1 April 2020

WISDOM ---- सुख - वैभव इनसान को संवेदनहीन बनाता है ---- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

  आचार्य श्री  लिखते  हैं ----  ' इनसान   जीवन  भर  श्रेष्ठ  कर्म  कर  के   पुण्य  अर्जित  करता  है   और  जब  इस  पुण्य  का  भोग  करने  के  लिए  उसे   मान - सम्मान   एवं   पद - प्रतिष्ठा  मिलती  है   तो  उसके  अंदर   इसे  और  पाने  की  लालसा  जगती  है  l   इस  लालसा - लोभ  में   इनसान   इतना  क्रूर  एवं   निष्ठुर  व  संवेदनहीन    हो  जाता  है  कि   वह  अनेकों  की  पीड़ा  को  भूल  जाता  है  l   वह  सुख  पाने  की  लालसा  में  अनेकों  का  सुख  छीन  लेता  है  l   उसके  इस  सुख  में  जाने  कितनों  के  अरमान  दफन   हो  जाते  हैं  l 
   आचार्य श्री  लिखते  हैं ---- ' इस  लालसा - लोभ    में   वह  बहुत  कुछ  ऐसा  कर   गुजरता  है  ,  जिसे  करने  में  सर्वदा  परहेज  करना  चाहिए  , अन्यथा  परिणामस्वरूप   वह  सुखभोग  के  फेर  में   फिर  से  एक  नया  भोग  बना  लेता  है  ,  जो  कालांतर  में  पाप  के  रूप  में  फलित  होता  है   l  '
      आचार्य श्री   के  ये  वचन   सुख - वैभव  संपन्न , पद - प्रतिष्ठित  लोगों  की   चेतना  जगाने  के  लिए  हैं  l  उन्हें  जागरूक  करने  के  लिए हैं  कि   कहीं  अपने  सुख - वैभव  को  चिरस्थायी  बनाने  के  लिए  वे  गरीबों  और  बेसहारों  पर  जुल्म  तो  नहीं  कर  रहे  ?   हानिकारक  और    जानलेवा  व्यवसायों  से  बहुत  लाभ  कमाने  के  लिए   लोगों   के  जीवन  में  अमिट    दुःख   तो    नहीं  दे  रहे  ?

31 March 2020

WISDOM -----

 वैज्ञानिक  प्रगति  के  इस  युग  में  मनुष्य  को  सब  कुछ  मिला   परन्तु  जो  हमसे  छीन  गया  वह  है ---- मानवीय  संवेदना  l  संवेदनहीन  व्यक्ति  और  समाज  ही  व्यवसाय  कर  सकता  है  , वह  लाभ - हानि  ढूंढता  है  l  चिकित्सा  और  चिकित्स्क  वहीँ  प्रभावशाली  हैं  , जहाँ  सम्पन्नता  है  , अन्यथा  निर्धन  रोगी  सड़कों  और  गलियों  में   दम   तोड़  देता  है   l
  बीमारी , महामारी  न  ऊंच - नीच  देखती  ,  न  जात - पांत ,  न  अमीर - गरीब  l  एक  ओर   गरीब  व्यक्ति   अपनी गरीबी , अभाव , भूख ,   रहने  को  घर  नहीं ,  गाँव  में  अच्छी  चिकित्सा  सुविधाएँ  नहीं  और  शहरों  में  व्यवसायिक  लूट   की  वजह  से  मरता  है  l   तो  दूसरी   ओर  अमीर , धनसम्पन्न  व्यक्ति   भोग - विलास  का  जीवन  जीने ,  कामना - वासना  की  अंधी  दौड़  में  अपनी   जीवनी शक्ति  को  खो देता  है  l   महँगी  दवाइयाँ , अच्छे  डॉक्टर   भी  उसका  जीवन  नहीं  बचा   पाते  l
   अधिकाधिक  लाभ  कमाने  की  प्रवृति  को   त्याग  कर  ' जियो  और  जीने  दो ' के  सिद्धांत  पर  चलकर  ही  मानवता  सुखी  हो  सकती  है  l 

WISDOM ---- ईश्वर सत्य है

  राजा  विक्रमादित्य  के  समय  की  बात  है --- राजा  रात्रि  को  वेश  बदलकर  अपनी  प्रजा  का  हाल  जानने  जाया  करते  थे  l  इसी  क्रम  में  वे  एक  रात्रि  को  एक   गाँव  में  पहुंचे ,  वहां  एक  घर  से  उन्हें  कराहने  की  आवाज  आई  l   पूछने  पर  पता  चला  कि   उस  ग्रामीण  की  पत्नी  प्रसव  वेदना  से  कराह  रही  है  l   ग्रामीण  ने  राजा  को  पहचाना  नहीं   , फिर  कहा  आप  बाहर  बैठो  , पुत्र  जन्म  होगा   , हमारी  ख़ुशी  में  सम्मिलित  होना  l   राजा  बरामदे  में  चारपाई  पर  विश्राम  करने  लगे  l  थोड़ी  ही  देर  में  बच्चे  के  रोने  की  आवाज  आई  और  ग्रामीण  ने  आकर  राजा  को  पुत्र जन्म  की  खुशखबरी  सुनाई  l
  राजा  को  निद्रा  नहीं  आ  रही  थी  वे  टहल  रहे  थे  l   अचानक  उन्होंने  देखा  एक  आकृति  नवजात  शिशु  के  कमरे  में  प्रवेश  करने  जा  रही  है  l   राजा  विक्रमादित्य  ने  तुरंत  जाकर  उसे  रोका  और  पूछा  -- इतनी  रात ,  को  तुम  इस  कमरे  में  क्यों  जा  रहे  हो   ?
  उस  आकृति  ने  कहा --- ' मैं  विधाता  हूँ ,  इस  बच्चे  का  भाग्य  लिखने  जा  रही  हूँ  l '
 राजा  ने  रोका  नहीं , लेकिन  जब  विधाता  बाहर  आये  तो  राजा  ने  उन्हें  रोक  लिया   और  कहा  कि   वे  बताएं  कि   उसके  भाग्य  में  क्या  लिखा  है 
विधाता  ने  कहा  -- और  बातें  तो  हम  नहीं  बताएँगे ,  लेकिन  मृत्यु  अटल  है  ,  उस  पल  को  बदला  नहीं  जा  सकता  l   विधाता  ने  राजा  को  बता  दिया  कि   इस  बालक   को   15  वर्ष  की  आयु  में  निश्चित  समय  में  शेर  खा  जायेगा  l
राजा  विक्रमादित्य  बहुत  वीर  थे  ,  उन्होंने  विधाता  के  इस  लेख  को  बदलने  का  निश्चय  किया  l प्रात:काल  होने  पर  ग्रामीण  को  अपना  परिचय  दिया  , उस  बालक  की  परवरिश  की  जिम्मेदारी  ली   फिर  राज्य  में  पहुंचकर  एक  बहुत  मजबूत  महल  बनवाना  शुरू  किया  जिसमे  शेर  तो  क्या  एक  परिंदा  भी  पर  नहीं  मार  सकता  था  l   बालक  15  वर्ष  का  हुआ  ,  उसे  उस  महल  के  बीचोबीच  एक  बड़े   सुरक्षित  कमरे  में  रखा  गया  ,  उसके  मन  बहलाने  का हर  सामान  वहां  था  l  कमरे    को  बहुत   सुन्दर  पेंटिंग ,  पक्षियों , जानवरों  के  चित्र  आदि  से  सजा  रखा  था  l  विधाता  द्वारा  बताये  निश्चित  समय  से  बहुत  पहले  ही  राजा  स्वयं  तलवार  लेकर  अपनी  सेना  सहित  उपस्थित  थे    l  सभी  चौकन्ने  थे  l  निश्चित  पल  पर  शेर  की  दहाड़  सुनाई  दी  ,  सब  लोग  बालक  के  कमरे  की  ओर   दौड़े ,  देखा  खून  से  लथपथ  बालक  मरा   पड़ा  है  l   कहते  हैं  दीवार  पर  बने  शेर  के  चित्र  ने  ही  शेर  का  रूप  ले  लिया  और  बालक  का  वध  कर  दिया  l
कथा   में  सत्यता  हो  न  हो ,  यह  तो  सत्य  है  कि   मृत्यु  अटल  है  ,  जो  इस  संसार  में  आया  है  उसे  जाना  है  l   आप  किसी  को  हजार  तालों  में  बंद  कर  दो ,  जब  हमें  मिली  हुई  साँसे  पूरी  हो  गईं ,  तब  उससे  एक  पल  ज्यादा  के  लिए  भी  संसार  की  कोई  ताकत  नहीं  रोक  सकती  l
हाँ ,  हमारे  धर्म  ग्रंथों  में  बताया  गया  है   और  आचार्य ,   ऋषियों  ने  इस  बात  पर  बहुत  जोर  दिया  है  कि   निरंतर  सत्कर्म  कर  के  हम  अकाल  मृत्यु  को   रोक  सकते  हैं ,  बड़ी  से  बड़ी  दुर्घटना  एक  छोटी  सी  सुई  चुभने  में  बदल  सकती  है  ,  हमारे  सत्कर्म ,  हमारा  निश्छल  मन  हमारे परिवार  पर  आये  हुए  बड़े  से  बड़े  संकट  को  टाल   सकता  है  l  बस ! सत्कर्मों  की  पूंजी  और  ईश्वर  की  कृपा  होनी  चाहिए  l 

30 March 2020

WISDOM ----- थोड़ी सी असावधानी मनुष्य के लिए एक बड़ा संकट उत्पन्न कर सकती है

 इस  सत्य  को  समझाने   वाली  एक  कथा  है ----  किसी  नगर  का  प्रमुख  शहद  खा  रहा  था  l  उसके  प्याले  में  से  थोड़ा  सा  शहद  टपककर  जमीन   पर  गिर  पड़ा  l
  उस  शहद  को  चाटने   मक्खियां  आ  गईं  l   मक्खियों  को  इकट्ठी  देख  छिपकली  ललचाई  और  उन्हें  खाने  के  लिए  आ  पहुंची  l   छिपकली  को  मारने   बिल्ली  पहुंची ,  बिल्ली  पर  दो - तीन  कुत्ते  टूट  पड़े  l  बिल्ली  भाग  गई   और  कुत्ते  आपस  में  लड़कर  घायल  हो  गए  l
  कुत्तों  के  मालिक  अपने - अपने  कुत्तों  के  पक्ष  का  समर्थन  करने  लगे    और  दूसरे  का  दोष  बताने  लगे  l  उस  पर  लड़ाई  ठन   गई  l  लड़ाई  में  दोनों  ओर   की  भीड़  बड़ी   और  आखिर  सारे  शहर  में  बलवा  हो  गया  l  दंगाइयों  को  मौका  मिला ,  उन्होंने  लूटपाट  की ,  कई  जगह  आग  लगा  दी  l
  नगर  प्रमुख  ने  जांच  कराई  और  इतने  बड़े  उपद्रव  का  कारण  पूछा    तो  मंत्री  ने  जांचकर  बताया  कि --- राजन  !  आपके  द्वारा  असावधानी  से  गिराया  हुआ  थोड़ा  सा  शहद  ही  इतने  बड़े  दंगे  का  कारण  बन  गया  है  l '
 यह  बात  सबको  समझ  में  आई  कि  थोड़ी  सी  असावधानी  मनुष्य  के  लिए  कितना  बड़ा  संकट  उत्पन्न  कर  सकती  है  l
 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है ---- ' सद्बुद्धि  ही  संसार  में  समस्त  कार्यों  में  प्रकाशित  है  l  यही  सबसे  बड़ी  सामर्थ्य  है  l   हम  ईश्वर  से  सद्बुद्धि  के  लिए  प्रार्थना  करें  l '

WISDOM ----- मौन रहें

 इमर्सन  ने  कहा  है --- ' आओ  हम  चुप  रहें  ,  ताकि  फरिश्तों  के  वार्तालाप  सुन  सकें  l '
  प्रकृति  निरंतर  हमसे  कुछ  कहना  चाहती  है  l  शान्त   और  एकाग्र  मन  से  ही    उनसे  वार्तालाप  संभव  है   l   मौन  रहकर  ही   अपने  अंतराल  में  उतरने  वाले  ईश्वर  के  दिव्य  संदेशों  , प्रेरणाओं  को  सुना - समझा  जा  सकता  है   l
  विश्व  के  अधिकांश  देशों  में  फैली  इस  महामारी  ने   मनुष्य  द्वारा  अपने  सामाजिक  जीवन  में  किये  जाने  वाले  व्यवहार  को  विकराल  रूप  में  प्रकट  कर  मानवता  को  एक  सन्देश  दिया  है  ----  संसार  के  विभिन्न  देशों  में    मनुष्य  ने  जाति ,  धर्म , लिंग , रंगरूप , नस्ल ,  अमीर - गरीब ,  ऊंच - नीच   आदि  पर  भयानक  भेदभाव  किया  l   स्वयं  को  श्रेष्ठ  समझकर  दूसरे  पक्ष  पर  अमानवीय  अत्याचार  किये ,  उन्हें  तिरस्कृत  किया l   सरल  भाषा  में  कहें  तो   जिसको  अपने  से  हीन   समझा ,  निम्न  श्रेणी  का  समझा   उसको  अपने  से  दूर  रहने  को  कहा  ,  उसको  छूने  से ,  उसके  साथ  उठने  बैठने  से  इनकार   किया  l
  इस  वैश्विक  महामारी  ने  सबको  एक  श्रेणी  में  ला  दिया ,  एक  दूसरे  से  दूरी   बनाकर  रहो  ,  टच  न  करो l   प्रकृति  में  कहीं  कोई  भेदभाव  नहीं  है   l   सूर्य  का  प्रकाश  सबको  समान   रूप  से  मिलता  है  l
  विशेषज्ञ  इस  महामारी  से  निपटने  के  तरीके  बताते  हैं  l   ईश्वर  सर्वोपरि  है   l   संसार  में  सब  लोग  मिलकर  ईश्वर  से  प्रार्थना  करें  और  संकल्प  लें  कि   वे  हमारी  रक्षा  करें  ,  स्थिति  सामान्य  होने  पर  हम  सब  भेदभाव  मिटाकर   सच्चे  इनसान   बनकर  रहेंगे  l
 सच्चे  दिल  से  की  गई  प्रार्थना  अवश्य  सुनी  जाती  है  ,  ईश्वर  हम  सबके  हृदय  में  है  ,  इसलिए  छल - कपट   ईश्वर  को  पसंद  नहीं  l 

29 March 2020

WISDOM ------- निष्काम सेवा ही असली सेवा है

 महर्षि  वेदव्यास  ने  अपने  अठारह  पुराणों  में  एक  ही  बात  सार  रूप  में  लिखी  है --- परोपकाराय    पुण्याय  पापाय   परपीडनम  l '  अर्थात  परोपकार  करने  से  पुण्य  और  दूसरों  को  सताने  से  पाप  मिलता  है  l   रामचरितमानस  में  भी   गोस्वामीजी  ने  लिखा  है --- ' परहित  सरिस  धर्म  नहीं  भाई  l   पर  पीड़ा  सम  नहिं   अधमाई  l '
  शास्त्रों   में  कहा  गया  है  कि  यदि  सेवा  कर्तव्यपालन   या  आत्मिक  उन्नति  के  लिए  की  जा  रही  है  तो  वह  असली  सेवा  है   और  अगर  किसी  लालच  से  की  जा  रही  है  ,  तो  वह  आडंबरमात्र  है  l
  कल्याण  मासिक  पत्रिका  के  संपादक  श्री  हनुमान प्रसाद  पोद्दार जी   भीषण  ठंड   के  दिनों  में   गीता  वाटिका  ( गोरखपुर )  से  चुपचाप  निकलते  थे  और  ठण्ड  से  सिकुड़  रहे   गरीबों  को  कम्बल - चादर  ओढ़ा  दिया  करते  थे  l   एक  बार  एक  पत्रकार  ने   गरीबों  को  कम्बल  ओढ़ाते  हुए   उनका  फोटो  ले  लिया  ,  तो  पोद्दार जी  ने  बड़ी  विनम्रता  से   उससे  कहा --- " यह  फोटो  अख़बार  में  मत  छापना   ,  न  ही  इसके  बारे  में  किसी  दूसरे  को  बताना ,  नहीं  तो   मैं  पुण्य  की  जगह  पाप  का  भागी  बनूँगा  l  प्रचार  के  उद्देश्य  से  की  गई  सेवा  पुण्य  नहीं , पाप  का  मार्ग  बताई  गई  है  l  "
  हमारे  शास्त्रों  में  लिखा  है  -- निष्काम  सेवा  यही  है  जिसमे  हम  यश - मान - अपमान  से  कोसों  दूर  होते  हैं  l  यदि  इस  सेवा  में  अहंकार  की  गंध  हो  , यश  प्राप्ति  की  कामना  और  किसी  प्रकार  का  लालच  हो   तो  वह  सेवा  ही  नहीं  है  l  
  ईसामसीह   भी  सेवा  करने  की  भावना  को  बहुत  महत्व   देते  थे  l उनके  एक  शिष्य  की  शेखी  बघारने  की  बहुत  आदत  थी  l  एक  दिन  वह  महात्मा  ईसा  के  दर्शन  को  पहुंचा   और  बोला --- " आज  मैं  पांच  गरीबों  को  खाना  खिलाकर  आया  हूँ  l  जब  तक  मैं  किसी  की  सहायता  न  कर  दूँ  ,  मुझे  चैन  नहीं    मिलता  l  "  इस  बात  पर  ईसा  ने  उसे  समझाया --- ' तुम्हारा  आज  का  सेवा - पुण्य  समाप्त  हो  गया  l   जो  दिखावे  के  लिए   किसी  की  सहायता  करता  है  , समझ  लो  कि   वह  नाटक  करता  है  l   इसलिए  किसी  की  सहायता  गुप्त  रूप  से  करनी  चाहिए  l  ' उन्होंने  आगे  कहा --- ' सेवा - सहायता  का  कार्य  तुम्हारा  इतना  गुप्त  हो  कि  तुम्हारे  बांये  हाथ  को  भी  पता  न  चल  सके  कि   दाहिने  हाथ  से  तुमने  दान  किया  है   या  किसी  की  मदद  की  है  l  परमेश्वर  तुम्हारे  गुप्त  कार्यों  को  भी  देखता  है  l  ढिंढोरा  पीटने  से  कोई  लाभ  नहीं  l ' 

WISDOM ------- शक्ति की शोभा दुर्बल पर जोर दिखाने में नहीं , गिरे हुओं को उठाने में होती है ---- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

  पेड़  की  एक  डाल   पर  तोता  और  दूसरी  डाल   पर  बाज  बैठे  थे  l   तोते  को  देखकर  बाज  अकड़कर  बोलै --- "अरे  तोते  ! अच्छा  है  कि   मेरा  पेट  भरा  है  ,  नहीं  तो  क्षण  भर  में   मैं  तेरे  टुकड़े  कर  दूँ  ,  पर  तू  ऐसे  दुस्साहस  के  साथ   मेरे  सामने  खड़ा  है  l "
  तोते  ने  कहा --- " आप  ठीक  कहते  हैं  कि   आप  मुझसे  ज्यादा  शक्तिशाली  हैं  ,  पर  शक्ति  की  शोभा  दुर्बल  पर  जोर  दिखाने   में  नहीं ,  गिरे  हुओं  को  उठाने  में  होती  है  l  भक्षण  तो  कोई  भी  कर  सकता  है  ,  पर  रक्षण  करना  बलवान  का  दायित्व  है  l  "  बात  बाज  की  समझ  में  आई  और  उसकी  समझ  में  परिवर्तन  आ  गया  l