किसी समय महर्षि रमण से पश्चिमी विचारक पॉल ब्रन्टन ने पूछा था ---- " महत्वाकांक्षा की जड़ क्या है ? " तब महर्षि हँसकर बोले ---- " हीनता का भाव , अभाव का बोध l " पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- ' मनुष्य जिन बड़ी से बड़ी बीमारियों और विक्षिप्तताओं से परिचित है , महत्वाकांक्षा से बड़ी बीमारी इनमें से कोई नहीं है l हीनता स्वयं से छुटकारा पाने की कोशिश में महत्वाकांक्षा बन जाती है l बहुमूल्य से बहुमूल्य साज - सज्जा के बावजूद यह न तो मिटती है और न ही नष्ट होती है l थोड़ी देर के लिए यह हो सकता है कि वह दूसरों की दृष्टि से छिप जाए , लेकिन अपने आपको लगातार उसके दर्शन होते रहते हैं l किसी चकाचौंध वाली सफलता के मिलने के बावजूद यह हीनता का भाव नष्ट नहीं होता l ' आचार्य श्री आगे लिखते हैं ---- हीन भाव की ग्रंथि से पीड़ित चित्त उसे छिपाने और भूलने की कोशिश में महत्वाकांक्षा से भर जाता है l महत्वाकांक्षा के ज्वर से पीड़ित व्यक्ति के पास सफलता तो आ जाती है , पर हीनता तो मिटती नहीं l विश्व का ज्यादातर इतिहास ऐसे ही बीमार लोगों से भरा पड़ा है l तैमूर , सिकंदर या हिटलर इसी ज्वर से पीड़ित थे l आचार्य श्री कहते हैं --- थोड़े बहुत रूप में इस बीमारी के कीटाणु सब में हैं l प्राय: सभी इस रोग से संक्रमित हैं l मनुष्य - मनुष्य के बीच सांसारिक संघर्ष का कारण यही है और युद्ध इसी का व्यापक रूप है l
28 November 2020
27 November 2020
WISDOM -----
परमात्मा ने चींटी से लेकर हाथी तक की सृष्टि रचना कर डाली l तब तक सृष्टि में न कोई उत्पात खड़ा हुआ न झंझट खड़ा हुआ l न ईश्वर से कोई कुछ मांगता न कोई शिकायत करता l किन्तु जब से वह मनुष्य की रचना कर चुका , तो उस दिन से परमात्मा बड़ा हैरान , बड़ा परेशान रहने लगा l नित नए उपद्रव , दंगे - फसाद , शिकायतों फरियादों का ताँता लग गया l सब काम रोककर शिकायतें निबटाते ही दिन बीतता l एक दिन परमात्मा ने देवताओं की बैठक बुलाई और कहा कि हमसे जीवन में पहली बार इतनी बड़ी भूल हुई है जितनी कभी नहीं हुई l अनेकों जीवों की रचना की , तब तक हम बड़े चैन से थे , किन्तु जब से मनुष्य की रचना की पूरी मुसीबत खड़ी हो गई l नित्य ही दरवाजे पर मांगने वालों और फरियाद करने वालों की भीड़ जमा रहने लगी है l अब कोई उपाय भी नहीं सूझता कि क्या किया जाये ? कोई ऐसी जगह बताओ जहाँ मैं छिपकर बैठ जाऊं l सब देवताओं ने सुझाव दिए , किसी ने कहा क्षीरसागर में , किसी ने कहा हिमालय पर तो किसी ने कहा चन्द्रमा में छुप जाओ l भगवान ने कहा , मनुष्य की अक्ल इतनी पैनी है कि वह आकाश , पाताल में कहीं भी पहुँच सकता है l तब देवर्षि नारद आए बोले --- " भगवन ! मनुष्य के दिल में छुपकर बैठ जाइये l इसकी आँखें बाहर देखती हैं l यह चारों ओर खोजता फिरेगा अपने अंदर यह कभी आपको खोजेगा ही नहीं l ' कहते हैं जबसे भगवान मनुष्य के हृदय में छिपकर बैठें हैं l जो इस रहस्य को जनता है वही उन्हें खोज पाता है l
26 November 2020
WISDOM -----
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --- मैं दमन करने की अमोघ शक्ति हूँ l मुझसे कोई बच नहीं सकता l भगवान कहते हैं ---दमन पाशविक भी है और ईश्वरीय विभूति भी है l भगवान कहते हैं --- दमन यदि विवेकहीन , औचित्यहीन व नीतिहीन हो तो यह आसुरी एवं पाशविकता का परिचय प्रदान करता है l घोर संकट का कारण बन जाता है तथा मनुष्य , समाज एवं सृष्टि को भारी क्षति पहुंचाता है l भगवान आगे कहते हैं --- यदि अन्याय , अनीति , अत्याचार , दुराचार , शोषण , भ्रष्टाचार का दमन किया जाता है तो दमन ईश्वरीय विभूति के रूप में अलंकृत होता है l जो इसे करने का साहस दिखाता है , दंड उसके हाथों में ईश्वरीय शक्ति के रूप में शोभित होता है l भगवान शिव का त्रिशूल , महाकाली का खड्ग , भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र , श्रीराम का धनुष , इंद्र का वज्र , परशुराम का परशु , यमराज का पाश और हनुमान जी की गदा ऐसे ही ईश्वरत्व को प्रकट करते है l शक्ति जब असुरों के हाथ में आ जाती है तो वे उसका दुरूपयोग कर अत्याचार और अन्याय करते हैं लेकिन वही शक्ति जब देवताओं के हाथ में आ जाती है तो वे उसका सदुपयोग करते हैं , लोक कल्याण के कार्य करते हैं , प्रजा को सुख - शांति मिलती है l
25 November 2020
WISDOM -----
महाराज ययाति को भोगों को भोगते हुए जीवन के सौ वर्ष कब पूरे हो गए , पता भी नहीं चला l यमदेव उन्हें लेने आ गए l उन्होंने यमदेव से प्रार्थना की ---- " मेरी सभी इच्छाएं अधूरी हैं , कृपया मुझे जीवनदान देने की कृपा करें " यमदेव बोले --- " यदि आपके सौ पुत्रों में से कोई एक भी पुत्र अपना यौवन आपको दे दे औ आपकी इच्छा पूर्ण हो सकती है l " कामग्रस्त ययाति ने अपने पुत्रों को बुलाकर उनसे यौवन की भीख मांगी l सभी ने मन कर दिया , केवल एक पुत्र तैयार हो गया l यमदेव को इस पर आश्चर्य हुआ और उन्होंने उससे ऐसा करने के पीछे का कारण पूछा l वह बोला ----- " जब सौ वर्षों के भोग से भी पिताजी की तृप्ति नहीं हो सकी तो मेरी कैसे होगी ? भोगों में समय गंवाना व्यर्थ है l " यमदेव ने प्रसन्न होकर उसे जीवनमुक्ति का आशीर्वाद दिया l सौ वर्ष पूर्ण हो जाने पर फिर ययाति के सामने यम प्रकट हुए तो ययाति ने पुन: वही याचना की l इन सौ वर्षों में उनके द्वारा पैदा हुए पुत्रों में से एक ने अपनी आयु उन्हें दे दी l इस तरह ययाति को दस बार जीवनदान मिला , वे एक हजार वर्ष तक जिए और विलास में रत रहे l अंतत: उन्हें पश्चाताप हुआ और वे समझ पाए कि भोगों की तृप्ति कभी नहीं होती l उन्हें नरक में घोर कष्ट भोगना पड़ा l ययाति की ये कथा ढलती उम्र के लोगों के लिए एक प्रेरणा है l
WISDOM ----
एक बार की बात है यमराज और उनके दूत धरती से आत्माओं को ले जाते , ढोते बहुत थक गए l युगों से यह कार्य कर रहे थे , किसी भी दिन कोई छुट्टी नहीं l उन्होंने महाराज से कुछ दिनों की छुट्टी माँगी l महाराज ने पहले तो मना किया , लेकिन पहली बार छुट्टी मांगी , तो देनी पड़ी l अब महाराज ने सोचा कि थोड़े दिनों की ही तो बात है क्यों न मृत्यु का ठेका कुछ मनुष्यों को सौंप दिया जाये l बहुत सोच - विचार के यह ठेका उन लोगों को सौंप दिया जो संपन्न थे , उम्मीद थी कि किसी लालच में नहीं आएंगे l लेकिन मनुष्य के लालच और तृष्णा का कोई अंत नहीं l ठेका मिलते ही उन्होंने मृत्यु को भी व्यापार बना दिया और उनकी तथा उनके आधीन काम करने वालों की सम्पति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ गई l इतने लोग मरने लगे कि संसार में हाहाकार मच गया l न केवल संसार में बल्कि ऊपर ब्रह्माण्ड में भी हाहाकार मच गया l यमराज जब आत्माओं को ले जाते थे तो न्याय होता था , कर्म के अनुसार स्वर्ग , नरक मिलता था लेकिन यमराज के छुट्टी लेने से आसुरी शक्तियां क्रियाशील हो गईं l अनेक अच्छी और बुद्धिमान आत्माओं को असुरों ने अपने कब्जे में कर लिया और उन्हें पीड़ित कर , जबरन दबाव बनाकर उनकी बुद्धि का उपयोग कर के संसार में असुरता का तांडव मचा दिया l गेहूं के साथ घुन भी पिसता है , संसार में अच्छे - बुरे सब अनेक परेशानियों में घिर गए , बहुत परेशान हुए l सबकी प्रार्थनाओं से शेषनाग पर शयन कर रहे भगवान भी जाग गए l उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र को भेजकर श्रेष्ठ आत्माओं को असुरता के चंगुल से मुक्त कराया l जब भी संसार में असुरता , अन्याय और अत्याचार बढ़ जाता है तब ईश्वर युग के अनुरूप अपने प्रयास से असुरता का अंत करते हैं l
WISDOM ----
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान अर्जुन को अपनी विशिष्ट विभूतियों के बारे में बताते हैं l---- मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को भगवान शस्त्र धारण करने वालों में अपना स्वरुप बताते हैं l भगवान कहते हैं ----- श्रीराम अति विनम्र , शिष्ट , मर्यादापूर्ण हैं l वे क्रोधित भी नहीं होते l उनके मन में न तो किसी के लिए हिंसा है , न ईर्ष्या , न किसी से शत्रुता , न प्रतिस्पर्धा l वे न तो किसी को दुःख देना चाहते हैं और न पीड़ा पहुँचाना चाहते हैं l विध्वंसकारी शस्त्र भी यदि श्रीराम के हाथ में होंगे , तो वे सृजन का ही माध्यम बनेंगे l इसलिए श्रीराम शस्त्रधारी होने पर भी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं , भगवान हैं l वे अतुलनीय हैं , मर्यादा व लोकहित के शिखर हैं l शस्त्र यदि रावण के हाथ में होंगे तो विनाश तय है क्योंकि उसके भी तर सिवाय दुर्गुणों के , लोभ , लालच , कामुकता , हिंसा के सिवाय और कुछ नहीं है l वह अपने शस्त्रों का जब भी प्रयोग करेगा , गलत ही करेगा l उसके द्वारा विनाश के सिवाय अन्य कुछ भी संभव नहीं है l गीता का शिक्षण हर युग के लिए है l आज संसार में आसुरी शक्तियां इतनी प्रबल होती जा रही हैं l हमें विवेकवान होने की जरुरत हैं , हम देखें कि हमारी योग्यता का लाभ कौन उठा रहा है , हम किसे शक्तिशाली बना रहे हैं -- राम को या रावण को ? यदि हमें तत्काल लाभ चाहिए तो निश्चित है कि हम असुरता का चयन करेंगे , फिर उसका परिणाम चाहे जो हो l ईश्वर ने हमें चयन की स्वतंत्रता दी है l सही मार्ग का चयन करने के लिए हम ईश्वर से सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करें l
24 November 2020
WISDOM ------
अत्याचारी और अन्यायी को यदि सत्ता का संरक्षण प्राप्त हो तो उसके परिणाम घातक होते हैं और उसका सामना करने के लिए धैर्य और विवेक की जरुरत है l महाभारत में एक प्रसंग है ----- राजा विराट का सेनापति था कीचक l बहुत शक्तिशाली था और उसकी गलतियों पर उसे मना करने और समझाने की राजा विराट में हिम्मत नहीं थी l पांचों पांडव और द्रोपदी अज्ञातवास के दौरान राजा विराट के यहाँ वेश बदलकर रह रहे थे l महारानी द्रोपदी ' सैरन्ध्री ' नाम से रनिवास में रानी की सेवा करती थीं l कीचक , राजा विराट की पत्नी का भाई था इसलिए रनिवास में बेरोक -टोक आता जाता था l जब से उसकी नजर सैरंध्री पर पड़ी , उसके मन में पाप आ गया और वह सैरंध्री से अनुचित व्यवहार करने लगा l एक दिन एकांत पाकर द्रोपदी ने अपना दुःख भीम से व्यक्त किया कि किस प्रकार कीचक उसे अपमानित करता है l भीम को बहुत क्रोध आया लेकिन उन्होंने द्रोपदी को समझाया कि कीचक बहुत बलशाली है , राजा विराट स्वयं उससे डरते हैं , उसे सत्ता का संरक्षण प्राप्त है इसलिए तुम उसका मुकाबला नहीं कर सकतीं , उसका अंत करने के लिए धैर्य और विवेक से कोई तरकीब सोचनी पड़ेगी l फिर भीम की सलाह के अनुसार दूसरे दिन जब कीचक सैरंध्री के सामने आया तो सैरंध्री ने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे वे उसके प्रस्ताव से सहमत हों साथ ही यह शर्त रखी कि वह अर्धरात्रि में नृत्यशाला में आये , चारों और घना अंधकार हो जिससे कोई देख न सके , लोक लाज का डर है l वहीँ सैरंध्री उसका इंतजार करेगी l जब रात्रि में कीचक नृत्यशाला पहुंचा तो वहां द्रोपदी के स्थान पर भीम बैठे थे , उन्होंने कीचक को ललकारा , फिर दोनों में मल्ल्युद्ध हुआ l बृहन्नला के वेश में अर्जुन मृदंग बजाते रहे , जिससे युद्ध का शोर बाहर न जाये , सुबह होने से पूर्व ही भीम ने कीचक का वध कर दिया ll