लघु कथा ---- बंदरों का एक दल आम के बाग़ में निवास करता था l बन्दर जब भी आम तोड़ने का प्रयास करते तो आम तो कम हाथ लगते , पर बाग़ के रखवालों के पत्थर ज्यादा झेलने पड़ते l तंग आकर बंदरों के सरदार ने एक दिन बंदरों की सभा बुलाई और उसमे घोषणा की कि ' आज से हम लोग अपना अलग बाग़ लगाएंगे और उसमें आम के पेड़ लगाएंगे l इससे रोज -रोज के इस झंझट से मुक्ति मिलेगी l बात बाकी बंदरों को जँच गई l सबने आम की एक -एक गुठली ली और जमीन में गड्ढा कर के बो डाली l बंदरों में प्रसन्नता की लहर व्याप्त हो गई कि अब शीघ्र ही हर बन्दर आम के एक पेड़ का स्वामी होगा l लेकिन कुछ ही घंटे गुजरे थे कि बंदरों ने जमीन खोदकर गुठलियाँ बाहर निकाल लीं , ताकि ये देख सकें कि गुठलियों से पेड़ निकला या नहीं l देखते ही देखते सारा बाग़ उजड़ गया l दूर से यह द्रश्य देखकर संत ने अपने शिष्यों से कहा ----- 'कर्मों का इच्छानुसार फल प्राप्त करना हो तो प्रयत्न के अतिरिक्त धैर्य की भी आवश्यकता होती है l अधीर मनुष्यों का हाल भी इन मूर्ख वानरों के समान ही होता है l हर विकास के लिए एक समय विशेष अनिवार्य है l '
25 April 2023
23 April 2023
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने से संबंधित किसी भी सच्चाई को स्वीकारना ही नहीं चाहते और सच्चाई को छुपाने के लिए भांति -भांति के आडम्बर ओढ़ते हैं , झूठ बोलते हैं l इस कारण उनके व्यक्तित्व के ऊपर इतने नकाब चढ़ जाते हैं कि वे अपनी वास्तविक पहचान से बहुत दूर हो जाते हैं l ओढ़े गए आडम्बर कभी भी जीवन में सुकून और शांति नहीं देते और इसका परिणाम भी कभी हितकारी नहीं होता l गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है -------' उधरहिं अंत न होइ निबाहू , कालनेमि जिमि रावण राहू l अर्थात जो वेशधारी ठग हैं , उन्हें भी अच्छा साधु का वेश बनाये हुए देखकर उनके वेश के प्रताप से जग उन्हें पूजता है , परन्तु एक न एक दिन उनका भेद खुल जाता है , अंत तक उनका कपट नहीं निभता , जैसे कालनेमि , रावण और राहू का हाल हुआ l राक्षसराज रावण के कहने पर कालनेमि ने साधु का वेश धारण किया और जब श्री हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के लिए हिमालय जा रहे थे , तब उनका मार्ग रोका l साधु वेशधारी कालनेमि की राम भक्ति से हनुमान जी बहुत प्रभावित हुए लेकिन जब उन्हें सच्चाई का पता चला कि यह कालनेमि तो राक्षस है , उनका मार्ग रोकने के लिए यह कार्य कर रहा है , तो उन्होंने तत्क्षण उसका वध कर दिया l इसी तरह रावण ने साधु का वेश धारण कर के और स्वयं को तपस्वी बताकर सीताजी का अपहरण किया l इस कपट का दंड सम्पूर्ण राक्षस वंश को अपने प्राण देकर चुकाना पड़ा और अंत में महाज्ञानी , शक्तिशाली रावण का भी इस कपट के कारण अंत हुआ l यही हाल राहु का भी हुआ l समुद्र मंथन में जब अमृत निकला और भगवान विश्वमोहिनी रूप धारण कर अमृत बाँट रहे थे तब राहु देव रूप धारण कर देवताओं के समूह में बैठ गया और अमृत पान कर लिया किन्तु जैसे ही सूर्य और चन्द्र देव ने भगवान को बताया कि यह तो असुर है तो भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया l तब तक राहु अमृत पी चुका था इसलिए मरा नहीं और दो भागों में विभाजित -राहु और केतु --नवग्रह में अपना स्थान पाया l आचार्य श्री लिखते हैं --- व्यक्ति को आडम्बर युक्त जीवन का चयन नहीं करना चाहिए , बल्कि सच्चाई के साथ जीवन जीना चाहिए l ऐसा जीवन ही व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करता है l
22 April 2023
WISDOM ----
महाभारत में अनेक रोचक प्रसंग हैं , इनमें एक प्रसंग है ---- जरासंध वध ---- जरासंध मगध देश का राजा था , उसने सभी राजाओं को जीतकर अपने अधीन कर लिया था l शिशुपाल जैसे शक्तिशाली राजा ने भी उसकी आधीनता स्वीकार कर ली थी l जरासंध की बेटी से कंस ने विवाह कर लिया था , कंस का साथ मिल जाने से वह और शक्तिशाली हो गया था l स्वयं भगवान कृष्ण अपने बंधुओं के साथ लगातार तीन वर्ष तक उससे युद्ध किया और हार गए l जरासंध के भय से उन्हें मथुरा छोड़ना पड़ा और द्वारका में दुर्ग बनाकर रहना पड़ा l जब पांडवों को खांडव प्रस्थ मिला यह जंगल था , जिसे पांडवों ने पुन: बसाकर इन्द्रप्रस्थ बना लिया l तब युधिष्ठिर को उनके मित्रों ने सलाह दी कि सम्राट पद प्राप्त करने के लिए राजसूय यज्ञ करें l इस संबंध में जब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से सलाह ली तब उन्होंने बताया ---- जरासंध अजेय पराक्रमी है , उसने आज तक पराजय का नाम नहीं जाना l जरासंध का वध किए बिना राजसूय यज्ञ संभव नहीं है l श्रीकृष्ण ने पांडवों को बताया कि जरासंध बहुत अत्याचारी है , उसने बिना किसी अपराध के अनेक राजाओं को जेलखाने में डाल रखा है l उसका इरादा है कि जब पूरे सौ राजा पकड़े जा चुके होंगे तब पशुओं की बलि के स्थान पर उन राजाओं का वध कर के वह यज्ञ का अनुष्ठान करेगा l इसलिए ऐसे अत्याचारी का अंत आवश्यक ही नहीं कर्तव्य भी है l श्रीकृष्ण , भीम व अर्जुन जरासंध की राजधानी पहुंचे और उसे द्वन्द युद्ध के लिए ललकारा l उन दिनों कोई युद्ध के लिए ललकारे तो उससे युद्ध करना क्षत्रिय धर्म था l जरासंध बोला --- कृष्ण तुम क्षत्रिय नहीं हो , ग्वाले हो और अर्जुन अभी बालक है , तुम दोनों से तो मैं नहीं लडूंगा , भीम की वीरता के किस्से सुने हैं , इसलिए मैं भीम से मल्ल - युद्ध करूँगा l भीम और जरासंध में भयंकर युद्ध हुआ , बिना विश्राम किए वे तेरह दिन और तेरह रात लगातार लड़ते रहे l भीमसेन भी पस्त होने लगे तब चौदहवें दिन भगवान श्रीकृष्ण ने एक घास का तिनका उठाया और भीम को इशारों से समझाया कि घास के तिनके को बीच से चीरकर दांया हिस्सा बांयी ओर और बांया हिस्सा दांयी ओर फेंक दो l भीम इशारा समझ गए और इसी तरह उन्होंने जरासंध का वध कर दिया श्रीकृष्ण और भीम व अर्जुन ने उन सभी राजाओं को मुक्त कर दिया , जिन्हें जरासंध ने बंदी बना रखा था l जरासंध के पुत्र को मगध की गद्दी पर पर बिठाकर अपनी विजय यात्रा पूर्ण की l
21 April 2023
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " धन का आकर्षण बड़ा जबरदस्त है l जब लोभ सवार होता है तो मनुष्य अँधा हो जाता है और पाप -पुण्य में उसे कुछ भी फर्क नजर नहीं आता l पैसों के लिए वह बुरे से बुरे कर्म करने पर उतारू हो जाता है और अंत में स्वयं भी उस पाप के फल से नष्ट हो जाता है l ------ इसी सत्य को समझाने वाली एक कथा है ---- तीन मित्र किसी कार्य वश जा रहे थे l रात्रि में जो गाँव पड़ता , वहां विश्राम कर लेते l एक गाँव में उन्हें पता चला कि किसी दबंग ने गरीबों की जमीन हड़प ली और बहुत बड़ा सेठ बन गया l दूसरी रात्रि जिस गाँव में रुके वहां पता चला कि एक व्यक्ति ने चोरी ,डकैती और लूटपाट से अथाह संपदा एकत्र कर ली थी , उसकी संपदा को लूटने के लिए किसी ने उसकी हत्या कर दी l एक अन्य गाँव में पहुंचे तो वहां देखा कुछ महिलाएं सड़क के किनारे बैठी रो रहीं थीं , पूछने पर पता चला कि समर्थ लोगों ने ही उनका सब लूटकर उन्हें बेघर कर दिया l यह सब देख -सुनकर वे तीनों बहुत दुःखी हुए और विचार करने लगे कि ये पाप उत्पन्न कहाँ से होता है ? आखिर इस पाप का बाप कौन है ? उसे समाप्त कर देने से फिर पाप उत्पन्न नहीं होगा l अब तीनों पाप के उत्पत्ति स्थान का , कारण का पता लगाने चल दिए l रास्ते में उन्हें एक वृद्ध पुरुष मिला , उससे उन्होंने पूछा कि इस पाप का बाप कौन है ? वृद्ध ने पहाड़ की गुफा की ओर इशारा कर दिया l तीनों भागते -भागते उस गुफा तक पहुंचे तो देखा उसमे स्वर्ण ,हीरा , मोती , जवाहरात जगमगा रहे हैं l अब वे तीनों अपना उदेश्य तो भूल गए और यह संपदा इकट्ठी करने में लग गए l जितना भर सकते थे उतना भर लिया और चल पड़े l रास्ते में भूख लगी तो दो मित्र भोजन लेने गए और तीसरे से कहा --तुम इस कीमती माल की देखभाल करो l अब तीनों के मन में लोभ , लालच आ गया l जो दो भोजन लेने गए थे उनमें से एक ने चालाकी से दूसरे की हत्या कर दी और भोजन में विष मिला दिया ताकि जो सामान की देखभाल कर रहा है वह भोजन खाकर मर जाये तो पूरी संपदा उसकी हो जाएगी l इधर इसको भी लालच आ गया और दरवाजे के पीछे छुपकर बैठ गया l जैसे ही उसका मित्र भोजन लेकर आया उसने तलवार से उसकी हत्या कर दी और बड़ा प्रसन्न हुआ कि इस संपदा से अब वह ऐशो आराम का जीवन जिएगा l उसे बड़ी भूख लगी थी , उसने सोचा पहले खाना खा लें फिर चलें l भोजन में विष था , खाते ही उसके हाथ -पैर ऐंठने लगे औए वह भी मर गया l आचार्य श्री कहते हैं---- 'जब भी लालच के अवसर आएं तो बुद्धि को सतर्क रखना चाहिए l लोभ आते ही पाप की भावनाएं बढ़ती हैं , उत्पन्न होती हैं l बुद्धि काम नहीं करती , वह इस पाप का भयानक परिणाम समझ नहीं पाता l '
19 April 2023
WISDOM ----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " चिन्तन परिक्षेत्र बंजर हो जाने के कारण कार्य भी नागफनी , बबूल जैसे हो रहे हैं l इससे मानवता का कष्ट पीड़ित होना स्वाभाविक है l कार्य में श्रेष्ठता की अभिव्यक्ति होना तभी संभव है , जब उसके मूल में चिन्तन की उत्कृष्टता हो l " आचार्य जी लिखते हैं --- " प्रत्येक व्यक्ति समाज पर अपना भला -बुरा प्रभाव छोड़ता है , किन्तु सुगंध की अपेक्षा दुर्गन्ध का विस्तार अधिक होता है l एक नशेड़ी , जुआरी , दुर्व्यसनी , कुकर्मी अनेकों संगी साथी बना सकने में सफल हो जाते हैं लेकिन आदर्शों का , श्रेष्ठता का अनुकरण करने की क्षमता हल्की होती है l गीता पढ़कर उतने आत्मज्ञानी नहीं बने , जितने कि दूषित साहित्य , अश्लील द्रश्य , अभिनय से प्रभावित होकर कामुक अनाचार अपनाने में प्रवृत्त हुए l समाज में छाए हुए अनाचार , असंतोष और दुष्प्रवृतियों का मात्र एक ही कारण है कि जन -साधारण की आत्मचेतना मूर्च्छित हो गई है l "
18 April 2023
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पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " जीवन में उतार -चढ़ाव तो आते ही रहते हैं l अनुकूलता व प्रतिकूलताओं से ही जीवन बना है l ऐसा कभी नहीं हो सकता कि जीवन में सब कुछ अनुकूल हो और ऐसा भी नहीं हो सकता कि जीवन में सब कुछ प्रतिकूल हो l जीवन की परिस्थितियां तो बदलती ही रहती हैं l यदि व्यक्ति अपनी मन:स्थिति को परिस्थितियों के अनुरूप ढाल ले तो वह अनावश्यक उलझनों से बच जाता है और हर स्थिति का लाभ उठा सकता है l जीवन में कुछ ऐसी भी परिस्थितियां भी आती हैं , जिन्हें स्वीकार करना पड़ता है इसलिए जिनकी सोच सकारात्मक है , वे अनावश्यक संघर्ष में अपना समय और शक्ति नहीं गंवाते , बल्कि मन:स्थिति बदलकर उनका लाभ उठाते हैं l ये गुणग्राही होते हैं , उनके लिए हर स्थिति विकास का अवसर है l " एक प्रसंग है ----- एक दिन एक शिष्य ने अपने गुरु से कहा --- " गुरुदेव ! एक व्यक्ति ने आश्रम के लिए गाय भेंट की है " गुरु ने कहा --- " अच्छा हुआ दूध पीने को मिलेगा l " एक सप्ताह बाद शिष्य ने आकर कहा ---- "गुरूजी ! जिस व्यक्ति ने गाय दी थी , वह अपनी गाय वापस ले गया l " गुरु ने कहा --- "अच्छा हुआ ! गोबर उठाने के झंझट से मुक्ति मिलेगी l " बदलती परिस्थिति के साथ सकारात्मकता बनाये रखना ही जीवन में सफलता का एकमात्र सूत्र है l
17 April 2023
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " नियत के अनुसार नियति होती है l नियति कर्मों का परिणाम होती है l जैसा हम सोचते हैं एवं करते हैं , वैसी ही हमारी नियति होती है l सतत सत्कर्म , सदाचरण एवं सद्भाव के द्वारा हमारी नियति श्रेष्ठता से परिपूर्ण हो जाती है l लेकिन इसके विपरीत स्थिति में नियति अत्यंत कष्टसाध्य बन जाती है l " महाभारत में पांडवों के साथ तो भगवान श्रीकृष्ण थे लेकिन कौरव सदा से षड्यंत्रकारी , फरेबी , झूठे व अहंकारी थे l उनके जीवन का उदेश्य दूसरों को तरह -तरह से परेशान करना और स्वयं को स्थापित करना था l पांडवों के साथ निरंतर छल -कपट और षड्यंत्र कर के , भरी सभा में अपनी ही कुलवधू महारानी द्रोपदी का अपमान कर के दुर्योधन ने स्वयं ही कौरव वंश के विनाश की नियति लिख ली थी l नियति के अनुरूप कौरव मिट गए और पांडवों को विजय प्राप्त हुई l अनीति और अत्याचार जो करता है , वह तो डूबता ही है , जो उसके साथ जुड़े होते हैं , वह उन सबको ले डूबता है l किसी भी जाति या धर्म में पैदा होना व्यक्ति के वश की बात नहीं है , लेकिन श्रेष्ठ कर्मों से , पवित्र भावनाओं से और छल -कपट रहित जीवन से हम अपनी श्रेष्ठ नियति का निर्माण कर सकते हैं l