एक संत अपने शिष्यों के साथ गंगा किनारे बैठे हुए थे l उनसे थोड़ी दूर एक व्यक्ति गंगा नहा रहा था l उसने बहुत देर तक गंगा स्नान किया फिर किनारे बैठकर भोजन करने लगा l उसी समय एक अपंग व्यक्ति उसके पास आकर भोजन की याचना करने लगा l उसे कुछ देने के बजाय वह व्यक्ति उस अपंग को भद्दी गालियाँ देने लगा और अपने पास से हटाने के लिए धक्का भी देने लगा l यह देख संत शिष्यों से बोले ---- " आज गंगा स्नान का पाप भी देख लिया l " वे बोले ---- "केवल बाहर से शरीर साफ कर लेने से मन पर चढ़ा मेल दूर नहीं होता l जिसके ह्रदय में दीन - दुःखियों के लिए करुणा नहीं , संवेदना नहीं , वो लाख प्रयत्न कर ले , उसे पुण्य का नहीं , केवल पाप का भागी बनना पड़ेगा l अध्यात्म का सार बाह्य क्रिया कलापों में नहीं , वरन आंतरिक परिष्कार में है l "
14 August 2018
12 August 2018
WISDOM ----- आचरण से शिक्षण हो , तभी समाज का परिष्कार होगा ----- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
आचार्य श्री ने लिखा है ----- " विकृत चिंतन और भ्रष्ट चरित्र ने इन दिनों सूक्ष्म जगत के अद्रश्य वातावरण को प्रदूषण से भर दिया है l प्रकृति की सरल स्वाभाविकता बदल गई है और वह रुष्ट होकर दैवी विपत्तियाँ बरसाने लगी है l कहीं अनावृष्टि , कहीं अतिवृष्टि , अकाल , भूकंप जैसी विपत्तियाँ बड़े क्षेत्रों को प्रभावित कर रही हैं l मानसिक रोगों में तेजी से वृद्धि हुई है l कामुकता बड़ी है l मानवीय संवेदना और व्यक्तित्व के स्तर में भरी गिरावट हुई है l युद्धोन्माद और आतंकवाद बढ़ता जा रहा है l हर कोई अपने को असुरक्षित महसूस कर रहा है l कभी जल - प्रलय तो कभी हिम - प्रलय जैसी स्थिति लगती है l " नवम्बर 1988 , अखण्ड ज्योति में लिखी उनकी यह बात आज अक्षरशः सत्य है l
उनका विचार था कि इस स्थिति निपटने के लिए आध्यात्मिक उपचार ही कारगर होगा l व्यक्ति अपने विचारों का परिष्कार करे , जीवन को श्रेष्ठ बनाये l इससे समाज परिष्कृत होगा l
एक प्रवचन में आचार्य श्री ने कहा था कि हमारे देश में सात - आठ लाख बाबाजी हैं जो आलस और विलासिता का जीवन जीते हैं , समाज पर बोझ हैं l यदि सात - आठ बाबाजी प्रत्येक गाँव में जाकर अपने धर्म के पादरी बनकर समाज की सेवा करें तो शिक्षा की समस्या , सामाजिक कुरीतियाँ , साक्षरता , गंदगी , पिछड़ापन आदि सभी समस्याएं ठीक हो जाएँ l
धर्म की आड़ में देवताओं का बहाना करके जो ढोंग है वह समाज के लिए कष्टदायक है l
उनका विचार था कि इस स्थिति निपटने के लिए आध्यात्मिक उपचार ही कारगर होगा l व्यक्ति अपने विचारों का परिष्कार करे , जीवन को श्रेष्ठ बनाये l इससे समाज परिष्कृत होगा l
एक प्रवचन में आचार्य श्री ने कहा था कि हमारे देश में सात - आठ लाख बाबाजी हैं जो आलस और विलासिता का जीवन जीते हैं , समाज पर बोझ हैं l यदि सात - आठ बाबाजी प्रत्येक गाँव में जाकर अपने धर्म के पादरी बनकर समाज की सेवा करें तो शिक्षा की समस्या , सामाजिक कुरीतियाँ , साक्षरता , गंदगी , पिछड़ापन आदि सभी समस्याएं ठीक हो जाएँ l
धर्म की आड़ में देवताओं का बहाना करके जो ढोंग है वह समाज के लिए कष्टदायक है l
11 August 2018
WISDOM ----- समाज के प्रति अपराध करने वाले को क्षमा नहीं किया जाये ------ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
जिन दिनों डाकुओं का आत्मसमर्पण होना था , उस समय आचार्य विनोबा भावे से एक चर्चा के दौरान आचार्य श्री ने कहा था -- जिसने अपराध किया है उसे दंड मिलना ही चाहिए l समाज के प्रति अपराध करने वाले को क्षमा नहीं किया जाये l अपराध को क्षमा कर देने से एक नयी परिपाटी जन्म लेगी l माफी मांगकर छूट जायेंगे , यह सोचकर दूसरे लोग भी अपराध में प्रवृत हो सकते हैं l
विनोबा जी का कहना था कि प्राचीनकाल में भी ह्रदय परिवर्तन के बाद क्षमा का विधान रहा था l वाल्मीकि और अंगुलिमाल इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं l
आचार्य श्री ने कहा कि वे घटनाएँ अपवाद थीं l इसके अतिरिक्त उन्होंने बाद में घनघोर प्रायश्चित भी किया था l डाकुओं को क्षमा के बाद हम तो उन्हें सम्मानित जीवन का अवसर दे रहे हैं l क्षमा मिल जाने के बाद डाकू रहेंगे तो समाज में ही l उनका रौब - दाब भी रहेगा l जब वे सामान्य नागरिक की तरह स्वीकार कर लिए गए तो भविष्य में उनका राजनीतिक उपयोग भी हो सकता है l चुनाव आदि के समय बागियों के रौब - दाब का इस्तेमाल अपने पक्ष में वोट डालने के लिए किया जा सकता है l
इतने वर्ष पहले ( वर्ष 1960 ) में आचार्य श्री द्वारा कही गई यह बात अक्षरशः सत्य है l आज राजनीति का अपराधीकरण हो गया है l यदि सत्ता ऐसे हाथों में है जिनका नाम किसी न किसी अपराधिक गतिविधि में है तो कितने भी कानून बन जाएँ , समाज में बढ़ते हुए अपराधों पर नियंत्रण रखना कठिन है l
विनोबा जी का कहना था कि प्राचीनकाल में भी ह्रदय परिवर्तन के बाद क्षमा का विधान रहा था l वाल्मीकि और अंगुलिमाल इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं l
आचार्य श्री ने कहा कि वे घटनाएँ अपवाद थीं l इसके अतिरिक्त उन्होंने बाद में घनघोर प्रायश्चित भी किया था l डाकुओं को क्षमा के बाद हम तो उन्हें सम्मानित जीवन का अवसर दे रहे हैं l क्षमा मिल जाने के बाद डाकू रहेंगे तो समाज में ही l उनका रौब - दाब भी रहेगा l जब वे सामान्य नागरिक की तरह स्वीकार कर लिए गए तो भविष्य में उनका राजनीतिक उपयोग भी हो सकता है l चुनाव आदि के समय बागियों के रौब - दाब का इस्तेमाल अपने पक्ष में वोट डालने के लिए किया जा सकता है l
इतने वर्ष पहले ( वर्ष 1960 ) में आचार्य श्री द्वारा कही गई यह बात अक्षरशः सत्य है l आज राजनीति का अपराधीकरण हो गया है l यदि सत्ता ऐसे हाथों में है जिनका नाम किसी न किसी अपराधिक गतिविधि में है तो कितने भी कानून बन जाएँ , समाज में बढ़ते हुए अपराधों पर नियंत्रण रखना कठिन है l
10 August 2018
WISDOM --- माता - पिता की भांति धर्म भी व्यक्ति को जन्म के साथ ही मिलता है ----- महात्मा गाँधी
, गाँधी वाड्मय ' में धर्म परिवर्तन पर गांधीजी के विचार बिखरे पड़े हैं l उन्होंने लिखा है कि जनक - जननी को जैसे नहीं बदला जा सकता है , उसी प्रकार धर्म भी नहीं बदला जा सकता l यदि कोई धर्म - परिवर्तन का प्रयास करता है , तो वह प्रकृति के विरुद्ध जाता है l महात्मा गाँधी ने यह बात अपने पुत्र हरिलाल के सम्बन्ध में कही थी l संगति - दोष के कारण हरिलाल में अनेक बुरी आदतें घर कर गईं थीं l हरिलाल के दुर्व्यसनी होने के कारण गांधीजी उसे पसंद नहीं करते थे l कुछ अवसरों पर गांधीजी ने अपने इस बेटे को स्वीकार करने से भी मना कर दिया था l दुर्व्यसनों के कारण हरिलाल पर कर्ज भी चढ़ गया था और कर्ज से मुक्ति पाने की उनकी स्थिति नहीं थी l
धर्म - परिवर्तन के नीम पर जुटी संस्थाओं ने इस शर्त पर आर्थिक सहायता दी कि वह अपना धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेगा l हरिलाल ने यह शर्त स्वीकार कर ली l महात्मा गाँधी से उस वक्त पत्रकारों ने पूछा था कि अब आपका क्या कहना है , आपका पुत्र धर्म बदल रहा है l
गांधीजी ने कहा था कि जो लोग धर्मांतरण को सही मान रहे हैं , वे गलत हैं l हरिलाल यदि प्रलोभन के कारण धर्मांतरण कर रहा है तो कल कुछ और संस्थाएं उसे वापस भी ला सकती हैं l ऐसा ही हुआ , धर्म सभा के नेताओं ने हरिलाल को समझा - बुझाकर पुन: हिन्दू बना लिया l आध्यात्मिक द्रष्टि से धर्मांतरण असंभव कर्म है l
धर्म - परिवर्तन के नीम पर जुटी संस्थाओं ने इस शर्त पर आर्थिक सहायता दी कि वह अपना धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेगा l हरिलाल ने यह शर्त स्वीकार कर ली l महात्मा गाँधी से उस वक्त पत्रकारों ने पूछा था कि अब आपका क्या कहना है , आपका पुत्र धर्म बदल रहा है l
गांधीजी ने कहा था कि जो लोग धर्मांतरण को सही मान रहे हैं , वे गलत हैं l हरिलाल यदि प्रलोभन के कारण धर्मांतरण कर रहा है तो कल कुछ और संस्थाएं उसे वापस भी ला सकती हैं l ऐसा ही हुआ , धर्म सभा के नेताओं ने हरिलाल को समझा - बुझाकर पुन: हिन्दू बना लिया l आध्यात्मिक द्रष्टि से धर्मांतरण असंभव कर्म है l
9 August 2018
WISDOM ------
विचार और भावनात्मक क्षेत्र की विकृतियाँ अनेक शारीरिक और मानसिक बीमारियों को जन्म देती हैं l विकृत चिंतन के ही कारण व्यक्ति अनैतिम आचरण करता है और पापकर्म में संलग्न होता है और यही रोगों की उत्पति का मूल कारण है l
8 August 2018
WISDOM ------ जागरूक स माज में ही विभिन्न समस्याओं के समाधान संभव है
काम , क्रोध , लोभ ये सब मानसिक विकार हैं , जो व्यक्ति की बुद्धि पर हावी हो जाते हैं और उसे दुर्बुद्धि में बदल देते हैं l ऐसे विकारों से ग्रस्त व्यक्ति यदि धन और शक्ति संपन्न है , वह जब ऐसे क्षेत्रों में रहता है जहाँ शिक्षा व जागरूकता की कमी है , लोग आर्थिक द्रष्टि से कमजोर हैं , उनमे अत्याचार व अन्याय का सामना करने की हिम्मत नहीं है , तो ये विकार उस व्यक्ति को उन्मत कर देते हैं , उसके भीतर का राक्षस जग जाता है , फिर वह अपनी सामर्थ्य का प्रयोग ऐसे कमजोर लोगों के शोषण व अत्याचार करने के लिए करने लगता है l
जब समाज जागरूक होगा , अपने बीच रहने वाले ऐसे अपराधियों का बहिष्कार करेगा , उनकी गतिविधियों को समाज के सामने बेनकाब करेगा , तभी महिलाओं और छोटी बच्चियों पर होने वाले अत्याचार की रोकथाम संभव है l
अपराधी कायर होता है , वह अकेला नहीं होता l ऐसे लोगों का बहुत बड़ा गुट होता है , उन पर किसी न किसी का वरद हस्त होता है तभी वे समाज में रहकर ऐसे अमानुषिक कृत्य करते हैं l आज की सबसे बड़ी जरुरत है ऐसे पिछड़े क्षेत्रों को शिक्षित और जागरूक करने की l
जब समाज जागरूक होगा , अपने बीच रहने वाले ऐसे अपराधियों का बहिष्कार करेगा , उनकी गतिविधियों को समाज के सामने बेनकाब करेगा , तभी महिलाओं और छोटी बच्चियों पर होने वाले अत्याचार की रोकथाम संभव है l
अपराधी कायर होता है , वह अकेला नहीं होता l ऐसे लोगों का बहुत बड़ा गुट होता है , उन पर किसी न किसी का वरद हस्त होता है तभी वे समाज में रहकर ऐसे अमानुषिक कृत्य करते हैं l आज की सबसे बड़ी जरुरत है ऐसे पिछड़े क्षेत्रों को शिक्षित और जागरूक करने की l
7 August 2018
WISDOM ----- शरीर और मन परस्पर गुंथे हुए हैं , दोनों के प्रभावों की पारस्परिक क्रिया से ही आधि - व्याधि उत्पन्न होती है l
आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थ ' चरक संहिता ' में एक प्रसंग में छात्र अग्निवेश अपने गुरु आचार्य चरक से पूछता है ----- " भगवन ! संसार में पाए जाने वाले अनेक रोगों का मूल कारण क्या है ? " आचार्य ने उत्तर देते हुए कहा ---- " लोगों के दुष्कर्म जिस स्तर के होते हैं , उसी के अनुरूप उन्हें पापों का प्रतिफल शारीरिक और मानसिक आधि - व्याधियों के रूप में प्राप्त होता है l "
प्राचीन काल में लोग उच्च स्तरीय आस्था का जीवन जीते थे l नैतिकता का , उच्च आदर्शों का उनके जीवन में समावेश था l इस कारण उस समय लोग स्वस्थ थे , बीमारियाँ इतनी नहीं थीं l
जबसे लोग उच्च स्तरीय आस्थाओं की अवहेलना करने लगे हैं , उनके चिंतन में दुष्टता और आचरण में भ्रष्टता का समावेश हुआ है तबसे तनाव और बीमारियों में वृद्धि हुई है l आज अधिसंख्य व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के मानसिक रोग से त्रस्त पाए जाते हैं l
प्राचीन काल में लोग उच्च स्तरीय आस्था का जीवन जीते थे l नैतिकता का , उच्च आदर्शों का उनके जीवन में समावेश था l इस कारण उस समय लोग स्वस्थ थे , बीमारियाँ इतनी नहीं थीं l
जबसे लोग उच्च स्तरीय आस्थाओं की अवहेलना करने लगे हैं , उनके चिंतन में दुष्टता और आचरण में भ्रष्टता का समावेश हुआ है तबसे तनाव और बीमारियों में वृद्धि हुई है l आज अधिसंख्य व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के मानसिक रोग से त्रस्त पाए जाते हैं l
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