महात्मा गाँधी ने भारतीय किसानों के दर्द को गहराई से समझा और उसे सुधारने का प्रयास किया l उन्होंने अपने जीवन में ऐसे कार्य किए , ताकि देश का किसान आत्मनिर्भर बन सके l यद्द्पि गाँधी जी के आस- पास टाटा , डालमिया , बिड़ला और बजाज जैसे उद्दोगपति रहे , लेकिन उन्होंने कभी भी बड़े उद्दोगों को बढ़ावा नहीं दिया और रसायनमुक्त जैविक खेती कर रहे किसानों को प्राथमिकता दी l गाँधीजी द्वारा ग्रामोद्दोग को बढ़ावा देने के पीछे उनका व्यापक वैज्ञानिक दृष्टिकोण था , इसलिए वे चरखा , खादी , हाथकुटे चावल , अहिंसक चमड़े के जूते जैसे हस्तनिर्मित ग्राम-उद्दोग चलाने पर जोर दे रहे थे l वे मानते थे कि यंत्रों को यथासंभव दूर रखा जाए , क्योंकि भारत जैसे विशाल जनसँख्या वाले देश में यंत्र चलाना एक तरह से मजदूरों के हाथ काटने के समान है क्योंकि यंत्रों के उपयोग से बहुत सारे मजदूर बेरोजगार हो जायेंगे l आज देश को गाँधी जी के विचारों को अमल में लाने की जरुरत है l गाँधी जी ने तीस - चालीस के दशक में ही रासायनिक खादों के दुष्परिणाम को जान लिया था l आज हम देख रहे हैं कि रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग से खाद्द्य पदार्थ शरीर को नुकसान पहुंचा रहे हैं , संतुलित और संयमी जीवन जीने वाले भी बड़ी बीमारी झेल रहे हैं l इसी तरह उन्होंने कहा था कि भारी - भरकम यंत्रों को चलाने के लिए जो ऊर्जा व्यय होगी , उससे जंगलों की कटाई होगी , पर्यावरण असंतुलित होगा l उनके ' स्वदेशी ' के विचार को अपनाने की जरुरत है l भारत जैसे गरम देश में छोटी जोत के खेत न केवल छायादार झाड़ियों और वृक्षों से फसल की रक्षा करते हैं , अपितु नीचे गिरे पत्तों से मिटटी में उपजाऊपन की मात्रा बढ़ाते हैं l
23 October 2020
22 October 2020
भक्ति का मर्म
व्रज की गोपिकाओं की भक्ति को शब्दों में उच्चारित नहीं किया जा सकता l एक कथा है ---- भगवान द्वारकाधीश ने एक दिन बीमार होने की लीला रची l उनकी बीमारी का समाचार सब ओर फ़ैल गया l राजवैद्य आए , नाड़ी देखी , पर कोई भी किसी तरह रोग का निदान नहीं कर पा रहा था l सब बड़े चिंतित थे l तब भगवान ने नारद जी का स्मरण किया l नारद जी आए , उन्होंने देखा कि भगवान के पलंग के पास रुक्मणी , सत्यभामा आदि रानियाँ खड़ी हैं , उन्होंने नारद जी से कहा ---देवर्षि ! आप तो परम ज्ञानी हैं l आप ही भगवान की इस बीमारी का कोई इलाज बताएं l ' नारद जी प्रभु की लीला समझ गए , उन्होंने कहा --- " इस बीमारी का इलाज बहुत सुगम है , आप में से कोई भी इसे कर सकता है l " सभी ने कहा -- उपाय सहज हो या कठिन हम अवश्य करेंगे l तब नारद जी बोले ---- " यदि भगवान श्रीकृष्ण का कोई भक्त अपने चरणों की धूल इनके माथे पर लगा दे तो ये अभी तुरंत ठीक हो जायेंगे l " यह विचित्र उपाय सुनकर सब सोच में पड़ गए l रानियों ने कहा --- " भला यह कैसे संभव है l पहले तो ये हमारे पति हैं , फिर ये स्वयं ब्रह्म हैं l अपने चरणों की धूल इनके माथे पर लगाकर हम सब नरकगामिनी हो जाएँगी l " नरक के भय से द्वारका में कोई भी यह उपाय करने को तैयार नहीं हुआ l भगवान श्रीकृष्ण के संकेत से नारद जी हस्तिनापुर पहुंचे , अपना संदेसा भीष्म , विदुर , द्रोपदी कुंती एवं सभी पांडवों आदि को सुनाया l नरक के भय से अपने चरणों की धूल देने को कोई भी तैयार नहीं हुआ , ऐसे पापकर्म से सब भयभीत थे l अंत में प्रभु की प्रेरणा से नारद जी व्रजभूमि पहुंचे l नारद जी को देखते ही सब गोपियाँ व्याकुल होकर भगवान श्रीकृष्ण का हाल पूछने लगीं l नारद जी से उनकी बीमारी का समाचार सुनकर सब गोपियाँ पोटली में भरकर अपने चरणों की धूल ले आईं l उनके ऐसा करने पर नारद जी ने उन्हें समझाया --- " अभी समय है , तुम सब सोच लो , श्रीकृष्ण भगवान हैं , उन्हें अपने चरणों की धूल देकर तुम सब नरक में जाओगी l " गोपियों ने कहा --- "श्रीकृष्ण के लिए वे सब कुछ त्याग सकती हैं , उनके लिए वे हर कलंक - अपमान सहने को तैयार हैं l अपने कृष्ण के लिए हम सदा - सदा के लिए नरक भोगने को तैयार हैं l " यह सुनकर नारद जी निरुत्तर हो गए और द्वारका पहुंचकर अपनी अनुभव कथा कह सुनाई l यह सब सुनकर श्रीकृष्ण हँसे और बोले --- " नारद ! यही है वह भक्ति , यही हैं वे भक्त , जिनके वश में मैं हमेशा रहता हूँ
21 October 2020
WISDOM -----
भौतिक प्रगति के नाम पर मनुष्य ने सुख - सुविधाओं के अंबार खड़े कर लिए किन्तु वह पहले की अपेक्षा दुःखी , परेशान , निराश , अशांत व असंतुष्ट है l इसका कारण यही है कि मनुष्य ने मानवीय जीवनमूल्यों की उपेक्षा की और स्वार्थ , अहंकार , ईर्ष्या , द्वेष में उलझकर संवेदना को भूल गया l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है --- ' इस संसार की समस्त समस्याओं का एकमात्र हल संवेदना है l संवेदनशील व्यक्ति कभी हिंसा के मार्ग पर नहीं चलता l ' एक प्रसंग है ------ कौशांबी के राजगृह में कारू कसूरी नामक कसाई रहता था l वह पशुओं का मांस बेचकर अपनी जीविका चलाता था l राजगृह में बौद्ध संत आते रहते थे l संत किसी भी प्रकार की हिंसा न करने की प्रेरणा दिया करते थे l कारू कसूरी कहता था --- मैं अपने पुरखों के धंधे को कैसे छोड़ दूँ ? यदि मैं हिंसा न करूँ तो खाऊंगा क्या ? जब कारू कसाई वृद्ध हो गया तो उसने तलवार अपने बेटे सुलस को सौंप दी l कसाइयों की पंचायत में सुलस से कहा गया कि कुलदेवी की प्रतिमा के समक्ष भैंसे की बलि दो l सुलस का हृदय पशुओं के वध के समय उनकी छटपटाहट देखकर द्रवित हो उठता था l अत: उससे तलवार न उठी l मुखिया ने दोबारा उससे कहा --- " बेटे ! यह हमारी कुल परंपरा है l देवी को प्रसन्न करने के लिए रक्त निकालना पड़ता है l " सुलस ने भैंसे की जगह अपने पैर पर तलवार से वार कर दिया l पैर से खून बहने लगा l ऐसा करने का कारण पूछने पर सुलस बोला ---- " यदि कुलदेवी को रक्त की चाहत है तो किसी निर्दोष का खून बहाने से बेहतर है कि वे मेरा ही रक्त स्वीकार कर लें l उसका उत्तर सुनकर कारू कसाई का हृदय द्रवित हो उठा और उस दिन के बाद उस परिवार में पशुवध बंद कर दिया गया l
20 October 2020
WISDOM ----- कर्म की गति
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है --- हम विश्व ब्रह्माण्ड में जहाँ कहीं भी हों , हमारे कर्म हमारा पीछा करते ही रहते हैं और तब तक समाप्त नहीं होते , जब तक हम उन्हें भोग नहीं लेते l ' महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ , भीष्म शरशैया पर लेटे थे l भगवान श्रीकृष्ण सब पांडव सहित उनसे धर्म का उपदेश लेने गए l तब भीष्म पितामह ने कहा --- " आप कहते हैं तो उपदेश मैं अवश्य दूंगा , किन्तु हे केशव ! मेरी एक शंका का समाधान करें l मैं जनता हूँ कि कर्मों का फल भोगना पड़ता है l मैंने ध्यान कर के देखा कि मैंने इस जन्म में और पिछले 72 जन्मों में भी ऐसा कोई क्रूर कर्म नहीं किया , जिसके फलस्वरूप मुझे बाणों की शैया पर शयन करना पड़े l " उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा --- " पितामह ! यदि आप पिछला एक और जन्म देख लेते तो आपकी जिज्ञासा का समाधान हो जाता l पिछले 73 वें जन्म में आपने ओक के पत्ते पर बैठे हुए हरे रंग के टिड्डे को पकड़कर उसको बबूल के काँटे चुभोए थे , आज आपको वही काँटे बाण के रूप में मिले हैं l " पुराणों में एक और कथा है ---- स्वर्ग के राजा इंद्र के पुत्र जयंत ने माँ सीता के पैर में कौवे के रूप में चोंच मार दी l उनके पैर से रक्त निकल आया l भगवान श्रीराम ने यह देखकर समीप रखे कुशा के एक तिनके को उठाया और उसे मंत्रसिक्त कर के जयंत की ओर फेंक दिया l कुशा के उस तिनके ने अभेद्य बाण का रूप ले लिया और जयंत के पीछे पड़ गया l इस बाण से बचने के लिए जयंत सभी लोकों में भागता फिर l स्वयं उसके पिता से लेकर भगवान ब्रह्मा ने उसको शरण नहीं दी , उसकी सहायता करने से मना कर दिया l अंत में उसे भगवान राम की शरण में ही आना पड़ा l उन्होंने उसे क्षमा तो किया परन्तु कर्मफल के रूप में उसे अपनी एक आँख गँवानी पड़ी l कर्म का फल सबको भोगना पड़ता है l
19 October 2020
WISDOM -----
ऋषि कहते हैं --- लोग पूजा - कर्मकांड तो बहुत करते हैं लेकिन उनकी भावनाएं ईश्वर को समर्पित नहीं होतीं l हजारों - लाखों ठोकरें खाने के बावजूद संसार से कभी अपनापन टूटता नहीं l प्राय: सभी लोग अपना नाता उन पुरखों से सहज अनुभव कर लेते हैं , जिन्हे उन्होंने कभी देखा ही नहीं परन्तु आदिशक्ति माँ , जिनकी कोख से हमारी आत्मा जन्मी , जो अनेकों बार हमें संकटों की यातना से त्राण दिलाती हैं , उनके स्मरण से हृदय में न तो कोई पुलकन होती है और न ही भवानी के प्रति भावनाएं आकृष्ट हो पाती हैं l संसार द्वारा दिए गए आघात - प्रतिघात मानव मन में थोड़ी देर के लिए विवेक और वैराग्य को जन्म देते हैं , किन्तु थोड़ी ही देर बाद पुन: मन संसार में भटकने लगता है l
WISDOM ------
मानव शरीर परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है l यदि शरीर में कोई अंग काम है या अपंग हो तो उस स्थिति में सामान्य जीवनक्रम बिताना कठिन होता है l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- " शरीर की कमी वस्तुत: इतनी बड़ी कमी नहीं है , जिसे मनोबल द्वारा पूरा न किया जा सके l महत्वपूर्ण काम तो मस्तिष्क करता है , दूसरे अंग तो उसकी आज्ञाओं का पालन भर करते हैं l यदि एक अंग बिगड़ गया है तो उसकी आवश्यकता दूसरा अंग पूरी कर सकता है l अपनी इच्छा शक्ति से शरीर के अन्य अंगों को अधिक सक्षम बनाकर उस विकृत अवयव की आवश्यकता पूरी की जा सकती है l इसी का एक उत्कृष्ट उदाहरण सोलहवीं सदी के प्रसिद्ध नृत्यशास्त्री सीवस्टीन स्पिनोला फ्रेंच हैं , जिन्हे नृत्य एवं संगीत का पिता माना जाता है l ग्यारह वर्ष की उम्र में एक दुर्घटना में घुटनों के नीचे से उनके दोनों पैर कट गए थे , पर उन्होंने अपने को कभी अपंग नहीं माना और जब कभी उनके पैरों की चर्चा होती तो वे यही कहते कि ----- " पैर तो शरीर का सबसे निचला और कम उपयोगी अंश है l जब तक मेरा मस्तिष्क और हृदय मौजूद है तब तक मुझे अपंग न कहा जाये और न ही दयनीय माना जाये l " वे कटे हुए पैरों को ही प्रशिक्षित करते रहे और नृत्य विद्द्या में इतने पारंगत हो गए कि उनकी कला को देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध रह जाते थे और उस विषय में रूचि रखने वाले उनसे शिक्षा भी प्राप्त करते थे l
17 October 2020
WISDOM ----- कठिनाइयाँ हमें सिखाने आती हैं
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है ---- कठिनाइयाँ हमें बहुत कुछ बताने , सिखाने आती है l सीखने वाली मानसिकता इससे बहुत कुछ सीख जाती है , इसके संकेतों को पहचान लेती है l ' इस सम्बन्ध में श्री अरविन्द ' मानव चक्र ' में लिखते हैं ---- नेपोलियन अपने दुर्दिनों में भगवान के संकेत को पहचान नहीं सका और इसी कारण यातनापूर्ण जेल जीवन में उसकी इहलीला समाप्त हुई l आचार्य श्री लिखते हैं --- कठिनाइयों से जूझने के लिए कभी - कभी ईश्वरीय संकेत आता है l जो इस संकेत को समझ लेता है और पुरुषार्थ करता है , वही संघर्ष के दरिया को पार कर लेता है l कठिनाइयों से जूझता इनसान जब वहां से निकलता है तो बहुत मजबूत बन जाता है l