12 March 2019

WISDOM---- जब आन्दोलन के लिए महिलाएं आगे आईं

 1930  के  नमक  सत्याग्रह  में   ' बा '  ने  इतना   काम  किया   कि  सरकारी  अफसर  भी  उनसे  डरने  लगे  थे   l  दांडी  कूच के  समय  जब  आन्दोलन  में  भाग  लेने  वाली बहनों  ने  पूछा   कि हमें  क्या  करना  चाहिए   तो  गांधीजी  ने  बताया  कि  उनको  नमक  बनाकर  जेल  जाने  की  आवश्यकता  नहीं   l  इसके  बजाय    उन्हें  शराब  बंदी  और  विदेशी   कपड़े  का  बहिष्कार  का  कार्य  करना  चाहिए   l  इस  कार्य  में  चार - पांच   हजार  स्त्रियों  ने  भाग  लिया   l  शराब  की  तमाम  दुकाने बंद कराई   गईं  l   अब  सरकार ने  कानून  को  ताक में  रखकर   फेरी  लगाकर  शराब   और   ताड़ी बेचने  की  इजाजत  दे  दी   l तब    स्त्रियों  ने  छप्पर  डालकर  छावनियां  बना  लीं   तो  पुलिस वालों  ने  छप्पर  में  आग  लगा  दी   और  बर्तन  उठाकर  ले  गए  l  तब  बा  ने  कहा --- " अब  हम  चटाई  तान  कर  रहेंगे   और  मिटटी  के  बर्तन  रखेंगे  , फिर  देखें  वे  क्या  ले  जाते  हैं  ? "
 अवंतिका  बाई  गोखले , सरोजिनी  नायडू  आदि  अनेक  संभ्रांत  परिवारों  की  महिलाएं  आन्दोलन  में  सक्रिय  रहीं   l  

11 March 2019

WISDOM ----- ईर्ष्या एक घुन के समान है जो आंतरिक विकास के सारे द्वार बंद कर देती है

 मानव  मन के  मर्मज्ञ   मानते  हैं  कि  ईर्ष्या  का  प्रादुर्भाव   एक  समान  स्तर  पर  होता  है  l  ईर्ष्या  एक  ही  कक्षा में  पढ़ने  वाले  छात्र - छात्राओं  के  बीच  पैदा  होती  है  l  ईर्ष्या  अपने  स्तरीय वर्ग  के  पारिवारिक  सदस्यों  के  बीच  , विभिन्न  संस्थाओं  में  कार्य  करने  वालों  के  मध्य  पैदा  होती  है  l
   आखिर  ईर्ष्या  क्यों  पैदा  होती  है  ?    इसके  पीछे  जो  मनोविज्ञान  है  उसी  को  स्पष्ट  करते  हुए   पं.  श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  ने  'अखंड  ज्योति '  में  एक  लेख  में  लिखा  है -----   मनुष्य  जिससे  ईर्ष्या  करता  है  ,  वास्तव  में   वह  उसके  जैसा  बनना  चाहता  है   और  ऐसा  न  बन  पाने  की  अतृप्ति  उसे  ईर्ष्यान्वित  कर  देती  है   l 
 ईष्यालु    उस  व्यक्ति  की  विशिष्टता  को  सम्मान  नहीं  दे  पाता  l   आमने - सामने  उसकी  कटु  आलोचना  करता  है ,  अपने  कुतर्कों  से  उसे   अयोग्य    सिद्ध  करता  है   परन्तु  अन्दर - ही - अन्दर   उसे  बड़ी  हसरत  भरी  निगाहों  से  निहारता  है  ,  सोचता  है , काश!  हम  भी  उस  जैसे  होते   l  पर  ऐसा  न  हो  पाने  की  स्थिति  में ईर्ष्या  पैदा  होती  है   l  ईर्ष्या  की  भावदशा  में  ही  प्रारम्भ  होता  है  --- निंदा  और   षड्यंत्र  का  अंतहीन  सिलसिला  l  ईष्यालु  व्यक्ति  चाहता  है  की  वह जिससे  ईर्ष्या  करता  है  ,  उसकी  सब  उपेक्षा  करें   प्रताड़ित  करें  l  ऐसा  होने  पर  ईर्ष्यालु  प्रसन्न  होता  है  l 
  ईर्ष्या  व्यक्ति  को  मूल्यहीन   बनाती   है ,  पतन  की  राह  पर  धकेलती  है   l  

10 March 2019

WISDOM ----- श्रेष्ठता का आधार -- सच्ची कर्तव्य निष्ठा है

   वर्ष  1576  राजस्थान  के  हल्दीघाटी   नामक  पर्वतीय  क्षेत्र  में   मुगलों  और  राजपूतों  की  सेना  में  भयंकर  युद्ध  हुआ   l  आमेर  के  राजा  मानसिंह   और  महाराणा  प्रताप   का  सगा  भाई  शक्तिसिंह  भी  मुगलों   का  ही  सहायक  था  l  इस  युद्ध  में  उनका  घोड़ा  चेतक  बुरी  तरह  घायल  हो  गया  था   फिर  भी  वह   अपने  स्वामी  को  उबड़- खाबड़  पहाड़ी  भूमि  में  तेजी  से  ले  जा  रहा  था   l   रास्ते  में  नदी  थी , बहुत  घायल  होने  पर  भी   चेतक  महाराणा  को  लेकर  नदी  के  उस  पार  पहुँच  गया  l   अभी   तक  युद्ध  की  तीव्रता  और  जोश  के  कारण  वह  घायल  होने  पर  भी  तीव्रता  से  दौड़ता  रहा  ,  पर  अब  महाराणा  के  नीचे  उतर  जाने  पर   उसका  शरीर  शिथिल  होकर  भूमि  पर  गिर  पड़ा   l  अपने  स्वामी  को  सुरक्षित  स्थान   में  पहुंचाकर  उनके  मुख  की  तरफ  देखते  हुए  उसने  प्राण  त्याग  दिए   l  अपनी  रक्षा  करने  वाले  चेतक  को  इस  तरह  परलोक  जाता  देख  प्रताप  का  ह्रदय  रो  उठा   l  उन्होंने  चेतक  के  मस्तक  को  अपनी  गोद  में  रख  लिया  l  महाराणा  प्रताप  की  देशभक्ति  और  कर्तव्य परायणता  के  साथ    उनके   घोड़े  की  अपूर्व  स्वामिभक्ति  देख  कर    शक्तिसिंह  का  भी  ह्रदय  परिवर्तन  हुआ  ,  उसने  अब  उनसे  लड़ने   की  बजाय  उनके  कदमों  में  अपना  मस्तक  रख  दिया   l  कुछ  दिन  बाद  राणा  ने   चेतक  के  प्राण  त्याग  करने  के  स्थान  पर  एक  स्तम्भ  बनवा  दिया   जो  अभी  तक  मौजूद  है   l
  अपना  कर्तव्य  इतनी    निष्ठा    के  साथ  पालन  करने  से    पशु  होते  हुए  भी   चेतक  का  नाम  इतिहास  में  अमर  हो  गया   l  

9 March 2019

WISDOM ------ विचारों की शक्ति

  मनुष्य  जैसे  विचार  करता  है   उसकी  सूक्ष्म  तरंगे  विश्वाकाश   में  फैल  जाती  हैं  l  स्वामी  विवेकनन्द  ने  विचारों  की  शक्ति  का  उल्लेख  करते  हुए   बताया  है   कि---- " कोई  व्यक्ति  भले  ही  किसी  गुफा  में  जाकर  विचार  करे   और  विचार  करते - करते  ही  वह  मर  जाये  ,  तो  भी  वे  विचार  कुछ  समय  उपरांत   गुफा  की  दीवारों  का   विच्छेद  कर  बाहर  निकल  पड़ेंगे  ,  और  सर्वत्र  फैल  जायेंगे   l  वे  विचार  तब  सबको  प्रभावित  करेंगे   l  " 
रूस  की  जन क्रान्ति  के  नेता  महापुरुष  लेनिन  केवल  गर्मागर्म  भाषण  कर  के   लोगों  की  वाहवाही  से   संतुष्ट  होने  वाले  नेता  नहीं  थे  l  उन्होंने  लिखने  की  मेज  पर  बैठे  हुए   जो  स्वप्न  देखा  था  , वह  उन्हें  निरंतर  आगे  बढ़ने  को  प्रेरित  करता  रहता  था  l  उस  समय  अत्यंत  साधारण  और  गरीबी  की  दशा  में  रहने  पर  भी   लेनिन  एक  ऐसी  शक्तिशाली  संस्था  के   निर्माण  के  लिए  प्रयत्नशील  था   जो  रूस  में  उथल - पुथल  मचा  दे   और  जारशाही  का  तख्ता  पलट  दे   l   जिस  प्रकार  संसार  के  अन्य  प्रसिद्ध  योद्धा  --- सिकंदर , शिवाजी , नेपोलियन  आदि   छोटी  अवस्था  से  ही   एक  विशेष  भाव  से  अभिभूत  होकर   भावी  साम्राज्य  की  कल्पना  किया  करते  थे  ,  उसी  प्रकार  लेनिन  भी  ,  जिसने  एक  बड़ी  भारी  सल्तनत  को  पलटने  का  प्रण  किया  था  ,  लन्दन  के  हाईगेट  कब्रिस्तान  में   कार्ल  मार्क्स  की  कब्र  के  पास   घंटों  तक  बैठकर   असीम  शक्तिशाली  भावी  बोल्शेविक  दल  का  स्वप्न  देखा  करता  था  l  अन्तर  इतना  ही  था   कि  प्राचीन  काल  के  योद्धाओं  ने   देवताओं  अथवा  ईश्वर  का  नाम  लेकर  तलवार  उठाई  थी  ,   लेनिन  के  इस  कार्यक्रम  का  आधार   इतिहास  और  समाजशास्त्र  था   l 
  अधिकांश  सार्वजनिक  कार्यकर्त्ता  ख्याति  के  लोभ  को  रोक नहीं  पाते   और  किसी  न  किसी  प्रकार  अपने  को  जाहिर  कर  देते  हैं    पर  लेनिन  ऐसी   यश  की  लालसा  से  बहुत  ऊँचा  उठा  हुआ  था   और  वह  बराबर  एक    अँधेरी  कोठरी  में  बैठा  हुआ   गुप्त  रूप से  अपना  काम  करता  था  l  रुसी क्रांति  को   लेनिन  ने  कैसे  अपना  सर्वस्व  होम  कर  के  खड़ा  किया  --- यह  रुसी  इतिहास  की  अमर  गाथा  है   l  

8 March 2019

WISDOM ----- ---

 संसार  के  इतिहास  में  अनेक   ऐसी  महिलाएं  हुई  हैं  जिन्होंने  विभिन्न  क्षेत्रों  में  अपना  नाम  अमर  किया  है   l   देशभक्त  महिलाओं  की   सबसे  अधिक  संख्या  रूस  में  पाई  जाती  है  l  जब  रूस  में  जार  का  अत्याचारी  शासन  था  ,  प्रजा  दुःखी  थी   l  ऐसी  दशा  में   अनेक  स्वाभिमानी  युवक - युवतियों  ने  इस  अन्याय  का  खात्मा  करने  की  प्रतिज्ञा  की  l   वे  बम  और  पिस्तौल  लेकर  गुप्त  रूप  से  अत्याचारी  अधिकारियों  और  स्वयं  जार  पर  भी  हमला  करते  थे  l 
  द्वितीय  विश्व युद्ध  के  अवसर  पर   जब  जर्मन  सेना  ने  अकस्मात  आक्रमण  कर  के  रूस  के  एक  बड़े  भाग  पर  कब्ज़ा  कर  लिया   और  वहां  की  जनता  को  घोर  कष्ट  दिए   तब  वहां  अनेक  स्त्रियाँ  ऐसी   निकलीं  जिन्होंने  जर्मन  सेना  की  परवाह  न  कर  के  उनके  विरुद्ध  संघर्ष  किया  l  इनमे  ' जोया '  की  अठारह  वर्ष  लड़की  का  नाम  सबसे  अधिक   प्रसिद्ध  है   l  विभिन्न  रुसी  पत्रों  में  सैकड़ों  लेख  और  निबंध   इस  किशोरी  कन्या   की  बलिदान  कथा  पर  निकलते  हैं   l    एक  सामान्य  ग्रामीण  लड़की  की  इतनी  महिमा  इसलिए  है   कि  उसने  अपने  प्राणों  की  तनिक  भी   चिंता  किये  बिना  देश  के  शत्रुओं  को  नष्ट  करने  का  हर  तरह  से  प्रयत्न  किया  l   वह  पहले  तो  गुरिल्ला फौज  में  शामिल  होकर   जर्मन  सेना  को  तरह - तरह  से  हानि  पहुँचाने  की  कार्यवाही  करती  रही  l  फिर  एक  दिन  जर्मन  सेना  की  छावनी  के  पास  जाकर  उसमे  आग  लगाकर  चली  आई  ,  पर  जब  उसे  मालूम  हुआ  कि  उसकी  लगाई  आग  से   बहुत  थोडा  नुकसान  हुआ  ,  तो  फिर  वह  दूसरे  दिन  आग  लगाने  चली  l  उसके  साथियों  ने  उसे  रोका  की  आज  मत  जाओ  , जर्मन  सैनिक  सतर्क  होंगे  ,  लेकिन  वह  अपनी  प्रतिज्ञा  को  पूरा  करने   को चल  दी  और  आग   लगाते  हुए  पकड़  ली  गई   l  जर्मनों  ने  उसे पहले  गुरिल्ला  दल  का  भेद  पूछने  के  लिए  कोड़ों  से  बहुत  मारा  ,  अन्य  यातनाएं  दीं  फिर  फांसी  पर  चढ़ा  दिया   l     उसने  देश  की  आजादी  के  लिए  हँसते - हँसते  प्राण    न्योछावर   कर  दिए   l  तभी  से  जोया  के  जीवन - मृत्यु  की  अमर   गाथा  विश्व  भर  के  लिए   नवीन  चेतना  और  शक्ति  का  उद्गम  बन  गई  है   l   

7 March 2019

WISDOM ------ सत्य तथा सत्कर्मों का अवलंबन करने से मनुष्य की अंतरात्मा में प्रसुप्त शक्तियां स्वत: ही जाग्रत हो जाती हैं

   औरंगजेब  ने     गुरु  तेगबहादुर  का  सिर  काटने  का  आदेश   दिया  l  एक  भाई  जीवनदास  ने  गुरु  का  सिर  तो  उठा  लिया   किन्तु  औरंगजेब  ने  गुरु  का  शरीर  देने  से  इनकार  कर  दिया  l  यह  ह्रदय विदारक  घटना  जब  घटी  उस  समय   गुरु  तेग बहादुर  के  पुत्र  गुरु  गोविन्दसिंह  की   आयु मात्र  पांच -छह  वर्ष  की  थी   किन्तु  सच्ची  धार्मिकता   और  धर्म  व  जाति  की  रक्षा  की   सच्ची  भावना  ने   उनके  अन्दर  अपूर्व  शक्ति , शौर्य , प्रभाव  तथा  तेज  भर  दिया  था  l    इस  बाल योद्धा   ने  गुरु  की  मृत्यु  से  उदास  खड़े  सैकड़ों  लोगों  की  और  उन्मुख  होकर  कहा ---- " गुरु  के  बलिदान  ने  हमें  शिक्षा  दी  है  कि  हम  उनके  पद चिन्हों  पर  चलकर  देश , धर्म  और  जाति  की  रक्षा  करें  l   उन्होंने  कहा --- " आज  धर्म  की  रक्षा  में   मैं  संत  परंपरा  की  गद्दी  पर  होने  पर  भी  स्वयं  शस्त्र  उठाता  हूँ   और  सबको   आज्ञा    देता  हूँ    कि  वे  किसी  भी  जाति,  या  वर्ण  के   क्यों  न  हों   क्षत्रिय  धर्म  का  अंगीकरण  करें   और  अत्याचार  के  विरुद्ध  हथियार  उठायें   l 
  इतनी  छोटी  सी   उम्र  में  उन्होंने  विशाल  जन  शक्ति  को  संगठित  किया   और  उनके  मानसिक  और  बौद्धिक  विकास  के  लिए   सैकड़ों  विद्वानों  और  शिक्षकों  को  नियुक्त  किया  l  उन्होंने  स्वयं  हिंदी , संस्कृत  व  फ़ारसी   आदि  अनेक   भाषाएँ  पढ़ीं  और  जनता  को  भी   पढ़ने  को  प्रेरित  किया  l  सैकड़ों  अनुयायिओं  को  विद्दा अध्ययन  के  लिए  काशी  भेजा  ,  जहाँ  से  वे  विद्वान्  बनकर  आये  और  जनता  में  शिक्षण  करने  लगे   l   उन्होंने  जनता  में   चन्द्रगुप्त , समुद्रगुप्त ,  अशोक  आदि  महान  राजाओं  के  इतिहास  का  प्रचार  किया  ,  रामायण , भागवत  की  कथाओं   का  वाचन  कराया   जिससे  जाति  को  अपने  अतीत के  गौरव  का  ज्ञान  हो   और  सोया  हुआ  आत्मविश्वास  जागे  l  

6 March 2019

WISDOM ---- पहले स्वयं उत्तम गुण ग्रहण करने चाहिए और तब वे गुण दूसरों को सिखाने चाहिए ---- समर्थ गुरु रामदास

 समर्थ  गुरु  रामदास  के  धर्म ग्रन्थ  ' दासबोध '  की  शिक्षाएं   औरंगजेब  के  शासनकाल  में   जैसी  लाभदायक    थीं  वैसी  ही  इस  अणुयुग  में    भी  सुख  और  शांति  प्राप्त  करने  में  सहायक  हो  सकती  हैं   l           समर्थ  गुरु  रामदास  ने  अपने   अनुयायिओं  को  उस  राजनीति  की  शिक्षा  दी  जो  विवेक , सूझ - बूझ  और  सावधानी  पर  आधारित  होती  है   l  उनका  कहना  है --- " जो  डरकर  पेड़  पर  चढ़  जाये   उसे  दम - दिलासा  देना  चाहिए   और  जो  लड़ने  को  तैयार  हो  उसे  धक्का  देकर  गिरा  देना  चाहिए  "  इसका  आशय  यह  है  कि   सांसारिक  व्यवहार  में  भी  हमको  अकारण  किसी  का  अहित  नहीं  करना  चाहिए  ,  यथासंभव  समझौते  और  मेल - मिलाप   की  नीति  से  काम  लेना  चाहिए  l  लड़ना  तभी  चाहिए  जब  कोई   नीच  और  स्वार्थी  व्यक्ति   दुष्टता  करने  पर  उतारू  हो  l 
  शिवाजी  महाराज  ने  इसी    नीति   पर    चलकर  महाराष्ट्र  में  संगठन  शक्ति  उत्पन्न  कर  दी  और   औरंगजेब  जैसे  साम्राज्यवादी  के  छक्के  छुड़ा  दिए  l  वे  कहते  थे  कि  अकारण  देश  में  अशांति  या  रक्तपात  की   स्थिति   उत्पन्न  करना  श्रेष्ठ  नीति  नहीं  है  l  वे  कहते  थे  कि--- " सच्ची  राजनीतिवही  है  जिसमे  दुष्टों  के  दमन  के  साथ   शिष्ट  व्यक्तियों  के  रक्षण  और  पालन  का  भी  पूरा  ध्यान  रखा  जाये   l  "