एक अनपढ़ किसान ने अपने गुरु से दीक्षा ली l गुरु ने मन्त्र दिया --- ' ॐ लक्ष्मीपतये नम: l ' किसान ने भक्ति और श्रद्धा के साथ इस मन्त्र को रट कर जप आरम्भ कर दिया , किन्तु अनपढ़ होने के कारण वह मूल मन्त्र भूलकर ' ॐ लछमनये मय: ' जप करने लगा l एक दिन भगवान विष्णु लक्ष्मी जी के साथ वहां से विचरण करते हुए निकले l अशुद्ध जप करते देख लक्ष्मी जी किसान के पास जाकर पूछने लगीं --" तुम किसका जप कर रहे हो l किसान मुंह से शब्द तो रट रहा था , पर ध्यान में उसके भगवान बस रहे थे l उसे लक्ष्मी जी के शब्द सुनाई नहीं पड़े l लक्ष्मी जी के कई बार टोकने से किसान का ध्यान भंग हो गया , खीजकर उसने उत्तर दिया --" तुम्हारे पति का ध्यान कर रहा हूँ l बोलो क्या करोगी ? ' लक्ष्मी जी अपने स्वामी के प्रति उसकी भक्ति से बहुत प्रसन्न हुईं और किसान को धन -धान्य से परिपूर्ण कर दिया l नारद जी ने एक दिन इसी प्रसंग का विवरण देकर भगवान से लक्ष्मी जी की शिकायत की तो भगवान बोले ---- " नारद ! हमारे यहाँ शब्दजाल का उतना महत्त्व नहीं है जितना भावना का है l किसान की भावना निर्दोष थी , फिर उसे लक्ष्मी जी ने वरदान दिया तो क्या हुआ l "
12 October 2023
11 October 2023
WISDOM ------
इस संसार में आदिकाल से ही देवताओं और असुरों में , अंधकार और प्रकाश में संघर्ष रहा है l कलियुग में यह स्थिति और भयावह हो गई है l युद्ध , दंगे -फसाद , आतंक , जाति और धर्म के नाम पर झगड़े , प्राकृतिक आपदाएं इस धरती पर बहुत बढ़ गई हैं l समस्या यह है कि ऐसी नकारात्मक परिस्थितियों में हम कैसे शांति और तनाव रहित जीवन जिएं ? नकारात्मकता की बार -बार चर्चा करना व्यर्थ है l संसार में कुछ लोगों का जन्म होता ही इसलिए है कि वे नकारात्मक शक्तियों के साथ काम करते हैं , स्वयं अशांत रहते हैं और संसार में अशांति फैलाते हैं l इनका निपटारा तो भगवान ही कर सकते हैं l हमारे आचार्य ने , ऋषियों ने सुख -शांति से जीने का सबसे सरल एक उपाय बताया है वह है ---- निष्काम कर्म और नि:स्वार्थ प्रेम l श्रीमद् भगवद्गीता में भी यही कहा गया है कि निष्काम कर्म से मन निर्मल होता है l मन यदि निर्मल है , शांत है तो बाहर का शोर हमें नहीं सताता l निष्काम कर्म को यदि हम अपनी दिनचर्या में सम्मिलित कर लें तो सत्कर्मों की यह पूंजी हर मुसीबत से हमारी रक्षा करती है l नि:स्वार्थ प्रेम यदि हमें सीखना है तो भगवान श्रीकृष्ण की यशोदा मैया से सीखें l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'त्याग एवं बलिदान ही प्रेम के पर्याय हैं l प्रेम वहीँ ठहरता है जहाँ स्वयं को मिटा देने का जज्बा पैदा होता है l ' जब भगवान श्रीकृष्ण को गोकुल छोड़कर मथुरा के लिए प्रस्थान करना था , उस समय मैया यशोदा का रो -रोकर बुरा हाल था , आँखें रोकर लाल हो गईं थीं l वे मैया से अंतिम विदाई लेने गए और कहा --- " माते ! मैं फिर लौटकर तुम्हारे पास आऊंगा , मुझे फिर से माखन -मिसरी अपने हाथों से खिलाना और जब तक मैं तेरे पास नहीं पहुँच जाऊँगा , अपने प्रिय माखन -मिसरी को हाथ तक नहीं लगाऊंगा l " अपने बाल्यकाल के चौदह वर्ष यशोदा मैया के सघन वात्सल्य में रहकर जब कृष्ण माता देवकी के पास पहुंचे तो इतने वर्षों बाद पुत्र को पाकर देवकी बावली सी हो रहीं थीं l उन्होंने सुन रखा था कि कृष्ण को माखन -मिसरी बहुत पसंद है , उन्होंने माखन -मिसरी से भरा स्वर्ण थाल कृष्ण के सामने रखा , तब कृष्ण ने माथा झुका लिया उनकी आँखों से दो बूंद आँसू टपक गए l देवकी ने कहा ---" पुत्र ! मुझसे क्या अपराध हुआ जो तुम इसे खाने के बदले रो रहे हो l " तब कृष्ण जी ने उनको यशोदा मैया को दिए गए वचन की बात कही l जब भगवान श्री कृष्ण के महाप्रयाण की सूचना देने अर्जुन माता देवकी के पास पहुंचे तब उन्हें यह दु:खद सूचना तो नहीं कह सके , हाँ उस समय देवकी ने यह माखन -मिसरी और यशोदा मैया को उनके दिए वचन की बात कही l देवकी ने कहा --- " अर्जुन ! मेरे मन में यशोदा के प्रति ईर्ष्या का भाव पनप गया था और कृष्ण के प्रति अधिकार का भाव आ गया था l अधिकार के इस भाव में अहंकार की गंध आती है और जहाँ अहंकार होगा , वहां प्रेम नहीं स्वार्थ पनपेगा l इसलिए माखन मिसरी में मेरा प्रेम नहीं , स्वार्थ टपक रहा था l वे कहती हैं ---'यशोदा का प्रेम त्याग से प्रकट हुआ था l इस प्रेम के कारण यशोदा का मातृत्व मेरे से बहुत ऊँचा था l इसी प्रेम के कारण जगत यशोदा को कृष्ण की मैया के रूप में जानता है l
10 October 2023
WISDOM ---
यह मानव जाति का दुर्भाग्य है कि अब लोगों को युद्ध , हिंसा , दंगे , फसाद , अपहरण ------ आदि के बीच भय और तनाव के साथ जीने की आदत बन गई है l इसका कारण स्पष्ट है --अब मनुष्य के लिए उसका स्वार्थ सर्वोपरि है l परिवार , समाज , संस्थाएं , राष्ट्र और सम्पूर्ण संसार में मनुष्य की मन:स्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि वह अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए उनकी खुशामद करता है जो सशक्त हैं , दबंग है , चाहे उनके कृत्यों से समाज की कितनी भी हानि क्यों न होती हो l स्थिति इतनी विकट है कि असुरता का साथ सब देते हैं क्योंकि उनसे तात्कालिक स्वार्थ की पूर्ति होती है और सत्य अकेला रह जाता है , यहाँ तक कि सत्य और ईमान की राह पर चलने वालों का लोग बायकाट कर देते हैं l इसका परिणाम यही होगा जो आज हम संसार में देख रहे हैं l एक कथा है ---- राजा कृतवीर्य के पुत्र सहस्त्रार्जुन बहुत वीर और सत्य के पथ पर अडिग रहने वाले महान तपस्वी भी थे l सम्पूर्ण पृथ्वी पर उनकी ख्याति थी l उनसे रावण को बहुत ईर्ष्या होती थी l रावण को बहुत अहंकार था , उसने सहस्त्रार्जुन पर आक्रमण किया कि उसके विशाल साम्राज्य पर अधिकार कर ले l युद्ध में रावण बुरी तरह पराजित हुआ और उसे बंदी बना लिया गया l सहस्त्रार्जुन ने उसे बंदीगृह में सम्मान से रखा , यह सम्मान रावण के अहंकार को चुभता था l स्वयं महर्षि पुलस्त्य रावण को बंदीगृह से मुक्त कराने गए l सहस्त्रार्जुन ने रावण को महर्षि पुलस्त्य के बराबर राजदरबार में स्थान दिया और रावण से कहा ----- " रावण ! मैं तुम्हारी विद्वता का कायल हूँ परन्तु तुम्हारे नीच कर्म पर मुझे दया आती है l रावण ! ध्यान रखना दुराचारी चाहे कितना बलवान , शक्तिवान क्यों न हो , एक दिन उसका दर्दनाक अंत होना सुनिश्चित है l पुण्य के क्षीण हो जाने पर सारा दंभ गुब्बारे की हवा की तरह निकल जाता है और बच जाता है शक्ति के बल पर किया गया घोर पाप l रावण ! तुम यह सब किसके लिए कर रहे हो ? यहाँ कोई अजेय नहीं है , काल किसी को क्षमा नहीं करता l मैं तुम्हे मुक्त नहीं कर रहा , मैं तुम्हे काल के हवाले कर रहा हूँ l मर्यादा और सत्य की कोई अवतारी सत्ता तुम्हारा विनाश करेगी l ध्यान रखना , शक्ति नहीं , सत्य ही विजित होता है l
9 October 2023
WISDOM ----
महाभारत के लिए कहा जाता है -- न भूतो न भविष्यति ' ऐसा युद्ध न कभी हुआ न होगा l वह युद्ध था अधर्म , अनीति और अत्याचार का अंत कर धर्म और शांति की स्थापना के लिए l युद्ध में दोनों ही पक्ष के योद्धा ने वीरता से युद्ध किया , युद्ध के नाम पर महिलाओं और बच्चों पर कोई अत्याचार नहीं हुआ l युद्ध में जो वीरगति प्राप्त हुए उन्हें स्वर्ग मिला l लेकिन इस कलियुगी दिमाग के युद्ध लोगों की पिशाचवृत्ति को जगा देते हैं l युद्ध और दंगों के नाम पर जो कृत्य करते हैं , ऐसे नर पिशाचों को देखकर तो सही का पिशाच भी शरमा जाए l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- क्रोध से मनुष्य की भावनाएं विकृत हो जाती हैं l वैर से वैर कभी शांत नहीं होता l अवैर से ही वैर शांत होता है l ' मैल से मैल साफ़ नहीं होता उसके लिए स्वच्छ जल की आवश्यकता होती है l एक कथा है जो इस सत्य को स्पष्ट करती है कि यदि विवेक नहीं जागता तो क्रोध और बदला लेने का दुर्गुण जन्म -जन्मान्तर तक चलता रहता है , किसी भी योनि में जन्म हो बदला शांत नहीं होता ------कौशाम्बी के राजा शूरसेन वन विहार को निकले l वन में एक पक्षी वृक्ष पर अत्यंत कर्कश स्वर में बोलने लगा , राजा ने इसे अपशकुन माना और उसे एक बाण मारा , पक्षी नीचे गिर गया l घायल पक्षी को तड़फता देख राजा का ह्रदय पश्चाताप करने लगा , अहंकार के कारण यह गलती हो गई l कुछ आगे बड़े तो एक मुनि ध्यान कर रहे थे उन्होंने राजा को दया -धर्म का उपदेश दिया l पक्षी को मारने का पश्चाताप और इस उपदेश का राजा पर इतना असर हुआ कि राज्य का परित्याग कर प्रव्रज्या ग्रहण कर ली l कौशाम्बी नरेश शूरसेन अब महामुनि कौशल्य बन गए l तीव्र तपस्या के कारण उन्हें ' तेजोलेश्या ' ( क्रोध से जिसे देखें वह जलकर राख बन जाये ) की प्राप्ति हो गई l वह पक्षी मरकर भील बना l एक बार महामुनि कौशल्य किसी वन से जा रहे थे , मार्ग में वह भील मिला l मुनि को देखते ही उसे पूर्व जन्म की याद आ गई और वह मुनि को लाठी से पीटने लगा l मुनि बहुत देर तक तो सहते रहे l वे सोच रहे थे कि मैंने तो इसका कोई नुकसान नहीं किया फिर भी यह मार रहा है , वे मुनि धर्म भूल गए और क्रोध में आकर तेजोलेश्या उस पर छोड़ दी l उसी क्षण वह भील जल गया और फिर उसी वन में सिंह के रूप में पैदा हुआ l महामुनि कौशल्य फिर उस वन से गुजरे तो उन्हें देखते ही सिंह उन पर टूट पड़ा l अपने बचाव के लिए मुनि ने उस पर तेजोलेश्या छोड़ दी , वह भी झुलसकर राख हो गया l उस पक्षी की आत्मा ने क्रमशः भील , सिंह , हाथी , सांड , और सर्प योनि में जन्म लिया और हर बार उसने पूर्व जन्म के वैर के कारण मुनि पर आक्रमण किया और मुनि ने उसे तेजोलेश्या से भस्म कर दिया l सर्प के बाद वह ब्राह्मण के घर जन्मा , पढ़ -लिख कर विद्वान् बन गया l मुनि उस गाँव में प्रवचन देने आए तो वह उनसे बहुत चिढ़ता था , उनको अपमानित करता , भरी सभा में निंदा करता , कटु वचन कहता l मुनि की सहनशीलता समाप्त हो गई , उन्होंने तेजोलेश्या छोड़कर उसे भी भरी सभा में भस्म कर दिया l मरते समय उसने ईश्वर को याद किया तो अगले जन्म में वह वाराणसी नगरी में ' महाबाहु नामक राजा बना l एक दिन राजा महाबाहु झरोखे से नगर का निरीक्षण कर रहे थे कि उन्होंने राजपथ से मुनि को जाते हुए देखा l मुनि को देखते ही उन्हें पूर्व जन्म की याद आ गई कि कैसे उसने पिछले छह जन्मों में बदला लेने के लिए मुनि पर आक्रमण किया और मुनि ने उसे तेजोलेश्य से भस्म कर दिया l राजा महाबाहु का विवेक जाग्रत हो गया , वे समझ गए कि यह सब उसके क्रोध और मुनि के ज्ञान के अहंकार के कारण हुआ l राजा ने मुनि को बुलवाया , उनकी वंदना की और सब बताया कि उसे इस तरह बदले की भावना रखने का पश्चाताप है l मुनि को भी अपने दुष्कृत्य का पश्चाताप हो रहा था l दोनों ने मिलकर संकल्प लेकर अपने ह्रदय को निर्मल बनाया और जन्म -जन्म की वैर परंपरा को समाप्त किया l
WISDOM -----
आज का समय कुछ ऐसा है कि परिवार, समाज , संस्थाएं , राष्ट्र और सम्पूर्ण संसार में कलह , दंगे -फसाद , झगड़े और युद्ध की स्थिति है l इसके मूल में प्रमुख दो ही कारण हैं ---1. विवेक न होना 2. अहंकार और उससे उत्पन्न बदले की भावना l यह बदले की भावना पीढ़ी -दर -पीढ़ी चलती रहती है l यदि इस पीढ़ी में किसी भाई ने छल -कपट से दूसरे भाई की संपत्ति हड़पी और धोखे से उसे मरवा दिया तो यदि हम उसकी पिछले दो तीन पीढ़ियों के बारे में पता करेंगे तो उन पीढ़ियों में भी ऐसी ही घटना अवश्य हुई होगी l l बदले की भावना यदि समाप्त न हो तो ऐसा पैटर्न हजार , पांच सौ साल तो क्या युगों तक चलता ही रहता है l विभिन्न देशों में जो युद्ध होते हैं वे इसी बदले की भावना और अहंकार के कारण है ----' तुमने वर्षों पहले ऐसा किया था इसलिए अब हम भी नहीं छोड़ेंगे ' जबकि जिसने किया और जिसके साथ हुआ वे सब इस संसार से जा चुके हैं लेकिन बदले की भावना जो संस्कारों में भरी है वह उफान मारती है और ऐसे कुत्सित संस्कारों से भरा व्यक्ति और व्यक्ति समूह युगों पहले किए गए अपराधों को बार -बार दोहराते हैं l अपने विकास , अपनी समृद्धि को अपने ही हाथों नष्ट करते हैं l यदि मनुष्य का विवेक जाग जाए तो अपनी ऊर्जा ओर अपने साधनों को दूसरों से बदला लेने के स्थान पर अपने सुरक्षा कवच को मजबूत करने में खर्च करे l हम दूसरे को तो नहीं सुधार सकते लेकिन अपना सुरक्षा कवच मजबूत बना सकते हैं l परिवार हो या राष्ट्र हो केवल भौतिक साधनों से सुरक्षा कवच मजबूत नहीं होता , उसकी मजबूती के लिए जरुरी है श्रेष्ठ चरित्र , नैतिक मूल्यों पर आधरित जीवन जीने से उत्पन्न आत्मविश्वास l यदि ऐसा आत्मबल है तो दुश्मन का हर वार विफल हो जायेगा , स्वयं दैवी शक्तियां उसकी रक्षा करेंगी l पांडव केवल पांच थे , कौरवों के पास विशाल सेना थी लेकिन वे पांडवों का कुछ नहीं बिगाड़ सके l उन पर नारायण अस्त्र का भी प्रहार किया गया लेकिन पांडवों की नम्रता और सत्य और न्याय पर उनके आचरण के कारण वह भी झुककर वापस चला गया l आज संसार के लिए जरुरी है कि अरबों की संपत्ति मारक हथियारों , बम आदि पर खर्च करने के बजाय श्रेष्ठ मनुष्यों के निर्माण पर धन व्यय करे l आज संसार बारूद के ढेर पर है और बदले की भावना से ग्रस्त विकृत मानसिकता स्वयं के साथ दूसरों को भी नष्ट कर देती है l
7 October 2023
WISDOM ----
इस संसार में आसुरी शक्तियां भी हैं और देवत्व भी है l ईश्वर ने हमें चुनाव की स्वतंत्रता दी है , हम दोनों में से जिसे चाहे चुन लें l जैसी राह होगी वैसा ही परिणाम सामने आएगा l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " असुरता मायावी खेल खेलती है l असुर छल -बल का प्रयोग करते हैं l ये अपने जाल में उलझाने के लिए बड़ा ही मोहक एवं आकर्षक द्रश्य प्रस्तुत करते हैं l ये व्यक्ति की कमजोरियों को उभारते हैं l लोभ , मोह , काम, वासना आदि का द्रश्य दिखाकर ये अपने जाल में फंसा लेते हैं , फिर उसका तब तक उपयोग करते हैं , जब तक वह पूरी तरह निचुड़ न जाए l अंत में उसे मारकर फेंक देते हैं l यह असुरता का क्रियाकलाप है l इसके विपरीत देवता किसी का उपयोग करते हैं तो उसको उसके सतोगुणी रूप में वापस लौटाते हैं l देवत्व का पक्षधर कभी घाटे में नहीं रहता l सभी रूपों में उसे लाभ ही मिलता है l ' असुर अपने तप से बहुत धन -वैभव और शक्ति प्राप्त कर लेते हैं , जिसका उन्हें अहंकार होता है l l आचार्य श्री लिखते हैं ---- ' वक्त किसी का नहीं होता , परन्तु अहंकारी वक्त को थाम लेने का दंभ भरता है परन्तु जग जाहिर है कि रावण , कंस , जरासंध जैसे शक्तिशाली राक्षस भी उसे थाम नहीं पाए , काल चक्र के घूमते पहियों में पिस गए l किसी कालखंड में उदित पुण्यों के प्रभाव से अनीति और अत्याचार करने पर भी कुछ नहीं होता , इससे उन्हें ऐसा लगता है कि हमने काल पर नियंत्रण कर लिया परन्तु जब पुण्यों का प्रभाव चुक जाता है तब वक्त के थपेड़ों से वह भी बच नहीं पाता l अत: बुद्धिमानी इसी में है कि वक्त की सही पहचान करते हुए आसुरी शक्तियों के हाथ की कठपुतली न बनकर देवताओं का यंत्र बन जाना चाहिए l
6 October 2023
WISDOM -------
काम , क्रोध , लोभ , मोह मन की ऐसी कमजोरियां हैं जिनसे मनुष्य तो क्या ऋषि , मुनि , देवता कोई नहीं बचे l जो इन पर विजय पाने का अहंकार करते हैं वे ईश्वर द्वारा ली जाने वाली परीक्षाओं में असफल हो जाते हैं , अहंकार व्यर्थ है l इन पर विजय पाना भी ईश्वरीय कृपा से ही संभव है l पुराण की एक कथा है -------- वेदव्यास के शिष्य थे जैमिनी l जैमिनी को अपनी तप साधना पर और वेदांत के ज्ञान पर अहंकार था l मैं ही ब्रह्म हूँ , उस पर तर्क करते l उन्हें अहंकार हो गया कि उन्होंने मन की इन कमजोरियों को जीत लिया है l गुरु ने अपने शिष्य को सही राह पर लाना ठीक समझा जिससे यह अहंकार का भूत उतर जाये l जैमिनी जंगल में कुटिया बनाकर रहते थे l एक अँधेरी रत , तेज आँधी आई , वर्षा हो रही थी l जैमिनी कुछ लिख रहे थे , अचानक एक सुन्दर युवती आई और बोली --- " आप महापुरुष है , यहाँ डर कैसा l आज्ञा हो तो कुटिया में शरण ले लें l " जैमिनी के अहं को पोषण मिला , बोले -- हाँ , विश्राम कर लो , दरवाजा अन्दर से बंद कर लो l " कुछ समय बीता , युवती की उपस्थिति से मन कुछ विचलित हुआ , दरवाजा खटखटा कर उसका हाल पूछा तो अन्दर से आवाज आई ---हम ठीक हैं l लेकिन मन कुछ ऐसा बैचैन हुआ कि फूस की छत का खपरैल हटाकर अन्दर कूदे तो अन्दर देखा महर्षि वेदव्यास आसन पर बैठे मुस्करा रहे हैं l जैमिनी बहुत शर्मिंदा हुए और गुरु के चरणों में गिर गए l गुरु ने समझाया ---- ' देह रहते आसक्ति का त्याग विरलों से ही संभव है l अहंकार नहीं करो l ' जैमिनी को सही शिक्षण मिला l