13 June 2018

WISDOM

  ज्ञान  और  धन  ,  दोनों  में   एक  दिन  अपनी  श्रेष्ठता  के  प्रतिपादन  के  लिए   झगड़ा  उठ  खड़ा  हुआ  l   दोनों  अपनी - अपनी  महत्ता  बताते   और  एक - दूसरे  को  छोटा  सिद्ध  करते  l  अंत  में  निर्णय  के  लिए  दोनों  आत्मा   के  पास  पहुंचे  l
  आत्मा  ने  कहा ---- " तुम  दोनों  कारण  मात्र  हो  ,  इसलिए  श्रेष्ठ   बात  तुम में  क्या  है   ? सदुपयोग  किये  जाने  पर  ही   तुम्हारी  श्रेष्ठता  है  ,  अन्यथा  दुरूपयोग  होने  पर    तो  तुम  दोनों  ही  घ्रणित  बन  कर  रह  जाते  हो    l   "  

12 June 2018

WISDOM ----- अच्छे या बुरे कर्मों का फल अवश्य मिलता है , लेकिन कब मिलेगा यह काल ( समय ) निश्चित करता है l

   यह  मनुष्य  की  अदूरदर्शिता   और  अज्ञान  है   कि  वह  क्षणिक  लाभ  के  लिए  वर्तमान  में   बुरे  कर्म  करने ,  अत्याचारी , अन्यायी  का  साथ  देने  के  लिए  तैयार  हो  जाता  है   और  अच्छे  कर्मों  के  माध्यम  से   लाभ  कमाने  के  लिए  तैयार  नहीं  होता  l   इसे  प्रकृति  अपने  ढंग  से  समझाती  है  --- यदि  खेत  में  आम  बोया  है   तो  एक  निश्चित  समय  के  बाद  आम  ही  मिलेगा  लेकिन  यदि  हमने  बबूल  बोया  है   तो  कांटे  ही   मिलेंगे ,  उसमे  किसी  तकनीक  से  परिवर्तन  संभव  नहीं  है   l 
  औरंगजेब  दिल्ली  का  शासक  था  ,  उसके  पास  किसी  तरह  की  कोई  कमी  नहीं  थी   लेकिन  सत्ता  हथियाने  के  लिए  उसने   अपने  भाइयों  की  हत्या  करवाई ,  पिता  को  मरवाया   l  ऐसा  कर  के  उसने  राज्य  तो  पा  लिया  लेकिन  उसका  अंतिम  जीवन  बहुत  कष्टपूर्ण  था  ,  विक्षिप्त  होकर  मरा  l 
  इसके    विपरीत    सम्राट  अशोक  ने  ह्रदय  परिवर्तन  के  बाद  जनता  के  कल्याण  के  अनेकों  कार्य  किये  ,  प्रजा जनों  को   सुशासन  देने  के  हर  संभव  कार्य  किये  इसलिए  आज  भी   सम्राट  अशोक  का  नाम  आदर  के  साथ  लिया  जाता  है  l  

11 June 2018

WISDOM ------ कर्तव्य ही धर्म है

  महाभारत  समाप्त  हुआ  l  पुत्रों  के  वियोग  में  दुःखी  धृतराष्ट्र   ने  महात्मा  विदुर  को  बुलाया  l  चर्चा  के  बीच  उनसे  पूछा --- " विदुर जी  ! हमारे  पक्ष  का  एक - एक  योद्धा  इतना  सक्षम  था  कि  सेनापति  बनने  पर  उसने  पांडवों  के  छक्के  छुड़ा  दिए  l  यह  जीवन - मरण  का  युद्ध  है  , यह  सबको  पता  है  l  यह  सोचकर   सेनापति   बनने   पर   एक - एक  कर के  अपना  पराक्रम  प्रकट   करने  की  अपेक्षा  कर्तव्य बुद्धि  से  एक  साथ  पराक्रम  प्रकट  करते  तो  क्या  युद्ध  जीत  न  पाते  l "
   विदुर  जी  बोले ---- " राजन  ! आप  ठीक  कहते  हैं   l  वे  जीत  सकते   थे  यदि  अपने  कर्तव्य  को   ठीक  प्रकार  समझते  और  अपना  पाते,    परन्तु  अधिक  यश   अकेले  बटोर  लेने   की  तृष्णा  तथा  अपने  को  सर्वश्रेष्ठ   प्रदर्शित  करने  की   अहंता  ने   वह  कर्तव्य   सोचने  ,  उसे  निभाने  की  उमंग  पैदा  करने  का  अवसर  ही  नहीं  दिया   l  " 
   थोड़ा  रूककर   विदुर  जी  बोले  -----  राजन  !  उनके  इतना  न  सोच  पाने   और  न  जीत  पाने  का  दुःख  न  करें  l   उन्हें  तो  हारना  ही  था  l   कर्तव्य  समझे  बिना  जीत   का  लक्ष्य   नहीं  मिल  सकता   l   यदि  वे   कर्तव्य  को  महत्व  दे  पाते  तो  युद्ध  का  प्रश्न  ही   न  उठता  l   कर्तव्य  के  नाते    भाइयों   का    हक   देने  से उन्हें  किसने  रोका  था   l  स्वयं  युगपुरुष  श्री  कृष्ण  समझाने  आये  थे  ,  पर  तृष्णा  ऐसी  कि   पांच  गाँव  भी  न  छोड़े   l   अहंता  ने   न  पितामह  की  सुनी  ,  न  युगपुरुष  की   l  जिन  वृतियों  ने  युद्ध     पैदा  किया  ,  उन्होंने   हरा  भी  दिया   l  

10 June 2018

WISDOM ---- कर्मकांड सरल है , लेकिन सच्चे ह्रदय से ईश्वर का स्मरण बहुत कठिन है l

  जब  तक  व्यक्ति  का  चित शुद्ध  न  हो  ,  ईश्वर  का नाम  स्मरण  करना  बहुत  कठिन  है   l  मन  चंचल  है , संस्कार  शुद्धि  के  बिना  सुमिरन  आसान  नहीं  है   l
        जयदयाल   गोयन्दका   जी  कलकत्ता  के  एक  बड़े  उद्दोगपति  और  धर्मपरायण  व्यक्ति  थे  l   उन्होंने  श्री  हनुमान प्रसाद  पोद्दार  जी  के  साथ  मिलकर   धार्मिक  प्रकाशनों  द्वारा  ऐसी  क्रांति  की   जिससे    लोगों  में  सच्चे  धर्म   के  प्रति  रूचि  पैदा  हुई  l   एक  बार  का  प्रसंग  है  -----  उनने  देखा  एक  भिखारी  भगवान  के  नाम  पर  भिक्षा  मांग  रहा  है  l  उनने  उससे  कहा --- "  तुम्हारी  यह  स्थिति  बदल  जाएगी  ,  यदि  हमारे  कहे  पर  चलोगे  l "  उससे  पूछा ---- " तुम  एक  दिन  में  कितना  कमा  लेते  हो  ? "
 भिखारी  ने  कहा ---- " कभी  चार  आने  कभी  आठ  आने  l  "  (  उस  समय  इसकी  कीमत  बहुत  थी  )
  उनने  कहा --- " हम  दो  रूपये  रोज  देंगे  l  हमारी  दुकान  के  बाहर  बैठकर  राम - राम  जपो  l "
 वह  बैठ  गया  , पर  तीन - चार  दिन  बाद  गायब  हो  गया   l  फिर  मिला  तो  ,  भीख  मांग  रहा  था  l
 गोयन्दका  जी  बोले  --- " हमसे  पांच  रूपये  रोज  ले  लो ,  पर  राम - नाम  का  जप  वहीं   दुकान  के  सामने  करो   l  "     वह  प्रलोभन  में  आया  तो  ,  पर  अधिक   बैठ  नहीं  पाया  l   फिर  जयदयाल  जी  ने  उसे  ढूंढ  निकाला  l  कारण  पूछा  तो  वह  बोला ---- " "  आप  पूरी  दुकान  भी  लिख  दो   तब  भी  वह  राम - नाम  जपने  का  काम  हम  नहीं  कर  पाएंगे  l  हमें  भीख  मांगने  में  जो  आनंद  आता  है  ,  वह  आपके  दिए  पैसों  में  नहीं  ,  और  फिर  हमारा  मन  भी  नहीं  लगता   l "
 सुमिरन  आसान  नहीं  है  l 

9 June 2018

WISDOM ----- व्यक्ति जन्म से नहीं , कर्म से महान होता है

   चीनी  दार्शनिक  कन्फ्यूशियस  की  महानता  से  चीन  के  सम्राट  परिचित  थे   l  एक  दिन  वे  कन्फ्यूशियस  से  बोले --- " तुम  मुझे  उस  व्यक्ति  के  पास  ले  चलो  जो  महान  हो  l "
 सम्राट  के  इस  प्रश्न  को  पूछने  के  पीछे  यह  भाव  था  कि  कन्फ्यूशियस  स्वयं  को  या  सम्राट  को  महान  की  श्रेणी  में  रखेंगे  l    परन्तु  कन्फ्यूशियस  उन्हें  लेकर  एक  वृद्ध  व्यक्ति  के  पास  पहुंचे  l    देखने में  साधारण  और  कमजोर  वह  व्यक्ति   एक  कुआं  खोद  रहा  था  l    सम्राट  को  उस  वृद्ध  व्यक्ति  से  परिचय  कराते  हुए   कन्फ्यूशियस बोले --- " सम्राट  !  मुझसे  भी  अधिक  महान  यह  वृद्ध  है   l  इसकी  काफी  आयु  बीत  चुकी  है ,  शरीर  से  भी  दुर्बल  है  ,  तब  भी  यह  परोपकार  के  भाव  से  कुआं  खोद  रहा  है  l  परोपकार  में  ही  इसको  आनंद  की  अनुभूति  होती  है   l  जिसका  तन  और  मन  दोनों  ही  परोपकार  में  निमग्न  हों  उससे  अधिक  महान  अन्य  कौन  हो  सकता  है   ? "
  महान  व्यक्ति  समस्त  मानवता  के  लिए  संवेदनशील  होते  हैं  ,  दूसरों  के  दुःख - दर्द  को  दूर करने  का  यथासंभव  प्रयास  करते  हैं   l 

8 June 2018

WISDOM ----- तृष्णा का अंत नहीं होता

 '  दिवस - रात्रि , शाम - सुबह ,  शिशिर - वसंत   जीवन  में  कितनी  बार  आये  और  गए  l  काल  ने  आयु  को  भी  समाप्त  कर  दिया  किन्तु  तृष्णा  समाप्त  न  हुई  l "
  घटना  उन  दिनों  की  है  जब  आचार्य  शंकर    ऋषि  व्यास  के  सूत्रों   की  चर्चा  हेतु  काशी  के  पास  एक  गाँव  में  शिव  मंदिर  में  ठहरे  हुए  थे  l  एक  शिष्य  ने  आकर   सूचना    दी  कि  एक   वृद्ध  सज्जन  आपसे  मिलना  चाहते  हैं   l  आचार्य  ने  कहा --- " उन्हें  आदर पूर्वक  ले  आओ  l  "   शिष्य  उन्हें  लेकर  आचार्य  के  समीप  उपस्थित  हुए  l  आचार्य  ने  देखा ,  वे  अति वृद्ध  थे ,  झुकी  हुई  कमर , दन्त विहीन  मुख ,  कमजोर  शरीर  और  वे  हाथ  में  एक  पुस्तक  पकड़े  हुए  थे  l 
वृद्ध  ने  आचार्य  से  कहा --- " आचार्य  ! यह  व्याकरण  की  पुस्तक  है  l  आप परम  विद्वान्  हैं  l  मुझे  व्याकरण  का  ज्ञान  दें  l "   इस  पर  आचार्य  ने  उनसे  कहा --- "  इस  आयु  में  आपके  सीखने  की  इच्छा  प्रशंसनीय  है   l  यदि  आप  केवल  व्याकरण  सीखना  चाहते  हैं    तो  इस  पुस्तक  को   अवश्य  पढ़ें , परन्तु   ज्ञान  का  यथार्थ  चितशुद्धि  में  है  l "
 वृद्ध  अपनी  ही  धुन  में  था , बोला --- "  मैं  व्याकरण  सीखूंगा , फिर  शास्त्रों  का  अध्ययन  करूँगा  l  शास्त्रों  को  समझकर  मैं   पंडित , फिर  महापंडित  बनूँगा  l  तब  मुझे   विद्वानों  से  शास्त्रार्थ  करने  का  मौका  मिलेगा  l  शास्त्रार्थ  में  विजयी  होने  पर   जन - जन  में  मेरा  सम्मान  होगा  l  लोग  मुझे  शास्त्रार्थ  महारथी , तर्क शिरोमणि , महामहोपाध्याय  कहेंगे   l  ऐसी  स्थिति  में  मुझे  ज्ञानी वृद्ध  कहा  और  समझा  जायेगा l "
         इस  क्षीणकाय,  कांपते  हुए  वृद्ध  की  मनोदशा  पर  आचार्य  को  करुणा  हो  आई ,  वे  इस  वृद्ध  को  जीवन  की  सही  राह  दिखाना  चाहते  थे  l  उन्होंने  कहा ---- " इतनी  आयु  होने  पर   इतनी  आशाएं  !  इतनी  अधिक  महत्वाकांक्षाएं ,  कैसी  है  ये  तृष्णा  ?  अरे  !  ज्ञान  शब्दों  में  नहीं ,  ज्ञान  आकांक्षाओं  और  अहंकार  के  पोषण  में  नहीं  ,  बल्कि  इनके  विनाश  में  है   l  "  उन्होंने  ईश्वर  से  प्रार्थना  की  -- हे  प्रभु  !  इस  प्राणी  का  उद्धार  कर  l   फिर  वे  उससे  कहने  लगे  --- "  काल  ने  तुम्हारी  आयु  को  समाप्त  कर  दिया ,  किन्तु  तुम्हारी  तृष्णा  समाप्त  नहीं  हुई  l  अरे ! मूढ़ !  मरण  समीप   आने  पर   यह  व्याकरण  काम  नहीं  आएगा  ,  अब  तुम  गोविन्द  का  भजन  करो ,  भक्ति  करो  l "
   आचार्य  शंकर  के   मुख  से  भक्ति   की  महिमा  सुन  के  उस  वृद्ध  को  चेत  हुआ    l   शिष्यों  ने  भी  भक्ति  की  महिमा  को  जाना  l 

7 June 2018

WISDOM ----- अपनी निंदा को स्वीकार कर पाना मुश्किल है l

  निंदा  सच्ची  हो  तो  भी  स्वीकार  नहीं  होती  l   निंदा  जितनी  सच  होती  है  उतनी  ही  खलती  है  l 
  किन्तु  यदि  निंदा - आलोचना  को  सहज  और  सकारात्मक  भाव  से  स्वीकार  किया  जाये   तो  व्यक्ति  को  अपने   आपका  सुधार  करने   के  लिए  भारी  मदद  मिलती  है  l   अपने  में  कौन  सी  कमियाँ  हैं ,  क्या  दोष  हैं  ?   इसका  स्वयं  इतना  पता  नहीं  चलता  l  अपने  व्यवहार  या  आचरण  की  परख  दूसरों  के  द्वारा  की  गई   आलोचना  और  निंदा  के  प्रकाश  में   भली  भांति  की  जा  सकती  है  l 
               निंदा  अपने  प्रकट  और  अप्रकट  दोषों    की   ओर    इंगित  करती  है   तथा  उन्हें  सुधारने  की  प्रेरणा  देती  है   l   इसके  लिए  चाहिए  वह  द्रष्टि    जो  निंदा  के  प्रकाश  में   अपने  दोष - दुर्गुणों  को  ढूंढ  सके    और  चाहिए  वह  सहिष्णुता   जो  निंदा - आलोचना  को  सह  सके   l