के लिए , अत्याचार व अन्याय के अंत के लिए जब अपनी शक्ति और विभूतियों का सदुपयोग किया जाता है , तब असंभव भी संभव हो जाता है l श्री हनुमान जी भगवान श्रीराम के प्रिय भक्त और उनके सबसे बड़े सेवक हैं l भगवान के कार्य को पूरा करना ही उनका लक्ष्य था l अत्याचारी , अन्यायी कितना भी शक्ति संपन्न क्यों न हो , उन्होंने उसका साथ नहीं दिया , उन्होंने बाली को छोड़कर सुग्रीव का साथ दिया l जब समुद्र को पार कर श्री हनुमान जी लंका पहुंचे , तो लंका के द्वार पर लंका की रक्षा करने वाली लंकिनी नामक राक्षसी मिली , उसने उन्हें रोकने का प्रयास किया l श्री हनुमान जी ने देखा कि यह लंकिनी अत्याचारी और अन्यायी रावण की सेवा में है , जिसने छल से माता सीता का हरण किया है , एक गलत व्यवस्था की रक्षा कर रही है इसलिए उस पर प्रहार करना चाहिए , तब उन्होंने मुक्का मारकर लंकिनी को घायल कर दिया l
9 April 2023
8 April 2023
WISDOM -----
विज्ञान के चमत्कारों ने इस युग को वैज्ञानिक युग का दर्जा दे दिया लेकिन इससे भी अधिक उन्नत दशा में हम महाभारत काल में थे l यह जरुरी है कि हम अपने प्राचीन ज्ञान -विज्ञान को बार -बार याद करें l अतीत का गौरव किसी भी देश के नागरिकों के स्वाभिमान को जगाने और उसे मजबूत बनाने में सहायक होता है l आज वैज्ञानिक जिस ब्लैक होल की बात करते हैं , हमारे महान ऋषि उससे पहले से ही परिचित थे l ------- महाभारत के वन पर्व के अंतर्गत तीर्थयात्रा पर्व के एक सौ बत्तीसवें अध्याय में कहोड़ मुनि और अष्टावक्र की कथा आती है l शास्त्रार्थ में पराजित मुनि कहोड़ को जल समाधि दे दी गई थी l बाद में मुनि के पुत्र अष्टावक्र ने अपने पिता के अपराधी पण्डित वन्दी को पराजित कर उसे भी समुद्र में डुबोने की सजा दी , तो वरुण पुत्र वन्दी ने क्षमायाचना सहित कहा कि पण्डितों को जान से मारने का मेरा तनिक भी इरादा नहीं है l वस्तुतः मेरे पिता वरुण के राज्य में विशाल यज्ञ हो रहा है l यहाँ से विद्वान् पण्डितों को चुन -चुनकर मैं वहीँ भेज रहा था l शास्त्रार्थ में में हराकर जल में डुबोना तो एक निमित्त मात्र था l अब यज्ञ समाप्ति पर है और सभी ब्राह्मण लौटने वाले हैं l कुछ समय पश्चात् सभी ऋषिगण सामने से आते दिखाई पड़े , इनमे ऋषि कहोड़ भी थे l यह समुद्र में ब्लैक होल ही था , जिसमे से ऋषियों को वरुण लोक भेजा गया l उस समय के ऋषि कोई रहस्यमय विद्या अवश्य जानते थे , जिसकी मदद से वे पृथ्वी लोक पर वापस आ गए l उस समय हमारा ज्ञान -विज्ञानं चरम उत्कर्ष पर था l युगों की गुलामी , आपसी फूट , जाति और धर्म के नाम पर मतभेद , विदेशी आक्रमण में उलझकर लोग इस वैभव को भूल गए l इस वैभव को पुन: प्राप्त करने के लिए परस्पर एकता और स्वाभिमान जरुरी है l
7 April 2023
WISDOM -----
सुकरात महान दार्शनिक थे , उन्होंने अपने आचरण द्वारा ही शिष्यों को ज्ञान दिया l उन्होंने अपना स्वयं के उदाहरण से शिष्यों को समझाया कि ज्योतिष का आकृति विज्ञानं हमारे चेहरे की आकृति को देखकर जो दुर्गुण बताता है , उन दुर्गुणों पर विवेक के जागरण से विजय संभव है , सद्बुद्धि के जागरण से गुण , कर्म और स्वभाव में आमूलचूल परिवर्तन कर उन दुर्गुणों पर अंकुश रखा जा सकता है l -------- एक बार सुकरात अपने शिष्यों के साथ गंभीर विषयों पर चर्चा कर रहे थे , उस समय एक ज्योतिषी आया और उसने कहा मैं किसी के चेहरे की आकृति देखकर उस व्यक्ति के स्वाभाव और चरित्र के बारे में बता सकता हूँ l आप मुझे एक अवसर प्रदान करो l " सुकरात स्वयं कहते थे कि वे बदसूरत हैं , उन्होंने अपने शिष्यों से कहा --- " तुम सभी इस ज्योतिषी से मेरी आकृति का सत्य सुन लो l " कुछ गंभीर होकर वे कहने लगे --" अपनी आकृति का रहस्य बाद में मैं तुम्हे बताऊंगा l " सुकरात ने ज्योतिषी को अनुमति दी कि वह उनकी चेहरे की आकृति का परीक्षण करे l ज्योतिषी कहने लगा ---- " इनके नथुनों की बनावट बता रही है कि इस व्यक्ति में क्रोध की भावना प्रबल है l इसके माथे और सिर की आकृति के कारण यह निश्चित रूप से लालची होगा l " अपने गुरु के बारे में अपमानजनक टिप्पणी सुनकर शिष्य बहुत नाराज होने लगे l सुकरात ने शिष्यों को रोककर अपनी बात आगे बढ़ाने को कहा l ज्योतिषी कहने लगा --- "इसकी ठोड़ी की रचना कहती है कि यह सनकी है l इसके होठों और दांत की बनावट के अनुसार यह व्यक्ति सदैव देशद्रोह करने के लिए प्रेरित रहता है l " सुकरात ने ज्योतिष विद्या के आधार पर स्वयं के संबंध में लगाये गए तथ्यों को बड़े ध्यानपूर्वक सुना और अंत में ज्योतिषी की प्रशंसा कर उसे इनाम देकर विदा किया l सुकरात के ज्योतिषी के प्रति इस व्यवहार को देखकर व्शिश्य भौंचक्के रह गए l शिष्यों की उलझन को सुलझाते हुए सुकरात ने कहा ---- " यथार्थ को छिपाना ठीक नहीं l ज्योतिषी ने मेरे मेरे संबंध में जो कुछ बताया , वे सभी दुर्गुण मुझमे हैं l यही मेरी स्थूल आकृति का सत्य है , किन्तु उस ज्योतिषी से एक भूल अवश्य हुई , वह है कि उसने मेरी आत्मिक ज्ञान की शक्ति पर जरा भी गौर नहीं किया l उस ज्ञान की मदद से मैं अपने सद् विवेक को जाग्रत कर अपने समस्त दुर्गुणों पर अंकुश लगाए रखता हूँ l " सद्बुद्धि ही सब कार्यों में प्रकाशित है l सद्बुद्धि की जरुरत हर युग में है l गायत्री मन्त्र के माध्यम से हम ईश्वर से सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना कर सद्बुद्धि और सद विवेक को जाग्रत कर सुख -चैन का जीवन जी सकते हैं l
6 April 2023
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- "एक -एक कदम चलकर ही हम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं l साथ ही लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जितना महत्व प्रयास व श्रम का है , उतना ही महत्त्व विश्राम का भी है l विश्राम करने से हमें मार्ग की थकान से राहत मिलती है और आगे बढ़ने के लिए ऊर्जा भी मिलती है l अति उत्साह और लालच का परिणाम नुकसान दायक हो सकता है l इसलिए मंजिल तक पहुँचने के लिए उत्साह तो बनाये रखना चाहिए , लेकिन अति उत्साह में अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहिए l "------------ पंचतंत्र की एक कहानी है ---- एक जंगल में दो पक्षी रहते थे l उस जंगल के एक छोर पर एक वृक्ष था , जिसमें वर्ष में एक बार स्वादिष्ट फल लगते थे l जब फलों का मौसम आया तो उन दोनों पक्षियों ने वहां जाने की योजना बनाई l l पहले पक्षी ने दूसरे से कहा --- " वह वृक्ष यहाँ से बहुत दूर है इसलिए मैं तो वहां आराम से पहुँच जाऊँगा l अभी फलों का मौसम दो माह रहेगा l " दूसरा पक्षी अति उत्साहित था , कहने लगा ---" नहीं मित्र ! मुझसे तो रहा नहीं जा रहा है l उन स्वादिष्ट फलों के बारे में सोचकर ही मेरे मुँह में पानी आ रहा है l इसलिए मैं तो एक ही उड़ान में वहां पहुंचकर मीठे फल खा लेना चाहता हूँ l " दूसरे दिन दोनों पक्षी अपने घोंसले से निकलकर उस वृक्ष की ओर उड़ चले l कुछ दूर जाने पर पहले पक्षी को जब थकान होने लगी तो वह एक पेड़ की टहनी पर ठहर गया लेकिन दूसरा पक्षी थकान के बावजूद भी रुका नहीं , अति उत्साह में उड़ता गया l अब उसे दूर से ही फलों का वृक्ष दिखाई देने लगा , मीठे फलों की सुगंध भी आ रही थी l वह बुरी तरह थक भी चुका था , उसके पंख लड़खड़ाये और वह आसमान से जमीन पर आ गिरा l उसके पंख बिखर गए और वह उन फलों तक कभी नहीं पहुँच सका l लेकिन पहला पहला पक्षी जो धैर्य के साथ कुछ देर विश्राम कर उड़ रहा था , वह फलों तक आराम से पहुँच गया और उसने जी भरकर स्वादिष्ट फल खाए l आचार्य जी कहते हैं जैसे एक -एक सीढ़ी चढ़कर ही हम मंजिल तक पहुँचते हैं , अति शीघ्रता में कभी -कभी पाँव फिसलने और गिरने का डर रहता है , सावधानी जरुरी है l
5 April 2023
WISDOM ----
कौए ने विद्वान् हंस से प्रश्न किया --- " शास्त्रों में सत्संग की इतनी महिमा क्यों कही गई है ? " हंस ने उत्तर दिया ---- " संग जिसके साथ का होता है , उसके जैसे गुण संग करने वाले को प्राप्त होते हैं l गरम लोहे पर पड़ने से जल का निशान नहीं पड़ता , परन्तु वही जल कमल के पत्ते पर पड़ने से मोती सा चमकने लगता है और वही जल स्वाति नक्षत्र में सीप के मुंह में पड़ जाने से मोती बन जाता है , कोई केले में गिरी तो कपूर बन गई l ठीक ऐसे ही संसर्ग जैसा हो , प्राणी वैसे ही उत्तम , माध्यम अथवा अधम गुण प्राप्त करता है l "
WISDOM -----
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है ---- "प्रशंसा केवल अच्छाई की ही हो , यह जरुरी नहीं , बुराई की भी प्रशंसा होती है l जैसे अमृत की प्रशंसा है कि थोड़ी सी मात्रा में होते हुए भी वह कितनी शीघ्रता से जीवन को बचा सकता है और विष की प्रशंसा यह है कि विष की छोटी सी बूंद भी कितने हजारों को क्षण भर में मृत्यु दे सकती है l " पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' प्रशंसा मधु (शहद ) ने सद्रश है , यदि इसमें व्यक्ति की आसक्ति हो जाये तो व्यक्ति भी मक्खी की तरह इसमें फँसकर अपना सब कुछ गँवा देता है l अर्थात यदि प्रशंसा सुनकर व्यक्ति का अहंकार प्रबल हो जाये , तो धीरे -धीरे उस अहंकारी व्यक्ति के पास वास्तव में प्रशंसा के करने योग्य कुछ बच नहीं पाता , क्योंकि अहंकार रूपी दुर्गुण उसके समस्त गुणों को आवृत कर लेता है l प्रशंसा का एक सकारात्मक पक्ष भी है कि यदि व्यक्ति को अपनी प्रशंसा में अपने सद्गुण नजर आने लगे तो वह स्वयं को सुधारने में लग जाता है l "
4 April 2023
WISDOM -----
ग्रीस का राजा प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात से मिलने पहुंचा l उसने उनसे प्रश्न किया ---- " कृपया ये बताएं कि संसार में इतनी असमानताएं हैं , हर जगह विसंगतियां हैं , इनका निस्तारण कैसे हो सकता है ? " सुकरात ने उत्तर दिया ---- " राजन ! दुनिया भर की असमानता हटाने की आवश्यकता क्या है ? यदि हम संसार के सारे पर्वत समतल कर दें तो पर्वतों पर रहने वाले प्राणी कहाँ रहेंगे और यदि संसार के सारे समुद्र और खाइयाँ पाट दी जाएँ तो मछलियाँ कहाँ रहेंगी? समुद्र और जल में रहने वाले अन्य प्राणी कहाँ रहेंगे ? इसलिए यह सोचने के बजाय कि संसार की सारी असमानता हटा दी जाये , तुम अपने मन से इस भेदभाव को हटाने का प्रयत्न करो , तो तुम्हे सारी विसंगतियों में भी समरसता दिखाई पड़ने लगेगी l सुखी जीवन का यही मार्ग है l "