असफलताएं खोलतीं हैं सफलताओं के द्वार ।एडिसन का कथन है -"असाधारण प्रतिभासंपन्न मात्र एक प्रतिशत जन्मजात होते हैं ।शेष निन्यानवे प्रतिशत को उनका कठिन परिश्रम और अध्यवसाय की आदत गढ़ती -ढालती एवं बनाती है ।"प्रत्येक असफलता हमें अधिक समझदार बनाती है ।असफलता मात्र एक अवसर है दुबारा बुद्धिमतापूर्ण ढंग से प्रयास करने का ।पनामा नहर की खुदाई चल रही थी ।यह कार्य संकल्प के धनी मेजर जनरल गोथाइल की देख -रेख में चल रहा था ।नहर आधी ही खुद पायी थी कि अचानक एक विशाल भूखंड टूटकर गिर पड़ा व नहर मिट्टी के मलबे से भर गई ।कई माह के कार्य की क्षति हुई ।जनरल के सहायक ने उदासी भरे हताश शब्दों में कहा -"अब क्या करें ?'गोथाइल ने दृढ स्वर से कहा -"पूरे उत्साह के साथ दोबारा खुदाई शुरु करो ।"ऐसा ही किया गया एवं सफलता प्राप्त हुई ।यदि हमारे ह्रदय में अपने लक्ष्य के प्रति अगाध श्रद्धा एवं विश्वास है और प्रत्येक असफलता को हम चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं तो हमारी सफलता उतनी ही सुनिश्चित होगी ,जितना कि लम्बी रात्रि के बाद का उगने वाला अरुणिम सूर्य ।
4 February 2013
3 February 2013
एक बार शरीर की सभी इंद्रियों ने हड़ताल कर दी ।उनने कहा -"कमाई हम करते हैं ,हजम सारा पेट कर जाता है ।हाथ ,पाँव ,आंख नाक ,कान आदि ने यूनियन बना ली और कहा कि हम कमाएंगे और हम ही खाएंगे ,अन्यथा काम नहीं करेंगे ।पेट ने सभी को समझाया कि तुम्हारा दिया सब कुछ तुम्हीं को तो लौटा देता हूँ ,ताकि तुम सशक्त रहो ।हड़ताल मत करो ।पर यह बात किसी इंद्रिय की समझ में नहीं आई ।उनने कहा -"तुम पूंजीपति हो ।शोषण करते हो ।जब सब अंगों ने काम करना बंद कर दिया तो भोजन पेट में कैसे पहुँचता ,इसलिए पेट भूखा रह गया ।शरीर के रस सूखने लगे ।सभी अंगों की शक्ति नष्ट होने लगी ।इंद्रियां निष्क्रिय सी हो गईं ।तब मस्तिष्क ने इंद्रियों से कहा -"मूर्खों !तुम्हारा परिश्रम अकेले पेट के पास नहीं रहता ,वह लौटकर तुम्हे ही वापस मिलता है ।दूसरों की सेवा करके हम घाटे में नहीं रहते ,जितना देते हैं ,वह ब्याज सहित वापस लौट आता है ।तुम सभी अपना कर्तव्य करो ।फल तो मिलेगा ही ।'हड़ताली इंद्रियां वापस काम पर लौट आईं ।परोपकार में बुद्धिमानी है ।इसी में हमारा सहअस्तित्व है ।
2 February 2013
दूध ने पानी से कहा -"बंधु !किसी मित्र के अभाव में मुझे सूना -सूना अनुभव होता है ।आओ ,तुम्हीं को ह्रदय से लगाकर मित्र बनाऊं ।"पानी ने उत्तर दिया -"भाई !तुम्हारी बात तो मुझे बहुत अच्छी लगी ,पर यह विश्वास कैसे हो कि अग्नि परीक्षा के समय भी तुम मेरे साथ रहोगे ?दूध ने कहा -"विश्वास रखो ,ऐसा ही होगा ।"और दोनों में मित्रता हो गई ।ऐसी मित्रता कि दोनों के स्वरुप को अलग करना कठिन हो गया ।अग्नि नित्य परीक्षा लेकर पानी को जला देती है पर दूध है कि हर बार मित्र की रक्षा के लिए अपने अस्तित्व की भी चिंता न करते हुए जलने को प्रस्तुत हो जाता है ,यही है सच्ची मित्रता ।
नशा ,नाश की जड़ है ।पिता ने बहुत समझाया -"बेटा !शराब मनुष्य को बरबाद कर देती है "।पर बेटे ने एक न सुनी ,वह नियमित रूप से शराब पीता रहा ।एक दिन उसने अपने मित्र के साथ खूब शराब पी ।उसकी सारी विचार शक्ति नष्ट हो गई ।उसने मित्र से पूछा -क्यों जी !मेरी मृत्यु के बाद क्या होगा ?"होगा यह कि तुम्हारा शरीर कब्र में डाल दिया जायेगा "-साथी ने उत्तर दिया ।लड़का बोला -"अजी यह तो मुझे भी पता है ,तुम उसके बाद की बात बताओ "।मित्र ने कहा -फिर क्या होगा ,तुम्हे मिट्टी से ढक कर कब्र बना दी जाएगी ।"लड़का ठठाकर हँसा और कहने लगा -मूर्ख !इतना तो मुझे भी पता है ,तू यह बता उसके बाद क्या होगा ?मित्र ने हँसकर कहा -"बरसात होगी और पड़ोसी तुम्हें खूब रौंदेगा ।"लड़का चिल्लाया -"अच्छा तो पड़ोसी की यह हिम्मत !और लाठी लेकर दौड़ा ।पकड़ते -पकड़ते उसने पड़ोसी का सिर सीरा बना दिया ।वह तो पुलिस आ गई ,नहीं तो मारकर ही छोड़ता ।पुलिस उसे पकड़ कर ले गई और हवालात में बंद कर दिया ।सुबह उसने पिताजी को संदेश भेजा -"पिताजी !अब मैं समझ गया ,नशा सचमुच मनुष्य से वह सब करा सकता है ,जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ।"
31 January 2013
जो ईश्वर से भय खाता है उसे दूसरा भय नहीं सताता है ।संकीर्ण स्वार्थ ,वासना और अहं से युक्त अनैतिक जीवन भय का प्रमुख कारण है ।भय का सबसे घ्रणित पहलू अपने स्वार्थ के लिए ,दूसरों पर छाये रहने की भावना से अधीनस्थ लोगों का शोषण करना है ।वैराग्यशतक में भय की स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है -भोग में रोग का भय ,धन में चोरी होने का भय ,सत्ता में शत्रुओं का भय ,सौंदर्य में बुढ़ापे का भय ,शरीर में मृत्यु का भय ।इस तरह संसार में सब कुछ भय से युक्त है ।त्याग का मार्ग ही निर्भयता की अवस्था की ओर ले जाता है ।
30 January 2013
SILENCE
जब महाभारत का अन्तिम श्लोक गणेशजी के सुपाठ्य अक्षरों में अंकित हो चुका तब महर्षि वेदव्यास ने गणेशजी से कहा -"आपका मौन विस्मयकारी है ।इस सुदीर्घ काल में मैंने तो पंद्रह बीस लाख शब्द बोल डाले ,परन्तु आपके मुख से मैंने एक भी शब्द नहीं सुना ।इस पर गणेशजी ने मौन की व्याख्या करते हुए कहा -"किसी दीपक में अधिक तेल होता है ,किसी में कम ,परन्तु तेल का अक्षय भंडार किसी किसी दीपक में नहीं होता ।उसी प्रकार सबकी प्राणशक्ति सीमित है ,असीम किसी की नहीं ।इस प्राणशक्ति का पूर्णतम लाभ वही पा सकता है जो संयम से उसका उपयोग करता है ।संयम ही समस्त सिद्धियों का आधार है और संयम का प्रथम सोपान है -वाक्-संयम ।वाणी का संयम न रखने से प्राणशक्ति सूख जाती है इसलिए मैं मौन का उपासक हूँ ।
29 January 2013
मनुष्य का अच्छा स्वभाव ही उसका सौन्दर्य है ।वह कुरूपता की कमी पूरी कर सकता है ,किन्तु बुरे स्वभाव के रहते देवताओं जैसे सौन्दर्य का भी कोई मूल्य नहीं ।लुकमान से किसी ने प्रश्न किया कि आपने इतनी शिष्टता कहाँ से सीखी ?लुकमान ने उत्तर दिया -"भाई ,मैंने शिष्ट व्यवहार अशिष्ट लोगों के बीच रहकर ही सीखा है ।लुकमान का उत्तर सुनकर लोग अचरज में पड़ गये ।लुकमान ने स्पष्ट करते हुए कहा कि अशिष्ट लोगों के बीच रहकर ही मैंने जाना कि अशिष्ट व्यवहार क्या है ।मैंने पहले उनकी बुराइयों को देखा ।फिर देखा कि कहीं वे बुराइयां मुझ में तो नहीं हैं ।इस तरह के आत्म निरीक्षण से मैं बुराइयों से दूर होता गया और आत्म सुधार के फलस्वरूप लोग मुझे लुकमान से हजरत लुकमान कहने लगे ।
Subscribe to:
Posts (Atom)