रूस के अति विलक्षण संत गुरजिएफ का कहना था कि अगर इस सारी धरती को धार्मिक बनाना हो तो केवल एक उपाय है----- वैज्ञानिकों को सारी चिंता छोड़कर एक मशीन खोज लेनी चाहिए, जो बिलकुल घड़ी की तरह हो । जिसे हर आदमी के हाथ पर बांध दिया जाये । जो हमेशा बाँधने वाले को बताती रहे कि अब मौत कितने करीब है । उसका काँटा निरंतर घूमता रहे । यह अनुसंधान कठिन जरुर है, पर असंभव नहीं ।
20 November 2014
19 November 2014
जीवन की सार्थकता
जीवन में सार्थकता तभी आती है, जब दूसरों के लिए कुछ किया जाता है । दूसरों के लिए किये गये परिश्रम में यदि निष्कामता का भाव हो, जनहित का भाव हो, तो ऐसा कर्म आध्यात्मिक कर्म बन जाता है, जिसका फल अनंत गुना मधुर एवं व्यापक होता है ।
मनुष्य जीवन की किसी भी अवस्था में और किसी भी स्थिति में परोपकार किया जा सकता है । बस, इसके लिए संवेदनशील एवं उदार भावनाएँ चाहिए ।
प्राचीन समय में एक बूढ़ा बेसहारा आदमी भिक्षा माँगकर अपना जीवन- निर्वाह करता था । वह नित्य प्रति अधिक से अधिक भिक्षा प्राप्त करने का प्रयास करता था । इसी प्रयत्न में उसे सवेरे से लेकर रात हो जाती थी । वृद्ध की दिनचर्या का एक हिस्सा यह भी था कि जैसे ही वह सवेरे सोकर उठता, सबसे पहले शुद्ध होकर मंदिर में जाता, वहां की पूजा में भाग लेता, भगवान को प्रणाम करता, फिर लौटकर आता और भीख मांगने निकल जाता ।
अपनी कुटिया से मुख्य मार्ग को जाते समय वह अनाज के दानों से मुट्ठियाँ भर लेता और जहाँ पक्षियों को देखता, वहां दाने बिखेर देता । दोपहर को जब खाना खाने बैठता तो आधे से अधिक खाना लोगों में बाँट देता । उसे अपना पेट भरने की चिंता न थी । जिस दिन वह अधिक परमार्थ करता, उस रात उसे बड़ी गहरी नींद आती और वह निश्चिंतता पूर्वक सो जाता ।
मनुष्य जीवन की किसी भी अवस्था में और किसी भी स्थिति में परोपकार किया जा सकता है । बस, इसके लिए संवेदनशील एवं उदार भावनाएँ चाहिए ।
प्राचीन समय में एक बूढ़ा बेसहारा आदमी भिक्षा माँगकर अपना जीवन- निर्वाह करता था । वह नित्य प्रति अधिक से अधिक भिक्षा प्राप्त करने का प्रयास करता था । इसी प्रयत्न में उसे सवेरे से लेकर रात हो जाती थी । वृद्ध की दिनचर्या का एक हिस्सा यह भी था कि जैसे ही वह सवेरे सोकर उठता, सबसे पहले शुद्ध होकर मंदिर में जाता, वहां की पूजा में भाग लेता, भगवान को प्रणाम करता, फिर लौटकर आता और भीख मांगने निकल जाता ।
अपनी कुटिया से मुख्य मार्ग को जाते समय वह अनाज के दानों से मुट्ठियाँ भर लेता और जहाँ पक्षियों को देखता, वहां दाने बिखेर देता । दोपहर को जब खाना खाने बैठता तो आधे से अधिक खाना लोगों में बाँट देता । उसे अपना पेट भरने की चिंता न थी । जिस दिन वह अधिक परमार्थ करता, उस रात उसे बड़ी गहरी नींद आती और वह निश्चिंतता पूर्वक सो जाता ।
18 November 2014
WISDOM
' विभूतियाँ दुधारी तलवार की तरह होती हैं । जहाँ ये सृजन में अपना चमत्कार प्रस्तुत करती हैं, वहीँ दिशा भटकने पर भयंकर विनाश एवं विध्वंस के द्रश्य भी प्रस्तुत करती हैं । '
देवताओं और असुरों में घोर युद्ध हो रहा था । राक्षसों के शस्त्र-बल और युद्ध कौशल के सम्मुख देवता टिक ही नही पाते थे । अब की बार वे हारकर जान बचाकर भागे, सब मिलकर महर्षि दत्तात्रेय के पास पहुँचे । असुरों ने भी उनका पीछा किया । असुर भी दत्तात्रेय के आश्रम में जा पहुँचे । वहां उन्होंने एक नवयुवती को देखा । अब दानव लड़ना तो भूल गये और उस स्त्री पर मुग्ध हो गये । वह नवयुवती रूप बदले हुए लक्ष्मी जी ही थीं, असुरों ने उनका अपहरण करने की चेष्टा की
दत्तात्रेय जी ने देवताओं से कहा, अब तुम तैयारी करके फिर से असुरों पर आक्रमण करो । लड़ाई छिड़ी और देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की ।
विजय प्राप्त करके देवता फिर दत्तात्रेय के पास आये और पूछने लगे, भगवन ! दो बार पराजय और अंतिम बार विजय का रहस्य क्या है ? महर्षि ने बताया----- जब तक मनुष्य सदाचारी-संयमी रहता है, तब तक उसमे पूर्ण बल विद्दमान रहता है और जब वह कुपथ पर कदम रखता है, तो उसका आधा बल क्षीण हो जाता है, परनारी का अपहरण करने की कुचेष्टा में असुरों का बल नष्ट हों गया था, इससे उन्हें जीतना सुगम हो गया ।
17 November 2014
WISDOM
' भय अँधेरे के समान है और साहस रोशनी के समान । साहस के आते ही भय खुद-ब-खुद गायब हों जाता है । यदि हमारे पास साहस है तो हम निर्भय होकर अपनी सफलता की कहानी खुद गढ़ सकते हैं । '
गुजरात के बोरसद क्षेत्र में डाकुओं का अत्याधिक आतंक था और उनसे रक्षा करने में पुलिस भी स्वयं को अशक्त अनुभव करती थी । त्रस्त होकर क्षेत्रवासियों ने सरदार पटेल ताक अपनी फरियाद पहुंचाई । सरदार पटेल ने पुलिसवालों और गाँववालों कों बुलाकर कहा---- " आप दोनों मिल जायें तो आपकी शक्ति डाकुओं से पांच गुना अधिक हो जायेगी । शक्ति संगठन में है । गांव के सभी समर्थ पुरुष पुलिस वालों के साथ दल बनाकर गाँव में पहरा दें और आक्रमण होने भर भागने के बजाय डटकर मुकाबला करें । " गाँव वालों ने ऐसा ही किया । फिर कभी उनके गाँव पर डाकुओं का हमला नहीं हुआ । जो अपनी रक्षा में समर्थ हो, उसे किसी रक्षक की आवश्यकता नहीं होती ।
गुजरात के बोरसद क्षेत्र में डाकुओं का अत्याधिक आतंक था और उनसे रक्षा करने में पुलिस भी स्वयं को अशक्त अनुभव करती थी । त्रस्त होकर क्षेत्रवासियों ने सरदार पटेल ताक अपनी फरियाद पहुंचाई । सरदार पटेल ने पुलिसवालों और गाँववालों कों बुलाकर कहा---- " आप दोनों मिल जायें तो आपकी शक्ति डाकुओं से पांच गुना अधिक हो जायेगी । शक्ति संगठन में है । गांव के सभी समर्थ पुरुष पुलिस वालों के साथ दल बनाकर गाँव में पहरा दें और आक्रमण होने भर भागने के बजाय डटकर मुकाबला करें । " गाँव वालों ने ऐसा ही किया । फिर कभी उनके गाँव पर डाकुओं का हमला नहीं हुआ । जो अपनी रक्षा में समर्थ हो, उसे किसी रक्षक की आवश्यकता नहीं होती ।
16 November 2014
सुख आंतरिक स्थिति है
प्रख्यात मनीषी बर्ट्रेंड रसेल अपनी पुस्तक ' सुखमय जीवन ' में लिखते हैं कि संसार में दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं--- एक जो संसार में रहकर धन बटोरने मे लगे हैं, दूसरे वे जिनने संपदा का परित्याग कर दिया और जंगल में जाकर आदि मानवों की तरह रहने लगे हैं । पर इन दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं है, दोनों ही भ्रांति में हैं ।
स्वार्थ में फंसे लोग समझते हैं कि बाह्य साधन सुविधाओं से अपने को भर लेंगे तो चैन पा जायेंगे, जबकि सन्यासी समझते हैं कि बाहरी चीजों को लात मार देने भर से आनंद की उपलब्धि हो जायेगी । वस्तुत: न तो बाहर की वस्तुओं से कभी कोई स्वयं को भर सकता है और न उसका परित्याग कर ऐसा किया जा सकता है, क्योंकि भराव का, प्राप्ति का बाहर से कोई संबंध है ही नहीं, वह तो सर्वथा आंतरिक है ।
यदि व्यक्ति अपने अंतस को सँवार ले तो किसी भी स्थिति में रहे सुख प्राप्त कर सकता है, चाहे वह सुविधाओं में रहे अथवा असुविधा-अभावों में, हर हाल में वह आनंद की अनुभूति कर सकता है । यह आंतरिक अवस्था उपलब्ध होने पर न तो उसे संसार त्यागने की आवश्यकता अनुभव होगी, और न कर्तव्य-कर्म को तिलांजलि देकर धर्म लाभ के नाम पर एकांत सेवन का प्रपंच रचने की ।
स्वार्थ में फंसे लोग समझते हैं कि बाह्य साधन सुविधाओं से अपने को भर लेंगे तो चैन पा जायेंगे, जबकि सन्यासी समझते हैं कि बाहरी चीजों को लात मार देने भर से आनंद की उपलब्धि हो जायेगी । वस्तुत: न तो बाहर की वस्तुओं से कभी कोई स्वयं को भर सकता है और न उसका परित्याग कर ऐसा किया जा सकता है, क्योंकि भराव का, प्राप्ति का बाहर से कोई संबंध है ही नहीं, वह तो सर्वथा आंतरिक है ।
यदि व्यक्ति अपने अंतस को सँवार ले तो किसी भी स्थिति में रहे सुख प्राप्त कर सकता है, चाहे वह सुविधाओं में रहे अथवा असुविधा-अभावों में, हर हाल में वह आनंद की अनुभूति कर सकता है । यह आंतरिक अवस्था उपलब्ध होने पर न तो उसे संसार त्यागने की आवश्यकता अनुभव होगी, और न कर्तव्य-कर्म को तिलांजलि देकर धर्म लाभ के नाम पर एकांत सेवन का प्रपंच रचने की ।
15 November 2014
अहंकार
मनुष्य के विनाश का सबसे प्रबल कारण है------ उसका अहंकार । मैं ही सब कुछ हूँ , मेरा विचार ही सबसे अच्छा है, मैं सबसे सुंदर हूँ, मैं धनी हूँ आदि अहंकारिक भावनाओं के कारण संसार में कलह, झंझट, युद्ध और महायुद्ध की विभीषका उठ खड़ी होती हैं । धरती पर अनेक रुपवान, शक्तिवान विद्दमान हैं । फिर ऐसे अहंकार से क्या प्रयोजन ?
संसार की क्षणभंगुरता को हमेशा ध्यान में रखने से मनुष्य इस दुष्प्रवृत्ति से बचा रह सकता है ।
संकल्प के धनी व्यक्ति ही अहंकार को कुचलने का साहस कर पाते हैं ।
संसार की क्षणभंगुरता को हमेशा ध्यान में रखने से मनुष्य इस दुष्प्रवृत्ति से बचा रह सकता है ।
संकल्प के धनी व्यक्ति ही अहंकार को कुचलने का साहस कर पाते हैं ।
14 November 2014
सच्चा सुख
सच्ची खुशी के लिये, खुशहाल जीवन के लिए जरुरी है--- सुकून और शांति खुशहाल जीवन का बैंक बैलेंस से कोई लेना-देना नहीं है । खूब पैसा जमा करके व्यक्ति निश्चिंत जीवन नहीं जी सकता । जो खुशियों को दौलत कमाने या पाने में तलाशते हैं, उनकी तलाश हमेशा अधूरी व अपूर्ण होती है । वे बहुत कुछ पाकर भी खाली हाथ रह जाते हैं । दौलत और शोहरत का सच यही है कि इससे मनुष्य के अहं को संतुष्टि मिलती है, परंतु इससे मिलने वाला सुख अस्थाई होता है ।
मनुष्य के जीवन की श्रेष्ठता और सार्थकता इसी में है कि उससे जितना भी बन पड़े, वह अपनी शक्ति और सामर्थ्य, संपदा को समाज कल्याण में और उच्च उद्देश्यों के लिए लगाये ।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक एल्फ्रेड नोबेल के जीवन का किस्सा है------ जब उनकी मृत्यु का झूठा समाचार फैलने पर फ्रांस के एक समाचार पत्र ने उनका शोक-संदेश ' मौत के सौदागर की मृत्यु ' के नाम से प्रकाशित किया था, क्योंकि उन्होंने डायनामाइट की खोज की थी । जब एल्फ्रेड नोबेल को यह पता चला तो उन्होंने अपने शेष जीवन और अपनी सारी संपदा को जनहित में लगाने का निर्णय लिया, ताकि मृत्यु के बाद उन्हें श्रेष्ठ कर्मो के लिये याद किया जाये । आज सारा विश्व उन्हें प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार के लिए जानता है, मात्र डायनामाइट की खोज के लिए नहीं ।
ऐसे ही अमेरिका के सुप्रसिद्ध उद्दोगपति एंड्रयु कारनेगी ने मृत्यु से पूर्व अपनी सारी संपदा अमेरिका के हर नगर में पुस्तकालयों की स्थापना में लगा दी, आज उनका नाम बौद्धिक जगत को दिए गये उनके अनुदान के कारण याद रखा जाता है ।
मनुष्य के जीवन की श्रेष्ठता और सार्थकता इसी में है कि उससे जितना भी बन पड़े, वह अपनी शक्ति और सामर्थ्य, संपदा को समाज कल्याण में और उच्च उद्देश्यों के लिए लगाये ।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक एल्फ्रेड नोबेल के जीवन का किस्सा है------ जब उनकी मृत्यु का झूठा समाचार फैलने पर फ्रांस के एक समाचार पत्र ने उनका शोक-संदेश ' मौत के सौदागर की मृत्यु ' के नाम से प्रकाशित किया था, क्योंकि उन्होंने डायनामाइट की खोज की थी । जब एल्फ्रेड नोबेल को यह पता चला तो उन्होंने अपने शेष जीवन और अपनी सारी संपदा को जनहित में लगाने का निर्णय लिया, ताकि मृत्यु के बाद उन्हें श्रेष्ठ कर्मो के लिये याद किया जाये । आज सारा विश्व उन्हें प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार के लिए जानता है, मात्र डायनामाइट की खोज के लिए नहीं ।
ऐसे ही अमेरिका के सुप्रसिद्ध उद्दोगपति एंड्रयु कारनेगी ने मृत्यु से पूर्व अपनी सारी संपदा अमेरिका के हर नगर में पुस्तकालयों की स्थापना में लगा दी, आज उनका नाम बौद्धिक जगत को दिए गये उनके अनुदान के कारण याद रखा जाता है ।
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