13 September 2018

WISDOM- --- भजन - उपासना भावनाओं से करें

 भजन - जप - उपासना  का   लाभ  और  आनंद  उन्ही  को   मिलता    है   जो  उसे  अपने  अन्दर  आत्मसात  करते  हैं  ,  ह्रदय  की गहराई  के  साथ  करते  हैं  l  शब्द  कुछ  भी  हों  , लेकिन  यदि  भावनाएं  पवित्र  हैं , सच्ची  हैं   तो  उसका  लाभ  व  आनंद  अवश्य  मिलता  है   l 
   एक  प्रसंग  है ----  एक  बार  गुरु  गोविन्द सिंह  के  शिष्यों  ने   उनसे   पूछा  ---- "  हम  प्रतिदिन    भगवान  का  भजन करते  हैं  , पर  हमें  कोई लाभ  नहीं  होता   " l     गुरु  गोविन्द सिंह  जी  बोले --- "  इस  प्रश्न  का  उत्तर  मैं  कुछ  समय  बाद  दूंगा  l 
  कुछ  दिनों  बाद  उन्होंने  अपने  शिष्यों  को  बुलाकर  कहा ---- " तुम  सभी मिलकर  एक  बड़े  मटके  में  ताड़ी  भरकर  लाओ  और  फिर  उससे  कुल्ला   कर    के  मटका  खाली  कर  दो  l  "   शिष्यों  ने  आज्ञानुसार  वैसा  ही  किया l    पहले   मटके  में  ताड़ी  भरकर  लाये   फिर  उससे  कुल्ला  कर  के  पूरा  मटका  खाली  कर  दिया   और  गुरु  के  पास  पहुंचे   l 
  गुरु  ने  पूछा ---  " क्या  तुमने पूरी   ताड़ी  समाप्त  कर  दी   ? "    शिष्यों  ने  कहा  --- आपकी   आज्ञा  नुसार    हमने  ताड़ी  से  कुल्ला  कर  के  पूरा  मटका  खाली   कर  दिया   l "
  अब  गुरूजी  ने कहा ---- "  "  इतनी  ताड़ी  थी  तुम  लोगों  को  नशा  नहीं  हुआ   l  "
 शिष्यों  को  आश्चर्य  हुआ  ,  वे   बोले  --- "  गुरुदेव  !   हमने  ताड़ी  से  केवल  कुल्ला किया  ,  उसको  गले  से  नीचे   नहीं  उतारा,   तो  नशा  कैसे  होगा   ?  " 
गुरु  गोविन्द सिंह  ने  उनकी  इस  बात से    उनके  प्रश्न  का  उत्तर  देते  हुए  कहा   ---"  शिष्यों  !  तुमने  भगवान  का   भजन  तो  किया  लेकिन   ऊपर - ऊपर  से  ,  उसे  गले  से  नीचे  नहीं   उतारा  l  जब  तक  भगवद  भजन  के  साथ  तुम्हारा  मन  नहीं  जुड़ेगा  ,  तब  तक  तुम्हे  कोई  लाभ  नहीं  होगा  l  "

12 September 2018

WISDOM ---- जो पूर्णतया निस्स्वार्थ है वही सच्चा प्रजापालक हो सकता है

   एक  प्रसंग  है ----  राजा  अश्विनी दत्त  को  अपने  महल ,  धन - सम्पति  व  रानी  से  अत्यंत  मोह  था  l  उसका  यह  मोह  शनै; - शनै:  बढ़ता  ही  जा  रहा  था   और  इस  कारण  उन्होंने  राज कार्य  पर  ध्यान  देना  बंद  कर  दिया  था  l  यह  देखकर  प्रधानमंत्री  बहुत  परेशान  हुए   और  वे  अपनी  चिंता  कुलगुरु  संत  नागानंद  के  समक्ष  रखने  पहुंचे   l  मंत्री  के  अनुरोध  पर   कुलगुरु  राजा  से  मिलने  राजमहल  आये   l    राजा  ने  उनका  भव्य  स्वागत   किया  l  उन्हें  अनेक  उपहार  भी  भेंट  किये  l 
             प्रत्युतर  में   कुलगुरु  ने   राजा  को  एक  कमल  का पुष्प  भेंट  किया   और  कहा  ---- "  राजन  !  तुम्हारा  उपहार  कमल  की  पंखुड़ियों  के  भीतर  है  l  "  राजा  ने  कमल  कि  पंखुड़ियाँ   हटाईं  तो  उन्हें  वहां  एक  भौंरा   मरा   दिखाई  पड़ा  l  राजा  कुलगुरु  के   इस  उपहार  का   अर्थ  समझ  नहीं  पाए  l  उनकी  उत्सुकता  को  भांपकर   कुलगुरु  बोले ---- "  राजन  !  यह  साधारण  भौंरा  नहीं  है  ,  यह  राजभौंरा   है   l   राजभौंरे  में  इतना  सामर्थ्य  होता  है   कि  वह  चाहे  तो  कठोर  लकड़ी  को  छेदकर   निकल  जाये  ,  परन्तु  वही  भौंरा   कमल   पर  आसक्त  हो  जाता  है   तो  उसकी  पंखड़ियों   के  मध्य  फंसकर   अपनी  जान  गँवा  बैठता  है   l  "    राजा  को  कुलगुरु  का  कथन  समझ  में  आ  गया   और  वह  मोह  छोड़कर  प्रजापालन - कर्तव्य   में  जुट  गए  l 

11 September 2018

WISDOM ----- भारतीय संस्कृति का सम्बन्ध संवेदना से है , इस कारण यह 'आध्यात्मिक संस्कृति ' है

   प्रसिद्ध  कवि  इकबाल  ने  कहा  है ---- यूनान , मिस्र  और  रोमा ,  सब  मिट  गए  जहाँ  से  l 
                                                          अब  तक  मगर  है  बाकी,  नाम - ओ--निशाँ  हमारा   l l 
                                                           कुछ  बात  है  कि  हस्ती  मिटती  नहीं  हमारी   l 
                                                            सदियों  रहा   है  दुश्मन , दौर - ए - जहाँ  हमारा  l l 
  भारतीय  संस्कृति  को  मिटाने  के  लिए  बहुतों  ने  प्रयत्न  किये ,  षड्यंत्र  किये   परन्तु  इसे  मिटाया  जा  सकना  संभव  नहीं      क्योंकि     भारतीय  संस्कृति  का आधार    आध्यात्मिक  है  l  इसकी  नींव  ऋषियों  की  तपस्या  की  ऊर्जा  से   रखी  गई  है   l   यही  कारण  है  कि   भारत  के  गुलाम  होने  पर  भी   स्वामी  विवेकानंद   अमेरिका  में  भारतीय  संस्कृति  का  डंका  बजा  सके   l 
 स्वामी  विवेकानंद  कहा  करते  थे ---- आदर्श  को  पकड़ने  के  लिए   एक  सहस्त्र  बार  आगे  बढ़ो   और  यदि  फिर  भी   असफल  हो  जाओ   तो  एक  बार  नया  प्रयास  अवश्य  करो  l  इस  आधार  पर  सफलता  सहज  ही  निश्चित  हो  जाती  है   l  

10 September 2018

WISDOM ---- धर्म का मर्म है ----- अन्याय का प्रतिकार , अनीति का विरोध और आतंक का उन्मूलन

 ऋषियों  ने  ,  आचार्य  ने  कहा  है ---- कर्तव्य  ही  धर्म  है ,  यही  सच्चा  कर्मयोग  है  ,  लेकिन  यह  विवेकपूर्ण  होना  चाहिए   l 
  महाभारत काल  में   भीष्म  पितामह   की  धर्म  पर  गहरी  आस्था  थी ,  वे  समर्थ  और  शक्तिशाली  योद्धा  थे   लेकिन    धर्माचरण   करने  वाले  भीष्म   ने    अत्याचार  करने  वाले ,  पांडवों  के  विरुद्ध  हमेश  षड्यंत्र  रचने  वाले  दुर्योधन  का ,    अधर्म  का  साथ  दिया ,  द्रोपदी  के   चीर   हरण  पर  मूक  दर्शक बन  सिर  झुकाए  बैठे  रहे  l   अधर्म  का  साथ  देकर   न  तो  दुर्योधन  की  रक्षा  कर  सके  और  न  स्वयं  की   l 
         इसी  तरह   कुलगुरु  कृपाचार्य  थे   l  कुलगुरु  का  कर्तव्य  होता  है  --- कुल  में  धर्म  की  प्रतिष्ठा   l  कुल   के   सभी  व्यक्ति  धर्म  का  आचरण  करें ,  शुभ  कर्म  करें  l  लेकिन  धर्म  के  जानकार  होते  हुए  भी  वे    कौरवों  के    अधर्म आचरण   के    मौन  साक्षी  रहे  ,  उनका  साथ  त्यागने  की  हिम्मत  नहीं   जुटा   सके   l 
   इसी  तरह  कर्ण  महान  योद्धा  और  महादानी  था   लेकिन  उसने  भी   मित्र  मोह  में      अधर्म  का  आचरण  करने  वाले  दुर्योधन  का  साथ  दिया   l  महारानी  द्रोपदी  के  चीर - हरण  जैसी  दुर्भाग्य पूर्ण  घटना   को  भी  रोकने  का  प्रयास  उसकी  वीरता  ने  नहीं  किया  ,  वह  भी  अधर्म  के  साथ  खड़ा  रहा   l 
  इन  सभी  महारथियों  का  अत्याचार  व  अन्याय  के  सामने  प्रतिक्रिया विहीन  रहना ,  उन्हें  अधर्म  की  कसौटी  पर  खड़ा  कर  देता  है   l 
  सामान्य  अर्थ  में  पूजा - पाठ ,  कर्मकांड  करने  को  धर्म  कहा  जाता  है   लेकिन  यह  करने   की   और  धर्म  की  सार्थकता   पीड़ा  और  पतन   निवारण  करना ,  सदभाव,  सद्विचार   और  सत्कर्म  करना  है  ,  अत्याचार  और  अन्याय  से  कमजोर  की  रक्षा  करना  है   l   

9 September 2018

WISDOM ----- सुख बाहरी त्याग में नहीं , यह एक आन्तरिक स्थिति है l

 यदि  व्यक्ति  अपने  अन्तस्  को  संवार  ले   तो  किसी  भी  स्थिति  में  सुख  प्राप्त  कर  सकता  है  ,  चाहे  वह  सुविधाओं  में  रहे   अथवा  असुविधा  व  अभावों  में   वह  हर  हालत में  आनंद  की  अनुभूति  कर  सकता  है   l 

8 September 2018

WISDOM ---- इतिहास से हम शिक्षा लें

  भारतीयों  की  आपसी  फूट,  विद्वेष  और  राजनीतिक  बिखराव  के  कारण  यहाँ   विदेशी  आक्रमण  हुए   और   विदेशी  अपनी  वीरता  के  कारण  नहीं   बल्कि   हमारी  आपसी  फूट  के  कारण  सफल  हुए  l  यह  देश  का  दुर्भाग्य  रहा  कि  कई  गद्दार  भी  हुए  जिन्होंने  आक्रमणकारियों  का  साथ  दिया   और  देश  युगों  तक  गुलाम  रहा  l   15 अगस्त  1947  को  देश  आजाद  हुआ  लेकिन  अंग्रेजों  की  फूट  डालो  की   नीति   के  कारण  देश  केवल  राजनीतिक  तौर  पर  ही  नहीं  बंटा  बल्कि   सामाजिक  तौर  पर  भी  बंट  गया   l  जातीय ,  क्षेत्रीय ,   सांप्रदायिक   दीवारें  खड़ी  हो   गईं  जो    भौतिक  और  वैज्ञानिक  प्रगति  के  साथ  बढ़ती   जा  रहीं  हैं  l   स्वार्थ  और  लालच  के  कारण  संवेदना  का  स्रोत  सूख  गया  है  ,  महाभारत जैसी  स्थिति  निर्मित  हो  रही  है   l   विवेक  और  सद्बुद्धि  की  जरुरत  है  l  

7 September 2018

WISDOM ------- आलस्य से बढ़कर अधिक घातक और समीपवर्ती कोई दूसरा नहीं ----- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

 आलस्य  मनुष्य  की  सबसे  ज्यादा  घातक  वृति  है  l  आलसी  व्यक्ति  के  अन्दर  कुछ  करने  की  प्रेरणा  नहीं  होती  ,  कुछ  काम  करने  का  उत्साह  नहीं  होता  l  आलस  मन  का  एक  स्वभाव    है  जो  दीखता  मनुष्य  के  व्यवहार  में  है   l  ऐसे  आलसी  व्यक्ति  समाज  पर  बोझ  होते  हैं  l
 ब्रिटिश  लेखक  और  राजनीतिज्ञ   बेंजामिन  डिजरायली  का  इस  बारे  में  कहना  है  कि --- ' काम  से  हमेशा  ख़ुशी  मिले  , यह  जरुरी  नहीं  ,  पर  यह  तय  है  कि  ख़ुशी  बिना  काम  किये   नहीं  मिल  सकती  l '  इसलिए  जिन्दगी  को  बेहोश  करने  वाले    आलस  के  नशे  का  त्याग  कर   जिन्दगी  की  असली  खुशी  की  तलाश  करनी  चाहिए  और  यह  हमें  बिना  काम  किये  नहीं  मिल  सकती  l  काम  कर  के  ही  हम   जिन्दगी  का  असली  सुकून   प्राप्त  कर  सकते  हैं   l